नदियों का संरक्षण खोलेगा विकास की असीम संभावनाओं के द्वार

रवि शंकर : नदियां हमेशा से ही सभ्यताओं के विकास का केंद्र रही हैं। इसका कारण भी एकदम साफ है। नदियां न केवल पानी का अच्छा स्रोत थीं, बल्कि वे लोगों की आजीविका के लिए भी काफी सहायक थीं। नदियां यातायात और परिवहन के लिए भी उपयुक्त थीं। यही कारण था कि दुनिया की अधिकांश सभ्यताएं नदी किनारे ही पैदा हुईं और फली-फूलीं। आज भी हम खेती के लिए वर्षा के बाद नदियों पर ही निर्भर हैं। खेती में सिंचाई

 

आज नदियों के इस शोषण से नदियों के अस्तित्व पर ही खतरा मंडराने लगा है। शोषण अर्थात् नदियों को बांधों से बांध कर उसके स्वाभाविक प्रवाह को रोक देना, उससे इतना पानी निकाल लेना कि वह विशाल नदी से एक पतली धारा में बदल जाए और उसमें इतना औद्योगिक, रासायनिक व मल-मूत्र वाला कचड़ा डालना कि उसका जल किसी के पीने लायक ही न रह जाए। ये तीनों काम खेतों की सिंचाई, पनबिजली परियोजनाओं और विभिन्न उद्योगों के विकास के लिए किए जाते हैं। परंतु नदियों के विनाशकों का तर्क होता है कि विकास के लिए यह जरूरी है। कहा जाता है कि विकास चाहिये तो, उद्योग चाहिए, उद्योग चाहिए तो बिजली चाहिए और इन दोनों के लिए बलि तो नदी की ही चढ़ानी होगी। हैरत की बात है कि विकास के लिए विनाश को जरूरी बताया जा रहा है। देखने की बात यह है कि क्या वास्तव में नदी को बचाए बिना विकास संभव नहीं है? क्या जो विकास बताया जा रहा है, वह वास्तव में विकास है या फिर वह विकास का छलावा मात्र है?

पहली बात खेती की है। आम तौर पर नदियों को खेती के लिए वरदान माना जाता रहा है और यही कारण भी है कि आज तक सभी सभ्यताएं नदियों के किनारे ही विकसित हुई हैं। परंतु इस देश में अंग्रेजों के आने के बाद से नदियों से हम घबराने लगे। नदियां जो जीवन का स्रोत थीं, अचानक उन्हें शोक और अभिशाप जैसे शब्दों से संबोधित किया जाने लगा। विख्यात जल विशेषज्ञ अनुपम मिश्र अपनी एक पुस्तक ‘साफ माथे का समाज मेंÓ लिखते हैं, “समाज ने इन नदियों को अभिशाप की तरह नहीं देखा। उसने इनके वरदान को कृतज्ञता से देखा। उसने यह माना कि इन नदियों ने हिमालय की कीमती मिट्टी इस क्षेत्र के दलदल में पटक कर बहुत बड़ी मात्रा में खेती योग्य जमीन निकाली है। इसलिए वह इन नदियों को बहुत आदर के साथ देखता रहा है। कहा जाता है कि पूरा का पूरा दरभंगा खेती योग्य हो सका तो इन्हीं नदियों द्वारा लाई गई मिट्टी के कारण ही।” परंतु अंग्रेज जोकि उनके अपने देशों में इतनी विशाल नदियां और बाढ़ न होने के कारण नदियों से ठीक से परिचित ही नहीं थे, बाढ़ से घबरा गए। उन्होंने नदी को बांधने की कोशिशें शुरू कीं। हालांकि भारतीय समाज भी थोड़ा बहुत तटबंध बनाया करता था, परंतु बाढ़ आने पर वह तटबंधों को तोड़ दिया करता था, ताकि बाढ़ का पानी और उसके साथ आई उपजाऊ मिट्टी सभी खेतों में जा सके। यह बात अंग्रेज समझ नहीं पाए और उन्होंने तटबंधों को तोडऩे वालों को दंडित करना शुरू किया।

