भारतीय धरोहर के बढ़ते कदम नया उत्साह और नई योजनाएं

प्रतिनिधि

भारतीय धरोहर यानी कि भारत की धरोहर। भारत की धरोहर जो बड़े ही प्रयत्नपूर्वक हमारे पूर्वजों ने संजोई है। ज्ञान और विज्ञान की उस धरोहर को हमें संभालना और आगे बढ़ाना है। परंतु क्या हम उस धरोहर को पहचान भी पा रहे हैं? क्या हम यह अनुभव भी कर पा रहे हैं कि ऐसी कोई धरोहर है भी हमारे पास? वास्तव में यह

अनुभूति कराने के लिए ही भारतीय धरोहर संस्था की संकल्पना की गई। पिछले 21 सितम्बर, 2014 को देश की राजधानी नई दिल्ली में हुए भारतीय धरोहर के प्रतिनिधि सम्मेलन में उक्त बातें संस्था महामंत्री श्री विजय शंकर तिवारी ने कहीं।  प्रतिनिधि सम्मेलन में मनोज जोशी कृत व अभिनीत चाणक्य नाटक का मंचन किया गया था और दूसरे दिन भारतीय धरोहर की वार्षिक बैठक की गई थी। इस बैठक में देश भर से भारतीय धरोहर के 50 से अधिक प्रतिनिधि सहभागी हुए थे।

इस अवसर पर भारतीय धरोहर के संरक्षक आदरणीय स्वामी ब्रह्मदेव जी ने प्रतिनिधियों का मार्गदर्शन करते हुए कहा कि देश में दुनिया की लगभग सभी ताकतें, ईसाइयत, इस्लाम, कम्यूनिज्म आदि अपने-अपने प्रयोग कर रही हैं क्योंकि दूसरे किसी भी देश में इन प्रयोगों को करने की छूट नहीं है। भारत एक उदार समाज होने के कारण यहां सभी अपने प्रयोग कर पा रहे हैं। परंतु इसके कारण समाज में काफी संभ्रम का निर्माण हो गया है। इस संभ्रम को दूर करने के लिए ही आज भारतीय धरोहर की आवश्यकता है। इस आवश्यकता को ध्यान में रख कर संस्था की अगले वर्ष की कार्ययोजना बनाई गई । संस्था के संगठन मंत्री श्री प्रवीण शर्मा ने संस्था की गतिविधियों की जानकारी देते हुए बताया कि वर्तमान में भारतीय धरोहर के द्वारा कुछ  प्रकल्प भी चलाये जा रहे हैं जिनका विवरण इस प्रकार है-

1. प्रकृति परीक्षण

भारतीय वैज्ञानिकों ने काफी परीक्षण करके यह सिद्ध किया है कि प्रत्येक मानव शरीर की अपनी एक प्रकृति होती है और तदानुसार ही उसे अपना आहार-विहार रखना चाहिए। आज की व्यस्ततम जीवनचर्या एवं अज्ञानता के कारण हम उसका पालन नहीं कर पाते और बीमार पड़ते रहते हैं।  इसे ध्यान में रख कर भारतीय धरोहर देश भर में प्रकृति परीक्षण की कार्यशालाएं आयोजित करता है। इसके लिए एक वेबसाइट भी चलाई जा रही है 

2. उत्तम संतान – भारतीय विज्ञान

भारतीय परंपरा में उत्तम संतान का उत्पन्न होना दम्पत्ति की योजना का हिस्सा होता था। जैसे कि हम अपने छोटे से छोटे कार्य की भी योजना बनाते हैं, ठीक उसी प्रकार श्रेष्ठ व योग्य संतान के जन्म की भी योजना बनाते थे। इसीलिए ऋषियों ने पहला संस्कार बनाया था गर्भाधान का। गर्भाधान से पहले से ही संतान के निर्माण के लिए युगल तैयारियां करता था। गर्भाधान के बाद गर्भस्थ शिशु को स्वस्थ रखने और उसमें उत्तम संस्कारों का रोपण करने के लिए पुंसवन और सीमंतोन्नयन के संस्कार होते थे। भारतीय धरोहर ने श्रेष्ठ संतान के जन्म के उस प्राचीन भारतीय विज्ञान को पुनर्जीवित करने के लिए यह प्रकल्प प्रारंभ किया है। इसके लिए कौशाम्बी, गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश में प्रसिद्ध आयुर्वेदाचार्य डा. नितिन अग्रवाल के निर्देशन में परामर्श केंद्र प्रारंभ किया गया है। यहां संपर्क करके कोई भी इच्छुक दंपत्ति उत्तम संतान पाने के लिए जानकारी ले सकते हैं।

