रामायणकालीन वानर संस्कृति

एन.आर.शर्मा, शिक्षाविद्


महर्षि वाल्मीकि प्रणीत रामायण विश्व वांगमय का प्राचीनतम उपलब्ध ग्रंथ रत्न है। इसमें आर्य, वानर तथा राक्षस संस्कृतियों का सुंदर तथा विस्तृत विवेचन देखने को मिलता है। बाली, सुग्रीव, हनुमान, अंगद, जाम्बवान, जटायु तथा संपाती वानर संस्कृति प्रधान पुरुष पात्र व बाली की पत्नी तारा वानर स्त्रियों का प्रतिनिधित्व करने वाली एक महत्वपूर्ण स्त्री पात्र है।

जनसामान्य में प्रचलित धारणा के अनुसार हनुमान सुग्रीव, बाली आदि पशु योनि के पात्र हैं, जिनका रामकथा में समावेश उसे आकर्षक बनाने के लिए किया गया है, जिसके कारण रामकथा का प्रसार इतने व्यापक रूप में हो पाया है, जबकि रामायण के अनुसार सच्चाई प्रचलित मान्यता से भिन्न कुछ और ही है। रामायण के अनुसार वानर जाति वनवासी मानवों की ही एक जाति थी, जिसकी अपनी एक विशिष्ट समाज व्यवस्था और संस्कृति थी। वानर साम्राज्य की शासन व्यवस्था राजा, मंत्रि-परिषद, सेना आदि की सहायता से चलती थी। राज्याधिकार वंश परम्परानुगत होता था। बाली वध के पश्चात् अंगद को युवराज पद पर अभिषिक्त कर दिया गया। यह संस्कृति उत्तर भारत की आर्य संस्कृति के समान समुन्नत और लंका के राक्षसों की साम्राज्यवादी लिप्सा के समान विस्तारवादी भले ही न हो, पर इसकी सरलता तथा निश्छलता का अपना वैशिष्ट्य है।

महर्षि के अनुसार वानर बलवान, मायावी, शूरवीर, वायु के समान वेगवान, बुद्धिमान, नीतिज्ञ, विष्णु के समान पराक्रमी, युद्ध में किसी से भी परास्त न होने वाले, तरह-तरह के उपायों के जानकार, देवताओं की तरह शस्त्रास्त्रों के प्रयोग में निपुण तथा इच्छानुसार रूप धारण कर सकते थे। उनके दांत और नख बाघ के समान लंबे तथा तीक्ष्ण होते थे। युद्ध में इनका प्रयोग करते समय इनकी आकृति बाघ के समान रोंगटे खड़े करने वाली विकराल हो जाती थी। इनमें कतिपय वानरों के शारीरिक तथा मानसिक लक्षण भी थे, जो इनका अन्य जातियों से पार्थक्य स्थापित करते थे। शारीरिक और मानसिक चापल्य इनके स्वभाव का उल्लेखनीय तथ्य है।
चपलाह्यविनीताश्च चल चित्ताश्च वानरा:। (रा- 6/57/9)

ऋक्ष (रींछ, भालू) भी भालू या रीछ नहीं थे, बल्कि ऋक्ष पर्वत पर निवास करने वाले हरिगण थे। ये धूम्र के छोटे भाई जाम्बवान यूथपतियों के भी यूथपति, बड़े बुद्धिमान तथा परम पराक्रमी थे। उन्होंने देवासुर संग्राम में देवराज इन्द्र की बड़ी सहायता की थी। इन्द्र ने प्रसन्न होकर बहुत से वर भी प्रदान किए थे। इन्होंने ही अतुलित बलधाम, ज्ञानिनामग्रगण्यम्, सकलगुण निधान श्री हनुमान जी महाराज को उनके बल, वीर्य, पराक्रम और वेग का स्मरण कराकर सीतान्वेषण के लिए प्रेरित किया था। अपने बल, वीर्य का स्मरण कर वानर वीरों का हर्ष बढ़ाते हुए उन्होंने हेमशैल के समान अपना विराट रूप प्रकट किया था।