डा. दिनेश कुमार मिश्र अपनी पुस्तक Óदुई पाटन के बीच मेंÓ में लिखते हैं, “बाढ़ देश में मुद्दा बनी ब्रिटिश हुकूमत का देश पर कब्जा होने के बाद क्योंकि बाढ़ों के स्वरूप ने अंग्रेजों को डरा दिया था, उन्होंने शायद न तो इतनी बड़ी नदियाँ कभी देखी थीं और न ही इतना पानी कभी देखा था। उन लोगों को बाढ़ समझने और उससे निबटने के तरीके खोजने में भी काफी समय लगा। पहले तो उन्होंने बाढ़ सुरक्षा के लिए बनाये गये टीलों को नदी के किनारे के टूटे हुये तटबन्धों के रूप में देखा और उन्होंने इनके बीच की जगह को भरना शुरू किया और इन्हें तटबन्धों की शक्ल दे दी। बाद में उन्होंने इन तटबन्धों की मरम्मत की और उन्हें मजबूत करने का काम किया। उन्होंने नए तटबन्ध भी बनाये। मगर धीरे-धीरे उन्हें इन तटबन्धों के रख-रखाव और मरम्मत में दिक्कतें आने लगीं तथा बाद में तो यह तटबन्ध टूटने भी लगे। एक समय ऐसा आया जबकि अंग्रेज हुक्मरान यह सोचने को मजबूर हो गये कि समाज को तटबन्धों से फायदा होता है या नुकसान होता है? उनके राजस्व अधिकारियों और उनके मिलिट्री इंजीनियरों के बीच भी तटबन्धों को लेकर जबर्दस्त मतभेद था।” इससे पता चलता है कि नदियों को बांधने का काम विकास के लिए नहीं, वरन् बाढ़ से भयभीत अंग्रेजों ने अपने फायदे के लिए किया था। इसमें एक खेल तटबंधों की मरम्मत के बहाने जमींदारों को लूटने का भी था। इसलिए राजस्व अधिकारी तटबंधों को बनाए रखना चाहते थे जोकि निरंतर और अधिक कठिन होता जा रहा था।

इतना ही नहीं इन तटबंधों के कारण दूसरी समस्याएं भी पैदा होने लगी थीं। डा. दिनेश आगे लिखते हैं, “बिहार में सन् 1872 की बाढ़ में गंडक तटबन्धों की धज्जियाँ उड़ गईं और 30 गाँवों में नदी का पानी फैल गया। इन तटबन्धों की वजह से बहुत से नदी-नालों का पानी गंडक तक नहीं पहुँच पाता था और तटबन्धों के बाहर अटक जाता था जिससे जल-जमाव बढ़ता था, पूरा क्षेत्र अस्वास्थ्यकर हो जाता था और मलेरिया फैलता था। तटबन्धों ने नदी की बहुत सी धाराओं का स्रोत ही समाप्त कर दिया था जिसकी वजह से पानी में और भी अधिक ठहराव आता था और एक तरह से तटबन्ध के किनारे-किनारे झील का निर्माण हो जाता था। इसके अलावा तटबन्धों के कारण नदी का पानी सुरक्षित क्षेत्रों में फैलने से तो जरूर रुक गया मगर इसके साथ ही इस सुरक्षित क्षेत्र को हर साल बाढ़ के ताजे पानी और नई उर्वरक सिल्ट की आपूर्ति भी बन्द हो गई। गंडक पर तटबन्धों के निर्माण के कारण आई इस विकृति पर ही सारण नहर प्रणाली की बुनियाद रखी गई थी क्योंकि अब बाढ़ सुरक्षित क्षेत्रों में नदी का ताजा पानी फैलना बन्द हो गया था और वहाँ सिंचाई की जरूरत महसूस की जाने लगी थी।” बीमारियां और खेती के लिए सिंचाई की समस्या, ये दो समस्याएं नदी को बांधने के कारण पैदा हुईं। नदी तो फिर भी नहीं बंध पाई। नदी को बांधने के यह कोशिश निरंतर बढ़ती ही गई और अब यह कोशिश हमारी जरूरत नहीं रह गई थी, बल्कि जिद बन चुकी थी और इस जिद को पूरा करने के लिए उलटे-सीधे बहाने गढ़े जाने लगे। इसमें दो प्रमुख बहाने गढ़े गए। पहला था, पानी को रोकने से बाढ़ समाप्त और दूसरा बहाना था, उस जमा पानी से बिजली का उत्पादन। दूसरा बहाना अधिक मोहक था।