3. नाड़ी परीक्षण शोध संस्थान

भारतीय परंपरा में स्वास्थ्य के परीक्षण के लिए नाड़ी के परीक्षण का अद्भुत विज्ञान विकसित किया गया था। यह अत्यंत ही प्रामाणिक, सहज, नि:शुल्क और प्रभावकारी विज्ञान था। आज भी देश में अनेक विशेषज्ञ नाड़ी वैद्य हैं, हालांकि उनकी परंपरा अब लुप्त होने के कगार पर है। इसलिए भारतीय धरोहर द्वारा पिछले दिनों देश की राजधानी दिल्ली में नाड़ी परीक्षण के दो शिविर आयोजित किए गए। भारतीय धरोहर की योजना है कि शीघ्र ही एक नाड़ी परीक्षण शोध संस्थान की भी स्थापना की जाएगी ताकि इस प्राचीन भारतीय विज्ञान को समाप्त होने से बचाया जा सके और जिससे आमजन भी लाभ उठा सकें। इस संस्थान में न केवल लोगों की नाड़ी परीक्षण द्वारा चिकित्सा की जाएगी, बल्कि इच्छुक व जिज्ञासु लोगों को नाड़ी परीक्षण का प्रशिक्षण भी दिया जाएगा।

4. भारतीय धरोहर आरोग्य शिविर

लोगों को अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक बनाना और स्वस्थ रहने की भारतीय पद्धतियों की जानकारी देने के लिए आरोग्य शिविर आयोजित किए जा रहे हैं। इन शिविरों में साधारणत: 2-3 आयुर्वेदाचार्य लोगों को चिकित्सकीय परामर्श देंगे।

5. भारतीय धरोहर व्याख्यानमाला

पिछले डेढ़-दो सौ वर्षों की अंग्रेजी शिक्षा के कारण हम अपने पूर्वजों द्वारा सौंपी गई धरोहर की समझ खो बैठे हैं। हम अपने इतिहास को मिथक और अपने विज्ञान को अंधविश्वास मानने लगे हैं। योग को पश्चिम से योगा बन कर आने पर ही हम उसे अपनाते हैं, हर्बल के रूप में आने पर ही आयुर्वेद हमें वैज्ञानिक लगने लगता है। भारतीय धरोहर इसी खोई अनुभूति को लौटाने का एक प्रयास है। भौतिकी विज्ञान हो या  रसायन शास्त्र, धातु विज्ञान हो या चिकित्सा शास्त्र, वैमानिकी हो या फिर भवन-निर्माण भारतीय मनीषियों ने सभी क्षेत्रों में अद्भुत विशेषज्ञता प्राप्त की थी। इस विशेषज्ञता का ही परिणाम था कि अ_ारहवीं शताब्दी तक भी भारत विश्व व्यापार का सिरमौर था और पूरी दुनिया का सोना भारत आता था। भारत के इस गौरवशाली परंपरा को स्मरण करने से हम गौरव से भर सकेंगे और देश का गौरवान्वित युवा मौलिक चिंतन और शोध कर सकेगा। साथ ही उस ज्ञान परंपरा को पाने से हम आज के विज्ञान के उन दोषों से भी मुक्त हो पाएंगे जिनके कारण आज सम्पूर्ण मानवता ही संकट में है। इस विषय को ध्यान में रख कर इस व्याख्यानमाला की योजना बनाई गई है।

6. भारतीय धरोहर सम्मान

पाश्चात्यीकरण की आज की विषम बेला में भी भारतीय धरोहर यानी कि भारतीय ज्ञान-विज्ञान की परंपरा को सामने लाने के लिए अनेक व्यक्ति और संस्थाएं प्रयत्नशील हैं। आज समाज को इन प्रयत्नों से परिचित करवाने की आवश्यकता है, ताकि ऐसे सभी प्रयासों को प्रोत्साहन मिल सके और उनका संवर्धन हो सके। इसके लिए भारतीय धरोहर सम्मान दिए जाने की योजना बनाई गई है। भारतीय ज्ञान-विज्ञान के किसी भी क्षेत्र या विधा पर शोध या किसी भी प्रकार का काम करने वाले व्यक्तियों व संस्थाओं को यह सम्मान दिया जाएगा। ह्व