आचार्य वराहमिहिर महान वैज्ञानिक

प्रो. बलवंत सिंह राजपूत
वरिष्ठ वैज्ञानिक, पूर्व कुलपति एवं पूर्व अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश राज्य उच्च शिक्षा परिषद


आचार्य वराहमिहिर प्राचीन भारत के महान गणितज्ञ, खगोलविज्ञानी तथा ज्योतिषाचार्य थे। उनका जन्म विक्रमी संवत् 562 (505 ई.) में उज्जैन के समीप शिप्रा नदी के तट पर स्थित कपिथ (वर्तमान कायथा) ग्राम में विख्यात ज्योतिषी आदित्यदास के परिवार में हुआ था। उनके पिता सूर्य के परम उपासक थे और उन्हीं से वराहमिहिर ने प्रारम्भिक अवस्था में ज्योतिष तथा गणित की शिक्षा प्राप्त की।

बाल्यकाल से ही वे अत्यन्त मेधावी, प्रतिभाशाली और जिज्ञासु थे। पिता से प्राप्त पारम्परिक गणित एवं ज्योतिष के ज्ञान को आधार बनाकर उन्होंने इन दोनों विषयों में व्यापक अध्ययन और अनुसंधान किया। युवावस्था में वे कुसुमपुर (पाटलिपुत्र) गए, जहाँ उनकी भेंट उस युग के महान गणितज्ञ एवं खगोलविज्ञानी आर्यभट्ट से हुई। कहा जाता है कि आर्यभट्ट की प्रेरणा से उन्होंने ‘ज्योतिष एवं खगोल विज्ञान को अपने जीवन का प्रमुख ध्येय बना लिया। उस समय उज्जैन विद्या और खगोल विज्ञान का प्रसिद्ध केन्द्र था, इसलिए वे वहीं रहने लगे। समय के साथ उनके असाधारण ‘ज्योतिषीय ज्ञान की ख्याति सम्राट विक्रमादित्य (चन्द्रगुप्त द्वितीय) तक पहुँची और उन्होंने वराहमिहिर को अपने नवरत्नों में स्थान प्रदान किया।
एक अन्य मान्यता के अनुसार वराहमिहिर महान ऐतिहासिक चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य (विक्रमी संवत् के संस्थापक) के नवरत्नों में से एक थे। महाकवि कालिदास ने अपनी प्रसिद्ध कृति ज्योतिर्विद्याभरण में अवन्ती (उज्जैन) के सम्राट विक्रमादित्य की सभा के नौ रत्नों का उल्लेख किया है। ये थे—धन्वंतरि, क्षपणक, अमरसिंह, शंकु, वेतालभट्ट, घटकर्पर, वराहमिहिर, वररुचि तथा कालिदास।

कालिदास ने अपनी इस कृति में वराहमिहिर द्वारा निर्मित समय-मापक घटयंत्र का भी उल्लेख किया है। कहा जाता है कि वराहमिहिर ने इन्द्रप्रस्थ में लौह स्तम्भ का निर्माण कराया तथा ईरान के शहंशाह नौशेखा के आमंत्रण पर जुन्दीशापुर में वेधशाला की स्थापना की। यह भी कहा जाता है कि उन्होंने दिल्ली में एक अत्यन्त ऊँची वेधशाला का निर्माण कराया, जिसे आज कुतुबमीनार के नाम से जाना जाता है।

New Illustrated Columbia Encyclopedia (खंड-6) में उनके संबंध में उल्लेख किया गया है— Varahamihir was a profound scholar of all the Sciences and Arts, from Botany to Astronomy and from Military Science to Civil Engineering.

वराहमिहिर का प्रमुख उद्देश्य गणित और विज्ञान को जनहित से जोडऩा था। यह वैदिक काल से चली आ रही भारतीय ऋषि-परम्परा का ही अनुपालन था। उन्होंने ज्योतिष, गणित और खगोल विज्ञान के क्षेत्र में अपने महत्वपूर्ण योगदान द्वारा भारतीय ज्ञान-परम्परा को और अधिक समृद्ध बनाया।

लगभग पैंतालीस वर्ष की आयु तक वे निम्नलिखित चार महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना कर चुके थे—लघुजातक, बृहत्जातक, बृहत्संहिता और पंचसिद्धान्तिका। इन ग्रंथों में अनेक स्थानों पर त्रिकोणमिति के महत्वपूर्ण सूत्र मिलते हैं, जो उनके गहन गणितीय ज्ञान के परिचायक हैं। उन्होंने एक सूत्र दिया कि— “किसी कोण की ‘या के वर्ग और उसकी को’ या के वर्ग का योग एक (1) के बराबर होता है।” यह सूत्र उनके त्रिकोणमितीय ज्ञान की उच्चता को दर्शाता है। उन्होंने आर्यभट्ट द्वारा प्रतिपादित ‘ज्या-सारिणी को और अधिक परिशुद्ध बनाया तथा शून्य के बीजगणितीय गुणों का भी विवेचन किया।
उन्होंने संख्या-सिद्धान्त नामक एक अन्य गणितीय ग्रंथ की भी रचना की थी। यद्यपि इस ग्रंथ का अधिकांश भाग उपलब्ध नहीं है, तथापि प्राप्त अंशों से ज्ञात होता है कि उसमें उन्नत अंकगणित, त्रिकोणमिति तथा अनेक गणितीय संकल्पनाओं का वर्णन था।