बहरहाल यदि हम तथ्यों को देखें तो पता चलेगा कि बांधों के कारण बाढ़ की समस्या अभी भी हल नहीं हो पाई है। हर वर्ष बाढ़ आती ही है और अब उनसे नुकसान अधिक होता है क्योंकि बाढ़ के साथ जीने की कला आज हम भूल गए हैं। रही बात सिंचाई की तो, वह भी बांधों के कारण बहुत नहीं बढ़ी है। उत्तराखंड जैसे राज्यों में तो बांधों की सिंचाई में कोई उपयोगिता ही नहीं है और जानकार बताते हैं कि वहां कि जो नहरें हैं वे केवल दिल्ली जैसे राज्यों को पानी की आपूर्ति करने के लिए बनाई गई हैं, स्थानीय लोग तो उसका पानी ले ही नहीं सकते। देश के अधिकांश किसान आज भी सिंचाई के लिए नलकूपों पर आश्रित हैं और उसमें बिजली लगती है। आज यह सिद्ध हो गया है कि तालाब, बावड़ी, कुंए, आहर और पइन की ग्रामीण व्यवस्थाएं ही सिंचाई के लिए सर्वोत्तम व्यवस्थाएं थीं। उनके खत्म होने से हम नलकूपों पर निर्भर रहने लगे हैं। कुल मिला कर नदियों वाले प्रदेशों में भी हम नदियों से खेती कम कर रहे हैं और बांधों का अधिकतम उपयोग केवल और केवल बिजली के उत्पादन के लिए किया जा रहा है।

अब बचता है दूसरा और सबसे मनमोहक बहाना व विकास का सर्वाधिक नया प्रपंच बिजली का उत्पादन। यह एक सच्चाई है कि बिजली और यंत्रों के आविष्कार ने मनुष्य जीवन को काफी सुखमय बना दिया है और इस सुख की प्राप्ति के लिए आज का मनुष्य कैसा भी बलिदान देने के लिए तत्पर हो गया है। अपने सुख के लिए वह अपनी भावी संततियों का सुख छीन लेने के लिए आमादा है। आज के मनुष्य और उसकी बढ़ती लालसा को देखने से ययाति की पौराणिक कहानी याद आ जाती है जिसने अपने सुखोपभोग के लिए अपने पुत्र पुरू का यौवन ले लिया था। आज बिजली की झूठी चाह में हम भी वही कहानी दोहरा रहे हैं। नदियां जिसे हमारे पूर्वजों ने हमारे लिए हजारों-लाखों वर्षों से इतने यत्नपूर्वक संभाल कर रखा, को हम मात्र कुछेक दशकों में ही समाप्त किये दे रहे हैं। बड़े-बड़े बांधों द्वारा उसे बांधकर उसकी धारा को कमजोर और मृतप्राय बना दे रहे हैं और इतना सब करने के बाद भी हमें हासिल क्या हो रहा है, यह देखें तो लगेगा मानो हमने सोना के बदले में लोहा खरीद लिया हो। आज खरबों रूपये खर्च करके देशभर में हजारों बांध बना चुकने के बाद भी कुल विद्युत उत्पादन में पनबिजली का कुल योगदान 16.4 प्रतिशत ही है। भारत विश्व का छठा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता है जो विश्व के कुल ऊर्जा खपत का 3.5 प्रतिशत उपभोग करता है। तापीय, जल बिजली और नाभिकीय ऊर्जा भारत में बिजली उत्पादन के मुख्य  स्रोत हैं। कुल संस्थापित विद्युत उत्पादन क्षमता 1,47,402.81 मेगावॉट (31 दिसम्बंर, 2008 के अनुसार) रही है, जिसमें 93,392.64 मेगावॉट (थर्मल), 36,647.76 मेगावॉट (हाइड्रो), 4,120 मेगावॉट (न्यूक्लियर); और 13,242.41 मेगावॉट (अक्षय ऊर्जा स्रोत) शामिल हैं।

ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान, प्रारंभ में 15,627 मेगावाट की हाईड्रो क्षमता वर्धन की योजना बनाई गई थी जो योजना के मध्य अवधि मूल्यांकन के समय, 8,237 मेगावाट तक संशोधित की गयी थी। इसमें 5,302 मेगावाट 31 दिसम्बर, 2011 तक वृद्धि की गई है। सरकार के अनुसार पन-बिजली के धीमे विकास के मुख्य कारणों में कठिन और दुर्गम्य संभाव्य स्थल, भूमि अधिग्रहण में कठिनाइयां, पुनर्वास, पर्यावरणीय और वन-संबंधित विषय, अन्तर-राज्य मुद्दे, भौगोलिक अवरोध और संविदागत मामले शामिल हैं। यानी सरकार और निजी क्षेत्रों के हजारों करोड़ रूपयों के निवेश के बाद भी परिणाम बहुत उत्साहवर्धक नहीं है। इसके बदले में हमने गंगा, यमुना और नर्मदा जैसी नदियों को बर्बाद कर दिया है, अधिकांश राज्यों में पानी के लिए झगड़े होने लगे हैं और इतना सब नुकसान करने के बाद आज पता चल रहा है कि इन बांधों की जितनी आयु निर्धारित की गई थी, ये उससे आधी आयु भी पूरी नहीं कर पाएंगे। नदियों के पानी द्वारा लाई गई गाद से वे भरने लगे हैं। आज बड़ी पनबिजली परियोजनाओं की जगह छोटी पनबिजली परियोजनाओं पर काम करने की आवश्यकता है। छोटी मतलब 25 मेगावाट से कम क्षमता वाली परियोजनाएं। इन परियोजनाओं में खर्च कम होता है, परिणाम अधिक आता है और इसके लिए बड़े बांध बनाने की आवश्यकता नहीं होती, जिससे नदी का प्रवाह भी सुरक्षित रहता है। हैरत की बात यह है कि वर्तमान में छोटी पनबिजली परियोजनाओं को अक्षय ऊर्जा मंत्रालय के अधीन रखा गया है, जिसका न सिर्फ बजट कम है, बल्कि जिसको विकसित करने के प्रति हमारे देश के नीति निर्धारकों की सोच भी सकारात्मक नहीं है। इन्हीं नदियों पर इन छोटी परियोजनाओं को विकसित करने से पूरे देश को जगमग किया जा सकता है। परंतु तब बड़ी कंपनियों का स्वार्थ तो इससे सधेगा नहीं और हमारे देश की भ्रष्ट सरकारों का वास्तविक मंतव्य तो जनता की बजाय उन्हें ही लाभ पहुंचाना होता है। उदाहरण के लिए अप्रैल 2011 से जनवरी 2012 के दौरान पनबिजली क्षेत्र में सरकार का लक्ष्य केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा केवल 165 और 655 मेगावाट के उत्पादन का था जबकि निजी क्षेत्र से 1170 मेगावाट का था। इसमें भी केंद्र और राज्य सरकारों का वास्तविक उत्पादन क्रमश: शून्य और 81 मेगावाट हुआ जबकि निजी क्षेत्र का 1100 मेगावाट। यह आंकड़ा बताता है कि वास्तव में सरकार इन परियोजनाओं से किसे लाभ पहुंचाना चाहती है। कहा जा सकता है कि नदियां विकास में बाधक नहीं, साधक हैं, परंतु यदि वह विकास हम नदियों को मार कर लेना चाहेंगे तो नदियां तो बचेंगी नहीं, विकास भी हमें नहीं मिलेगा।

