श्रीपाद अवधूत स्वामी महाराज
पीठाधीश्वर, श्री दत्त पादुका मंदिर श्री क्षेत्र बांगर, देवास
मानव सभ्यता के विकास में वर्षा का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रहा है। कृषि, जल-संसाधन, वनस्पति, पशुधन और समूचे जीवन का आधार वर्षा ही है। आधुनिक मौसम विज्ञान वर्षा की व्याख्या समुद्र के तापमान, वाष्पीकरण, वायुदाब, पवन-परिसंचरण, आद्र्रता, संघनन तथा वायुमंडलीय संवहन जैसी भौतिक प्रक्रियाओं के माध्यम से करता है। दूसरी ओर, भारतीय वैदिक साहित्य इन्हीं प्राकृतिक घटनाओं को इन्द्र, पर्जन्य, वरुण, मरुत, वायु और आप: जैसे प्रतीकों के माध्यम से व्यक्त करता है। यहाँ प्रकृति को केवल भौतिक सत्ता नहीं, बल्कि ‘ऋत’ अर्थात् ब्रह्माण्डीय व्यवस्था के रूप में देखा गया है।
हाल के वर्षों में भारतीय मानसून के संदर्भ में Niño और La Niña की व्यापक चर्चा हुई है। ऐसे में प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या वैदिक साहित्य में इन जैसी प्राकृतिक घटनाओं का कोई संकेत मिलता है? क्या इन्द्र-वृत्र युद्ध केवल पौराणिक कथा है, अथवा उसके पीछे वर्षा और सूखे के संघर्ष का कोई प्राकृतिक बोध भी निहित है? इन प्रश्नों का उत्तर खोजने के लिए वैदिक साहित्य और आधुनिक विज्ञान दोनों की दृष्टि को समझना आवश्यक है।
आधुनिक मौसम विज्ञान के अनुसार सूर्य की ऊष्मा महासागरों और नदियों के जल का वाष्पीकरण करती है। यह जलवाष्प वायुमंडल में पहुँचकर पवनों के साथ दूर-दूर तक जाती है। ऊँचाई पर पहुँचकर उसका संघनन होता है, बादल बनते हैं और अनुकूल परिस्थितियों में वर्षा होती है। इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को आज जल-चक्र (Hydrological Cycle) कहा जाता है।
भारतीय ग्रंथों में भी जल-चक्र का संकेत मिलता है। शतपथ ब्राह्मण में कहा गया है—
“आदित्य: रश्मिभिरेवापोऽदत्ते।”
अर्थात् सूर्य अपनी किरणों द्वारा जल को ग्रहण करता है। आगे ब्राह्मण-ग्रंथों की व्याख्या में यह भी बताया गया है कि वही जल पुन: वर्षा बनकर पृथ्वी पर लौटता है। यद्यपि यह आधुनिक वैज्ञानिक विवरण नहीं है, फिर भी यह प्रकृति के चक्र के सूक्ष्म अवलोकन का परिचायक है।
ऋग्वेद (5.83) के पर्जन्य सूक्त में वर्षा का अत्यंत सजीव चित्र मिलता है—
“प्र वाता वान्ति पतयन्ति विद्युत:…”
अर्थात् जब पर्जन्य वर्षा करता है, तब वायु चलती है, बिजली चमकती है, वनस्पतियाँ अंकुरित होती हैं और समस्त जगत जीवनदायी जल से परिपूर्ण हो जाता है। यहाँ वायु, विद्युत, वर्षा और वनस्पति के पारस्परिक संबंध का अत्यंत स्वाभाविक वर्णन मिलता है।
इसी प्रकार बृहदारण्यक उपनिषद् में कहा गया है—”धूमादभ्रम्। अभ्राद्वर्षम्।”
अर्थात् धूम से मेघ और मेघ से वर्षा होती है। यह आधुनिक विज्ञान की भाषा नहीं, बल्कि प्रकृति के चक्र का दार्शनिक निरूपण है।
छान्दोग्य उपनिषद् की पंचाग्नि विद्या भी जल के ऊपर उठने, वर्षा बनने, पृथ्वी पर आने, अन्न बनने और पुन: जीवन का अंग बनने की प्रक्रिया का वर्णन करती है। इससे स्पष्ट है कि ऋषियों ने जल और जीवन के संबंध को गहराई से समझा था।
अब प्रश्न उठता है कि वृत्र कौन है?
