जोया मंसूरी
हमारे हिन्दू धर्म के अंतर्गत एक शैव सम्प्रदाय है। जैसा कि नाम से ही विदित है शैव यानी भगवान शिव। शैव सम्प्रदाय में भगवान शिव की उपासना की जाती है। शैव सम्प्रदाय का उपसंप्रदाय है शाक्त सम्प्रदाय। शाक्त सम्प्रदाय में शक्ति की उपासना की जाती है। शक्ति जुड़ी हुई है देवियों से।
अब जाते है इतिहास में। पाषाण काल मे सप्तमातृकाओ के बारे में कोई जानकारी न है क्योकि वो प्राग ऐतिहासिक काल है। सिन्धु घाटी सभ्यता सबसे प्राचीन सभ्यता मानी जाती है जो कि आद्य ऐतिहासिक काल है तो वहां मातृ देवी की पूजा की जाती थी। यहां से पुरातात्विक अवशेष भी मिल रहे हैं पर इनकी स्क्रिप्ट अपठनीय है।
कदंब और चालुक्य के ताम्र शिलालेखों में इन सप्तमातृका के बारे में लिखा गया है। एक प्राचीन चेंब्रोलू शिलालेख (आंध्र प्रदेश) जो कि संस्कृत में है। उनमें भी इनका वर्णन किया गया है। इससे आगे जाए तो वैदिक काल में वेदों की उत्पत्ति वैदिक काल में हुई। पहला – अर्थवेद में पृथ्वी को माता का दर्जा दिया गया है। दूसरा -ऋग्वेद में इनका सात दिव्य सूत्रों के रूप में वर्णन है, जो कि सोम के निर्माण पर नियंत्रण करती है। उनकी उपासना की जा रही है तो यह शाक्त से ही सम्बंधित है। आरण्यक काल में तृतीय आरण्यक में रुद्र की पत्नी पार्वती का उल्लेख किया गया है। अब इससे आगे आये तो महाकाव्य काल यानी रामायण, महाभारत काल में। यहाँ आप श्री कृष्ण की देवकी माँ की सातवीं संतान महामाया (सती का रूप) के रूप में इनके वर्णन मिलता है। ये हिन्दू शास्त्रों और इमारतों में चित्रित है।
अब जानते है कि सप्तमातृका है क्या? ये शक्ति के सात रूप है सात देवियाँ हैं। इन्हीं को सामुहिक रूप से सप्तमातृका कहते हैं। पुरुष देवताओं से मातृकाएं शक्ति के रुप में निकली हैं। शाक्त सम्प्रदाय में इनका वर्णन देवी शक्ति के लिए राक्षसों के विरुद्ध युद्ध मे सहायक देवियों के रूप में हैं। शास्त्रों में लिखा गया है युद्ध मे शुंभ निशुम्भ नामक राक्षसों से लड़ते समय माँ सरस्वती की सहायता के समय सभी देवता अपनी अपनी शक्तियां भेजते है। (चामुंडा को छोड़कर वह काली मां का रूप मानी जाती है)
1. ब्राह्मी – ब्रह्म देव से
2. माहेश्वरी – महेश ( शिव) से
3. कौमारी – कुमार देव( स्कंद)
4. वैष्णवी – विष्णु देव से
5. वाराही – वराह देव से
6. चामुंडा – काली मां से
7. इंद्राणी – इंद्र देव से
अगर इन सप्तमातृका में एक और देवी लक्ष्मी जोड़ दिया जाए तो ये अष्ठमातृका कहलाई जाएगी। अष्ट मातृकाओं की नेपाल में पूजा की जाती है। मार्कण्डेय पुराण में इनका वर्णन है कि देवी चण्डिका से युद्ध के समय उनकी सहायता के लिए ये उत्पन्न हुई थी। इन्ही सप्त मातृकाओं की सहायता से देवी ने रक्तबीज का वध किया था। अब इन देव शक्तियों के भी तीन स्वरूप हैं।
1 शांत – उमा , पार्वती,लक्ष्मी वैष्णवी
2 उग्र – काली माता (काली घाट मन्दिर, कलकत्ता)
3 काम – कामख्या माता( कामख्या माता मन्दिर)
सप्तमातृकाओं की पूजा विशेषत: दक्षिण भारत मे पूजा की जाती है वहां मंदिरों के द्वार पर स्तम्भ या तोरण द्वार पर इनको चित्रित किया है। उनमें कभी कभी इनको गणेश यानी विनायक के साथ या वीरभद्र के साथ दिखाया दर्शाया गया है, क्योकि सूत्रधार मंडन रचित ग्रन्थों में लिखा गया है कि आरम्भ में वीरभद्र और अंत मे गणेश की प्रतिमा होनी चाहिए। सप्त मातृकाएं अपने पति के वाहनों और आयुध के साथ विराजमान होती है। सप्त मातृकाओ की प्रतिमा तीन रूपों में होती है।
1. स्थानक यानि खड़ी प्रतिमा
2. आसन्थ यानि बैठी हुई प्रतिमा
3. नृत्यरत प्रतिमा
तन्त्रो में इनको मातृशक्ति से जोड़ा जाता है। पुराणों में जो सप्त मातृकाओं का वर्णन है, उनमें माताओं के चार हाथ और गोद मे शिशु है। ये उनका ममता मयी रूप का वर्णन है। ऋषि अगस्त्य-लोपामुद्रा एवं ऋषि वसिष्ठ-अरुंधति, इन चारों ने अपनी संतान के लिए जो पहला पूजन किया था उसे सप्तषष्टि पूजन भी कहा जाता है।
देखिए, कितने सुंदर और सूक्ष्म तरीके से सप्त मातृकाओं के बारे में हमारा इतिहास गवाही देता है। सिद्ध करता है कि यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:।