खेती और आज बिजली उत्पादन के अलावा नदियों का एक बड़ा उपयोग परिवहन में रहा है। जल परिवहन किसी भी देश को सबसे सस्ता यातायात प्रदान करता है क्योंकि इसके निर्माण में परिवहन मार्गो का निर्माण नहीं करना पड़ता और केवल परिवहन के साधनों से ही यातायात किया जाता है। इतना अवश्य है कि इसके लिए नदियों में भरपूर जल का होना आवश्यक होता है। हमारे देश में आन्तरिक एवं सामुद्रिक दोनों प्रकार का जल परिवहन किया जाता रहा है। आन्तरिक जल परिवहन की दृष्टि से देश में प्राचीनकाल से ही नदियों के माध्यम से यातायात किया जाता था। वर्तमान में देश में लगभग 14,500 किमी लम्बा नौगम्य जलमार्ग है, जिसमें नदियाँ, नहरें, अप्रवाही जल यथा झीलं आदि संकरी खडिय़ाँ शामिल हैं। देश की प्रमुख नदियों में 3,700 किमी लम्बे मार्ग का ही उपयोग किया जा रहा है। जहाँ तक नहरों का प्रश्न हैं, 4,300 किमी लम्बी नौगम्य नहरों से मात्र 900 किमी तक की दूरी की नौकाओं द्वारा परिवहन के उपयुक्त है। वर्तमान में आन्तरिक जल परिवहन के माध्यम से लगभग 550 लाख टन माल की ढुलाई प्रतिवर्ष की जा रही है। परंतु आज परिवहन के इस सरल व सुलभ साधन की उपेक्षा की जा रही है, जबकि भारतीय रेलवे के भारी-भरकम नेटवर्क के बाद भी इसके द्वारा केवल 608 टन की ही ढुलाई होती है। यह हाल तो तब है जब हमने अभी जल परिवहन पर कोई जोर ही नहीं दिया है। अब सरकार का ध्यान इस ओर गया है और वह केवल इस कारण कि सड़क और रेलवे दोनों ही साधन काफी मंहगे साबित होने लगे हैं।

वास्तव में जल परिवहन की उपेक्षा के पीछे भी अंग्रेजों का ही प्रभाव है। डा. दिनेश कुमार मिश्र अपनी पुस्तक Óदुई पाटन के बीच मेंÓ में लिखते हैं, ÓÓशुरुआती दौर में रेल सेवाओं में लगाई गई पूंजी अंग्रेजों के लिए बहुत फायदे की चीज नहीं थी। लेकिन यातायात का यह साधन इंग्लैंड में ज्यादा प्रचलित था और वहाँ के व्यापारी यह चाहते कि उनका माल भारतवर्ष के भीतरी इलाकों तक पहुँचे और बिके। सरकार भी रेलवे कम्पनियों को प्रोत्साहित करने के लिए उनके निवेश पर सूद की गारन्टी देने जैसे उपाय करने के लिए प्रतिबद्ध थी और ‘ईस्ट इंडिया कम्पनी और ब्रिटिश हुकूमत दोनों के प्रशासन पर वहाँ के सदन का लगातार दबाव पड़ रहा था कि भारत में रेल लाइनों का विस्तार कई गुना किया जाय भले ही इससे उन्हें नुकसान ही क्यों न होता हो।Ó इसके अलावा ब्रिटेन में दो घटक और मुखर थे जो कि भारत में रेल सेवाओं के विस्तार के प्रति उतने ज्यादा उत्साहित नहीं थे।

