मनमोहक हैं असम के लोकगीत

डॉ. राजश्री देवी
लेखिका असम विश्वविद्यालय में अतिथि अध्यापिका हैं।


लोक का अर्थ है एक समाज में रह रहे साधारण लोग। साहित्य में लोक कहने से साधारणत: औपचारिक शिक्षा-दीक्षा से दूर अथवा अत्यंत सामान्य औपचारिक शिक्षा से शिक्षित शहरों से दूर परंपरागत संस्कार और रीति-रिवाजों के माध्यम से जीवन निर्वाह करनेवाले लोगों को ही इंगित किया जाता है। हालाँकि अब इस अवधारणा में परिवर्तन आ गया है। सामान्य जन से जुड़ा हुआ जो साहित्य है, उसे ही लोक साहित्य कहा जाता है। इसीलिए यह समाज का दर्पणस्वरुप है। लोक साहित्य की रचना कोई विशेष व्यक्ति करता हो, ऐसा नहीं है। समाज के साधारण लोग ही, समाज की अनुभूतियों को व्यक्त करने के लिए लोकसाहित्य की रचना करता है, जहाँ लोकसमाज का ही चित्रण होता है।

किसी भी समाज में शास्त्रीय साहित्य का आरंभ बहुत बाद में होता है। शास्त्रीय साहित्य के लिए लिपि, मानक भाषा, व्याकरण आदि की आवश्यकता होती है। किंतु जहाँ तक लोकसाहित्य की बात है, इसके लिए इन तत्त्वों की आवश्यकता नहीं होती। लोग अपनी सामान्य भाषा में ही अपने हृदयगत भावों को लोक साहित्य के माध्यम से प्रकट करते हैं। लोक साहित्य शास्त्रीय साहित्य की जननी होती है। बाद के समय में समाज में जो लिखित अथवा शास्त्रीय साहित्य का सृजन होता है, वह पुराने लोक साहित्य से ही कई बार प्रेरित होता है अथवा तत्वों को ग्रहण करता है। लोक-साहित्य लिखित नहीं होता बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक ही हस्तांतरित होता चला जाता है। आजकल इसकी चर्चा कम होने की वजह से हो अथवा संरक्षित करने की भावना के कारण ही हो लोक साहित्य का लिखित रूप भी सामने आने लगा है।

पूर्वोत्तर भारत के आठों राज्यों में सैंकड़ों जनजातियां रहती हैं। सबकी भाषा-संस्कृति अलग-अलग हैं। इसी के चलते लोक साहित्य में भावों की अभिव्यक्ति में भी अंतर पायी जाती है। पूर्वोत्तर भारत लोक साहित्य का खान है। आज भी जिन जनजातियों की अपनी लिपि नहीं है अथवा लिखित साहित्य नहीं है वे लोक साहित्य में बहुत समृद्ध है। हर एक पेड़, पहाड़, नदी, पत्थर, जंगल, रास्ते के साथ उनकी कथा-कहानियों की, किंवदंतियों की सांस्कृतिक विरासत जुड़ी हुई है।

जहाँ तक असमिया समाज की बात है, यहाँ विभिन्न समय में असम आये हुए विभिन जनगोष्ठियों का प्रभाव देखा जाता है। यह प्रभाव भाषा, पोशाक, रीति-रिवाज, उत्सव, चीजों के नाम आदि सभी में स्पष्ट परिलक्षित होता है अथवा यह कहना अधिक उचित होगा कि नेग्रिटो, ऑष्ट्रिक, द्रविड़, मंगोल आदि के साथ-साथ सभी जनजातीय संस्कृति के संमिश्रण से वृहद असमिया जाति का गठन हुआ है। असम में प्रचलित लोक साहित्य की बात की जाये तो लिखित साहित्य के साथ-साथ लोकसाहित्य की भी यहाँ कमी नहीं है। इसमें सामान्य जनमानस के भावावेग, अनुभूति, सुख-दु:ख के क्षण, विश्वास, परंपरा आदि संस्कृति का विविध पक्ष मुखर हो उठा है।

