वेदों में पेय पदार्थ

सुबोध कुमार
लेखक गौ एवं वेद विशेषज्ञ हैं।


वेदों में विविध प्रकार के विज्ञान की जानकारी है। ऐसा ही एक जानकारी है स्वास्थ्यवर्धक पेयों के बारे में। वेद कहते हैं कि अनेक प्रकार के पेय पदार्थ हैं जो हमारे शरीर को स्वस्थ रखते हैं और ऊर्जा प्रदान करते हैं। सामान्य तौर पर वेद जल, सक्रिय जल, दूध, शहद आदि की चर्चा करते हैं। वेद पेय पदार्थों के माध्यम से केवल शारीरिक स्वास्थ्य पाने की ही चर्चा नहीं करते, बल्कि वे इससे हमारे मन की शुद्धि होने की भी बात बतलाते हैं। ऋग्वेद के दसवें अध्याय का नौवां सूक्त इससे ही संबंधित है। इसके कुछ मंत्र यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद में भी आए हैं।
उत्तम जलीय पेय पदार्थ शरीर को ऊर्जा प्रदान करके जीवन को स्वस्थ और सुखमय बनाते हैं। ऋ10.9.1. अथर्व 1.5.1, यजु 11.50

जैसे वात्सल्यमयी माता बालक को अपने दूध पिलाती है, वैसे ही उत्तम जलीय पेय पदार्थ हमें अपने परम कल्याण्कारी रसों से पुष्ट करें। ऋ 10.9.2, अथर्व 1.5.2, यजु 11.51, यजु 36.15, साम 1868

हमारे दूध इत्यादि पेय पदार्थो में वह गुण हों जो हमारी प्रजनन शक्ति को बढ़ाएं, जिसके द्वारा ही हम सब जीवित हैं। ऋ 10.9.3, अथर्व1.5.3, यजु11.52, यजु 36.16, साम 18/39

दिव्य गुणों वाले उत्तम जलीय पेय पदार्थ हमारे लिए शांतिदायक हों, अभीष्ट सुख प्राप्त करने में सहायक हों और पीने के लिए उपलब्ध हों। अस्वच्छता के कारण रोग, मलीनता इत्यादि को दूर करने के लिए तथा रोगों की सम्भावनाओं को दूर करने के लिए, भोजन इत्यादि करने से पूर्व हाथ धोने के लिए, शौच इत्यादि के बाद हाथ धोने के लिए, शरीर को स्वच्छ करने के लिए स्नान इत्यादि के लिए, घर की साफ सफाई के बाद हाथ धोने के लिए, पालतू कुत्ते बिल्ली इत्यादि जानवरों से खेलने के बाद हाथ धोने के लिए, किसी बीमार व्यक्ति से मिलकर आने के बाद हाथ धोने के लिए, छींक या खांसी के बाद हाथ धोने के लिए, खेलने या बागवानी के बाद रोगों के सूक्ष्माणुओं को दूर करने ले लिए हाथ धोने के लिए, चमड़े की वस्तुओं जूते इत्यादि को हाथ लगाने के बाद हाथ धोने के लिए, मलीन वस्त्रों, घरबार इत्यादि को स्वच्छ करने के बाद हाथ धोने के लिए के लिए स्वच्छ जल सब समय उपलब्ध हो। ऋ 10.9.4,अथर्व 1.6.1,यजु 36.12

प्रशासन का यह दायित्व है कि सब निवारणीय रोगों को दूर करने की सामर्थ रखने वाले जल सब प्रजा को उपलब्ध हों। ऋ 10.9.5, अथर्व 1.5.4

उत्तम जलीय पेय पदार्थ ही सब रोगों की ओषधि हैं। जल में विश्व का कल्याण करने की ऊर्जा भी होती है। ऋ 10.9.6 , ऋ 1.23.20, अथर्व 1.6.2

यही विषय इस ऋग्वेद 10.99.4 में भी मिलता है। इस पक्ष का वैज्ञानिक विश्लेषण निम्न प्रकार से किया जाता है। पौष्टिकता से युक्त तथा वेग से आगे बढते हुए और श्वास लेते हुए घी को वारि कहते हैं। इसको ही आधुनिक विज्ञानी भंवर वोर्टेक्स प्रक्रिया द्वारा उपचारित चैतन्यता युक्त जल यानी सक्रिय जल कहते हैं। सक्रिय जल यानी वह जल जिसने विद्युत को वरण कर लिया है। पवित्र गंगा जल की सामथ्र्य का यही वैज्ञानिक रहस्य प्रतीत होता है, होम्योपेथी और सींग खाद रूपी बायोडायनमिक उर्वरक में भी जल का उपचार इसी प्रकार किया जाता है। आधुनिक विज्ञानी ऐसे उपचारित जल को एक्टिवेटेड यानी चेतना युक्त जल कहते हैं।

हे जल, आप मुझमें ऐसे ओषधि तत्व भरो जो मेरे शरीर के लिए रक्षा कवच बनें और मैं चिरकाल तक सूर्य का दर्शन करूं। ऋ 10.9.7, ऋ 1.23.21, अथर्व 1.6.3

मेरे शरीर के ऊपर से बहते हुए यह जल मेरे बाह्य शरीर के मल को दूर करने के साथ ही मेरे मन और शरीर में जो कुछ भी दुष्ट स्वभाव, दुष्ट इच्छाएं, वासनाएं इत्यादि हैं, उनसे मुझे ऊपर उठने में सहायता करें। ऋ 10.9.8, ऋ 1.23.22, अथर्व 7.89.3

स्नान करना एक मानसिक परिवर्तन की भी दशा है, व्यक्ति कुछ निश्चित आचरणों, त्याग, इत्यादि का पालन करेगा और उस दौरान गंगा स्नान करेगा, दान पुण्य, करेगा, तर्पण करेगा, इससे उसके मन से पाप का मानसिक बोझ उतर जायेगा और समाज उसे स्वीकार करेगा। यही उसके पाप धुलने का आशय है। वैदिक न्याय प्रणाली हमेशा से सुधारवादी रही है। जिस सुधारवाद का ठेका आज के प्रगतिशील लोग ले रहे हैं, वह अत्यंत प्राचीनकाल से भारतवर्ष में रही है। भारत में व्यक्ति का सुधार अपराधिक एवं पाप मनोवृत्तियों के उन्मूलन की एक वैधानिक व्यवस्था प्राचीनकाल से रही है। हमारी यह मान्यता है कि सुधार के रास्ते बंद नहीं होने चाहिए। जाने-अनजाने किसी के द्वारा कोई पाप कर्म या अपराध हो जाए तो उसकी मानसिक स्थिति और विचारधारा का परिवर्तन कर उसे सन्मार्ग पर लाया जाए।

दूध के समान ऊर्जा प्रदान करने वाले सब रसयुक्त तरल पदार्थ जैसे मधु, घी इत्यादि मुझे सदैव उपलब्ध रहें, जो मुझे तेज, बल और वर्चस्व से संयुक्त करें। ऋ 10.9.9, ऋ 1.23.23, यजु 20.22