डॉ. अभिषेक जोशी
गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है, अन्नान् भवन्ति भूतानि। अर्थात् अन्न यानि आहार से ही जीवनमात्र का विकास होता है। आहार को आयुर्वेद में जीवन को आधार अन्नप्राशन संस्कार देने वाली मूलभूत तीन चीजों में से एक माना गया है। बच्चों को अन्न कब से दिया जाए, क्यों दिया जाए, कैसे दिया जाए, क्या न दिया जाए वगैरह विषय पर विस्तार विवेचना प्रस्तुत किया गया है। इस सिद्धान्त को आयुर्वेद में अन्नप्राशन संस्कार के अन्तर्गत बतलाया गया है।
अन्न यानि आहार और प्राशन यानि खिलाना। शास्त्रों में बच्चों को अन्न या फल रस सेवन कराने के लिए प्राशन शब्द का प्रयोग है। अन्नप्राशन संस्कार सप्तम संस्कार है। इस संस्कार में बालक को अन्न ग्रहण कराया जाता है। अब तक तो शिशु माता का दुग्धपान करके ही वृद्धि को प्राप्त होता था, अब आगे स्वयं अन्न ग्रहण करके ही शरीर को पुष्ट करना होगा, क्योंकि प्राकृतिक नियम सबके लिये यही है। अब बालक को परावलम्बी न रहकर धीरे-धीरे स्वावलम्बी बनना पड़ेगा। केवल यही नहीं, आगे चलकर अपना तथा अपने परिवार के सदस्यों के भी भरण-पोषण का दायित्व संम्भालना होगा। यही इस संस्कार का तात्पर्य है।
छठे माह में बालक का अन्नप्राशन संस्कार किया जाता है। छह मास तक की आयु के बच्चों के लिए माता का दूध ही संपूर्ण आहार है। इस आयु में बालक की वृद्धि के लिए विशिष्ट आहार व पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। केवल माता के दूध से अब बच्चे का सही विकास होना कठिन हो जाता है। तब बच्चों को अन्य फल, अनाज आदि आहार देने का जो विधान है वही अन्नप्राशन संस्कार कहलाता है।
आहार कब शुरू करें?
प्राय: आयुर्वेद के सभी आचार्यों के मत है कि छठे माह से बालक को माता के दूध के साथ अन्य आहार देना चाहिए। अन्न से केवल शरीर का पोषण ही नहीं होता, अपितु मन, बुद्धि, तेज व आत्मा का भी पोषण होता है। इसी कारण शुद्ध, सात्विक व पौष्टिक अन्न को ही जीवन में लेने का व्रत करने हेतु अत्रप्राशन-संस्कार संपन्न किया जाता है। अत्रप्राशन का उद्देश्य बालक को तेजस्वी, बलशाली एवं मेधावी बनाना है, इसलिए बालक को घृतयुक्त भात या दही, शहद और घृत तीनों को मिलाकर अन्नप्राशन करने का विधान है।
छह माह बाद बालक हल्के अन्न को पचाने में समर्थ हो जाता है, अत: अन्नप्राशन संस्कार छठें माह में ही करना चाहिए। इस समय ऐसा अन्न दिया जाता है, जो पचाने में आसान व बल प्रदान करने वाला हो। आचार्य कश्यप के अनुसार, छठे माह में फलप्राशन करवाना चाहिए और उसके पश्चात दाँत आने के बाद दसवें माह से अन्नप्राशन कराना चाहिए।
कैसा अन्न दें ?
