मरते बच्चे, पनपती महामारी

मुरारी शरण शुक्ल
लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।


मुजफ्फरपुर में लगभग 200 बच्चे काल के गाल में समा गए। मीडिया में खूब चर्चा हुई, सभी ने सरकारों को बहुत कोसा। सभी ने मुजफ्फरपुर में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाल स्थिति पर जम कर भड़ास निकाली। इतने हो-हल्ले के बाद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने भी मुजफ्फरपुर में अस्पताल की सुविधाओं को बढ़ाने की घोषणा कर दी। परंतु किसी ने भी यह ध्यान नहीं दिया कि इन मौतों को रोकने में आधुनिक चिकित्सा प्रणाली और अस्पतालों की भूमिका नहीं के बराबर है। इस बात को समझना हो तो हमें पहले यह समझना होगा कि आखिर मुजफ्फरपुर में हो क्या रहा था।

उल्लेखनीय है कि यह बीमारी, जिसे वास्तव में बीमारी कहना ठीक नहीं है, हर वर्ष गर्मी के मौसम में ही होती है। इसे बीमारी कहना इसलिए ठीक नहीं है, क्योंकि अभी तक यह सुनिश्चित नहीं किया जा सका है कि किस बीमारी से मौतें हुई हैं। इसलिए विशेषज्ञ और डॉक्टर इसे सिंड्रोम यानी लक्षण कह रहे हैं। इसे जापानी इंसेफ्लाइटिस सिंड्रोम कहा जा रहा है यानी इसके लक्षण जापानी इंसेफ्लाइटिस जैसे ही हैं। परंतु यह स्पष्ट है कि यह इंसेफ्लाइटिस नहीं हो सकता। डब्ल्यू एच ओ की वेबसाईट में इंसेफ्लाइटिस का वर्णन करते हुए लिखा है कि इनसेफेलाइटिस का आर्बोवाईरस इंसेक्ट बाइट के माध्यम से फैलता है। मच्छर मारने की दवा बनाने वाली कंपनी गुडनाईट का वेबसाईट में लिखा है कि जापानीज इंसेफ्लाइटिस एक मोस्क्विटो बोर्न डिजीज है जो क्यूलेक्स मच्छरों के द्वारा फैलाया जाता है। इसका अर्थ यह है कि जापानीज इंसेफ्लाइटिस किसी व्यक्ति, पदार्थ, रसायन, फल या फल के वृक्ष के किसी भी भाग के स्पर्श से नहीं फैल सकता। वर्तमान में डॉक्टरों के द्वारा जो बात फैलाई जा रही है कि लीची के पेड़ पर चढऩे से और दाँत से छीलकर लीची खाने से यह बीमारी फैल रही है। यह बात सरासर झूठ है।

जापानीज इंसेफ्लाइटिस में सिरदर्द और मेनिन्जाइटिस जैसे न्यूरोलॉजिकल लक्षण दिखाई देते हैं। मेनिन्जाइटिस का अर्थ है मष्तिस्क की कोशिकाओं का सुजन। दूसरे प्रकार के लक्षण हैं तेज बुखार, चेतनालोप, गर्दन की अकडऩ, डिसओरिएंटेशन, पक्षाघात एवं लैक ऑफ कोर्डिनेशन। यह नर्वस सिस्टम को नुकसान पहुँचाता है या फिर मृत्यु का कारण बन जाता है। उपरोक्त लक्षणों के आलोक में बिहार में बच्चों को हो रहा रोग जापानीज इंसेफ्लाइटिस नहीं है।

एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति में जापानीज इंसेफ्लाइटिस का कोई उपचार नहीं है, यह भी तमाम वेबसाइट्स चीख चीख कर कह रहे हैं। फिर बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर उपचार न ज्ञात होने पर भी ये एलोपैथिक चिकित्सक और ऐलोपैथिक अस्पताल क्यों जापानीज इंसेफ्लाइटिस से पीडि़त बच्चों को भर्ती करके उनके जान से खेल रहे हैं? एलोपैथिक चिकित्सक समाज को चाहिए कि वे अपनी अक्षमता स्वीकार करते हुए देशज चिकित्सा पद्धतियों द्वारा इलाज के लिए मार्ग प्रशस्त करें और लीची पर आरोप लगाना बंद करें।

