विवाह संबंध का आधार पारस्परिक प्रेम

प्रो. लल्लन प्रसाद
अध्यक्ष, कौटिल्य फाउंडेशन, दिल्ली


कौटिल्य (चाणक्य) द्वारा लगभग 320 ईसा पूर्व में रचित अर्थशास्त्र एक विशद ग्रंथ है जिससे जीवन का कोई पहलू अछूता नहीं है। अर्थनीति, राजनीति, समाजशास्त्र, न्याय और नीति शास्त्र, वास्तु शास्त्र, युद्ध और शांति और अनेक विषयों पर इसमें जो व्याख्या की गई है वह कालातीत है, आज भी बहुत अंशों में व्यावहारिक और मान्य है। विवाह संबंध और उससे जुड़े विषयों की कौटिल्य ने धर्मस्थीय तीसरे अधिकरण के तीन प्रकरणों (58-60) में व्याख्या की है और अपने विचार रखे हैं। विवाह के लिए पारस्परिक प्रेम को वे आवश्यक मानते थे: सर्वेषांम प्रीत्यारोपणमप्रतिसिद्धंम।

विवाह के प्रकार
चाणक्य काल में 12 वर्ष की लड़की और 16 वर्ष का लड़का कानून बालिग माने जाते थे। विभिन्न प्रकार के विवाहों का जो विवरण अर्थशास्त्र में मिलता है उसमें धर्म—सम्मत विवाह सर्वाधिक मान्य है, जिसके बाद ही सारे सांसारिक व्यवहार आरंभ होते हैं। आठ प्रकार के विवाहों में ब्रह्म विवाह, प्रजापति विवाह, आर्ष और ऋत्विक विवाह को धार्मिक मान्यता थी, बाकी चार प्रकार के विवाह हैं- गंधर्व, असुर, राक्षस और पैशाच। ब्रह्म विवाह में वस्त्र आभूषण आदि से सजाकर विधिपूर्वक कन्यादान किया जाता है। प्रजापति विवाह में कन्या और वर दोनों सहधर्म पालन करने की प्रतिज्ञा कर बंधन स्वीकार करते हैं। आर्ष विवाह में वर से गौ का जोड़ा लेकर विवाह किया जाता है। ऋत्विक विवाह में विवाह वेदी में बैठकर कन्यादान किया जाता है इसे दैव विवाह भी कहते हैं। कन्या और वर के मां—बाप की अनुमति के बिना जो विवाह होता है, वह गंधर्व विवाह कहलाता है। कन्या के पिता को धन देकर जो विवाह किया जाता है उसे असुर विवाह कहते हैं। कन्या के साथ बलात्कार करके जो विवाह किया जाता है उसे राक्षस विवाह की संज्ञा दी गई है। सोई हुई कन्या को हरण करके उसके साथ विवाह करने को पैशाच विवाह कहा गया है। पहले चार प्रकार के विवाहों में माता-पिता की सहमति होने के कारण उन्हें धार्मिक मान्यता है। जिन विवाहों में माता-पिता लड़की के बदले में धन लेकर ब्याह की अनुमति देते हैं वे धर्म सम्मत नहीं हैं।

स्त्री धन
अर्थशास्त्र में दो प्रकार के स्त्री धन का विवरण मिलता है— वृत्ति और आवध्य। जो धन स्त्री के नाम से जमा किया जाता है, रकम की सीमा निर्धारित होती है उसे वृत्ति कहा गया है। जो सोने चांदी के जेवर के रूप में होते हैं जिनकी तादाद का कोई नियम नहीं है उसे आवध्य की संज्ञा दी गई है। पति के परदेश चले जाने पर यदि जीविका का और कोई साधन न हो, विपत्ति, बीमारी, दुर्भिक्ष, आर्थिक संकट आदि से बचने के लिए और धार्मिक कार्यों के लिए पत्नी अपना निजी धन खर्च कर सकती है। संतान पैदा होने पर भी यह धन खर्च किया जा सकता है। राक्षस और पैशाच पद्धति से विवाह करने वालों के लिए इसकी अनुमति नहीं है। स्त्री धन की व्यवस्था आपातकाल के लिए की गई है। पुत्रहीन विधवा पत्नी अपने धर्म का पालन करती हुई आजीवन स्त्री धन का उपयोग कर सकती है। पत्नी के मरने के बाद बचा हुआ धन उसके उत्तराधिकारियों को मिलना चाहिए। पति के रहते हुए यदि पत्नी मर जाए तो उसका निजी धन उसकी संतानों में बांट दी जाए, लड़के ना हो तो सारा धन लड़कियों को दे दिया जाए। यदि लड़कियां भी ना हों तो पति उस धन का उपयोग कर सकता है। कुछ परिस्थितियों में दहेज में मिले हुए धन के उपयोग से स्त्री वंचित की जा सकती है जैसे राज्य के प्रति बगावत, आवारागर्दी आदि।