बच्चों को सरल, तरल, लघु, मुलायम एवं सहज निगलने योग्य अन्न ही देना चाहिए। जो आहार माता ने गर्भिणी अवस्था में ग्रहण किया हो, वही आहार बालक को सहज ग्राह्य होता है। अत: जब बच्चों के दाँत निकलने लगे, तब धीरे-धीरे उसे रस आहार दें जो पचने में आसान और शरीर को बलवान बनाने वाला हो।
शुरुआत में यानि 6-8 मास तक उसे अच्छे से पकाई या उबाली हुई शाक-सब्जी को अच्छी तरह मसलकर द्रव जैसा करके दें। इनमें कद्दू, मटर, गाजर, हरी सब्जियां, टमाटर, आलू आदि दें। इसके साथ-साथ मौसमी फलों का रस भी दें।
उसके बाद 9-12 मास तक ऊपर बनाई हुई चीजों के साथ घी, मक्खन या तेल के साथ खिचड़ी या अच्छी तरह गलाया हुआ दलिया थोड़ी-थोड़ी मात्रा में दें। एक साल के बाद हलवा, पोहा, ढोकला, इडली, दोसा जैसे आहार दें।
आचार्य कश्यप के मतानुसार बारह मास के बाद बालकों की इच्छा अनुसार उसे जो अच्छा लगे, वैसा आहार देना चाहिए और अन्य निम्नलिखित आहार भी थोड़ी मात्रा में दें।
पुराना, छिलकारहित भुने हुए शालि एवं पौष्टिक चावलों को धोकर सिद्ध किए हुए द्रव में घी तथा नमक मिलाकर अवलेह बनायें। यह बच्चों के लिए काफी पौष्टिक और रूचिकर भोजन है। बच्चे की पाचन क्षमता के अनुसार गेंहू या जौ का आटे की रोटी या परांठा दें। बच्चे को पित्त की शिकायत होने पर मुनक्का, मधु एवं घृत मिला कर दें।
वात की समस्या होने पर बिजौरा नीबू के रस के साथ नमकीन भोजन दें।
किस प्रकार से अन्न दें तथा कैसे स्तनपान छुड़ाए?
स्त्री समय तक स्तनपान कराने के पश्चात् यदि शिशु को आहार दिया जाए तो वह स्वस्थ रहता है। धीरे-धीरे बच्चों को अन्न देते जाएं और क्रमश स्तनपान छुड़ाते जाए।
बच्चों को स्तनपान छुड़वाकर धीरे-धीरे विविध आहार देने को आयुर्वेद में स्तन्यपनयन का नाम दिया गया है। यह प्रक्रिया सभी बच्चों में सुगमता से नहीं हो पाती है। बच्चे शीघ्रता से स्तनपान करना नहीं छोड़ते और अन्न लेना नहीं शुरू करते। अत: आचार्यों ने इसके लिए भी कुछ उपाय बतलाये
स्तन लेपन
स्तन पर कड़वे पदार्थों का लेप करें, उसे साफकर फिर बच्चों को पान करवायें। इससे हल्की कड़वाहट के अनुभव से बालक स्तनपान त्याग देगा। चमेली पुष्प का लेप जो स्तन में दुग्ध का शोष करता है, वैसे कल्क लगाए।
अवात्सल्य
स्तनपान करने के आग्रह पर बालक को झिड़कें।
सावधानियां
अन्त्र प्राशन संस्कार बच्चों के लिए एक महत्वपूर्ण संस्कार है। इस संस्कार के समय निम्न बातों का विशेष ध्यान दें-
आहार द्रव्य विधि सरल रखें।
समीप में उपलब्ध आहार द्रव्य ही दें। जो भी व्यंजन दें वे स्वाद और सघनता में हल्का हो। एक या डेढ़ साल के बाद बच्चों को घर में खाया जाने वाला आहार दे सकते हैं।
अन्नप्राशन संस्कार के लिए नियत विधान के पीछे यह भाव था कि माता लाड़-प्यार के कारण शिशु को अनिश्चित काल तक अपना स्तनपान न कराती रहे। इससे माता तथा शिशु दोनों के स्वास्थ्य पर कुप्रभाव पड़ता है तथा शिशु को अन्य ठोस पोषक आहार न मिलने से उसका सम्यक रूप से शारीरिक विकास भी नहीं हो सकेगा।
अत: समय आने पर इसे अवश्य किया जाना चाहिए। इसलिए अधिकतम 24 महीने के बाद बच्चों को अवश्य स्तनपान छुड़वा दें।
एक बार में एक ही प्रकार का आहार दें। नया आहार देने के लिए एक सप्ताह इन्तजार करें जिससे कि पता चल पाए की बच्चों को वह आहार पच रहा है या नहीं। अच्छी प्रकार से किया हुआ अन्नप्राशन संस्कार अवश्य ही बालक के लिए स्वास्थ्यकारक और पोषक होता है।