वैदिक साहित्य में वृत्र वह शक्ति है जो जल को रोकती है। ऋग्वेद में इन्द्र द्वारा वृत्र-वध के बाद नदियों और जलधाराओं के मुक्त होने का वर्णन मिलता है। पुराणों में इसी कथा का विस्तार हुआ और वृत्रासुर को विशाल सर्प या असुर के रूप में चित्रित किया गया, जिसने जल और मेघों को रोक रखा था। इन्द्र ने दधीचि की अस्थियों से बने वज्र द्वारा उसका वध किया और अवरुद्ध जल पुन: प्रवाहित हुआ।
यदि इस कथा को प्रतीकात्मक दृष्टि से देखें तो इसका अर्थ सूखे और वर्षा के संघर्ष के रूप में भी किया जा सकता है। वृत्र जल को रोकने वाली शक्ति का, जबकि इन्द्र उसे मुक्त करने वाली शक्ति का प्रतीक बन जाते हैं। इस प्रकार यह कथा केवल धार्मिक आख्यान नहीं, बल्कि प्रकृति के अनुभव का काव्यात्मक रूप भी हो सकती है।
इस संदर्भ में यास्काचार्य का निरुक्त विशेष महत्त्व रखता है। वे इन्द्र-वृत्र युद्ध को प्राकृतिक प्रक्रियाओं की उपमा बताते हैं। उनके अनुसार जल और प्रकाश के परस्पर संबंध से वर्षा होती है तथा युद्ध का वर्णन प्रतीकात्मक है। इसी प्रकार सायणाचार्य ने भी ऋग्वेद भाष्य में वृत्र को जल को ढकने वाला मेघ अथवा अवरोध बताया है।
इन भाष्यों से यह स्पष्ट होता है कि मध्यकालीन भारतीय विद्वानों ने भी वैदिक कथाओं के प्राकृतिक अर्थों पर विचार किया था। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं कि उन्होंने आधुनिक मौसम विज्ञान की सभी अवधारणाओं का प्रतिपादन कर दिया था।
दधीचि के वज्र की कथा भी अत्यंत रोचक है। पुराणों में कहा गया है कि वृत्रासुर को वरदान प्राप्त था कि उसका वध सामान्य अस्त्र से नहीं हो सकता। तब दधीचि ने अपनी अस्थियाँ दान दीं और उनसे वज्र निर्मित हुआ। आधुनिक दृष्टि से कुछ विद्वान इसकी तुलना आकाशीय बिजली से करते हैं, क्योंकि बिजली की शाखायुक्त आकृति और वज्र के पारंपरिक स्वरूप में दृश्य समानता दिखाई देती है। यह एक आकर्षक प्रतीकात्मक व्याख्या है, यद्यपि इसे ऐतिहासिक तथ्य नहीं कहा जा सकता।
आज के मौसम विज्ञान में El Nino और La Nina प्रशांत महासागर के तापमान और वायुमंडलीय परिसंचरण से जुड़ी महत्त्वपूर्ण घटनाएँ हैं। श्वद्य हृद्बठ्ठश की स्थिति में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है, जिससे भारत सहित अनेक क्षेत्रों में मानसून कमजोर पड़ सकता है। इसके विपरीत El Nino प्राय: सामान्य अथवा अधिक वर्षा से जुड़ी होती है।
कुछ आधुनिक लेखक इन घटनाओं की तुलना वैदिक साहित्य में वर्णित ‘बड़वानल’, ‘सोम’ या ‘वरुण’ जैसे प्रतीकों से करते हैं। यह तुलना दार्शनिक और सांस्कृतिक दृष्टि से रोचक अवश्य है, परंतु यह ध्यान रखना चाहिए कि वैदिक ग्रंथों में El Nino या La Nina का प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं मिलता। इसलिए इन्हें आधुनिक पुनव्र्याख्या के रूप में ही देखना चाहिए, न कि प्रत्यक्ष वैज्ञानिक समानता के रूप में।
इसी प्रकार बृहत्संहिता में वराहमिहिर ने वर्षा के पूर्व संकेतों, पवनों, मेघों, आकाशीय परिवर्तनों और समुद्री प्रभावों के आधार पर वर्षा के पूर्वानुमान का विस्तृत वर्णन किया है। यह उस समय के प्राकृतिक अवलोकनों का उत्कृष्ट उदाहरण है।
वास्तव में भारतीय ज्ञान-परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसने प्रकृति को एक समग्र व्यवस्था के रूप में देखा। जल, वायु, अग्नि, सूर्य, बादल, बिजली और वनस्पति को अलग-अलग नहीं, बल्कि परस्पर जुड़े हुए तत्वों के रूप में समझा। आधुनिक विज्ञान भी पृथ्वी की जलवायु को एक परस्पर संबद्ध प्रणाली (Climate System) के रूप में देखता है। दोनों की कार्यप्रणाली भिन्न है, किन्तु दोनों का लक्ष्य प्रकृति को समझना है।
आधुनिक विज्ञान प्रयोग, मापन और गणितीय मॉडल पर आधारित है, जबकि वैदिक साहित्य प्रतीक, दर्शन और काव्य की भाषा में प्रकृति का वर्णन करता है। इसलिए दोनों की तुलना करते समय यह आवश्यक है कि न तो विज्ञान को शास्त्रों में जबरन खोजा जाए और न ही प्राचीन भारतीय ज्ञान की अवलोकन-शक्ति को कम करके आँका जाए।
इन्द्र, पर्जन्य, वरुण और मरुत जैसे देवताओं को यदि प्रकृति की कार्यशील शक्तियों के प्रतीक के रूप में देखा जाए, तो वैदिक साहित्य हमें पर्यावरण के प्रति संवेदनशील दृष्टि प्रदान करता है। इसी प्रकार वृत्र केवल एक पौराणिक असुर नहीं, बल्कि जल-अवरोध, सूखे या प्राकृतिक संकट का भी प्रतीक माना जा सकता है। यह व्याख्या हमें यह समझने में सहायता करती है कि भारतीय ऋषियों ने प्रकृति के विविध रूपों को सांस्कृतिक भाषा में कैसे अभिव्यक्त किया।
आज जब जलवायु परिवर्तन, अनियमित मानसून और वैश्विक तापवृद्धि जैसी चुनौतियाँ हमारे सामने हैं, तब प्राचीन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के बीच संवाद पहले से अधिक प्रासंगिक हो गया है। विज्ञान हमें कारण और समाधान बताता है, जबकि भारतीय परंपरा हमें प्रकृति के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने का नैतिक संदेश देती है।
अत: यह कहना अधिक उचित होगा कि वैदिक साहित्य और आधुनिक मौसम विज्ञान दो भिन्न ज्ञान-पद्धतियाँ हैं। एक प्रतीकों और दर्शन की भाषा बोलता है, दूसरा प्रयोग और गणित की। फिर भी दोनों हमें प्रकृति की विशाल, जटिल और परस्पर संबद्ध व्यवस्था को समझने की प्रेरणा देते हैं। यही इस अध्ययन का वास्तविक महत्व है।





