राजीव रंजन
एनएचपीसी में इंजीनियर तथा प्रसिद्ध लेखक
भारतीय संस्कृति का महापर्व अर्थात् महाकुंभ का आरंभ कब हुआ, इस विशिष्ट परिपाटी में कब और किस तरह तीर्थयात्रियों को आकर्षित करना आरंभ किया, इस पर इतिहासकार और शोधार्थी एकमत नहीं हैं। इस महापर्व की व्यापकता का विश्लेषण करते हुए यह बात निश्चित रूप से कही जा सकती है कि ऐसी परम्पराएं किसी एक-दो युग की थाती नहीं, अपितु सनातन रीति-मान्यताओं में यह बीज रूप से विकसित होते हुए वटवृक्ष बना है। आज यदि इस बात पर हम तर्क करने लगें कि कौन इसका प्रथम आयोजक था तो किसी निष्कर्ष पर पहुंचना असंभव हो जाता है, परंतु धर्मग्रंथों के उल्लेखों से निश्चित रूप से यह भान हो जाता है कि सनातन धर्म जितना पुराना है, उतना ही प्राचीन कुंभ मेला भी है। सम्राट अशोक के कालखण्ड में शासन की सम्पूर्ण ऊर्जा केवल और केवल बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में लगी रही। राज्याश्रय प्राप्त होने से अन्य धर्मावलंबियों की मान्यताओं-परंपराओं की अवनति होने लगी और प्राथमिकता के केवल स्तूपों का निर्माण होता रहा। निश्चय ही ऐसी अवस्थाओं का सीधा प्रभाव कुम्भ जैसे विशाल आयोजनों पर भी पड़ा था। अपनी अपूर्व प्रतिभा तथा आध्यात्मिक शक्ति के बल पर समस्त भारत में वेदांत की विजय पताका फहराने वाले शंकराचार्य को सनातन मान्यताओं-प्रथाओं-परिपाटियों के पुनरुद्धारक की तरह देखा जा सकता है। उन्होंने कुम्भ मेले को उसकी भव्यता लौटाने का महती कार्य किया है।
यह विषय महाकुंभ की इसी महती यात्रा को सम्राट हर्षवर्धन के कालखंड के समय के उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर समझने का प्रयास है। यह इसलिए आवश्यक है चूँकि इन्हीं समय में शासक का बौद्ध धर्म की महायान शाखा के प्रति झुकाव भी देखने को मिलता है और वह महाकुंभ के प्रति भी नितांत आस्थावान है। हम बात वर्धन काल अर्थात् 606 से 720 ई. के मध्य की कर रहे हैं। इस दौर के सर्वाधिक चर्चित और यशस्वी शासक रहे हैं सम्राट हर्षवर्धन, जिन्हें मौखरि वंश के अवसान के पश्चात् शासन प्राप्त हुआ था। उन्होंने कन्नौज को केंद्र में रख कर वर्ष 647 ई. अर्थात् 41 वर्ष तक शासन किया था। हर्षवर्धन के व्यक्तित्व को एक योद्धा और विजेता के रूप में, कुशल प्रशासक के रूप में, विद्या-उन्नायक और साहित्यानुरागी के रूप में, कला के संरक्षक और प्रोत्साहक के रूप में जाना जाता है साथ ही उनकी धार्मिक प्रतिबद्धताओं पर अनेक विमर्श होते रहे हैं। सम्राट हर्षवर्धन की धार्मिक मान्यताओं को लेकर संभ्रम की स्थिति इसलिए उत्पन्न होती उल्लेख मिलते हैं कि उनके द्वारा कन्नौज में एक सर्व धर्म सभा आयोजित की गई थी। इस सम्मेलन में हर्षवर्धन ने बौद्ध-चीनी यात्री ह्वेनसांग का न केवल सम्मान किया, अपितु इस समय तक अनेक शाखाओं में बट गए बौद्ध धर्म के प्रमुख घटक महायान सम्प्रदाय की सर्वश्रेष्ठता घोषित की। इसे लेकर सभा में मतभेद, विवाद और हिंसा भी हुई थी। इस परिघटना को ध्यान में रखते हुए बात करते हैं सम्राट हर्षवर्धन की जिनकी महाकुंभ को लेकर आस्था असाधारण थी। सम्राट हर्षवर्धन कुंभ के प्रति अगाध श्रद्धा रखते थे, अपितु पूर्ण कुंभ और अर्धकुंभ के अवसरों पर उनका प्रयाग में रहना अनिवार्यता की तरह था।
