-हरिमंगल, वरिष्ठ पत्रकार
प्रयागराज महाकुंभ में देश—दुनिया से भक्त आ रहे हैं। अधिकांश श्रद्धालु तो मुख्य स्नान पर्व पर या सामान्य दिनों में संगम में डुबकी लगाकर अपने घरों को लौट जाते हैं। इनकी सुख—सुविधा की व्यवस्था तो प्रशासन करता है, लेकिन लाखों की संख्या में ऐसे श्रद्धालु भी होते हैं, जो गंगा तट पर ही जप—तप, संकल्प, अनुष्ठान, कल्पवास आदि के लिए यहां दो—चार दिन या फिर माह भर रह कर अपना मनोरथ पूर्ण करने का प्रयास करते हैं। ऐसे श्रद्धालुओं के लिए व्यवस्था का दायित्व प्रयागराज के तीर्थ—पुरोहित संभालते हैं। यहां प्रत्येक श्रद्धालु के लिए तीर्थ—पुरोहित का आवंटन है और यह आवंटन सरकार ने नहीं, स्वयं पुरोहित समाज ने कर रखा है और वह भी लगभग 500 वर्ष पहले। प्रत्येक तीर्थ—पुरोहित को नाम के साथ पहचान के लिए एक झंडा और उस पर एक निशान आवंटित है। यह निशान भी ऐसा है जो हमारे दैनिक जीवन से जुड़ा है। जैसे पान का पत्ता, तीन तुमड़ी, जहाज, पेटारी, तीन लोटे, काली कमली, चांदी के नारियल, टेढी कमान आदि। यहां आने वाले श्रद्धालुओं को अपने तीर्थ—पुरोहित के नाम के साथ ही झंडे का निशान पता होता है। बड़े—बड़े बांस—बल्लियों में लगे झंडे दूर से ही दिखाई देते हैं और श्रद्धालु सीधे अपने तीर्थ—पुरोहित के पास पंहुच जाता है।
तीर्थ—पुरोहित का इतिहास प्रयागराज जितना ही पुराना बताया जाता है। प्रयागराज आने वाले श्रद्धालुओं को आम बोलचाल की भाषा में यजमान कहा जाता है। इनके सभी प्रकार के धार्मिक कर्मकांड या अनुष्ठान तीर्थ—पुरोहित ही कराते हैं। तीर्थ—पुरोहित भी उच्च कुल के ब्राह्मण कहे जाते हैं। ‘तीर्थ—पुरोहित प्रयागवाल समाज’ के संरक्षक श्रवण कुमार शर्मा बताते हैं कि तीर्थ— पुरोहित समाज का आगमन तो पृथ्वी पर गंगा जी के आगमन के साथ ही हो गया था। राम युग और कृष्ण युग में भी हमारे समाज के लोग यहां आने वाले महापुरुषों के अनुष्ठान और धार्मिक क्रियाकलाप कराते रहे हैं। ‘तुजुक-ए-जहांगीरी’, जो ‘जहांगीरनामा’ के नाम से विख्यात है, और फिर चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी प्रयागराज में तीर्थ—पुरोहितों की उपस्थिति को स्वीकार किया है। श्री शर्मा कहते हैं कि प्रयाग का महत्व सृष्टि काल से है। इसलिए यहां तीर्थ—पुरोहितों की संख्या भी ज्यादा थी। लगभग 500 वर्ष पूर्व 1,484 परिवार थे, जो अब घटकर 500 से 700 रह गए हैं। यजमानों के बंटवारे के संबंध में वे कहते हैं कि हमारे पूर्वजों ने कई सदी पहले आपस में बैठ कर तय किया कि कौन किसको देखेगा यानी सारे परिवारों को चाहे वह छोटा रहा हो या बड़ा सभी को यजमानों का बंटवारा कर दिया गया। यही कारण है कि प्रयागराज में देश के हर गांव, कस्बे का तीर्थ—पुरोहित आपको मिल जाएगा।
संगम तट पर सामान्य दिनों मे 250 से 300 के आसपास ही तीर्थ—पुरोहित रहते हैं। बाकी लोगों की उपलब्धता यजमानों के आने पर निर्भर रहती है। महाकुंभ के बारे में श्री शर्मा ने बताया कि यजमानों के आवास, भोजन से लेकर हर प्रकार की व्यवस्था करना हम सबका दायित्व रहता है। इसलिए हमारे समाज का लगभग प्रत्येक परिवार इस महाकुंभ में अवश्य उपस्थित रहता है।