आचरण की शुद्धता
विवाह संबंध का स्थायित्य और पारिवारिक सुख पति-पत्नी दोनों के आचरण पर निर्भर करता है। चाणक्य के मत में पति-पत्नी के अतिचार दंडनीय अपराध हैं। पराई स्त्री के साथ संभोग करने के चिन्ह स्पष्ट दिखाई देने पर भी यदि पुरुष इनकार कर दे तो भी वह दंड का भागी होता है। स्त्री पर किसी तरह का जुर्म करना भी अपराध की श्रेणी में आता है। रजस्वला स्त्री के साथ या उसकी इच्छा के विरुद्ध संभोग निषिद्ध माना गया है। पराई स्त्री को अपने घर में पनाह उस स्थिति में देना जबकि अपने घर में उस पर कोई संकट न हो दंडनीय माना गया है। दांपत्य नियमों का उल्लंघन करने वाली स्त्री के लिए अर्थशास्त्र में दंड की व्यवस्था है। पति को चाहिए कि पहले वह नम्रतापूर्वक उसे समझाने की कोशिश करें, यदि वह ना माने तभी दंडित करें। अकारण ही निर्दोष पत्नी के साथ बुरा व्यवहार करना, पति घर से भाग कर दूसरे पुरुष के साथ मैथुन के लिए सहवास करना, पति से द्वेष करना, पति की इच्छा के विरुद्ध घर के दरवाजे बंद कर देना, उसको घर से बाहर रहने को मजबूर करना, पर पुरुष के साथ एकांत में अश्लील बातें, चूमने और मैथुन करने आदि को पत्नी का अतिचार कहा गया है, दांपत्य जीवन के नियमों का उल्लंघन और दंडनीय माना गया है। विवाह संबंधी कुछ अपराधों जैसे उपहार देकर अनैतिक काम के लिए पुरुष पर स्त्री की अपेक्षा दोगुना दंड की व्यवस्था है।

संबंध विच्छेद
चार प्रकार के धर्म विवाहों में संबंध विच्छेद की अनुमति नहीं है— अमोक्षो धर्म विवाहानाम। विशेष परिस्थितियों में ही स्त्री और पुरुष दोनों को संबंध विच्छेद का अधिकार दिया गया है। पति से द्वेष रखने वाली स्त्री पति की इच्छा के विरुद्ध तलाक नहीं दे सकती, इसी प्रकार पति भी अपनी पत्नी को तलाक नहीं दे सकता। दोनों में परस्पर समान दोष होने पर ही संबंध विच्छेद संभव है। पत्नी में कुछ बुराइयां आ जाने के कारण यदि उसका पति परित्याग करना चाहे तो जो धन उसको स्त्री की ओर से मिला है उसे वह स्त्री को लौटा दे, यदि इसी कारण कोई स्त्री पति से संबंध विच्छेद करना चाहे तो पति से पाए हुए धन को उसे वापस कर दे। अपनी इच्छा से स्त्री यदि मायके में रहने लगती है या स्वतंत्र रहकर अपना गुजारा करती है तो उसके भरण—पोषण के लिए पति को बाध्य नहीं किया जा सकता। यदि पति पत्नी से द्वेष करने लगता है तो उसको चाहिए कि वह पत्नी को अपने भाई—बंधुओं के साथ रहने से ना रोके। पति के साथ द्वेष करने वाली पत्नी यदि सात ऋतु काल तक दूसरे पुरुष के साथ समागम करती रहे तो वह अपना स्त्री धन पति को वापस कर दे और उसे दूसरी स्त्री के साथ समागम करने की अनुमति दे दे।