यदि हम ध्यान से देखें तो यह सारा मामला लू लगने का है। मुजफ्फरपुर जिले से होकर कई नदियाँ बहती हैं। गंडकी, बोधि, बागमती इत्यादि बड़ी नदियाँ मुजफ्फरपुर से होकर बहती हैं। गंगा भी वहाँ से निकट ही है। कोशी का बहाव क्षेत्र भी बहुत दूर नहीं। पहले पेड़ और जंगल अधिक होने से इस अतिरिक्त तापमान और आद्र्रता का प्रभाव सामान्य जन जीवन पर नहीं पड़ता था। किंतु अब प्रकृति से छेड़छाड़ ने हमें असुरक्षित कर दिया है। हवा में विद्यमान अतिरिक्त आद्र्रता और अत्यधिक गर्मी के कारण बच्चों को लू लग रही है। लू लगने या सनस्ट्रोक का कोई उपचार एलोपैथी में न होने से बच्चों की मृत्यु हो रही है।

ओआरएस और सैलाईन चढ़ाने के अतिरिक्त एलोपैथी में लू लगने की समस्या का कोई उपचार नहीं है। जबकि आयुर्वेद में इसके एक नहीं, अनेक उपचार हैं। यह मामला अत्यधिक गर्मी से प्रभावित होने का है। इसको आप चाहे जो नाम दे दें। इसमें आरंभिक अवस्था में नियंत्रण बहुत आसान तो है ही, रोगी की बिगड़ी अवस्था में भी नियंत्रण कठिन नहीं है। जिस लीची पर इसका दोष मढ़ा जा रहा है, वह लीची भी इसके उपचार में सक्षम है। लीची जहाँ शरीर में पानी और लवणों की फिर से आपूर्ति (रिहाईड्रेट) करने की क्षमता रखता है, वहीं यह शरीर का चीनी का स्तर भी संतुलित करता है। साथ ही इसका प्रभाव नर्वस सिस्टम की ऑक्सीजन आपूर्ति पर भी बहुत सकारात्मक है। लीची के अलावा कच्चे आम का पन्ना (अमझोरा) भी इसका सटीक उपचार है। आप आम के पन्ना (अमझोरा) को पिलाएँ भी और शरीर पर लेप भी लगाएं। रोगी के शरीर का तापमान सामान्य हो जाने पर इसका प्रयोग बंद कर देना होता है।

लू के इन रोगियों के लिए पुदीना बहुत प्रभावी है। पुदीना जहाँ शरीर को रिहाईड्रेट करता है वहीं डिहाइड्रेशन से उपजे सभी लक्षणों का यह रामबाण उपचार है। पुदीने के शरबत और चटनी का प्रयोग जहाँ आरंभिक अवस्था में उपयोगी होगा, वहीं पुदीना अर्क का उपयोग बिगड़ी अवस्था में रामबाण है। पुदीना लीवर और किडनी को सक्रिय करता है तथा शरीर में सूक्ष्म लवणों की भी आपूर्ति कर देता है।

बच्चों को ठंडा पानी, घड़े/सुराही के पानी से बार बार नहलाना और उनका शरीर सूखे सूती कपड़े से तुरंत पोंछ देना अत्यंत उपयोगी उपचार है। कोल्ड ऑवर यानी शीतकाल में स्नान बहुत उपयोगी होता है। दिन के कोल्ड आवर्स यानी शीतकाल होते हैं रात्रि, भोर का समय और अति प्रात:। उल्लेखनीय है कि जितने भी बच्चों की मौत हुई है, उनकी स्थिति सुबह-सुबह यानी कोल्ड ऑवर में ही बिगड़ी है। यह भी एक प्रमाण है कि यह लू लगने की बीमारी है, कोई जापानी बीमारी नहीं।