प्रयागराज के तीर्थ—पुरोहित सनातन धर्म की धर्मध्वजा फहराने के लिए प्राचीनकाल से देश—विदेश में विख्यात हैं। ‘तीर्थ—पुरोहित प्रयागवाल समाज’ के अमित राज पंडा बताते हैं कि तीर्थ— पुरोहितों को व्यवस्थित रूप देने में आदि गुरु शंकराचार्य जी का बड़ा योगदान है। पूज्य शंकराचार्य ने सनातन धर्म की रक्षा के लिए अखाड़ों का गठन किया, तो उसी प्रकार तीर्थ—स्थलों पर सनातन संस्कृति और परम्परा को निरन्तर और अक्षुण्ण बनाए रखने का कार्य और दायित्व पुरोहित समाज को दिया। प्रयागराज में संगम तट पर होने वाले सभी प्रकार के अनुष्ठान—दान और संकल्प केवल तीर्थ—पुरोहित ही कराता है। अमित राज पंडा बताते हैं कि सामान्य दिनों में यहां आने वाले यजमानों में बड़ी संख्या में पिंड दान, वेणी दान, गंगा दान करने वालों की होती है, जबकि माघ मेले या कुंभ मेले में कल्पवासियों की संख्या बहुत ज्यादा होती है। यह कल्पवासी पौष पूर्णिमा से माघी पूर्णिमा तक एक माह गंगा तट पर बने तंबुओं में भूमि शयन, दो समय गंगा स्नान, एक समय भोजन और सुबह—शाम भक्ति—भजन और संतों के पंडाल में चलने वाली धार्मिक कथाओं का श्रवण करके कल्पवास संकल्प पूरा करते हैं। जब यजमानों का कल्पवास संकल्प पूरा हो जाता है वे माघ मास में ही शैया दान करते हैं। इसके अतिरिक्त यजमानों के अनेक प्रकार के संकल्प होते हैं, जिनमें बच्चों का नामकरण, कर्ण छेदन तथा कथा-कीर्तन आदि भी पुरोहित समाज कराता है।
संगम तट पर गोपाल पंडा अपने ‘पान के पत्ते’ वाले निशान की ऊंची पताका के नीचे चौकी पर बैठे दिखे। महाकुंभ में व्यवस्था की बात चली तो बोले सरकार की व्यवस्था तो उच्च—कोटि की है, लेकिन यहां तीर्थ—पुरोहित सबसे बड़ा जनसेवक है। हम प्रयागराज आने वाले अपने यजमानों का पहले सत्यापन करते हैं, फिर चाय—जलपान से उनकी आवभगत कराके उनका सुख—दुख पूछते हैं। उसके बाद प्रयाग आने का प्रयोजन पता करके उसके अनुरूप व्यवस्था कराते हैं। ये सभी कार्य बिना किसी मोलभाव के होते हैं। यजमान से जो कुछ मिला हम उसे सहर्ष स्वीकार करते हैं। दान—दक्षिणा के सवाल पर कहते हैं कि हमारे समाज के लोग अपने यजमानों पर दान दक्षिणा के लिए कोई दबाव नहीं बनाते हैं। हम पुरोहित अर्थात् पर-हित करने के लिए हैं। हम व्यापारी नहीं हैं। हमारा यजमानों से पीढ़ी दर पीढ़ी का रिश्ता चला आ रहा है और जब तक गंगा जी पृथ्वी पर रहेंगी तब तक चलता रहेगा। यदि कोई यजमान अचानक किसी मुसीबत में फंस जाता है, उसका सामान चोरी हो जाता है, पैसा खो जाता है, खत्म हो जाता है, तो हम उसे उसके घर तक सकुशल भिजवाने की व्यवस्था कराते हैं। सरकार के पास भी ऐसी व्यवस्था का अभाव है। ‘तीर्थ—पुरोहित प्रयागवाल समाज’ के अखिल भारतीय महामंत्री माधवानंद शर्मा ने कहा कि हमारे लिए यजमान केवल यजमान है। यहां सभी समान होते हैं। हम अपने यजमानों का संगम तट पर सामूहिक पिंडदान कराते हैं, चाहे वह अमीर या गरीब हो। हम सबको वही सुख—सुविधा और सम्मान देते हैं।
इन तीर्थ—पुरोहितों के पास अपने यजमानों की वंशावलियों का अनूठा संग्रह मौजूद है। देश के किसी कोने से प्रयागराज आने वाले हर उस व्यक्ति का विवरण इन तीर्थ—पुरोहितों के पास सुरक्षित है, जो कभी भी संगम तट पर आकर अपने तीर्थ—पुरोहित से मिला हो। इन तीर्थ— पुरोहितों के पास लगभग 400 वर्ष पूर्व तक के विवरण उनकी हस्तलिखित पोथियों में जीवंत और सुरक्षित है। जैसे ही कोई यजमान इनके पास पहुंच कर अपना जिला और तहसील बताता है, वैसे ही यह तहसील के गांवों को हिन्दी वर्णमाला में उसे बताने लगते हैं। जैसे ही यजमान के गांव का पता चलता है तो उस गांव के दस बीस चर्चित लोगों का नाम तीर्थ—पुरोहित बता कर उसे आश्वस्त कर देता है कि हम ही आपके तीर्थ—पुरोहित हैं। यदि यजमान ने बताया कि उसके पूर्वज 25-50 या 100 साल पहले प्रयागराज आए थे, तो तुरंत वह तीर्थ—पुरोहित अपनी बही निकाल कर उसके सामने रख देता है, जिसमें सब कुछ आइने की तरह साफ—साफ लिखा होता है कि उनके पूर्वज कब और किसके साथ किस प्रयोजन से प्रयागराज आए थे। इतना ही नहीं, उनके पूर्वजों के उस पर हस्ताक्षर भी दिखाए जाते हैं। तीर्थ—पुरोहितों की यह बही जिल्द आकार में सफेद कागज पर पुराने जमाने की सरकट की कलम और काली स्याही से बहुत ही सुन्दर और सुस्पष्ट शब्दों में लिखी हुई है। यद्यपि अब वह कलम और स्याही प्रचलन से बाहर हो गई है। इसलिए अब आधुनिक पेन का प्रयोग किया जाने लगा है।
