हरि मंगल
वरिष्ठ पत्रकार
भारतीय लोकजीवन में त्योहारों का अपना अलग महत्व है। हर्षोल्लास, भाईचारा और सामाजिक समरसता के साथ मनाये जाने वाला हर त्योहार समाज को विशिष्ट संदेश भी देता आ रहा है। हिन्दू समाज द्वारा कई त्योहारों को सार्वभौमिक मान्यता प्रदान की गई है। यह त्योहार देश और विदेश में परंपरागत रूप से मनाये जा रहे हैं, लेकिन अनेक स्थानों पर उनके स्वरूप अलग-अलग हैं। होली, दीपावली के क्रम में लोकप्रिय तीसरा त्योहार विजयादशमी है। विजयादशमी का पर्व शारदीय नवरात्रि की समाप्ति के अगले दिन मनाया जाता है। शारदीय नवरात्र आश्विन मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा (प्रथम तिथि) से लेकर नवमी तिथि तक होता है जिसमें देवी शक्ति मां दुर्गा के विभिन्न रूपों की पूजा और उनकी लीलाओं की झांकी प्रदर्शित होती है। दशमी तिथि को विजयादशमी के रूप में जाना जाता है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान राम ने लंकापति रावण को युद्ध में पराजित कर सकल ब्रह्मांड को संदेश दिया था कि बुराई पर अच्छाई की विजय सुनिश्चित है।
नवरात्रि में 9 दिन तक जहां मां दुर्गा की पूजा उपासना होती है, वहीं दूसरी ओर रामलीला अर्थात भगवान राम की लीलाओं का मंचन भी समाज में होता है, जिसके माध्यम से प्रभु श्रीराम के जीवन आदर्श और सामाजिक मर्यादा के स्थापित मानदंडों को नाट्य रूप में समाज के सामने प्रस्तुत किया जाता है। दशमी तिथि का मुख्य आकर्षण राम-रावण युद्ध और रावण की पराजय के फलस्वरूप उसका पुतला दहन होता है परन्तु प्रयागराज से सटे कौशांबी जनपद के दारानगर कस्बे की रामलीला में भगवान राम अपनी सेना के साथ युद्ध के मैदान में लंकापति रावण को पराजित करते हुए अपने बाणों से उसका वध करते हैं। श्रीराम और रावण का यह युद्ध खुले मैदान में होता है। दोनों ओर की सेनाएं अपनी पूरी ताकत और कुशल रणनीति का प्रदर्शन करते हुए एक—दूसरे को मात देने का प्रयास करती हैं। श्रीराम और रावण की सेना के बीच होने वाले इस युद्ध को देखने के लिए आसपास के जनपदों से हजारों की संख्या में लोग एकत्र होकर उत्साह बढाते हैं।
दारानगर में रामलीला का मंचन और श्रीराम और रावण के बीच सजीव युद्ध की परम्परा का इतिहास काफी पुराना है। कहा जाता है कि मुगल बादशाह शाहजहां के सबसे बड़े बेटे दारा शिकोह ने ही दारानगर बसाया था जो एक उदारवादी शासक था और सभी मत—पंथों का सम्मान करता था। उसके समय में धार्मिक आयोजन शरू हुये थे लेकिन उसकी हत्या करके सत्तासीन औरंगजेब के कार्यकाल में इन आयोजनों पर विराम लग गया था। रामलीला के मंचन का क्रमबद्ध इतिहास 1779-80 से मिलता है। रामलीला समिति के अध्यक्ष जयमणि तिवारी बताते हैं कि पिछले 245 वर्ष से रामलीला का मंचन और रामलीला मैदान में श्रीराम और रावण के बीच सजीव युद्ध होता आ रहा है। यद्यपि समय के साथ तमाम बदलाव हुये, आधुनिकता का बोलबाला बढ़ा लेकिन हम अपनी पुरानी परंपराओं के अनुसार ही आयोजन करते आ रहे हैं। यही कारण है कि हमारी रामलीला और युद्ध जो कि कुप्पी युद्ध के नाम से पूरे क्षेत्र में विख्यात है, को देखने के लिये समीप के जनपद प्रयागराज, प्रतापगढ़, बांदा, फतेहपुर सहित प्रदेश और मध्य प्रदेश के जनपदों से लोग आते हैं। इनमें बड़ी संख्या में पर्यटक और शोधकर्ता भी शामिल हैं। हमारे क्षेत्र के तमाम लोग जो जीवन—यापन के लिये दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े शहरों में रहते हैं, वे लोग भी नवरात्रि में रामलीला और कुप्पी युद्ध का आनंद लेने अथवा भाग लेने के लिये गांव आते हैं।
