बृजेश मिश्र
सह संपादक
आज के आधुनिक युग में मानव जीवन का कोई भी ऐसा पक्ष नही है जो प्रभावित ना हुआ हो। ऐसा ही एक विषय है व्यायाम,अखाड़ा और मल्ल विद्या परंपरा जो भारत की अमूल्य धरोहर रही है और जो निश्चित रूप से इस आधुनिक दौर में प्रभावित हुआ है।
अखाड़ा संस्कृति के माध्यम से तैयार होने वाले पहलवानों का एक वर्ग अब अत्याधुनिक मशीनों का प्रयोग करने लगा हैं तो कुछ युवा तो सिर्फ़ स्टेट्स सिंबल के नाम पर जिम में जा रहे हैं। हमारे समाज पर स्टेटस सिंबल का बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है। भारत वर्ष की सभ्यता संस्कृति पर सर्वाधिक प्रभाव सिने जगत का पड़ता है, आज का युवा सिने जगत फर्जी हीरो से प्रभावित होकर सिक्स पैक संस्कृति की ओर आकर्षित हुआ है। आज से लगभग 15 वर्ष पहले ही एक फिल्म गजनी आई थी जिसमे आमिर खान का सिक्स पैक दिखाया गया था, उसके बाद से इस प्रकार की फिल्मों का होड़ लग गई और सिक्स पैक कल्चर का उदय हुआ और ये सिक्स पैक्स आता कहां से है जिम से, जिम ट्रेनर शरीर बनाने के लिए टिप्स देते हैं और बहुत अधिक युवाओं को बाइसेप्स, ट्राइसेप्स और सिक्स पैक्स, शोल्डर, लेग्स बैक बनाने का इतना शौक होता है कि वे स्टीरॉयड, प्रोटीन, मल्टीविटामिन, क्रेटिन इत्यादि का भी सेवन करते है। जो सेहत के लिए काफी हानिकारक है। आज जिम का समय है बड़े बड़े शहरों को छोडि़ए छोटे छोटे कस्बों में जिम खुल गए हैं और वहां शरीर बनाने के लिए, वर्कआउट करने के लिए युवाओं के साथ साथ प्रौढ़ अवस्था में पहुच चुके लोग भी जाते है।
खैर आज के इस लेख में हम बात करने जा रहे हैं कि व्यायाम की भारतीय अवधारण क्या है। किसको कितना व्यायाम करना चाहिए और कैसी थी मल्ल विद्या परंपरा जो धीरे धीरे विलुप्त होने की कगार पर है।
व्यायाम की परिभाषा
महर्षि चरक बताते हैं कि ऐसी शारीरिक क्रिया जिससे शरीर में स्थिरता आती है, मन में स्थिरता आती है, बल बढ़ता है उसको व्यायाम कहते हैं। व्यायाम को उचित मात्रा में ही करना चाहिए। महर्षि चरक ने थकावट आने तक व्यायाम करने को उचित स्वीकार किया है तो वहीं अष्टांगसंग्रह में महर्षि वाग्भट ने आधी शक्ति व्यायाम करने को उचित माना है।
व्यायाम करने से कार्य करने की शक्ति बढ़ती है, जठराग्नि या पाचकाग्नि प्रदीप्त होती है, मेदस् (स्थूलता) का क्षय होता है अर्थात् मोटापा घटता है, अंग-प्रत्यंग (मांसपेशियों) स्पष्ट दिखलायी देते हैं और वे ठोस हो जाते हैं।
व्यायाम कब, किसे और कितना करना चाहिए
वैद्य कविता शर्मा जी का कहना है कि वातज (गठिया , बाय इत्यादि) तथा पित्तज ( जैसे उच्च रक्तचाप) रोगों से पीडि़त रोगी, बालक ,वृद्ध तथा अजीर्ण आदि रोगों से पीडि़त मनुष्य को व्यायाम वैद्य के निर्देशन में ही करना चाहिए स्वयं ना करें। रक्तपित्त वाले व्यक्ति, क्षय रोग से ग्रसित, सूखे के शिकार रोगी, अस्थमा से पीडि़त, भूख से आकुल और स्त्रियों के उपभोग से क्षीणकाय हुए लोगों को व्यायाम नही करना चाहिए।