तीर्थ—पुरोहितों के इस अनूठे संग्रह पर हरि नारायण शर्मा बताते हैं कि बही खाते में यजमानों का विवरण लिखने की एक प्रक्रिया है, जो आरम्भिक वर्षों से उसी रूप में चली आ रही है। बही में हम सबसे पहले यजमान की जाति, उसके बाद उसके क्रमवार गांव, थाना, तहसील और जिले का नाम लिखा जाता है। इसके बाद प्रयागराज आए यजमान का नाम, उसके बाद पिता, दादा और उसके बेटे का नाम फिर भाई और उनके बच्चों का नाम लिखा जाता है। इसके बाद यजमान किस कार्य और मनोरथ के लिए आया है उसका विवरण रहता है। यह सब तिथिवार अंकित होता है, लेकिन आरंभ से लेकर आज भी यह सब विक्रम संवत् की तिथि और वर्ष में ही लिखा जा रहा है। अंग्रेजी माह या वर्ष का कोई जिक्र इन बहियों में नहीं रहता है। इन सारे विवरण के अंकन के बाद यजमान के हस्ताक्षर भी कराए जाते हैं, ताकि भविष्य में आने वाले उनके वंशज अपने पूर्वजों के बारे और उनके प्रयागराज आगमन के प्रयोजन के बारे में जान सकें। हरि नारायण शर्मा आश्चर्य से बताते हैं कि तमाम लोगों को अब अपने दादा या परदादा के नाम के बारे में कोई जानकारी ही नहीं होती है तो हम उन्हें बताते हैं। यजमानों से जुड़ी इस अनमोल बही के रख—रखाव की बात पर वे कहते हैं कि इसे हम लोग अपने शरीर से ज्यादा सुरक्षित रखने का प्रयास करते हैं। डिजिटल युग में सब कुछ आन—लाइन हो रहा है, तो क्या अब यह बही भी डिजिटल होगी! इस पर वे कहते हैं नहीं। हम ऐसा नही कर रहे हैं, क्योंकि इस बही के माध्यम से हमारे और यजमान के बीच बड़ा भावनात्मक जुड़ाव है। हम हस्तलिखित बही में कभी कोई बदलाव नहीं कर सकते हैं, उनके हस्ताक्षर आने वाले वंशजों को विश्वास दिलाते हैं, जबकि कम्प्यूटर में सब कुछ सम्भव है। शर्मा स्वीकार करते हैं कि कुछ लोग बही को स्कैन करा कर अवश्य सुरक्षित करने लगे हैं। प्राचीनता और परम्परा की बात चली तो वे कहने लगे कि प्रयागराज में चौखंडी बारह खम्भा के रहने वाले मिश्र परिवार के पूर्वज भगवान राम के तीर्थ पुरोहित थे। मिश्र परिवार के पास भगवान राम के पूर्वजों की वंशावली है। कहा जाता है कि त्रेता युग में लंका विजय के बाद प्रभु राम प्रयागराज आए और स्नान किया था। जिस स्थान पर प्रभु श्रीराम ने स्नान किया था। वह राम घाट के नाम से विख्यात है। आज भी प्रयागराज के तीर्थ— पुरोहित देवोत्थान एकादशी के दिन प्रभु श्रीराम की शोभायात्रा निकालते हैं।
प्रयागराज के तीर्थ—पुरोहित धर्म—संस्कृति के साथ ही राष्ट्र और समाज की मुख्य—धारा से अपने को जोड़कर चलते आ रहे हैं।
‘तीर्थ—पुरोहित प्रयागवाल समाज’ के संरक्षक श्रवण कुमार शर्मा कहते हैं कि प्रयागराज का तीर्थ—पुरोहित समाज अनादि काल से सनातन धर्म और संस्कृति का पोषक रहा है और आज भी गंगा, यमुना और अगोचर सरस्वती के तट पर अपना झंडा और निशान की ऊंची—ऊंची फहरा रही पताका के नीचे बैठ कर देश—विदेश से आने वाले अपने यजमानों को उस परम्परा से जोडऩे का दायित्व निभा रहा है, जिसे हमारे धार्मिक ग्रंथों में हिन्दू समाज की संस्कृति और परम्परा का नाम दिया गया है। प्राचीन काल से हमारे समाज का एक ही ध्येय वाक्य है—वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिता:। हम पुरोहित राष्ट्र को सदैव जीवंत और जागृत बनाए रखेंगे।