सम्राट हर्षवर्धन की धार्मिक आस्था उनके प्राप्त ताम्रलेखों, शिलालेखों व सिक्कों से भी परिलक्षित होती है। इन साक्ष्यों के अध्ययन से ज्ञात होता है कि सम्राट के पूर्वजों में से अनेक शिव-उपासक तो कई सूर्य-उपासक रहे हैं। स्वयं सम्राट हर्षवर्धन ने जो विरुद धारण किए, उनमें उल्लेखनीय है -‘परम माहेश्वर माहेश्वर ईव स्त्वानुकम्पी परमभट्टारक महाराजाधिराज श्री हर्ष:’ यहाँ ‘परम माहेश्वर’ शब्द से शैव मत की ओर झुकाव स्पष्ट परिलक्षित होता है। इतना ही नहीं, उनकी राजमुद्रा पर शिववाहन नंदी की मूर्ति पायी गयी है। शासक होने पर सम्राट हर्षवर्धन ने शीलादित्य की उपाधि धारण की जो सूर्य के प्रति उनकी आस्था का द्योतक है। यही कारण है कि जहाँ कन्नौज का सर्वधर्म सम्मेलन सम्राट के बौद्ध धर्म के प्रति अगाध श्रद्धा और पक्षधरता का परिचायक है, वहीं प्रयाग के महामोक्ष परिषद पर जो उल्लेख ह्वेनसांग द्वारा अपनी यात्रा के वृतांत में किए गए हैं, वह इस शासक की आस्था-मान्यता का दूसरा पक्ष प्रस्तुत करते हैं।
ह्वेनसांग ने कुंभ के अवसर पर प्रयाग के उस महासम्मेलन का वर्णन किया है, जिसमें स्वयं सम्राट हर्षवर्धन सम्मिलित हुए थे, रुचिकर है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि न केवल हर्षवर्धन, अपितु कुंभ के अवसर पर यह सभी कन्नौज के पूर्ववत्री शासकों की परिपाटी रही थी कि प्रयाग जाकर सिद्ध, ऋषि-महात्माओं के दर्शन और पूजन करें, निर्धनों और अनाथों को दान दें। हर्षवर्धन की यह छठवीं बार की प्रतिभागिता थी, जबकि वे महाकुंभ में सम्मिलित होने जा रहे थे, इस बार चीनी यात्री ह्वेनसांग भी उनके साथ थे। ह्वेनसांग लिखते हैं कि सम्राट के आग्रह पर वे महाकुंभ में सम्मिलित होने गए थे। उनके विवरणों के अनुसार तीर्थराज प्रयाग के एक विस्तृत क्षेत्र में यज्ञ मण्डपों की रचना की गयी थी। अपार जन-समूह महाकुंभ के आयोजन में पहुँचा हुआ था। देशभर के महंत, ब्राह्मण, विद्वान, अनाथ आदि आमंत्रित थे। सब के ठहरने का और अन्य सुविधाओं का प्रबंध था। पूजन, चढ़ावा, दान आदि की सामग्रियों से सैकड़ों पर्णकुटी भरे हुए थे। अनेक मूल्यवान रेशमी और सूती वस्त्रों के अतिरिक्त सोना, चांदी, मोती, माणिक आदि भी अनेक धनिकों, राजाओं और स्वयं सम्राट द्वारा वहाँ दान-पुण्य के उद्देश्य से लाए और संग्रहित किए गए थे। विवरणों पर ध्यानपूर्वक दृष्टि डालें तो कुंभ महापर्व के आयोजन की गरिमा में, न महाराज हर्षवर्धन के दौर में कोई कमी थी न आज तक इसमें कोई व्यवधान या कि अनुत्साह देखा गया है। कहीं साधु—संतों के डेरे थे, कहीं यात्रियों के रैन-बसेरे थे, तो देवताओं के भी स्थान निर्धारित किए गए थे। स्वाभाविक है कि सम्राट, उनके परिवारजनों व मित्रों के लिए अलग और विशेष व्यवस्था कुंभ में ठहरने, स्नान आदि करने व आयोजन के विविध कार्यक्रमों में सम्मिलित होने के लिए की गयी थीं। सुरक्षा व सुविधा को ध्यान में रखते हुए सम्राट के शिविर, उनके दामाद ध्रुव भट्ट के शिविर तथा मित्र राजा कुमारराज भास्कर वर्मन के शिविर लगवाए गए थे।