व्यायाम बलवान स्निग्ध (घी तेल से बने हुए तथा बदाम, काजू आदि) पदार्थों का सेवन करने वालों के लिए सदा ही पथ्य रूप में करणीय है।
यदि विपरीत भोजन कर लिया हो तो नित्य व्यायाम करना चाहिए क्योंकि इससे जठराग्नि इतनी सबल हो जाएगी कि वह अपचित आहार को भी पचाकर वात आदि रोगों से बचाता है। हेमंत, शिशिर एवं बसंत ऋतु में अपनी शक्ति से आधा व्यायाम करें और ग्रीष्म, वर्षा और शरद ऋतुओं में इससे भी कम व्यायाम करने के निर्देश दिए गए है।
अब प्रश्न उठता आधी शक्ति क्या है? व्यायाम करते समय जब कांखो पर, माथे पर, नासिका के ऊपर और शरीर के अन्य अंगों पर जब पसीना आने लगे और मुख सूखने लगे तब समझना चाहिए कि आधी शक्ति समाप्त हो चुकी है। उस समय व्यायाम छोड़ देना चाहिए।
मल्ल विद्या परंपरा
आज का युवा शरीर बनाने के लिए आधुनिक जिमों में जाता है। जहां पर वह जिम ट्रेनर के निर्देशन में व्यायाम करता है, कसरत करता है, वेट लिफ्टिंग करता है। जैसा कि मैंने लेख के प्रारंभ ही लिखा है कि युवाओं के जीवन पर सिने जगत का और अन्य सेलिब्रेटीयों का खूब प्रभाव पड़ता है पिछले 15 से 20 वर्षो में हमारे देश में जिम का खूब प्रचलन बढ़ा है लेकिन क्या आपने कभी विचार किया कि जब ये जिम शालाएं नही थी तो हम कैसे व्यायाम करते थे, कैसे पहलवान और योद्धा तैयार होते थे, क्या थी हमारी परंपरा। सच्चाई ये है कि हमारा समाज बिना विचार किए हुए अपनी समृद्ध शाली परंपरा को छोड़ देता है और आधुनिकता के नाम पर स्टेटस सिंबल के नाम पर कुछ भी करने लगता है। इस समय यही हाल बड़े बड़े शहरों में जिम में जाना स्टेटस सिंबल बन चुका है।
भारत वर्ष में व्यायाम के लिए, शरीर को सख्त, सुडौल बनाने के लिए क्या व्यवस्थाएं थी?
भारत वर्ष में शरीर बनाने के लिए, पहलवानों को बनाने के लिए मल्ल विद्या परंपरा का अस्तित्व काफी पुराना है, जिसके महत्पूर्ण विवरण श्रीमदभागवत, रामायण, महाभारत एवम विभिन्न पुराणों में मिल जाएगा।
पाणिनी कृत अष्टाध्यायी में भी मल्ल विद्या परंपरा के महत्त्वपूर्ण विवरण दर्शित होते हैं। अष्टाध्यायी के अध्ययन से ज्ञात होता है कि तत्कालीन समय में खेल के लिए क्रीड़ा एवं खिलाड़ी के लिए आक्रीड़ी शब्द प्रयुक्त होता था। अष्टाध्यायी के क्रीड़ा विनोद परिच्छेद में अन्य क्रीड़ाओं के साथ मल्ल युद्ध का विवरण भी मिलता है। उक्त ग्रन्थ के माध्यम से यह जानकारी मिलती है कि उस समय अन्य क्रीड़ाओं के साथ ही मल्लयुद्ध का आयोजन में होता था। जातकों से ज्ञात होता है कि समज्या वे विशिष्ट प्रकार की गोष्ठियाँ थीं, जिनमें स्त्री-पुरूष, बालक एवं वृद्ध इक_े होकर अनेक प्रकार के खेल-तमाशे, नृत्य-संगीत, मेष-युद्ध, अजायुद्ध एवं मल्ल