हनुमान इच्छानुसार रूप धारण कर सकते थे। बाली के भय से ऋष्यमूक पर्वत पर निवास करते समय जब सुग्रीव ने राम-लक्ष्मण को देखा तो उसे आशंका हो आयी कि कहीं ये दोनों वीर पुरुष बाली के द्वारा तो नहीं भेजे गए हैं। उसने हनुमान को इनके विषय में विस्तृत जानकारी प्राप्त करने के लिए इनके पास भेजा। हनुमान अपना कपि रूप त्याग कर भिक्षु के वेश में उनके पास गए। उन्होंने उन दोनों महावीरों को प्रणाम करके मधुर वाणी में वार्तालाप आरम्भ किया। उन्होंने अपने शील स्वभाव तथा वाग्मिता से राम को अतिशय प्रभावित किया। राम स्वयं लक्ष्मण से उनके वैदुष्य की चर्चा करते हुए कहते हैं कि सुग्रीव के ये महामंत्री हनुमान वेद-वेदांग पारंगत तथा व्याकरण के परम विद्वान हैं। इन्होंने अपने इस लंबे वक्तव्य में कोई भी अशुद्धि नहीं की है। तलवार लेकर वध करने के लिए उतारू शत्रु का हृदय भी इस अद्भुत वाणी से बदल सकता है। सीतान्वेषण के समय भी वे समय-समय पर आवश्यकतानुसार रूप धारण करते हैं। रावण के दरबार में एक कुशल राजदूत के कार्य का शिष्टतापूर्वक निर्वाह करते हैं। श्रीराम का समस्त परिवार उनका ऋणी है। भगवान श्रीराम स्वयं उनका ऋण स्वीकार करते हुए उनसे ऋणपत्र लिखवाने को कहते हैं। किंबहुना हनुमान संपूर्ण मानव जाति के सर्वोत्तम रत्न हैं। वे बल, वीर्य, पराक्रम, शास्त्र ज्ञान, तेज, धैर्य, क्षमा, स्थैर्य तथा विनयशीलता के मूर्तिमान स्वरूप हैं।

वाल्मीकि ने वानर जाति में यौन संबंधों की शिथिलता एवं अनियमितता दिखाई है। हनुमान जन्म की परिस्थितियों में भी इसका आभास मिलता है। दुंदुभि से युद्ध करके जब बाली एक वर्ष तक नहीं लौटे तो सुग्रीव ने उसे मरा हुआ जानकर किष्किंधा के राज्य तथा अपनी पत्नी रूमा तथा बाली की पत्नी को भी अपने अधिकार में ले लिया। दुंदुभि वध करके लौटने पर बाली ने उसकी पत्नी रूमा को छीनकर उसे मार कर बाहर निकाल दिया। अंत में बाली मृत्यु के पश्चात् सुग्रीव ने अपनी पत्नी रूमा के साथ बाली-पत्नी तारा को भी अपने अधीन कर लिया। मृत शत्रु की पत्नी को युद्ध की लूट के रूप में स्वीकार करने का रिवाज वानर जाति में विद्यमान था, जो आर्य संस्कृति की दृष्टि अवैध एवं अनुचित था।
अनुज वधू भगिनि सुतनारी।
सुनु सठ कन्या सम ये चारी।।
इन्हहिं कुदृष्टि बिलोकइ जोई।
ताहि बधें कछु पाप न होई।।
(मा- 4/9/7-8)
बाली वध के पश्चात् विलाप करती हुई तारा को सान्त्वना देते हुए राम कहते हैं, ”शोक संताप करने से मरे हुए जीव की कोई भलाई नहीं होती। मेरे द्वारा मारे जाने के कारण बाली अपने स्वरूप को प्राप्त हुए हैं। नीतिशास्त्र के अनुकूल साम, दान और अर्थ के समुचित प्रयोग से मिलने वाले जो पवित्र कर्म हैं, वे सभी उनको प्राप्त हो गए हैं। अत: अब आगे के कर्तव्य कर्म को विधिवत् सम्पन्न करना चाहिए।
बाली वध के पश्चात् सुग्रीव मधुपान तथा स्त्रियों के साथ क्रीड़ा विहार में अनुरक्त हो गया। उसने राम काज को विस्मृत कर दिया। राम इससे बड़े दु:खी हुए। उन्होंने लक्ष्मण को अपने संदेश-

