पोषण की ऋतु है शिशिर

संत, ग्रीष्म और वर्षा देवी ऋतु हैं तो शरद, हेमंत और शिशिर पितरों की ऋतु है। शिशिर में कड़ाके की ठंड पड़ती है।यह ऋतु स्वास्थ्य साधना की ऋतु हैं। इस ऋतु में पौष मास आता है, जो पुष्टि का मास है। इस मास की पूर्णिमा पुष्य नक्षत्र में आती है, इस लिए इसे पौष की संज्ञा दी गई है।

इस ऋतु को स्वास्थ्य बनाने का मौसम समझें और स्वास्थ्य बना

ने का कोई भी उपाय तथा अवसर हाथ से न जाने दें, उस व्यापारी की तरह जो अनुकूल समय में कमाई करने का कोई मौका नहीं छोड़ता।

इस ऋतु में दिन छोटे और रातें बड़ी होती हैं, इसलिए शरीर को अधिक समय तक नींद और विश्राम मिलने के अलावा आहार को पचाने का समय भी ज्यादा मिलता है। जिससे पाचन शक्ति और भूख बढ़ जाती है, भोजन अत्यन्त सुस्वादु लगने लगता है और रसना उसका रस लेते हुए अघाती तक नहीं है। इसलिए शिशिर ऋतु में भूख सहना और रूखा-सूखा आहार लेना हानिकारक होता है। शिशिर ऋतु की अपनी अलग ही प्राकृतिक विलक्षणता है जिसका वर्णन एक कवि ‘सेनापतिÓ अलौकिक रूप से इस प्रकार करते हैं :

सिसिर में ससि को सरूप वाले सविताऊ,

घाम हू में चाँदनी की दुति दमकति है।

सेनापति होत सीतलता है सहज गुनी,

रजनी की झाँईं वासर में झलकति है॥

चाहत चकोर सूर ओर दृग छोर करि,

चकवा की छाती तजि धीर धसकति है।

चंद के भरम होत मोद है कुमुदिनी को,

ससि संक पंकजनी फूलि न सकति है॥

शिशिर ऋतु में सूर्य भी चन्द्रमा के स्वरूप वाला हो जाता है और धूप में चाँदनी का भास होने लगता है। इस ऋतु में शीतलता सौ गुनी बढ़ जाती है जिसके कारण दिन में भी रात्रि का आभास सा होने लगता है। सूर्य को चन्द्रमा समझकर चकवा पक्षी उसी की ओर देखने में मग्न हो जाता है और चकवी की छाती धड़कने लगती है। कुमुदनी भी सूर्य को चन्द्र समझकर मुदित हो खिल उठती है और कमल सूर्य के चन्द्र होने की शंका के कारण खिल नहीं पाता।

मकर संक्रांति पर शीतकाल अपने यौवन पर रहता है। शीत के प्रतिकार हेतु तिल, तेल आदि बताए गए हैं। शिशिर में ठंड बढऩे के कारण अनेक प्रकार के स्वास्थ्यवर्धक पाक, मेवे, दूध, गुड़-मूंगफली आदि शरीर को पुष्ट करते हैं। नई फसल आने पर परमात्मा को पहले अर्पित करते हैं, फिर उनका सेवन करना चाहिये। इस समय व्रत-त्योहारों में तिल का प्रयोग महत्वपूर्ण बताया गया है।

ऋतुओं ने हमारी परंपराओं को काफी प्रभावित किया है। सर्दी आते ही क्या हितकर है क्या नहीं, यह हमारे धर्मशास्त्र भी बताते हैं और आयुर्वेद भी। स्वास्थ्य की दृष्टि से उपयोगी बातों का वैज्ञानिक दृष्टिकोण तो होता ही है, धर्म उसे कर्तव्य के रूप में अनिवार्य कर देता है। इसलिए संक्रांति, लोहड़ी, पोंगल पर्व पर तिल का प्रयोग विशेष रूप से बताया गया है। तिल-गुड़ से बने पदार्थ स्वास्थ्यकर होते हैं। धर्मशास्त्रों के अनुसार पौष और माघ मास में तिल और गुड़ का दान पुण्यकारक तथा सेवन हितकर होता है।

शिशिर में वातावरण में शीतलता के साथ ही रूक्षता बढ़ जाती है। यह सूर्य का उत्तरायण काल होता है, इसमें शरीर का बल धीरे-धीरे घट जाता है। तिल विशेषत: अस्थि, त्वचा, केश व दांतों को मजबूत बनाता है। बादाम की अपेक्षा तिल में छ: गुना से भी अधिक कैल्शियम है। इसीलिए इस ऋतु में आने वाले व्रत-त्योहार में तिल के सेवन करने के लिए कहा गया है।

कहते हैं शीतकाल का खान-पान वर्षभर के लिए रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है। शीतकाल के तीन-चार मासों में बनाए जाने वाले प्रमुख व्यंजनों में गोंद, मैथी, मगज के लड्डू और सौंठ की मिठाइयां प्रमुख हैं, जो स्वादिष्ट और सुपाच्य होती हैं तो स्वास्थ्य की दृष्टि से दवा का काम करती हैं। इस ऋतु में ज्यादा सर्दी न सहें ताकि शीत का अतियोग न हो। शीत से बचने के लिए अति उष्ण वातावरण में न रहें ताकि शीत का मिथ्या योग न हो और शीत से बिलकुल ही बचकर न रहें ताकि शीत का हीन योग न हो। शीत का सम्यक योग होना शरीर को स्वस्थ और बलवान बनाने के लिए आवश्यक होता है।

देर रात में भोजन करना, देर रात तक जागना, सुबह देर तक सोये रहना और व्यायाम न करना इस ऋतु के लाभों से वंचित करने वाला काम है।

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