वैद्य राहुल पाराशर शिशिर ऋतु में ठंड अपने जोरों पर होती है और हालांकि शीत ऋतु यानी कि ठंड का मौसम अपने पुष्टिकारक होने के लिए प्रसिद्ध है, परंतु यदि सावधानी न रखी जाए यानी कि शीतकालीन आहार-विहार का पालन ठीक से न किया जाए तो यही शीत ऋतु आपके लिए अत्यंत कष्टप्रद भी सिद्ध हो सकती है।
वैसे तो शीत ऋतु में सर्दी-जुकाम को आम बीमारी के रूप में जाना जाता है परंतु उनके उपाय न केवल आम जन को ज्ञात हैं, साथ ही हम पिछले अंक में हेमंत ऋतुचर्या में उसका वर्णन कर चुके हैं। इस अंक में हम ठंड में होने वाली एक दूसरी कष्टकारक बीमारी की चर्चा करेंगे। यह है ठंड में श्वास लेने में होने वाली तकलीफ यानी कि श्वास कृच्छता। आम तौर पर श्वास कृच्छता की तकलीफ होने पर लोग उसे अस्थमा समझ लेते हैं, परंतु आयुर्वेद में इसे अस्थमा से अलग रखा गया है।
आयुर्वेद में श्वास कृच्छता को रोग के रूप में तथा विभिन्न रोगों के लक्षणों के रूप में बताया गया है। कास, हिचकी के साथ श्वास रोग के नाम से तथा ज्वर, तपेदिक तथा पीलिया या रक्ताल्पता आदि व्याधियों में लक्षण या उपद्रव के रूप में इसका वर्णन पाया जाता है। श्वास कृच्छता को वात-कफज विकार के रूप में बताया गया है तथा इस रोग का मूल पित्त दोष का स्थान बताया गया है। इस प्रकार तीनो ही दोषों का अल्प या अधिक रूप से दूषित संयोग इस रोग के कारण के रूप में दिखाई देता है।
आयुर्वेद के मूल ग्रंथ चरक संहिता के अनुसार श्वास कृच्छता का कारण है :
- श्वास मार्ग में धूल या धुएं का प्रवेश होने से
- शीतल स्थान में रहने से या शीतल जल पीने से
- अधिक व्यायाम करने से
- अधिक मैथुन करने से
- अधिक रास्ता चलने से
- रूक्ष अन्नों का निरन्तर सेवन करने से
- विषम (मात्रा तथा काल की विषमता से युक्त) भोजन करने से
- शरीर में रूक्षता के बढ़ जाने से
- द्वन्द्व (शीत-उष्ण आदि विपरीत भावों के निरन्तर प्रयोग) से
- संशोधन (वमन-विरेचनो) के अतियोग से
- अतिसार, ज्वर, वमन, जुकाम, घाव, क्षय, रक्तपित्त, उदावर्त, विसूची, पाण्डू रोग तथा विष भक्षण से
इनके अतिरिक्त सेम, ईख, तिल की चटनी, तेल का अधिक सेवन, पिष्ट (चावल की पिट्ठी), कमलकंद, कब्जियत पैदा करने वाले भोज्य पदार्थ, मात्रा में अधिक तथा देर से पचने वाले भोज्य पदार्थो को खाने से, पानी में रहने वाले तथा दही एवं कच्चे दूध का सेवन करने से, गरिष्ठ पदार्थों का सेवन करने, कण्ठ तथा छाती पर आघात लगने आदि विविध कारणों से श्वास रोग की उत्पत्ति होती है।
उपरोक्त कारणों से बढ़ी हुई वायु प्राण वायु को वहन करने वाले स्रोतो में प्रवेश कर कुपित हो जाती है। वह कुपित वायु हृदय में स्थित हो कर कफ दोष को प्रकुपित कर प्राण वायु में रुकावट पैदा करती है और कष्टप्रद श्वास कृच्छता उत्पन्न होती है। कफ के साथ प्रकुपित वात दोष, प्राणवह, अन्नवह तथा उदकवह स्रोतो को रोककर और कफ के कारण स्वयं अवरुद्ध हो कर विलोम गति से शरीर में चारो ओर फैलने लगता है तब वह वात दोष श्वास कृच्छता का उत्पन्न करता है।
यदि आधुनिक चिकित्सा सिद्धांतो को देखा जाये तो श्वास कृच्छता के लक्षण फुफ्फुस सम्बंधित विकारो, श्वास पथ में अवरोध, हृदय रोग, अस्थमा,रक्ताल्पता, किसी विशेष चीज से एलर्जी, तनाव आदि विभिन्न परिस्थितियों में दिखाई देती है। शीतकालीन श्वास कृच्छता इसी का रूप है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार यह चौथी ऐसी व्याधि है जो विश्व में मृत्यु का कारण है। एसआरएस अपोलो हॉस्पीटल के डा. आकाश दीप सिंह के अनुसार शीत ऋतु के आते ही कुछ रोगियों में कफ बढ़ जाता है जिससे श्वास कृच्छता की शिकायत उन्हें होती है। हाल में हुए सर्वेक्षणों में भारत में पंाच प्रतिशत पुरुषों व तीन प्रतिशत महिलाओं में जिनकी आयु 30 वर्ष से अधिक है, यह रोग देखा गया है। फिर भी यह रोग उन लोगों में अधिक दिखाई देता है जो पहले धूम्रपान किया करते थे।
