कैसे खाएं बासी भोजन ?

ममता रानी
लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं।


बासी भोजन हमारे सभी धर्मशास्त्रों में वर्जित यानी न खाने योग्य ही माना गया है। आयुर्वेद भी स्वस्थ रहने के लिए हमें ताजा भोजन करने की ही राय देता है। आज के डाक्टर भी हमें तुरंत का बना गरमागरम खाना खाने के लिए कहते हैं। हमारे यहाँ तो दूध भी ताजा निकाला हुआ, बिना गर्म किया पीने की परंपरा रही है। परंतु दूसरी ओर हमारे यही धर्मशास्त्र यह भी कहते हैं कि गृहस्थ के घर में 1-2 अतिथियों का भोजन हमेशा रहना चाहिए। अन्न को हमारे यहाँ ब्रह्म का ही प्रतीक माना गया है। बड़े-बुजुर्गों ने हमें हमेशा यही शिक्षा दी है कि अन्न को बर्बाद करना ईश्वर का अपमान है। ऐसे में यदि कुछ भोजन बच जाए, तो उसका क्या किया जाए? बासी भोजन जो कि लगभग घरों में बचता ही है, उसे क्या हम फेंक दें, पशु-पक्षियों को खिला दें, गरीब भिखारियों को दे दें या फिर हम स्वयं खा लें?
शास्त्रों की इस शिक्षा के साथ ही हम अपने देश में कुछ ऐसी परंपराएं भी देखते हैं, जो इनके ठीक विपरीत हैं। देश के अनेक इलाकों में बासी भोजन खाने की परंपरा है। अपने यहाँ बंगाल, बिहार, राजस्थान जैसे राज्यों में एक त्यौहार ही है, जिसमें बासी भोजन ही किया जाता है। उस दिन घर में चुल्हा नहीं जलाया जाता। एक दिन पहले ही भोजन बना कर रख लिया जाता है और उसे ही दूसरे दिन खाया जाता है। यह त्यौहार है शीतला अष्टमी का। कहीं-कहीं यह सप्तमी को भी मनाया जाता है और इसलिए वहाँ इसे शीतला सप्तमी भी कहते हैं। आखिर इन शास्त्रविरोधी परंपराओं और त्यौहार बनाए जाने का कारण क्या है?

देखा जाए तो हमारी परंपराओं ने बासी भोजन का भी एक विज्ञान विकसित किया था। कुछ भी और कितना भी बासी भोजन नहीं खाया जाता। किस बासी भोजन को खाना है और कैसे खाना है, इसका एक व्यवस्थित विज्ञान रहा होगा, जो कि परंपरा में शामिल हो गया। आज हम उसके पीछे के विज्ञान को नहीं जानते, परंतु उसका पालन उसी रूप में करते हैं। हमें यह ज्ञात था कि किस भोज्य सामग्री को कब बासी माना जाए। उदाहरण के लिए रोटी 8-10 घंटे तक खराब नहीं होती, उसके बाद वह बासी मानी जाती है। सामान्यत: बनने के 4-5 घंटे बाद भोजन खराब होने लगता है। इसलिए उसे ताजा ही खा लिया जाना चाहिए। विशेषकर गर्मियों में भोजन शीघ्र खराब होने लगता है। गर्मियों में मनुष्य की पाचन क्षमता भी घट जाती है। परंतु ध्यान देने की बात यह है कि बासी भोजन हमें तब अधिक नुकसान पहुँचाता है, जब हम उसे दोबारा गर्म करते हैं। पकी हुई सब्जी या दाल को हम जितनी बार गर्म करते हैं, वह उतना अधिक खराब होती जाती है। उसकी पोषक क्षमता उतनी ही नष्ट होती जाती है। इसलिए बासी भोजन को हमेशा ठंडा रखने और ठंडा ही उपयोग करने की परंपरा रही है।

ध्यान देने की बात यह है कि सर्दियों में खाना शीघ्र खराब नहीं होता और इसलिए बासी की परिभाषा में थोड़ी छूट मिल जाती रही है। सर्दियों में 8-10 घंटे की बजाय 12-15 घंटे भी भोजन सुरक्षित रहता है। इसलिए सर्दियों में अक्सर घरों में थोड़ा बहुत बासी भोजन लोग खा लेते हैं। सर्दियों में मनुष्य की पाचन क्षमता बढ़ी हुई होती है। परंतु जैसे ही सर्दियां समाप्त होती हैं और गर्मी प्रारंभ होती है, बासी भोजन खाना बंद करना चाहिए। इसके संकेत के रूप में ही संभवत: शीतलाष्टमी का त्यौहार प्रारंभ हुआ होगा। शीतलाष्टमी का त्यौहार चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाया जाता है।

हमें यहाँ यह भी ध्यान रखना चाहिए कि शीतला माता का संबंध एक खतरनाक बीमारी से भी है। यह बीमारी है चेचक जिसे जन सामान्य माता के नाम से पुकारता है। छोटी माता, बड़ी माता आदि इसके प्रकार हैं, जिसे आधुनिक चिकित्साविज्ञान मिजिल्स, स्मॉल पाक्स और चिकेन पाक्स के नाम से पुकारता है। उल्लेखनीय बात यह है कि इसका कोई इलाज आधुनिक चिकित्सापद्धति में नहीं ढूंढा जा सका है। इसकी कोई दवा नहीं होती। यह बीमारी केवल उचित आहार-विहार से ही ठीक होती है।