युद्ध आदि खेल अथवा क्रीड़ाएं खेलते थे। अशोक के अभिलेखों में भी समज्या शीर्षक आयोजनों का उल्लेख मिलता है। जिसमें मल्ल की मुष्टि या पकड़ को संग्राह कहा है। (अहो मल्लस्य: संग्राह:, वाह पहलवान की कैसी पकड़ है) कात्यायन ने लिखा है कि मुष्टि का अर्थ मुष्टि नहीं अपितु मूठ या पकड़ है। जातकों में पहलवान को मुष्टिक कहा गया है। उस काल में कुश्ती का आरम्भ दो मल्लों की परस्पर ललकार से होता था जिसके उत्तर में वे दोनों ही परस्पर दाव-पेंच लगाने लगते थे।
शुक्रनीतिसार शुक्र की ही परम्परा में लिखी गई महत्वपूर्ण रचना है जिसकी प्राचीनता अश्वघोष द्वारा रचित बुद्धचरित एवं महाकवि कालिदास द्वारा विरचित कुमारसंभव से भी सिद्ध होती है, इसमें मल्ल विद्या परम्परा के सन्दर्भ में पर्याप्त जानकारियाँ मिलती हैं। शुक्र नीति के षष्ठ प्रकरण में जहाँ राजा को अपना शौर्य बनाए रखने संबंधी अनेक नीतियाँ बताई गई हैं, वहीं सैनिकों की दिनचर्या के अन्तर्गत वहाँ मल्ल विद्या के संदर्भ में उल्लेख मिलता है कि मल्लयुद्ध में कुशल, समान शक्ति वाले के साथ कुश्ती लड़ा कर तथा व्यायाम कराकर, पौष्टिक आहार लेकर एवं गुरु जनों को प्रणाम करके सैनिकों के दैहिक बल को बढ़ाना चाहिए।
महाकवि कालिदास ने भी स्वरचित रघुवंश महाकाव्य के अंतर्गत प्रभु श्रीराम की चढ़ती हुई युवा अवस्था की जो झाँकी प्रस्तुत की है। उससे उनके व्यायामशील शारीरिक विकास का परिचय भली प्रकार करते है कि युवावस्था के कारण श्रीराम की भुजाएं हल के जुए के समान दृढ़ और मजबूत हो गई, सीना चौड़ा तथा कंधे भारी हो गए इस प्रकार डील-डौल बढ़ जाने के कारण रघुनंदन अपने पिता से ऊँचे और तगड़े लगते थे, फिर भी वे इतने विनम्र थे कि कभी अपना बड़प्पन प्रकट नहीं होने देते। रामायण काल में किष्किन्धा के नरेश वानर राज बाली और रावण के मध्य मल्ल युद्ध हुआ था जिसमें रावण की पराजय हुई थी।
कृष्ण और बलराम ने अपनी ग्वाल मण्डली के साथ ब्रज के वनों में गाय चराते हुए नाना प्रकार की लीलाएं कीं, दूसरे ग्वाल बालों के साथ खेलने के लिए बहुत सी सामग्री लेकर वे घर से निकल पड़ते और गोष्ठ (गायों के रहने के स्थान) के पास ही अपने बछड़ों को चराते। ग्वाल बालों के साथ दोनों कहीं बाँसुरी बजाते तो कहीं गुलेल या ढेलवॉस से ढेले या गोलियाँ फेंकते। मल्ल विद्या को लेकर श्री मद्भागवत में विशद् विवरण मिलता है। उसमें कंस के पहलवानों से श्रीकृष्ण-बलराम के मल्ल युद्ध, अखाड़े की साज-सज्जा, मल्ल युद्ध के दौरान बजने वाले वाद्ययंत्र, कुश्ती के नियम एवं दर्शक दीर्घा आदि विषयों को लेकर सुन्दर चित्र खींचा गया है।