इनमें से एक घटक का नेतृत्व अनौपचारिक रूप से सर आर्थर कॉटन कर रहे थे जिन्होंने दक्षिण भारत में कावेरी, गोदावरी और कृष्णा नदियों से नहरें निकाल कर सिंचाई के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान किया था और वह नहरों से नौका परिवहन के बहुत बड़े पैरवीकार थे। उनका कहना था कि, ”हिन्दुस्तान को जरूरत है जल-पोतों की। रेल सेवा पूरी तरह से असफल रही है, वह वाजिब दामों पर लोगों और माल को नहीं ढो सकती, उनकी माल ढोने की क्षमता भी नहीं है तथा इन्हें चलाते रहने के लिए देश को तीस लाख (पाउण्ड) की हर साल जरूरत पड़ती है और यह रकम हर साल बढ़ती जाती है। तेज गति से चलने वाली नावों के लिए यदि नहरें बनाई जायें तो उन पर रेलवे के मुकाबले आठ गुना कम खर्च होगा। यह (नावें) किसी भी मात्रा में, किसी भी गति से और मामूली खर्चे पर माल ढो सकती हैं।ÓÓ इस उद्धरण से यह साबित होता है कि रेल परिवहन तब भी मंहगा था और आज भी मंहगा है, परंतु अंग्रेजों के पूर्वाग्रह के कारण उस पर जोर दिया गया और भारत के जल मार्गों की पूरी उपेक्षा की गई, जिससे उनका विकास नहीं हुआ।

दुख की बात यह है कि आजादी के बाद भी देश की सरकारें अंग्रेजों की नीतियों पर ही चलती रही। परंतु आज उसे भी स्वीकारना पड़ा है कि नदियों के माध्यम से परिवहन सस्ता, सुलभ और सहज है। यही कारण है कि पिछले दिनों रेलमार्गों और सड़कों पर यातायात बोझ कम करने के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देश के जलमार्गों के त्वरित विकास पर जोर दिया। प्रधानमंत्री ने निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के सहयोग से अंतर्देशीय जलमार्गों का उपयोग और उनके विकास की दिशा में कदम उठाने की बात कही।

केन्द्र सरकार के उपक्रम एनटीपीसी ने बिहार की बाढ़ बिजली परियोजना के लिए 30 लाख टन कोयले की आपूर्ति के लिए अंतर्देशीय जलमार्ग के उपयोग पर सहमति जताई है। प्रधानमंत्री कार्यालय के एक बयान में कहा गया कि एनटीपीसी, भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण और एक निजी कंपनी के बीच त्रिपक्षीय समझौता हुआ है जिसमें एनटीपीसी को परिवहन के लिए प्रतिस्पर्धी दरों पर परिवहन सुविधा उपलब्ध होगी। जलमार्ग का उपयोग एनटीपीसी अपने बिजली संयंत्रों को आयातित कोयला पहुंचाने के लिए करेगी। यह खबर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यदि हम जल मार्गों को विकसित करना चाहेंगे तो इसके लिए नदियों की रक्षा करनी ही पड़ेगी। वास्तव में देखा जाए तो जल मार्गों के विकास से रेल और उसमें लगने वाली बिजली दोनों की बचत होगी। साथ ही परिवहन सस्ता होगा और उसमें से बचा धन हम विकास की दूसरी योजनाओं पर खर्च कर सकेंगे।

 

अंतिम बात नदी की निर्मलता की है। आज विकास का एक और मापदंड सीवेज तंत्र है। आज हम यह नहीं जानना चाहते कि टॉयलेट फ्लश करने से नदी के मरने का क्या संबंध है? शहरी समाज की इस लापरवाही का कारण आखिर क्या है? क्या यह हमारे समाज के अति अहंकार का प्रतीक है जो यह मानता है कि संपन्नता से सभी समस्याओं का समाधान निकाला जा सकता है? वैसे भी हमारी सरकारें हमें यही सिखाती हैं कि संपन्नता से हम बड़े-बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट तैयार करेंगे और पानी तथा सीवेज की समस्या से निजात पा लेंगे? हम चाहे जिस रूप में ऐसा व्यवहार कर रहे हों लेकिन एक बात साफ है कि हम भारतीय पानी के बारे में बहुत अज्ञानी हो चले हैं।

