विमानशास्त्र के जनक महर्षि भारद्वाज

प्रो. बलवंत सिंह राजपूत,वरिष्ठ वैज्ञानिक


विज्ञान और अध्यात्म के परमज्ञानी महर्षि भारद्वाज के अद्भुत आविष्कारों का उल्लेख त्रेता युग में रचित ग्रंथो में मिलता है। इन्हें आदिकवि महर्षि वाल्मीकि का शिष्य माना जाता था। इनके पिता बृहस्पति थे तथा माता का नाम ममता था। इन्होंने ही प्रयाग बसाया था और वहां पर विश्व के सबसे बड़े गुरुकुल विश्वविद्यालय की स्थापना की थी। वे शिक्षाशास्त्री, राजतंत्र मर्मज्ञ, अर्थशास्त्री, शास्त्र—विद्या विशारद, आयुर्वेद विशारद, अभियांत्रिकी विशेषज्ञ, विज्ञान्वेत्ता तथा मंत्र दृष्टा थे। ऋग्वेद के छठे मंडल के दृष्टा ऋषि वे ही हैं। इस मंडल में 765 मंत्र हैं, जिनमें विज्ञान का असीम ज्ञान निहित है। अथर्ववेद में भी इनके 23 मंत्र हैं, जिनमें आयुर्वेद का ज्ञान निहित है। इन्होंने ज्ञान, विज्ञान के क्षेत्र में अनेक विषमयकारी शोध किए थे तथा अनेक मौलिक ग्रंथों की रचना की थी, जिनमें से निम्नलिखित ग्रंथ प्रमुख हैं :

आयुर्वेद संहिता, भारद्वाज स्मृति, भारद्वाज संहिता, यंत्र सर्वस्य विमान शास्त्र तथा विमान संहिता। इनके शोध के दो मुख्य विषय थे—जीव विज्ञान आयुर्वेद तथा विमानशास्त्र।

महर्षि भारद्वाज द्वारा सृजित आयुर्वेद
प्राचीन कथा के अनुसार पांच हजार ईसा पूर्व लगभग साढ़े सात हजार वर्ष पूर्व स्वास्थ्य विज्ञान के इतिहास में प्रथम गोष्ठी का आयोजन हिमालय के ढलानों पर महर्षि भारद्वाज की अध्यक्षता में हु़आ था, जिसमें महर्षि अग्निरस, जमदग्नि, वशिष्ठ, कश्यप, भृगु, अगस्त्य, मार्कण्डेय, विश्वामित्र, भार्गव, गर्ग, ब्रक्षि, देवल, गाल्व, बदरायण, कात्यायन, मरीचक, सौनक, मैत्रेय सहित अनेक ऋषियों ने भाग लिया था। इस गोष्ठी में निर्णय लिया गया था एक महान प्रतिनिधि को इंद्र के पास आयुर्वेद एवं जीव विज्ञान सीखने हेतु भेजा जाए तथा इस कार्य हेतु महर्षि भारद्वाज को चुना गया।

आयुर्वेद जीवन का विज्ञान है तथा इसका विकास सृष्टि में जीवन के प्रारंभ के साथ ही हुआ था। हमारे वैदिक मनीषियों ने आयुर्वेद को पंचम वेद माना था। इससे इसकी दिव्यता एवं उपयोगिता स्वत: सिद्ध है। सभी आयुर्वेद संहिताओं के अनुसार सर्वप्रथम जीवविज्ञान तथा आयुर्वेद का ज्ञान ब्रह्मदेव को हुआ था। ब्रह्मा से यह ज्ञान दक्ष प्रजापति, उनसे अश्विन कुमारों तथा उनसे इंद्र को प्राप्त हुआ—
ब्रह्मणा हि यथा प्रोक्तमायुर्वेद प्रजापति:।
जग्रह निखिलेनावर्षविनों तु पुनस्तत:।।
ब्रह्मा ने एक लाख श्लोकों का आयुर्वेद रचा था, जिसमें एक हजार अध्याय थे।
महृषि भारद्वाज ने इंद्र से आयुर्वेद का संपूर्ण ज्ञान प्राप्त किया तथा इसे दो सूत्रों—”ब्रह्त्य फलग्रहतम” तथा ”फलग्रहत्म” में रखा। पृथ्वी पर आयुर्वेद पर प्रथम ग्रंथ रचना महर्षि भारद्वाज द्वारा ही की गई थी। इनके ही शिष्य थे अत्रे पुनर्वसु, जो महर्षि अत्रि के पुत्र थे। इन्होंने महर्षि भारद्वाज के निर्देशन में निम्नलिखित सात विशिष्ट आविष्कार किए थे—
अग्निशोधन, राजवल्लभ तैल घ्रतम, अधर्मा त्रिकावस्ति, विम्सनती सर्वस्य, दधिका घृतमं, महाम्युराघृतम, तथा ब्रह्मग्रदीस तैलम।