उनकी प्रसिद्ध कृति बृहत्संहिता में संचय और क्रमसंचय का ज्ञान भी मिलता है। इसमें एक श्लोक के माध्यम से बताया गया है कि यदि सोलह प्रकार के द्रव्य उपलब्ध हों, तो उनमें से किसी भी चार को मिलाकर कुल 1820 प्रकार के इत्र बनाए जा सकते हैं।

आधुनिक गणित की भाषा में इसे इस प्रकार व्यक्त किया जाता है— ख ष्ट = (16x15x14x13) / (1x2x3x 4) = 1820

बृहत्संहिता में वास्तुकला, भवन निर्माण, वायुमंडल की प्रकृति, वृक्ष-आयुर्वेद, ग्रहों की गति, सूर्य एवं चन्द्र ग्रहण, इत्र निर्माण, रत्नों तथा मोतियों आदि अनेक विषयों का विस्तृत विवेचन मिलता है। पंचसिद्धान्तिका में वराहमिहिर ने उस समय प्रचलित पाँच प्रमुख सिद्धांतों का अत्यंत रोचक वर्णन किया है— पौलिश सिद्धांत, रोमक सिद्धांत, वसिष्ठ सिद्धांत, सूर्य सिद्धांत पितामह सिद्धांत।

इनमें सूर्य सिद्धांत को विशेष प्रसिद्धि प्राप्त हुई। इसमें उन्होंने अयनांश का मान 50.32 सेकंड बताया है। पितामह सिद्धांत के अनुसार पृथ्वी पर एक वर्ष 365 दिन तथा 21½ घटिकाओं के बराबर माना गया है। पौलिश सिद्धांत में सूर्य के चारों ओर भ्रमण करने वाले ग्रहों की दीर्घवृत्तीय कक्षाओं तथा उनके दिनों और पृथ्वी के दिनों के मध्य निम्नलिखित संबंध बताए गए हैं—

बुध के 584/11 दिन = पृथ्वी के 89 दिन 2 घंटे।
शुक्र के 1157/52 दिन = पृथ्वी के 224 दिन 17 घंटे।
मंगल के 7804/45 दिन = पृथ्वी के 697 दिन।
शनि के 3991/11 दिन = पृथ्वी के 10765 दिन 19 घंटे।

वराहमिहिर ने सूर्य और चन्द्रमा के आकार तथा पृथ्वी से उनकी दूरी की भी गणना प्रस्तुत की थी। उन्होंने फलित ज्योतिष के क्षेत्र में भी अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की। अपने एक ग्रंथ में वे लिखते हैं— ”ज्योतिष विद्या एक अथाह सागर है और हर कोई इसे सरलता से पार नहीं कर सकता। मेरी पुस्तक एक सुरक्षित नौका है; जो इसे पढ़ेगा, वह इस सागर को पार कर सकेगा। यह केवल आत्मप्रशंसा नहीं थी, बल्कि उनकी विद्वत्ता का परिचायक था। आज भी उनके ग्रंथों को ज्योतिष साहित्य की अमूल्य धरोहर माना जाता है।

वराहमिहिर वेदों के प्रकाण्ड विद्वान थे, किन्तु उनकी दृष्टि एक वैज्ञानिक की थी। अपने समकालीन वैज्ञानिक आर्यभट्ट की भाँति उन्होंने भी पृथ्वी के गोल होने का समर्थन किया। उन्होंने गुरुत्वाकर्षण संबंधी विचार व्यक्त करते हुए कहा—”पृथ्वी में ऐसी शक्ति है जो सभी वस्तुओं और प्राणियों को अपनी ओर आकर्षित करती है और उन्हें पृथ्वी से जुड़े रहने देती है।”उन्होंने यह भी कहा कि पौधे तथा दीमक भूगर्भीय जल की उपस्थिति का संकेत देते हैं। आज भूगर्भ विज्ञान में भी इस विचार को महत्त्व दिया जाता है।

आचार्य वराहमिहिर ने पर्यावरण विज्ञान, जल-विज्ञान, भूविज्ञान तथा अंतरिक्ष-विज्ञान से संबंधित अनेक महत्वपूर्ण सिद्धांतों का उल्लेख किया। संस्कृत व्याकरण पर उनकी अद्भुत पकड़ तथा छन्दशास्त्र में उनकी दक्षता के कारण उनके सभी ग्रंथ साहित्यिक सौन्दर्य और वैज्ञानिक गंभीरता का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने गणित और खगोल जैसे जटिल विषयों को भी सरल, रोचक और सुबोध शैली में प्रस्तुत किया। उनकी पंचसिद्धान्तिका और बृहत्संहिता ने उन्हें गणित और ज्योतिष के क्षेत्र में वही प्रतिष्ठा प्रदान की, जो राजनीति एवं अर्थशास्त्र में कौटिल्य तथा व्याकरण में पाणिनि को प्राप्त है।
कहा जाता है कि वराहमिहिर ने यूनान सहित अनेक दूरस्थ देशों की यात्राएँ कीं और वहाँ भारतीय गणित एवं ज्योतिष का प्रचार-प्रसार किया। विक्रमी संवत् 644 (587 ई.) में इस महान गणितज्ञ एवं वैज्ञानिक का निधन हो गया। आचार्य वराहमिहिर के जीवन तथा विज्ञान एवं गणित के विविध क्षेत्रों में उनके अमूल्य योगदान का विस्तृत विवरण प्रोफेसर बलवंत सिंह राजपूत द्वारा लिखित पुस्तक Historical, Cultural and Scientific Heritages of India में उपलब्ध है, जिसका प्रकाशन प्रगति प्रकाशन, मेरठ (उत्तर प्रदेश) द्वारा दो खंडों में किया गया है।