कैसा हो मन्त्रिपरिषद चाणक्य की दृष्टि में

प्रो.लल्लन प्रसाद

प्रख्यात आर्थिक विचारक एवं अध्यक्ष, कौटिल्य फाउंडेशन

चन्द्रगुप्त मौर्य को चक्रवर्ती सम्राट बनाने के बाद चाणक्य ने मुद्राराक्षस को उनका प्रधानमन्त्री नियुक्त किया। वह चाहते तो स्वयं यह पद ले सकते थे किन्तु उन्होंने अपने आप को सत्ता सुख से अलग रखा और मुद्राराक्षस जो उनका सबसे बड़ा प्रतिद्वन्द्वी था, उसे पदासीन किया। मुद्राराक्षस नन्द वंश का एक स्वामिभक्त और अत्यन्त कुशल प्रशासक था। उसको चन्द्रगुप्त के राज्य में वही सम्मान देकर उन्होंने एक इतिहास रच दिया और एक संदेश दिया कि उच्च पदों पर नियुक्ति योग्यता के आधार पर होनी चाहिए, मात्र व्यकितगत सम्बन्धों के आधार पर नहीं। मंत्री शासन के पहियों की धुरी होते हैं।

 

राष्ट्राध्यक्ष मन्त्रियों से किस तरह सलाह ले, इसके ऊपर विभिन्न आचार्यों ने अलग अलग मत दिये हैं। पाराशर के अनुसार जिस कार्य के लिए सलाह लेनी हो, उससे मिलती जुलती समस्या के बारे में पूछा जाए। नारद मुनि इससे सहमत नहीं है। उनका मानना है कि प्रकारान्तर से पूछे जाने पर मन्त्री सोचेंगे कि उन पर विश्वास नहीं है। चाणक्य के मत में तीन चार मंत्रियों को बैठाकर मन्त्रणा करें, जिससे समस्या के सभी पहलुओं पर विचार हो सके और प्रभावशाली निर्णय हो। मंत्रियों के सहयोग से ही राजा न जाने हुए कार्यों को जान पाता है, संदेह का निवारण कर सकता है, आंशिक कार्यों को सफलतापूर्वक सम्पन्न करा सकता है। मंत्रियों की बात धैर्य से सुनने के बाद किया गया निर्णय कारगर होता है। कुछ बातें शासक गुप्त रख सकता है जिसकी भनक जब तक उचित अवसर न आये, मंत्रियों को भी न लगे। जैसे कछुआ अपने अंग समेट कर रखत है और आवश्यकता पडऩे पर खोलता है। मंत्रियों से गुह्य मन्त्रणा की भी आवश्यकता पड़ सकती है। ऐसी स्थिति में मन्त्रणा का स्थान ऐसा हो जहां पंछी तक झांक न सके। इसका यह तात्पर्य नहीं कि शासन में पारदर्शिता न हो, परिस्थितियों को ध्यान में रखकर शासन में कुछ चीजें गुह्य रखी जाती है, गुप्त मन्त्रणा की जाती है।

मन्त्रिपरिषद का आकार क्या हो, इसके बारे में भी विभिन्न आचार्यों में मतैक्य नहीं है। आचार्य वृहस्पति ने मन्त्रिपरिषद की सीमा 16 मन्त्रियों की रखी है, शुक्राचार्य 20 मन्त्री तक सीमित रखने की सलाह देते हैं। चाणक्य के मत में मन्त्रियों की सीमा नियुक्त किये जाने वाले मन्त्रियों की योग्यता और सामथ्र्य के आधार पर निर्धारित करना चाहिए। इन्द्र के पास एक हजार ऋषि थे जो उनके सलाहकार थे और इसीलिए उन्हें सहस्रासु की संज्ञा दी गयी। इन्द्र राजाओं के राजा, पूरी सृष्टि के राजा माने जाते हैं। इसलिए उनके सलाहकारों की संख्या भी बड़ी है।

