हाल ही में समाचार-पत्रों के माध्यम से यह पता लगा कि दिल्ली स्थित एम्स में एक किशोरी का निधन अत्यधिक मात्रा में चाउमीन, पास्ता, मैग्गी, बर्गर जैसे जंक फूड के सेवन के कारण से हो गया। यह घटना आधुनिक आहार-संस्कृति पर गंभीर प्रश्न अवश्य खड़े करती है। आयुर्वेद की दृष्टि से देखें तो यह केवल एक आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि लंबे समय से चली आ रही ”विरुद्ध आहार” और ”मिथ्या आहार” की जीवनशैली का परिणाम भी हो सकती है।
आयुर्वेद कहता है कि जो भोजन हम प्रतिदिन ग्रहण करते हैं, वही हमारे शरीर, मन और रोग-प्रतिरोधक क्षमता का निर्माण करता है। चाउमीन, पास्ता, मैग्गी और बर्गर जैसे अत्यधिक प्रसंस्कृत, अत्यधिक तैलीय, तले-भुने और रसायनयुक्त खाद्य पदार्थ आयुर्वेद में गरिष्ठ और शरीर के स्रोतों को अवरुद्ध करने वाले माने जाते हैं। इनका नियमित और अधिक मात्रा में सेवन शरीर की पाचन शक्ति को मंद कर देता है परिणामस्वरुप भोजन का ठीक से पाचन नहीं हो पाता है। जिसके कारण शरीर में आम अर्थात विषैले अवशेष का निर्माण होता है। यही आम धीरे-धीरे शरीर के स्रोतों में जमा होकर मोटापा, कब्ज, अम्लपित्त, यकृत विकार, हृदय रोग और यहाँ तक कि आकस्मिक जटिलताओं का कारण बन सकता है। किशोरावस्था में यह खतरा और भी बढ़ जाता है, क्योंकि इस उम्र में शरीर विकासशील होता है और गलत आहार उसके संतुलन को शीघ्र बिगाड़ देता है।
आधुनिक जंक फूड न केवल पोषण-हीन होता है, बल्कि आयुर्वेदिक दृष्टि से यह विरुद्ध आहार की श्रेणी में भी आता है अर्थात ऐसा भोजन जो देश, काल, ऋतु और व्यक्ति की प्रकृति के प्रतिकूल हो। ठंडे पेय के साथ तला-भुना भोजन, देर रात भारी आहार, बार-बार खाने की आदत—ये सभी दोषों (विशेषकर कफ और वात) को विकृत करते हैं। परिणामस्वरूप शरीर में सूजन, गैस, हृदय पर दबाव और अचानक स्वास्थ्य गिरावट जैसी स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।
यह घटना समाज और परिवार दोनों के लिए चेतावनी है। आज स्वाद, विज्ञापन और सुविधा के नाम पर बच्चों को पौष्टिक, ताजा और देशी आहार से दूर किया जा रहा है। आयुर्वेद स्पष्ट कहता है कि हितकर आहार वही है जो ताजा, हल्का, ऋतु-अनुकूल और संतुलित हो जैसे दाल, चावल, रोटी, सब्जियाँ, फल, घी की सीमित मात्रा और घर का बना भोजन। ऐसा आहार न केवल शरीर को पोषण और मन को स्थिरता देता है।
यही समय है कि हम अपने बच्चों को स्वाद के नाम पर बीमारी परोसने के विरुद्ध दृढ़ता से खड़े हों। विद्यालयों, अभिभावकों और नीति-निर्माताओं को मिलकर जंक फूड के अंधाधुंध प्रचलन पर अंकुश लगाना चाहिए। अच्छी बात है कि ऐसे भी समाचार मिलते हैं कुछ शैक्षिक संस्थानों ने अपनी कैन्टीनों में जंक फूड की बिक्री पर रोक लगा रखी है। आयुर्वेदिक जीवनशैली, समय पर भोजन, सम्यक मात्रा, उचित व्यायाम और पर्याप्त निद्रा को पुन: सामाजिक व्यवहार में स्थान देना होगा।
अंतत: यह घटना यह स्थापित करती है कि स्वस्थ जीवन दैनिक अनुशासन का परिणाम है। आयुर्वेद की चेतावनी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है कि जो जैसा खाता है, वैसा ही बनता है। क्षणिक तृप्ति के लिए जंक फूड का सेवन करने के बजाय यदि हम संतुलित आहार को अपनाएँ, तो अनेक असमय होने वाली दुर्घटनाओं को रोका जा सकता है।
भारतीय धरोहर के द्वारा पिछले पंद्रह वर्षों से इस विषय पर भोजन से भेषज श्रंखला के अंतर्गत लगभग ढाई हजार व्याख्यानों का आयोजन किया जा चुका है। जिसका मुख्य उद्देश्य जनसामान्य के मध्य आहार संबंधी सही जानकारियों का प्रचार कर उन्हें जागरुक करना है। हमारा स्पष्ट मत है कि शासन के द्वारा भी इस तरह के राष्ट्रव्यापी जागरुकता अभियान समय समय पर चलाए जाने चाहिए।