शक्तिपीठ माता शीतला के मंदिर और संत मलूकदास के आश्रम के समीप स्थित दारानगर कस्बे की रामलीला अपनी धार्मिक आभा के लिये विख्यात है, लेकिन स्थानीय निवासी शिव शंकर मोदनवाल बताते हैं कि लोकप्रियता के तीन प्रमुख कारण हैं। पहला कुप्पी युद्ध दूसरा सजीव श्रीराम-रावण युद्ध और रावण वध और तीसरा सामाजिक समरसता और साम्प्रदायिक सद्भाव का अनूठा संगम। शिव शंकर बताते हैं कि अतीत में रामलीला और कुप्पी युद्ध दारानगर के रामलीला मैदान में ही सम्पन्न होते थे लेकिन बढ़ती आबादी के कारण दारानगर का व्यापक विस्तार हुआ और वह कई गांवों तक फैल गया। पिछले लगभग दो दशक से रामलीला नवरात्रि की अलग अलग तिथियों में अलग गांवों में होती है। नवरात्रि में रामलीला का प्रारम्भ प्रतिपदा के दिन दारानगर गांव में मुकुट पूजन से होता है। शादीपुर की रामलीला में सीता हरण का मंचन होता है। शादीपुर, कटरा, दारानगर, म्योहरा आदि प्रमुख स्थानों पर अलग अलग तिथियों में रामलीला का कार्यक्रम तो होता है लेकिन यह सब दारानगर की रामलीला के नाम से ही सुप्रसिद्ध है।
दारानगर रामलीला अपने कुप्पी युद्ध के लिये ही दूरदराज क्षेत्रों तक विख्यात है। कुप्पी युद्ध का वृत्तांत सुनने में जितना रोचक लगता है उससे ज्यादा रोमांच देखने में आता है। यह कुप्पी युद्ध दो दिन विजयादशमी और एकादशी को होता है। पहले दिन 4 युद्ध और दूसरे दिन 3 युद्ध होते हैं दोनों ही दिन म्योहरा के रामलीला मैदान में सुबह से ही बड़ी संख्या में दर्शक मैदान में पहुंचने लगते हैं। यद्यपि युद्ध दोपहर में शुरू होता है। प्रभु श्रीराम की सेना लाल वस्त्र में और रावण की सेना काले वस्त्र में होती है। दोनों ओर से 25-25 सैनिक होते हैं और एक युद्ध का समय 10 मिनट का होता है। दोनों ओर के सभी सैनिक स्थानीय होते हैं और उनके चयन में सामाजिक समरसता का पूरा ध्यान रखा जाता है। मैदान में युद्ध के संचालन के लिये रामलीला कमेटी के पदाधिकारी, सदस्य तथा क्षेत्र के तमाम गणमान्य लोग मौजूद रहते हैं। सारे सैनिकों के हाथ में कुप्पी होती है जो मजबूत प्लास्टिक की बनी होती है। इसकी आकृति प्राचीन काल में होने वाले युद्ध में प्रयुक्त होने वाली कुप्पी जैसी होती है। आयोजकों की ओर से युद्ध शुरू करने की सीटी बजते ही दोनों ओर की सेनायें एक—दूसरे पर टूट पड़ती हैं। दोनों ओर की सेनाओं का भाव अपने अपने ईष्ट को विजय दिलाने की ओर होता है। 10 मिनट का समय समाप्त होते ही संचालन करने वालों की सीटी बजती है और युद्ध रूक जाता है। जो सैनिक जहां और जिस हालत में रहता है वहीं रुक जाता है। पहले दिन इस प्रकार के चार युद्ध होते हैं और दोनों सेनाओं के योद्धा पूरी ताकत से विजय के लिये जूझते दिखायी पड़ते हैं। परम्परा के अनुरूप पहले दिन के चारों युद्ध में लंकापति रावण की सेना को ही विजय मिलती है।
अगले दिन एकादशी को पुन: वही क्रम होता है। दोनों ओर की सेनाएं अपने कुप्पी के साथ युद्ध मैदान में उतरती हैं लेकिन उस दिन का रोमांच ज्यादा होता है, क्योंकि रावण की सेनाओं की हार और रावण का वध होता है। आयोजकों की ओर से युद्ध का उद्घोष होते ही योद्धा एक—दूसरे पर प्रहार करते हुये वास्तविक युद्ध का रोमांच पैदा करते हैं। दर्शकों की ओर से श्रीराम की सेना का उत्साहवर्धन करने के लिये जय सिया राम, जय सिया राम के गगनभेदी नारे लगते रहते हैं। रामलीला समिति के सदस्य मृदुल मिश्र कहते हैं कि एकादशी के दिन होने वाले युद्ध का भी समय 10 मिनट का ही होता है और तीनों युद्ध प्रभु श्रीराम की सेना जीतती है। आखिरी युद्ध में रथ पर सवार भगवान राम और लक्ष्मण अपने धनुष वाण से सेना को परास्त करके युद्ध लड़ रहे रावण का वध कर देते हैं। इस सजीव वध का दृश्य देखने आये दर्शकों के हर्ष और उल्लास की कोई सीमा नहीं होती है। आयोजक बताते हैं कि इस प्रकार का ऐतिहासिक युद्ध काशी के रामनगर के अतिरिक्त किसी अन्य स्थान पर होने की जानकारी उनके पास नहीं है।
रामलीला आयोजन समिति के एक प्रमुख सदस्य बताते हैं कि रामलीला हो या कुप्पी युद्ध उसमें भाग लेने वाले सभी कलाकार और सैनिक स्थानीय होते हैं। अनेक लोग तो एक लम्बे अर्से से जुड़े हैं। इस मेले की तैयारी और पात्रों के रिहल्सल का काम नवरात्रि से काफी पहले शुरू हो जाता है जिसमें स्थानीय लोगों का बड़ा सहयोग होता है। कार्यक्रम में होने वाला खर्च भी स्थानीय लोगों से सहयोग के रूप में प्राप्त होता है।