भागवत से जानकारी मिलती है कि अपने तमाम दैत्यों को भेजने के उपरान्त भी जब कंस को सफलता हाथ न लगी तो उसने अपनी रंगशाला में मल्ल युद्ध का आयोजन किया। कंस द्वारा छोड़े गये कुवलिया पीड़ हाथी का वध करने के उपरान्त जब श्रीकृष्ण एवं बलराम ने उसके अखाड़े में प्रवेश किया तो कंस के दरबारी पहलवान चाणूर ने कहा, नंद नन्दन श्रीकृष्ण और बलराम ! तुम दोनों वीरों के आदरणीय हो, हमने सुना है कि तुम लोग कुश्ती लडऩे में निपुण हो ब्रज के वनों में गाय चराते हुए तुमने कुश्ती का खूब अभ्यास किया है।
महाभारत के विराट पर्व में पांडवों के अज्ञात वास की कथा में भीम और जीमूत मल्ल के मध्य हुए मल्लयुद्ध का विवरण भी मिलता है। तथा महाभारत में ही भीम और जरासंध के मध्य मल्ल युद्ध हुआ था। जिसमें जरासंध की पराजय हुई थी।
मल्ल युद्ध पर आधारित मानसोलासा और ज्येस्थिमल्ला ग्रंथ है। चालुक्य वंश के राजा सोमेश्वर तृतीय (ई. 1124 1138) के समय जो ग्रंथ लिखा गया उसे मानसोलासा कहा जाता है जोकि युद्धकला पर आधारित है। मानसोलासा ग्रंथ को चालुक्य वंश का शाही ग्रंथ माना गया है। इसमें मल्ला विनोद नाम के अध्याय में उल्लेख है कि मल्ल युद्ध की कला को सीखने वाले व्यक्ति का व्यायाम और भोजन शैली कैसी होनी चाहिए। इस युद्ध कला के दांव-पेंच के साथ कठिन युद्ध शैली की नीतियों के बारे में भी बताया गया है।
वहीं तेरहवीं शताब्दी में गुजरात में मल्ल युद्ध पर आधारित ग्रंथ लिखा गया जिसे ज्येस्थिमल्ला कहा जाता है। इसे गुजरात के एक ब्राह्मण द्वारा लिखा गया था। ब्राह्मण स्वयं भी इस कला मेंनिपुण थे और वे क्षत्रिय, राजाओं व सैनिकों को इसका प्रशिक्षण देते थे।
मल्ल विद्या की परम्परा भारतीय जनमानस में रची गई है, जिसके विवरण विभिन्न कालक्रमों में रचित महत्वपूर्ण ग्रंथों में विद्यमान दिखते हैं।
मल्लविद्या परम्परा में प्रयुक्त सामग्री
व्यायाम के दौरान विविध सामग्रियों का प्रयोग करते हुए पहलवान अपने शरीर को सुदृढ़ बनाते हैं। प्रतिदिन किये जाने वाले दैनिक अभ्यास में पहलवान शरीर के पृथक-पृथक हिस्सों की मजबूती के लिए अलग-अलग सामग्री का प्रयोग करते हैं। अखाड़ों में प्रचलित परम्परागत आयुधों (सामग्री) की चर्चा प्रासंगिक होगी। अलग-अलग पहलवान अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार शरीर के विभिन्न अंगों को पुष्ट करने के लिए पृथक-पृथक वजन के विभिन्न आयुधों (सामग्री) का प्रयोग करते है जिन्हें निम्नानुसार समझा जा सकता है।
मुगदर
यह मल्ल विद्या के अभ्यास में प्रयुक्त काष्ठ निर्मित परम्परागत सामग्री है। पहलवानी के अभ्यास में इसका समावेश काफी पूर्व से देखा जा सकता है। मल्लविद्या के जनक कहे जाने वाले बलदाऊ जी का यह प्रिय आयुध रहा है। गर्ग सहिंता में उल्लेख मिलता है कि कंस की व्यायामशाला में उसके पहलवान मल्लविद्या के अभ्यास के समय मुगदरों का प्रयोग करते थे।