जब तक बच्चा मुँह से भोजन ले रहा है, तब तक उसको आयु के अनुसार लवण भास्कर चूर्ण देते रहना भी बहुत सहायक होता है। लवण भास्कर चूर्ण जहाँ सभी लवणों की आपूर्ति कर देता है, वहीं यह पाचन, गैस का प्रभाव, नर्वस सिस्टम, आंतरिक ऑक्सीजन आपूर्ति में भी बहुत सहायक होता है। मैंने इन्हीं गर्मियों अपने तीनों बच्चों को दो-दो बार इन्हीं उपचारों के सहारे बिना किसी एलोपैथिक दवा के ठीक किया है। इसलिए यह स्वानुभूत प्रयोग है।

कुल मिला कर कहा जा सकता है कि लू के पारंपरिक इलाजों की उपेक्षा और ऐसी साधारण बीमारियों के लिए भी अस्पतालों पर निर्भरता ने मुजफ्फरपुर जैसी भयावह घटना को जन्म दिया है। भारत में सबके स्वास्थ्य की गारंटी आयुर्वेद ही कर सकता है इसका प्रत्यक्ष संकेतक है एलोपैथ की विफलता से सृजित हुई यह हृदय विदारक घटना। एलोपैथ की विफलता का दंश झेलकर आखिर हम कबतक अपने प्रियजनों को खोते रहेंगे। त्रासदी सी बन जाती इस विभीषिका को हम कबतक मूकदर्शक बनकर देखते रहेंगे? अब समय आ गया है राज्यपोषित एलोपैथिक चिकित्सा से मोहभंग करके आयुर्वेद समेत अन्य अनेक वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों को राजकीय प्रश्रय दिया जाय और इनके सहारे भारत की एक एक जनता का स्वास्थ्य सुरक्षित किया जाय। अब जनता को पूर्ण स्वास्थ्य (होलिस्टिक हेल्थ) की गारंटी सरकार को देनी ही होगी। किन्तु होलिस्टिक हेल्थ की गारंटी एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति से संभव नहीं है। यह गारंटी आयुर्वेद ही दे सकता है।


रोग का कारण नहीं, इलाज है लीची

लीचीफल के खाद्यभाग के प्रति 100 ग्राम में पोषक तत्वों का अनुपात निम्नवत होता है-
कार्बोहाइड्रेट – 16.5 ग्राम
आहारीय रेशा -01.3 ग्राम
विटामिन सी – 72 मि.ग्रा.
कैल्शियम – 5 मि.ग्रा.
मैग्नेशियम – 10 मि.ग्रा.
फॉस्फोरस 31 मि.ग्रा.
प्रति 100 ग्राम खाद्यभाग में ऊर्जा 70 किलो कैलोरी अर्थात 280 किलो जुल प्राप्त होता है।
प्रश्न उठता है कि जिस फल में बड़ी मात्रा में कार्बोहाइड्रेट है, वह फल रक्तशर्करा के कम होने का कारण कैसे बन सकता है? लीची में कुछ तो ऐसा पदार्थ पाया जाता जो रक्तशर्करा को कम करे। यदि ऐसा होता तो मधुमेह के रोगियों के लिए तो यह फल वरदान सिद्ध हो जाता। परंतु एक ओर एलोपैथिक डॉक्टर तो मधुमेहरोगियों को लीची खाने से मना करते हैं किन्तु बच्चों के इस मामले में रक्तशर्करा कम होने का जिम्मेदार लीची को ठहराया जा रहा है। यह विरोधाभासी बात समझ से परे है। कपोल कल्पित बातों के आधार पर पीडि़तों के परिवारजनों समेत पूरे देश को भ्रमित करना एक आपराधिक कृत्य है जिसका संज्ञान उच्चतम न्यायालय को लेना चाहिए।