कुंभ के आयोजन में सम्राट के धर्म समन्वय का अद्भुत रूप देखने को मिलता है। ह्वेनसांग जैसे प्रधान बौद्ध भिक्षु साथ थे, जिनके साथ मिल कर आयोजन के पहले दिन बुद्ध प्रतिमा का अभिषेक किया गया, मूल्यवान वस्तुओं से उनका सम्मान प्रदर्शन हुआ, पुष्पांजलि दी गयी। आयोजन के दूसरे दिवस भगवान सूर्य देव की पूजा-उपासना की गयी। आयोजन के तीसरे दिवस भगवान शिव का अभिषेक व पूजन सम्पन्न हुआ। यज्ञ-पूजन आदि के उपरांत विपुल दान दक्षिणाओं का वितरण संतों-साधकों और जरूरतमंदों के मध्य किया गया। दान में भी कोई भेदभाव नहीं था, वे बौद्ध भिक्षु हों अथवा उपासक साधु; प्रति व्यक्ति 100 स्वर्ण मुद्रा, एक मुक्ता, एक जोड़ा वस्त्र तथा नाना प्रकार के व्यंजन वितरित किए जा रहे थे। उल्लेखों के अनुसार सतत एक माह तक प्रतिदिन दीन-दुखी जन को दान देने का सिलसिला चलता रहा, यह मात्रा इतनी अधिक थी कि वहाँ लाया गया राजकोष रिक्त हो गया। सम्राट के पास दान करने को कुछ न रहा तो अपनी मुकुट-मणी भी उन्होंने दान कर दी। शरीर पर धारण किए गए गहनों और मूल्यवान वस्त्रों का भी उन्होंने दान कर दिया, स्थिति यह हो गई कि स्वयं अपनी बहन राज्यश्री से पुराने वस्त्र ले कर धारण किए। राजा को रीते हाथ देख कर उनके साथ आए मांडलिक राजाओं ने दानपत्रों से राजसी चिन्हों को मोल लेकर पुन: सम्राट को भेंट कर दिया। हर्षवर्धन कुंभ के आयोजन से रीते हाथ ही राजधानी लौटना चाहते थे। अत: उन्हें जो भेट प्राप्त होती, उसे भी वे दान में देते रहे। स्मरण करें कि ऐसी दानशीलता के वृतांत अंगराज कर्ण के अतिरिक्त अन्य किसके लिए कहे-सुनाये जाते हैं?
इस आयोजन की महत्ता, इतिहास के दृष्टिगत इस वृतांत को जानने की आवश्यकता पर बात करते हैं। परंतु इससे पूर्व जिस हर्षकालीन महाकुंभ आयोजन से मैंने आपका परिचय कराया उसकी कुछ विशेषताओं को भी जान लेते हैं। जैसा कि सभी जानते हैं महाकुंभ पर्व प्रत्येक बारह वर्ष की आवृत्ति पर आयोजित होता है, जबकि अर्धकुंभ प्रत्येक छह वर्ष के अंतराल में। प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन, नासिक आदि स्थानों पर, इन महान अवसरों में, बड़े-बड़े मेले प्राचीन काल से ही लगते आ रहे हैं। यदि ज्योतिष की दृष्टि से देखा जाए तो पूर्ण कुंभ पर्व का विशेष महत्व है। जब बृहस्पति मेष राशि पर और सूर्य तथा चंद्रमा मकर राशि पर होते हैं, उस नक्षत्र योग में पूर्ण कुंभ लगता है। स्वाभाविक है कि प्रत्येक वर्ष माघ के महीने में सूर्य तथा चंद्रमा मकर राशि में होते हैं किंतु बृहस्पति के मेष राशि पर आने का योग बारह वर्ष में एक बार ही आता है, तभी महाकुंभ महापर्व आयोजित होता है। यही नहीं, अनेक ग्रहों-नक्षत्रों की स्थिति आदि के आधार पर भी कतिपय विशेष योग बनते हैं। ऐसे ही विशेष ग्रहों का वह संयोग हर्षकालीन उस महाकुंभ के अवसर पर बना था, जो उसके बाद लगभग तेरह सौ पचास साल बाद वर्ष 1977 में बन सका।
यह सम्पूर्ण घटनाक्रम हमारे सामने एक धर्म-सहिष्णु शासक की छवि को प्रस्तुत करता है, जो विविध मान्यताओं को पूरी आस्था से प्रतिपादित करने में सहज है। उन्हें न बुद्ध से आपत्ति न शिव से बैर…वह तो यज्ञ-हवन करने में भी उतना ही सहज है, जितना भगवान बुद्ध के प्रति अपनी आस्था और आदर के प्रदर्शन में। वह ह्वेनसांग जैसे विद्वान का इतना सम्मान करता है कि उनके आगे नतमस्तक है, वह पूर्वजों की शैव और सूर्य पूजा की परिपाटी का भी समान संरक्षक है और उसे सहेज कर रखता है। महाकुंभ जैसे आयोजन के धार्मिक महत्व अवश्य हैं लेकिन समाजशास्त्र की दृष्टि से भी इसकी विवेचना होनी चाहिए। जहाँ अध्यात्म और परम लक्ष्य की चाह में राजा इतना रंक हो जाता है कि मांग कर कपड़े भी पहने के लिए बाध्य हो जाता है। सम्राट हर्षवर्धन को हमें सहिष्णुता के उस सेतु की तरह देखना चाहिए जो अनेक मतों-मान्यताओं के मध्य निर्मित किया जा सकता है।