सीएसई द्वारा किए गए एक शोध में यह पता चला कि आज हम अपने शहर में जिसे गंदा नाला कहते हैं, अतीत में वह साफ नदियां हुआ करती थीं। उदाहरण के लिए दिल्ली का नजफगढ़ नाला है। यह नजफगढ़ नाला रोजाना शहर की गंदगी यमुना के हवाले करता है। लेकिन दिल्ली वालों को यह शायद नहीं मालूम है कि इस नाले का उद्गम स्थल शहरी घरों के टॉयलेट नहीं है बल्कि इसका उद्गम साहिबी झील से होता था। लेकिन अब साहिबी झील का भी कहीं पता नहीं है। कोढ़ में खाज की बात यह है कि दिल्ली के ठीक बगल में आजकल जो नया शहर गुडग़ांव दुनिया के सामने अपनी चमक दमक दिखा रहा है, वह गुडग़ांव साहिबी झील की तर्ज पर ही नजफगढ़ झील को अपने सीवेज से समाप्त कर रहा है। लुधियाना का बुढ्ढा नाला अपनी गंदगी और बदबू के कारण जाना जाता है। लेकिन बहुत वक्त नहीं बीता है जब बुद्धा नाला नहीं बल्कि बुढ्ढा दरिया होता था। सिर्फ एक पीढ़ी ने इस साफ पानी के दरिया को गंदे बदबूदार नाले में परिवर्तित कर दिया। मुंबई की मीठी नदी तो सीधे-सीधे इस शहर के शर्म की कहानी ही कहती है।

2005 में जब मुंबई में बाढ़ आई थी तो अचानक लोगों को मीठी नदी की याद आई। याद इसलिए कि मीठी नदी इतनी अधिक गाद से भरी हुई थी कि वह शहर का पानी समुद्र तक ले जाने में अक्षम साबित हुई। मीठी नदी आज इतनी गंदी हो चुकी है कि इसे नाले के रूप में देखा जाता है। लेकिन यह नाला नहीं बल्कि समुद्र के किनारे मीठे पानी की ही नदी थी। लेकिन हमारे सरकारी विभागों के रिकार्ड में भी अब मीठी नदी का नाम नहीं बचा है। वहां भी अब मीठी नदी को नाले के रूप में चिन्हित कर लिया गया है। अपनी नदियों को इस तरह नालों में तब्दील करने पर भी क्या हमें किसी प्रकार की कोई शर्म आती है? क्या हमें कभी आश्चर्य होता है? हम अपने शहरी घरों और शहरी उद्योगों के लिए इन्हीं नदियों से पानी लेते हैं और गंदा करके नदियों को वापस कर देते हैं।

देश में कई नदियां जाकर समुद्र में मिलती हैं जिसे देखते हुए सरकार ने निजी लॉजिस्टिक प्रतिष्ठानों को यह आमंत्रण दिया है कि वह कच्चे माल एवं औद्योगिक वस्तुओं की आंतरिक जलमार्गों से होकर आवाजाही के लिए जरूरी बुनियादी ढांचे का विकास करें। रिलायंस और ओएनजीसी जैसी कंपनियों ने तो कच्चे माल एवं औद्योगिक वस्तुओं की ढुलाई के लिए इस सस्ते और पर्यावरण अनुकूल यातायात का उपयोग करना शुरू भी कर दिया है। मुख्यत: कच्चे तेल एवं गैस को बंदरगाहों से आंतरिक क्षेत्रों में भेजने के लिए जलमार्ग का उपयोग किया जाता है।

इससे यह स्पष्ट है कि नदियों के विनाश से नहीं, बल्कि उनके संरक्षण से ही विकास संभव है। चाहे बात बिजली की हो या फिर परिवहन की, बात चाहे खेती की हो या फिर स्वच्छ पेय जल की, नदियों को बचाए बगैर इनमें से कोई भी आवश्यकता पूरी नहीं की जा सकती। इसलिए विकास की दुहाई देकर नदियों को मारने की बजाय अब नदियों के संवर्धन और उससे जुड़े विकास के प्रारूपों पर चर्चा और उस पर काम करना आज के समय की मांग है।