इनके छह अन्य शिष्य थे: अग्निवेश, मेल, जानुकर्ण, पाराशर, क्षरपणी तथा हरित।
इनमें महर्षि अग्निवेश ने तीन विशेष उल्लेखनीय रचनाएं की थीं—अग्निवेशतंत्र, अंजन निदान, निदानस्थान। महर्षि भारद्वाज की शिष्य परंपरा में ही विख्यात आयुर्वेदाचार्य चरक तथा आदि शल्य चिकित्सक सुश्रुत हुए थे।

महर्षि भारद्वाज द्वारा रचित विमान शास्त्र
महर्षि भारद्वाज द्वारा रचित विमान संहिता में आठ अध्याय तथा पांच सौ सूत्र हैं, जिनमें पूर्णत: सुरक्षित विमान की रचना, तकनीक एवं प्रचालन का विस्तृत वर्णन है। विमान के निर्माण एवं इसमें प्रयुक्त ऊर्जा स्रोत ईंधन एवं इसके प्रचलन में अभियांत्रिक के कर्तव्यों का विस्तार से वर्णन किया गया है। इस ग्रन्थ में महर्षि भारद्वाज ने विमानों में प्रयुक्त रूपदर्शक, शब्द दर्शक, गति मापक तथा काल मापक यंत्रों के निर्माण का विस्तार से वर्णन किया है तथा वर्षा, झंझावात, भूकंप, ग्रहीय गति परिवर्तन एवं अन्य प्राकृतिक आपदाओं में विमान एवं इसके यात्रियों की समुचित सुरक्षा को विस्तार से समझाया गया है।

महर्षि भारद्वाज ने विमान संहिता में युगभेद के अनुसार तीन प्रकार के विमानों का वर्णन किया है— ”जातीत्रेविद्यांग युगभेदाद विमानानं।” ये हैं— मांत्रिक; तांत्रिक; तथा कृतक यांत्रिक।

सतयुग और त्रेता युग में विद्वान एवं अभियंता मंत्रों की शक्ति से परिचित थे। इसलिए इन युगों में मांत्रिक विमान बनाए जाते थे। द्वापर युग में तंत्र का ज्ञान ज्यादा उपलब्ध था। इसलिए उस युग के लिए महर्षि भारद्वाज ने तांत्रिक विमानों के निर्माण की विधि विकसित की थी। इसी प्रकार कलयुग के लिए यांत्रिक विमानों को विकसित करने का वर्णन महर्षि ने विमान संहिता में किया है।

महर्षि भारद्वाज ने पुष्पक विमान जैसे पच्चीस प्रकार के मांत्रिक विमानों की निर्माण विधि का वर्णन किया है—
”पंचविशमांत्रिका पुष्पकादिप्रभेदन”
उन्होंने पैसठ प्रकार के तांत्रिक विमानों का भी वर्णन किया:
”भैरवादिभेदात तांत्रिकाषदपंचाशत”
महर्षि ने अपने विमानशास्त्र में कलियुग के लिए पच्चीस प्रकार के यांत्रिक विमानों का भी विस्तार से वर्णन किया था। विमानों की निम्नांकित बारह प्रकार गतियों और इन्हें प्राप्त करने के लिए ऊर्जा स्रोतों का भी विस्तार से वर्णन किया है—चालन; कंपन; उध्र्वगमन; अधर; मंडलाकार गति; वैज्ञनि; अनुलोम गति; त्रियक गति; परादमुखी; विलोम; स्तंभन तथा चित्रागति।
उनके विमान शास्त्र की कारिका 80-81 में महर्षि भारद्वाज ने विमान निर्माण हेतु मिश्रधातुओं का विस्तार से वर्णन किया है:
विमानहारनी लोहानि भारहिनानी षोडश।
उद्यमयुक्तानी सूत्रों स्मिन शोनकेन महात्मना।।
ऐततशोड श्लोहण्यवयनरचनाविधो।
वरिष्ठानीति शास्त्रैशु निर्णतानिमहर्षिभी।।
महर्षि के विमानशास्त्र में विमान में प्रयुक्त विभिन्न दर्पणों का विस्तृत वर्णन किया गया है। इस शास्त्र की करीका 79 में विमान के यात्रियों के लिए वातानुकूल व्यवस्था का भी वर्णन है—
वसंत ग्रीष्मतुलकाल प्रयाणे यानयंत्रणाम।
सुख शत्योंपचारार्थ पुष्णीयंत्रमुच्यते।।
आधुनिक विमान उतने उच्चकोटि के नहीं बन पाए हैं, जितने महर्षि भारद्वाज के विमान शास्त्र एवं विमान संहिता में वर्णित हैं।