वेदों में व्यापार और समृद्धि

सुबोध कुमार
वेद एवं गौ विशेषज्ञ।


वेदों को सामान्यत: ईश्वर की स्तुति-उपासना का ग्रंथ समझा और माना जाता है। परंतु वेद लौकिक जीवन को सुखी और समृद्ध बनाने का निर्देश देने वाले मंत्रों से भरे पड़े हैं। सच तो यह है कि वेदों में मनुष्य को पर्याप्त धन कमाने, उस धन से धर्माचरण करने तथा धर्माचरण से सुख प्राप्त करने का निर्देश दिया गया है। जिस सीएसआर यानी कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी की काफी चर्चा होती है, वेदों ने उसके निर्देश पहले से ही दे रखे हैं। इसी प्रकार व्यापार में कर्मचारियों की हितरक्षा यानी श्रमकानूनों की भी वेदों में भरपूर चर्चा मिलती है।

वेद उचित तथा अनिंदित उपायों से भरपूर धन कमाने का निर्देश देते हैं। इस संबंध में वेदों में ढेर सारे सूक्त मिलते हैं, उनमें से अथर्ववेद के तीसरे अध्याय का 15वाँ सूक्त काफी महत्त्वपूर्ण है। उसके मंत्रों का अर्थ यहाँ प्रस्तुत है।
पहले मंत्र में कहा गया है कि मैं अपने व्यापार की उन्नति के लिए इंद्र के सामथ्र्य का आह्वान करता हूं, वह हमारे समीप आवे हमें व्यापार की प्रगति के साधनों की खोज के लिए प्रेरित करे। हम अपने व्यापार के मार्ग की प्रगति की सभी बाधाओं जैसे कि शत्रुओं, लुटेरों, जंगली पशुओं आदि को दूर करते हुए निरंतर धन प्राप्त करने वाले बनें। इस मंत्र में ऋषियों ने निरंतरता की बात की है, जिसे आज सस्टेनेबिलिटी के रूप में काफी महत्त्व दिया जाता है।

दूसरा मंत्र कहता है कि जो व्यापार के लिए विभिन्न साधनों से विमान, रथ, नौका इत्यादि द्वारा सब मार्गों पर चलते हैं, वे गाय का दूध-घी खरीदने-बेचने के व्यापार से भी धन लाएं। यह मंत्र मुख्यत: गोकृषि की बात कर रहा है। व्यापार और उद्योग आज की भांति प्रकृति के विनाशक नहीं हों। वे प्राकृतिक उत्पादों पर भी साथ-साथ ध्यान दें।

तीसरे मंत्र में व्यापारी की बुद्धि को शुद्ध रखने की प्रार्थना की गई है। कहा गया है कि जिस प्रकार मैं घी और समिधाओं से वेद मंत्रों के साथ दु:खों से पार हो कर बल प्राप्त करने की इच्छा से यज्ञ करता हूँ, उसी प्रकार इस व्यापार रूपी यज्ञ में अपनी सामथ्र्य से जितनी आहुति दे सकता हूँ और देता भी हूँ। मेरी बुद्धि भी द्रुत गति से उत्तम तथा शुभगुणों वाली और पुष्ट हो कर मुझे अनपेक्षित धन प्राप्त कराए। इस मंत्र का तात्पर्य है कि यदि बुद्धि शुभगुण वाली न हो तो पूरा सामथ्र्य लगाने के बाद भी व्यापार आदि से पूरा लाभ नहीं कमाया जा सकता।

तीसरा मंत्र न केवल गलत मार्ग से बचने का निर्देश देता है, बल्कि यह भी बताता है कि उससे व्यापार में हानि भी हो सकती है। वहाँ कहा गया है कि अपने लक्ष्य को पाने के लिए जिस गलत मार्ग पर हम दूर तक चले आए हैं और जिससे व्यापार में हानि हुई है, उसे सहन करने की हमें शक्ति दो। मेरी बुद्धि से किए गए प्रयत्न और शक्ति प्रत्येक व्यापरिक वस्तु के खरीदने और बेचने में लाभकारी हो।

चौथा मंत्र व्यापार में निरंतर तथा उत्तरोत्तर लाभ होने की बात करते हुए कहता है, कि धन से धन कमाने की इच्छा से मैं जो व्यापार करता हूं उस के लाभ को मैं कभी नष्ट न होने दूं और मेरी वह पूंजी खूब बढ़े।

पाँचवें मंत्र में व्यापाक में मन लगाने और साथ ही प्रशासन व अन्यान्य अधिकारियों की सहायता मिलने की बात कही गई है। मंत्र कहता है कि जिस व्यापार को मैं धन के लाभ के लिए चला रहा हूं, उसे मैं मन लगा कर करूं और प्रजापति यानी प्रशासन सविता यानी उत्पाद अधिकारी, सोम यानी बुद्धि और ज्ञान, अग्नि यानी ऊर्जा के साधन मेरे सहायक रहें। इसप्रकार वेद व्यापार में वृद्धि के लिए न केवल प्रशासन के सहयोग की बात करते हैं, बल्कि रिसर्च एंड डेवलेपमेंट और ऊर्जा की आवश्यकता पर भी बल देते हैं।

छठे मंत्र में वेद व्यापारियों तथा उद्यमियों को उन पर आश्रित कर्मचारियों तथा अन्यान्य पशु आदियों के हितों का भी ध्यान रखने का निर्देश देते हैं। मंत्र कहता है कि हम समस्त प्राणियों तथा नर-नारियों के हित में आदरपूर्वक अपने कर्म से पूजा करते हैं। इस प्रकार हम अपने शरीर (स्वास्थ्य), अपनी संतान, आश्रित जनों यानी सेवक तथा कर्मचारियों, गौ आदि पशुओं इत्यादि की आवश्यकताओं के प्रति भी सजग रहें।

अथर्ववेद के इस सूक्त का सातवाँ मंत्र रखरखाव यानी मेंटिनेन्स पर जोर देता है। मंत्र में कहा गया है कि सब दिन हमेशा जैसे खड़े घोड़े के लिए पौष्टिक अन्न, पालन-पोषण तथा रखरखाव की व्यवस्था की जाती है, ठीक उसी प्रकार हम धन से समृद्धि पाने के लिए अपने सब साधनों- पूंजीगत उपकरण का ठीक से रख रखाव करें।
इस प्रकार हम पाते हैं कि वेद व्यापार आदि से समृद्धि पाने का न केवल निर्देश देते हैं, बल्कि उसके लिए आवश्यक उपायों का भी वर्णन करते हैं। वेदों के अन्यान्य सूक्त जैसे कि ऋग्वेद के दसवें मंडल का लक्ष्मीघ्नम् सूक्त व्यापारियों और उद्यमियों के समाज के प्रति उत्तरदायित्व और दानशीलता के महत्व पर प्रकाश डालता है।