पुनर्विवाह
पति के परदेस चले जाने पर स्त्री एक साल तक उसका इंतजार करे। यदि पति ने उसके भरण— पोषण का पूरा इंतजाम कर दिया हो तो इससे दुगुने समय तक पत्नी उसका इंतजार करे। अध्ययन के लिए विदेश गए पति की पुत्रहीन स्त्रियां 10 वर्ष तक और पुत्रवती स्त्रियां 12 वर्ष तक अपने पतियों के आने की प्रतीक्षा करें। किसी राज्य कार्य से बाहर गए पतियों की प्रतीक्षा उनकी स्त्रियां आयु पर्यंत करें। पत्नी द्वारा संतान न होने पर पति दूसरा विवाह कर सकता है। प्राचीन मान्यता है: पुत्रार्था हि स्त्रिय:। चार प्रकार के धर्म सम्मत विवाहों के अंतर्गत ब्याही पत्नी के पुनर्विवाह संबंधी व्यवस्था, जो अर्थशास्त्र में दी गई है, उसके अनुसार बिना कहे ही पति परदेश चला जाए तो पत्नी 7 मासिक धर्म तक उसका इंतजार करे। यदि उसकी कोई सूचना मिल गई हो तो एक वर्ष तक उसकी प्रतीक्षा करे। यदि कहकर पति विदेश जाए और उसकी कोई खबर ना मिले तो 5 मासिक धर्म तक और मिल जाए तो 10 मासिक धर्म तक उसका इंतजार करे। विवाह के समय प्रतिज्ञात धन में से जिसने अपनी पत्नी को थोड़ा ही धन दिया हो और विदेश जाने पर उसकी कोई खबर ना मिले तो 3 मासिक धर्म पर्यंत, यदि खबर मिल जाए तो 7 मासिक धर्म तक पत्नी उसकी प्रतीक्षा करे। जिस पति ने विवाह में प्रतिज्ञात सभी धन पत्नी को चुकता कर दिया हो विदेश जाने पर उसकी खबर ना मिले तो पांच मासिक धर्म तक और खबर मिल जाए तो 10 मासिक धर्म तक उसकी प्रतीक्षा करे। इन सभी अवस्थाओं के बीत जाने पर कोई भी स्त्री धर्माधिकारी से आज्ञा लेकर अपनी इच्छा से दूसरा विवाह कर सकती है। पति के संन्यास लेने पर या उसकी मृत्यु हो जाने पर मासिक धर्म तक पत्नी दूसरी शादी ना करे। यदि उसकी कोई संतान हो तो एक वर्ष तक ठहर जाए। उसके बाद पति के सगे भाई से विवाह कर सकती है, कोई सगा भाई ना हो तो समान गोत्र वाले किसी पारिवारिक भाई के साथ विवाह कर सकती है। ऋतु काल के साथ पुनर्विवाह जोडऩे के पीछे आचार्य कौटिल्य की धारणा महिलाओं के प्रति उनके सम्मान का द्योतक है: तीर्थोपरोधो हि धर्मवधं- ऋतु काल में स्त्री को पुरुष का सहवास न मिलाना धर्म का नाश होने के बराबर है।

चाणक्य चंद्रगुप्त के गुरु थे, उनकी गणना भारत के महान ऋषियों में होती है। उनका काल भारत का स्वर्ण युग था जिसके वे निर्माता माने जाते हैं। उनका जीवन दर्शन भारतीय समाज के लिए महान प्रेरणादायक है। सुखी जीवन के लिए उनका एक लोकप्रिय श्लोक है: यश पुत्रो वशीभूतो भार्या छंदाअनुगामिनी। विभवे यश्च संतुष्टस्तस्य स्वर्ग इहैव हि।
जिसका पुत्र आज्ञाकारी हो, पत्नी पतिव्रता हो, जो अपने धन से संतुष्ट हो उसके लिए स्वर्ग यहीं पर है।