यदि आयुर्वेद व आधुनिक चिकित्सों विज्ञानों में गौर से देखा जाये तो मूल रूप से बढ़े हुए कफ के द्वारा श्वास मार्ग का अवरोध तथा श्वास पथ का संकोच ही शीतकालीन श्वास कृच्छता का कारण दिखाई देता है। आयुर्वेद में श्वास कृच्छता की चिकित्सा बहुत विस्तृत रूप से बताई गई है। यहां हम कुछ घरेलु उपायों के बारे में चर्चा करते हैं-
ठ्ठ सेंधा नमक व गाय की पुराना घी अथवा तैल में मिलाकर वक्ष प्रदेश पर मालिश करें तथा भाप से या गरम कपड़े से स्वेदन (शरीर में पसीना लाएं) करें तुरन्त आराम मिलता है।
ठ्ठ घी या सेंधा नमक को गुनगुने जल में मिलाकर कुंजल करने से भी शीघ्र आराम आता है।
ठ्ठ रोगी को बिजोदा नीबू का रस, घी में भूनी हींग, अम्ल वेतस का चूर्ण तथा सैधा नमक युक्त भोजन दें।
ठ्ठ यदि रोगी दुर्बल है तो मंूग की दाल का सूप दें।
ठ्ठ मूंग का सूप बनाकर नमक, यवक्षार, सहीजन के बीज तथा कालीमिर्च आदि का मात्रानुसार चूर्ण मिलाकर पिलाने से इस रोग का नाश हो जाता है।
ठ्ठ कासमर्द (कसौदी) के पत्तों, सहिजन के पत्तों और सुखायी गयी मूली का जूस श्वास कृच्छता का नाश करते हैं।
ठ्ठ श्वास रोगी को जब प्यास लगे तो दशमूल क्वाथ या देवदारू के सार भाग का क्वाथ अपना गर्म पानी पीने को दें।
ठ्ठ सर्षद तैल या तिल तैल में सैंधा नमक भून ले तथा शेष तैल की दो-दो बूंदें नाक में डालें।
ठ्ठ कफ नाशक, वातनाशक, उष्णवीर्य तथा वायु का अनुलोचन करने वाला भोजन व औषध श्रेष्ठकर है।
ठ्ठ फूला हुआ सुहागा एवं मुलेठी का चूर्ण बराबर मात्रा में मिलाकर आधे ग्राम सुबह दोपहर सांय तीन बार दिन में शहद के साथ ले।
ठ्ठ बच्चों को श्वांस कृच्छता होने पर तुलसी की पत्तियां खूब बारीक पिसकर शहद के साथ चटायें।
ठ्ठ काली मिर्च, हल्दी व सोंठ तीनों समान मात्रा में मिलाकर प्रतिदिन दो बार आधा चम्मच चूर्ण गर्म पानी से लें।
ठ्ठ लहसुन पीसकर शहद के साथ चाटें यदि अधिक कफ होगा तो तुरंत आराम आयेगा।
ठ्ठ यदि खांसी भी साथ में हो तो सैंधा नमक की डली व अनार का छिलका मूह में रखे, धीरे धीरे चूसें, शीघ्र आराम आयेगा।
ठ्ठ हल्दी व शहद मिलाकर आधा-आधा चम्मच दिन में तीन बार लें। यह श्वास नलिका की सूजन को ठीक करता है।
ठ्ठ लौग को भूनकर पीस ले शहद मिलाकर सेवन करेें।
ठ्ठ भूनी फिटकरी का दो चुटकी चूर्ण शहद के साथ लें।
ठ्ठ हरसिंगार की पत्तियों का रस गर्म पानी के साथ ले।
ठ्ठ दो सो पचास मिली पानी में एक चम्मच अजवायन उबाले तथा चौथाई रह जाने पर छान कर पी लें ।
ठ्ठ अधिकाधिक दाहिने स्वर से श्वास लें, मतलब सूर्य स्वर का अधिक उपयोग करें।
श्वास कृच्छता के रोगी को दही, गोभी, उड़द की दाल, अधिक तले-भुने व मसालेदार भोजन, शीतल खाद्य एवं पेय पदार्थ नही लेने चाहिये तथा मानसिक तनाव से बचना चाहिये। आयुर्वेदिक रस-रसायनों यथा च्यवनप्राश, कंटकादि अवलेह आदि का प्रयोग करना चाहिये। पेट को साफ रखना चाहिये, इसके लिये त्रिफला या हरीतकी का प्रयोग उत्तम है। भुने हुए बहेड़े को चूसना कफ निकालने के लिए सर्वोत्तम है।
द्य कफनाशक एवं वातनाशक आहार के लिए 222.ड्डड्डद्धड्डह्म्1द्बद्धड्डह्म्.ष्शद्व देखें।