स्थानीय अखाड़ों सहित यहाँ लोगों के निजी संग्रहों में पाँच-छ: पीढ़ी पूर्व तक के मुगदरों की जोडिय़ाँ आज भी देखी जा सकती है। मुगदरों को तैयार करने के लिए प्राय: साल या शीशम की लकड़ी ही प्रयुक्त की जाती थी। ताकत और लम्बाई के हिसाब से पृथक-पृथक वजन तथा अलग-अलग ऊंचाई के मुगदर अखाड़ों मे रखे जाते थे। पहलवानी की परम्परा में इन काष्ठ मुगदरों का विशेष महत्व है। हनुमान जयन्ती एवं बलदेव छठ के अवसर पर यहाँ इनका पूजन भी किये जाने की परम्परा देखने को मिलती है। पहलवानी के अभ्यास के दौरान मुगदर संचालन के पूर्व पहलवान इन्हें प्रणाम करते हुए दोनों हाथों से ऊपर उठाकर सीने के सामने की ओर लाता है तथा दांये हाथ द्वारा सिर के ऊपर बांयी तरफ से घुमाते हुए सामने की ओर तथा इसी प्रकार बांये हाथ से सिर के ऊपर दांयी तरफ से घुमाते हुए सीने के सामने लाता है, इस प्रकार यह प्रक्रिया की जाती थी।
गोला
गोलाई लिए हुए पत्थर के मध्य बने गोल छिद्र में मजबूत बाँस लगाकर व्यायाम हेतु गोला तैयार किया जाता है। संचालन पद्धति में मुगदर के समान इन गोलों से व्यायाम बाजुओं की ताकत हेतु किया जाता है। मुगदर की जोड़ी जहाँ दोनों हाथों से अलग-अलग घुमाई जाती है, वहीं गोला दोनों हाथों से एक साथ पकड़ कर घुमाया जाता है। इसके संचालन में काफी सावधानी की आवश्यकता होती है। गोले में लगे बाँस या लाठी की लम्बाई अधिक होने के चलते गोला घुमाते समय जब उसकी स्थिति ठीक पीछे की तरफ होती है, तो नीचे की ओर अधिक वजन होने के कारण सन्तुलन बनाने के लिए अधिक श्रम की आवश्यकता होती है। इस प्रकार चक्रित क्रम में गोला घुमाते समय इस बात पर विशेष ध्यान रखना आवश्यक है, अन्यथा पीछे की तरफ पैर से गोला टकराने पर पटक लगने की सम्भावना रहती है।
नाल
यह पत्थर से तैयार किया जाता है, गोलाई लिए हुए किन्तु व्यायाम में प्रयुक्त गोलों से भिन्न होती है। गोलों के मध्य बने छिद्र में जहाँ मजबूत बाँस या ल_ लगाकर उसे उपयोगार्थ तैयार किया जाता है वहीं नाल के केन्द्र में स्थित चौड़े छिद्र में उसे उठाने के उद्देश्य से हथेली की चौड़ाई के हिसाब से उसी पत्थर में तराशा हुआ हत्था होता है। नाल से वर्जिश करना काफी दमखम का काम है। सतत अभ्यास और प्रतिदिन कड़ी मेहनत द्वारा ही इसका संचालन सीखा जा सकता है नाल वजन के हिसाब से भिन्न-भिन्न होता है।
इन सब के अलावा अखाड़ों में अनेक मल्ल आयुध व्यायाम के लिए अखाड़ो में रखे रहते थे, जिनका प्रयोग शरीर को हिस्ट-पुस्ट बनाने के लिए किये जाते थे।
अखाड़ों का निर्माण बगीचों मे, नदी किनारे सुरम्य वातावरण किया जाता था, जहाँ जाकर युवा शरीर साधन करते थे लेकिन समय बदल अब युवा अखाड़ों में नही बल्कि कमरों में व्यायाम करता है तथा वहां पर कान के पर्दे फाड़ देने वाला म्युजिक चल रहा होता है। इस लेख उद्देश्य यही है कि हमारे पूर्वजो ने हमें स्वस्थ रहने की वो सारी व्यवस्था बना रखी थीं जो हमारे लिए आवश्यक हैं तथा उनका हमें पालन करना चाहिए और स्वस्थ रहना चाहिए।





