कौशल विकास से ही आएगी समृद्धि

अभी मैं जो लिखने जा रहा हूं सम्भव है कि वह आश्चर्यजनक लगे किन्तु है सत्य। जब मगध में महापद्म नन्दों का राज्य था,

भारत स्वतंत्र था, व्यापार फल फूल रहा था, व्यापारियों के साथ प्रजा भी सम्पन्न थी, राज्य भी सुशासित और समृद्ध था। यहां की बनी हुई वस्तुओं से विदेशी बाजार पटे पड़े थे। जहां देखो भारतीय शिल्पकारों के हाथ से बना माल ही दिखाई देता था। उन कारीगरों के हाथ में कुछ ऐसी सफाई थी, कुछ ऐसा जादू था कि वे जिस वस्तु को बनाते वह सबका मन मोह लेती थी। राजा भी राज्य की तिजोरी को भरने वाले इन शिल्पकारों को खूब बढ़ावा देते थे। बढ़े हुए व्यापार से देश में धन की कमी नही थी। राजकोष भरा पड़ा था। मगधराज के पास दस पद्म रुपये होने के कारण ही उसका नाम महपद्म पड़ा था। इस राज्य की राजधानी थी कुसुमपुर बाद में यहीं पर पाटलिपुत्र बसाया गया जो अब पटना कहलाता है। कुसुमपुर के वैभव के कारण देश विदेश के व्यापारियों का पाटलिपुत्र में जमघट लगा रहता था। व्यापारी व्यापार करते और कुसुमपुर की कला की सुगन्ध लेकर जाते। राज्य में प्रजा और राजा में कुछ तो खास था यह लगना स्वाभाविक है। राजा स्वयं को स्वामी न मानकर सेवक समझता था। हमारे यहां राजा का यही आदर्श रहा है। यहां तो छोटे छोटे कर्मचारी भी प्रसन्न रहते थे। उसी राज्य में घनानन्द जैसा विलासी राजा भी हुआ और वहीं से राज्य के पराजय की कहानी भी प्रारम्भ हुई। बाद में चन्द्रगुप्त और चाणक्य की जोड़ी ने फिर से राज्य को शक्ति और धन सम्पन्न बनाया। ऐसी परिस्थिति शायद भारत के भाग्य में ही है जो बार-बार दोहराई जाती है। अभी आज ही की बात देखी जाए बात कुछ-कुछ समझ में आने लगेगी। सन् सैंतालीस के पहले और बाद के शासक वर्ग की विलासिता की कहानियां यत्र-तत्र छपती रहती हैं। इसी विलासिता के कारण देश की नीव कमजोर पड़े लगी। बाद में तो ये भी महसूस हुआ कि जिस देश को सैकड़ों वर्षों के संघर्ष ने भी मानसिक रूप से नहीं तोड़ा उसे स्वतंत्रता के बाद के कुछ दशकों ने तोड़ दिया।
स्वतंत्रता के बाद भारत में जो आर्थिक नीतियां बनाई गई उससे भारत का भला नहीं हुआ, सात समन्दर पार के देश भले ही मालामाल हो गए हों लेकिन हम गरीब ही रहे। जिन कारीगरों के घरों में घी के दीपक जलाए जाते थे वहां अंधेरा हो गया। वस्त्र बनाने वालों के शरीर ही निर्वस्त्र हो गए। सुन्दर नक्काशीदार घर बनाने वाले बेघर होकर झुग्गियों में रहने के लिए विवश हो चुके हैं। अब तो हाल ये है कि स्वतंत्रता के पहले भारत की कुल जितनी आबादी थी उससे कहीं अधिक लोगों को तो अब एक वक्त खाना भी नहीं मिलता है। हम समझ सकते हैं कि कौन से वैभव सम्पन्न भारत में हम रहते हैं। विदेशी और आधुनिक कहलाने वाले अखाड़े में लडऩे वाले कुछ भारतीय नवयुवकों के सफल होने मात्र से भारत की गरीबी कभी भी नहीं जाएगी। कहा जाता है कि अपने अखाड़े में लडऩे वाले अपनी जीत के प्रति अधिक आशावान रहते हैं। बात बिल्कुल ठीक है समझदार योद्धा भी वही होते हैं जो प्रतिद्वन्द्वी को अपने अखाड़े में खींच लाते हैं। ढाका की मलमल पश्चिम बंगाल में आज भी बनाई जा सकती है उसके अमीर खरीददार अब भी पूरी दूनिया में मौजूद हैं। ऐसे ही अनेक भारतीय शिल्पकलाओं के पारखी भारत को मालामाल कर सकते हैं। आज जरूरत है उन भारतीय शिल्पकारों को ताकत देने की जिनका दुनियाभर में कोई प्रतिद्वन्द्वी नहीं है, उनकी बेजोड़ कला की सब जगह मांग है बस उन्हें ताकतवर बनाने की आवश्यकता है। भारत के वर्तमान नेतृत्व को देखकर देश को लगता है कि उसमें दम-खम है, और वह बहुत कुछ करने में सक्षम है। भारत की जनता को विश्वास अब तक शायद किसी भी शासक पर नहीं रहा है। ईश्वर करे कि ये विश्वास सही साबित हो स्वतंत्रता के पश्चात के विलासी राजाओं के कारण जो आर्थिक क्षति हुई है उससे उबरने के लिए परंपरागत भारतीय शिल्पकारों को अखाड़े में उतारा जाए तो विजय निश्चित है।