”न स संकुचित पन्था येन वाली हतो गत:” के साथ सुग्रीव को अपनी प्रतिज्ञा पर डटे रहने, अर्थात् राम काज करने की प्रतिज्ञा पर डटे रहने का कठोर वचनों में आदेश दिया। इस पर परम विदुषी मृदुभाषिणी तारा ने लक्ष्मण के क्रोध को शांत करते हुए कहा, हे वीर लक्ष्मण! सुग्रीव वानरों के राजा हैं, उन्होंने श्रीराम के उपकार को भुलाया नहीं है। वे न कृतघ्न हैं, न शठ हैं, न क्रूर और न असत्यवादी और न कुटिल ही हैं। वे कठोर वचन सुनने के अधिकारी नहीं हैं। उन्होंने बहुत समय तक कष्ट भोगा है, अब वे सुख प्राप्त करके विषयाक्त हो गए हैं। आपकी सहायता के लिए उन्होंने असंख्य श्रेष्ठ वानरों को वीरों की सेना एकत्र करने के लिए भेज रखा है। इस प्रकार तारा अपनी वक्तृता से लक्ष्मण के क्रोध को शांत कर देती है।
वानर साम्राज्य की राजधानी किष्किंधा समृद्धिशाली तथा वैभव की क्रीड़ास्थली थी। लक्ष्मण ने सुग्रीव को सचेत करने के लिए जब उसमें प्रवेश किया तो उन्होंने देखा राजमार्ग के दोनों ओर वानर वीरों के बहुमंजिले प्रासाद बने थे जो अनेक विध स्वर्णालंकारों से विभूषित तथा नारी रत्नों से सुशोभित थे। वानर राज सुग्रीव का महल तो देवराज इन्द्र के सौध की शोभा को मात देता था।

आप उपर्युक्त वक्तव्य के आधार पर विचार कीजिए बाली वध के पश्चात् राम का तारा को समझाना, तारा का क्रोधाविष्ट लक्ष्मण के रोष को अपने वाक् चातुर्य से शांत करना आदि क्या सामान्य वानर-वानरियों द्वारा संभव है? निश्चय ही ऐसा बिल्कुल संभव नहीं है।

वनवासी वानर जाति अपनी स्वभावगत चंचलता एवं चपलता के कारण वानर कहलाती होगी। वर्तमान में भी बहुत से लोग अपनी स्वभावगत विशेषता के कारण शेर, मंदबुद्धि उल्लू, झपटने वाले को भेडिय़ा कहलाते हैं। बहुत से लोगों के उपनाम भी नाग, नागपाल, कोकिल, मृग आदि होते हैं। आचार्य शंकर ने दशनामी संन्यासियों के उपनाम नदी, पर्वत, गिरि, तीर्थ, सागर रखने का विधान किया है। वे अवधेशानन्द गिरि, रामतीर्थ, कृष्णानन्द सागर कहलाते हैं। क्या अपनी स्वभावगत विशेषताओं के लिए प्रयुक्त किए गए इन विशेषणों के कारण अथवा वंशानुगत प्राप्त उपनाम के कारण वे व्यक्ति तत्-तत् ही हो जाते हैं। नहीं ऐसा बिल्कुल नहीं होता। अत: वह वनवासी जाति अपनी स्वभावगत शारीरिक तथा मानसिक चंचलता के कारण ही वानर कहलाती होगी। इस वानर जाति की संस्कृति आर्य संस्कृति तथा राक्षस संस्कृति की अपेक्षा अवश्य ही कुछ कम उन्नत रही होगी।