वास्तव में चैत्र का महीना पूरे देश विशेषकर पूर्वी तथा उत्तर भारत में विशेष रूप से मनाया जाता है। लगभग स्थानों में इस महीने में नीम के पत्ते खाने का प्रचलन है जोकि इस बीमारी के लिए सबसे अधिक उपयुक्त आहार-विहार है। नीम के पत्ते खाना, नीम के पेड़ के पास रहना, उसमें पानी देना, उसकी छाँह में विश्राम करना, निम्बोली खाना आदि चेचक को दूर रखने के उपाय हैं। इसका ही एक भाग बासी भोजन भी है। यदि बासी भोजन को ठंडा ही खाया जाए तो वह भी पेट को ठंडा रखता है। शीतलाष्टमी का त्यौहार इस बात का भी संकेत करता है कि गरमियाँ आ गई हैं, इसके बाद बासी भोजन नहीं करना है। एक प्रकार से यह बासी भोजन करने का अंतिम दिन है। इस दिन ऐसी चीजें बनाई जाती हैं जो शीघ्र खराब नहीं होतीं। साथ ही पेट को ठीक और ठंडा रखने वाली चीजें विशेषरूप से खाई जाती हैं। जैसे कि दहीभात। भात यानी पके हुए चावलों को दही में मिला कर रख दिया जाता है। फिर उसे अगले दिन खाया जाता है। एक दिन में उसमें कीण्वन यानी फर्मेन्टेशन की प्रक्रिया होती है। इससे वह अधिक सुपाच्य हो जाता है।

उड़ीसा, बंगाल और बिहार में बासी चावल खाने की परंपरा मिलती है। यह ध्यान देने की बात है कि इन इलाकों में भरपूर सब्जियां होती हैं, फिर भी बासी भोजन में केवल पके हुए चावल को ही रखा गया है। पके हुए चावलों में पानी डाल कर रख दिया जाता है। फिर उसे अगले दिन नमक-तेल मिला कर खाया जाता है। कई स्थानों में उसमें चने का सत्तू भी मिला कर खाते हैं। सत्तू भी गर्मियों में पेट को ठंडा रखता है। कीण्वित हो जाने के कारण यह बासी भात भी सुपाच्य हो जाता है। उड़ीसा में इसे पाखाल भात कहते हैं। हालाँकि अब केवल गरीब और निम्न वर्गों में ही इसका प्रचलन शेष रह गया है।

तो बासी भोजन करने के भी कुछ नियम हैं। आइये अपनी परंपराओं में से इसके सूत्र तलाशते हैं।

  • बासी भोजन खाने की भी एक समय-सीमा है। उसके बाद उसे नहीं खाया जाना चाहिए। पके चावलों को 8-10 घंटे में ही प्रयोग कर लें। अधिक समय रखने से समें कीण्वन की प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है। एक दिन से अधिक समय तक रखने पर उसमें अल्कोहल बनने लगता है, जिसका पूर्वोत्तर तथा झारखंड जैसे इलाकों में देसी शराब की तरह सेवन किया जाता है।
  • फ्रिज भोजन को ठंडा रखकर खराब होने से बचाता है, परंतु वह भोजन पोषण योग्य नहीं रह जाता। इसलिए उसे खाने से लाभ की बजाय नुकसान ही अधिक है। इसलिए फ्रिज में भी 7-8 घंटे से अधिक कोई भोजन सामग्री नहीं रखें।
  • बासी भोजन को दोबारा गर्म नहीं करें। फ्रिज में रखे भोजन को भोजन करने से एक घंटे पहले बाहर रख दें। वह सामान्य ताप पर आ जाए, तब उसे खा लें। बासी चावलों को भून कर, वेजिटेबल राइस बनाकर खाना पेट और स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है। उसे पानी में डाल कर ठंडा करके ही खाना चाहिए।
  • बासी रोटी और सब्जियों तथा दालों को भी कम से कम बार गर्म करें।
  • बासी रोटी तथा चावलों को दूध में पका कर खाया जा सकता है। रोटी के छोटे-छोटे टुकड़े कर लें। उसे दूध में डाल कर उबाल लें। चूल्हे से उतारने के बाद उसमें गुड़ और थोड़ी सी इलायची डाल लें। इसे गर्मागर्म या ठंडा करके खाएं। इसे दोबारा बासी नहीं होने दें।
  • बासी चावलों को दही में मिला कर भी खा सकते हैं। दही में मिले बासी चावल काफी सुपाच्य हो जाते हैं।

लेमन राइस
चावलों को नींबू के रस में पका कर भी सेवन किया जा सकता है। दक्षिण भारत में लेमन राइस के नाम से यह काफी प्रसिद्ध है। लेमन राइस बनाने के लिए एक पैन में थोड़ा सा तेल गरम करें। इसमें करी पत्ता, राई, लाल मिर्च, चने की दाल, मंूगफली आदि डाल कर तड़काएं। तड़कने पर इसमें चावल की मात्रा के अनुपात में नींबू का रस डालें। स्वादानुसार नमक डाले। फिर इसमें बासी चावल डाल कर थोड़ी देर तक भून लें। बस लेमन राइस तैयार है। इसे गरमागरम परोसें या खाएं।