मन्त्रियों की नियुक्ति के लिए अर्थशास्त्र में एक विशेष व्यवस्था का प्रावधान है। अर्थ, धर्म और काम की त्रयी शासन का मूलाधार है। अर्थ को चाणक्य सर्वोपरि मानते हैं, धर्म का पालन अर्थ के बिना सम्भव नहीं है। काम प्रकृतिजन्य है और त्रयी का अंग है। मोक्ष को चाणक्य ने अपने दर्शन में कोई महत्व नहीं दिया है। कर्तव्य निवाह छोड़कर साधू बनना समाज के हित में नहीं है। मंन्त्रियों के चुनाव में उन्होंने जिस परीक्षा का विधान किया है, उसमें मोक्ष सम्बन्धी प्रश्न नहीं है। धर्म परीक्षा में उत्तीर्ण व्यक्ति धर्मस्थान, न्यायालय आदि विभाग के लिए उपयुक्त है। अर्थ परीक्षा में सफल होने वाला समाहती (कर विभाग), सन्निधाता (कोष) आदि विभागों के योग्य होता है। कामोपधा परीक्षा में उत्तीर्ण बाह्य विहारों और अन्त:पुर के प्रबन्ध के लिए योग्य माना जा सकता है। इन तीनों परीक्षाओं के अतिरिक्त एक भय परीक्षा को भी सम्मिलित किया गया है जिसमें उत्तीर्ण रक्षा और अंगरक्षक जैसे कामों के लिए उपयोगी माने जाते हैं। जो चारों परीक्षाओं में सफल हों वे प्रधानमन्त्री पद के योग्य है। जो एक चौथाई में हों, उनको निम्न श्रेणी में रखा गया है। परीक्षा का माध्यम राजा या रानी स्वयं न बनें बाहर से चुने लोगों से यह काम कराया जाए। गुप्तचरों और भेदियों के द्वारा जानकारी प्राप्त करने का विधान भी है। जो सम्भावित व्यंिक्त इन चारों परीक्षाओं में असफल रहें, उन्हें खदानों, जगलों, पशुपालन आदि विभाग के लिए नियुक्त किया जा सकता है।

अपने निकटतम व्यक्तियों को मन्त्रिपरिषद में रखा जाए या नहीं, यह निर्णय राष्ट्राध्यक्ष को सोच समझकर करना चाहिए। आचार्यों ने इस सम्बन्ध में अलग अलग विचार दिये हैं। भारद्वाज के मत में राजा अपने सहपाठियों को मंत्री बनाए जिनके हृदय की पवित्रता से वह परिचित है। विशालाक्ष इसको उचित नहीं समझते क्योंकि साथ उठने बैठने वाले राजा का तिरस्कार भी कर सकते हैं। पाराशर का मानना है कि जिन लोगों ने बुरे समय में साथ दिया है उन्हें मंत्री बनाया जा सकता है। पिशुंन इसके विरोध में मत देते है कि क्योंकि जो लोग विपत्ति में रक्षा करते हैं, यह उनकी स्वामीभक्ति हैं, लेकिन बुद्धि और योग्यता का प्रमाण नहीं। बाहुदन्ती पुत्र का कहना है कि मंत्री पद उन लोगों को दिया जाना चाहिए जो कुलीन, बुद्धिमान, विश्वासपात्र और राष्ट्रभक्त हैं। कोणपदन्त का मानना है कि मंत्रियों की नियुक्ति में वंश परम्परा का भी ध्यान रखना चाहिए। पशु-पक्षी भी अपना गोष्ठ पहचानते हैं और अपने वंश के साथ ही रहना पसंद करते हैं। आचार्य चाणक्य का मानना है कि सभी आचार्यों की बाते अपनी अपनी जगह ठीक हैं। राजा को देश, काल और परिस्थितियों को ध्यान में रखकर अपने विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए।

मंत्रियों के चुनाव का आधार उनकी योग्यता है, जिसका मापदंड कठोर है। स्वदेशोत्पन्न, निपुण, ज्ञानी, अर्थशास्त्री, ललित कलाओं के जानकार वाक्पटु, प्रतिवार, प्रतिकार करने में समर्थ, उत्साही, प्रतिभाशाली, सहिष्णु, दृढ़, धैर्यवान, प्रियदर्शी और चरित्रवान लोगों को ही मन्त्रीपद के लिए चुनना चाहिए। सर्वगुणसम्पन्न मन्त्रिपरिषद के अध्यक्ष के योग्य माना जाता है। नियुक्ति के पहले पूरी जानकारी इकठ्ठी कर लेनी चाहिए। निष्ठा और स्वामिभक्ति के प्रति कोई संदेह की स्थिति नहीं रहनी चाहिए।

मंत्री की प्रशासनिक क्षमता जिन कार्यों से परखी जानी चाहिए उनके प्रमुख है – प्रारम्भ किये गए कार्य। दिये गये कार्य, वे कितनी सफलता से पूरा करते हैं, नयी योजनाए कैसी बनाते हैं और कैसे उनका कार्य स्वयं करते है और जो योजनाए पूरी हो चुकी हैं उनकी समीक्षा संशोधन की व्यवस्था किस ढंग से करते है? देश की सम्पदा मानवीय और प्राकृतिक, धन दौलत की सुरक्षा और सदुपयोग परिस्थितियों को ध्यान में रखकर राज्य की और विदेशी नीति का सफल संयोजन और राज्य द्वारा जनहित की योजनाओं को प्रभावशाली ढंग से पूरा करना आदि मन्त्रियों की जिम्मेदारी है।   ह्व