सामान्य रूप से लोक साहित्य को यहाँ छह भागों में बाँटा जाता है – क) कहानी, ख) गीत अथवा लोकगीत, ग) दृष्टांत, घ) मुहावरा, ङ) लोकोक्ति, च) मंत्र। इन भागों को फिर से कई उपभागों में विभाजित किया गया है। इसलिए आज लोकगीत पर ही चर्चा की जाएगी। जहाँ तक असमिया समाज में प्रचलित लोकगीतों की बात है, विभिन्न उत्सव, अवसर, सामाजिक अनुष्ठानों पर ये गीत गाए जाते हैं। उनमें से कुछ इस प्रकार हैं – श्रमगीत, बिहू गीत अथवा बिहू नाम, निचुकोनी गीत अथवा धाई नाम (लोरी), देह विचारर गीत, देव-देवी के गीत, बारह महीनों के गीत, मालिता, जुना, खेल गीत, मेंढक की शादी के गीत, नैसर्गिक गीत, विवाह के गीत, ओजा-पाली के गीत, दरिद्रता और विद्रोह के गीत आदि आदि। इनमें से कुछ गीतों का विवरण इस प्रकार हैं।

श्रम गीत
शारीरिक श्रम करते समय दु:ख-कष्ट को भूलाने के लिए श्रमिक के मन से जो दो शब्द गीत के रूप में बाहर आते हैं, वही श्रमगीत है। माना जाता है कि ऐसे गीत गाकर श्रम करने से कष्ट का अनुभव कम होता है और काम के लिए प्रेरणा और उत्साह मिलता है।

सूत काटने के गीत
असम में कीड़ों से रेशम के धागे बनाने का चलन है। सूत काटते समय भी गीत गाये जाते हैं। स्वतंत्रता आंदोलन के समय चरखे से सूत काटना जब स्वावलंबन और देशप्रेम का द्योतक बन गया तो इस प्रकार लोकगीत गाये गए-
यँतरते भक्ति आमार यँतरते मुक्ति आमार, यँतरते गाउ जय गान।
अर्थात् हमारी भक्ति चरखे में हैं, चरखे में ही मुक्ति है, चरखे की हम जयगान करते हैं। ठीक उसी प्रकार अन्य एक लोक गीत इस प्रकार है-
गांधी नामर नौका खनिये, जवहर नामर बोठा,
स्वराज आनिबाके लागि, हाते काटा सूता।
अर्थात् गांधी और जवाहर नाम का नौका है। हाथ से कटे धागे से स्वराज लाना है।
हल चलाने के गीत:-असमिया समाज मूलत: कृषिजीवी समाज है। हल चलाते समय जो गीत गाये जाते हैं वह कुछ इस प्रकार है-
ओ बूढ़ा हालुवा ऐ
हाल गाथिब नरा
कथाई बागरि फुरा
मन बूढ़ा पगला ऐ।
अर्थात् हल चलानेवाला ओ बूढ़ा किसान, अब तू हल नहीं चला सकता, इधर-उधर घूमता फिरता है। तेरा मन भी बूढ़ा है और तू पागल हो गया है।

मछली पकडऩे के गीत
समूह में जब लोग मछली पकडऩे जाते हैं तो कुछ लोग एक ओर से मछलियों को खदेड़ते चले जाते हैं और थोड़ी दूरी पर रुके हुए दूसरे लोग मछलियों को पकड़ लेते हैं। मछलियों को खदेड़ते समय इस प्रकार गीत गाये जाते हैं-
हे कवेलेंगी बेरोक जा
हे पुठीलेंगी बेरोक जा।
अर्थात् कावै, पुठी आदि जो विभिन्न प्रकार की मछलियाँ हैं उन्हें किनारे की ओर जाने के लिए कहा गया है।

धान कूटने के गीत
जब पहले समुह में महिलायें धान कूटने का काम करती थीं तो कई तरह के गीत गाती थीं।
उ नंदी, कामाई करों आय,
कुलात झारो बखेर बारा, तुष उडिय़े बाय,
हातत बाजे हातेर खारु, आँचल खसि जाय।
अर्थात् ऐ नंदी आ, कमाई करते हैं, कुला (धान झाडऩे के लिए बाँस से बनाया जाता है) में बरा यानी चावल झाड़ के साफ करते हैं। इसका मैल चला जायेगा। हाथों का कंगन खनकेगा, आँचल खिसक जाता है।

धर्ममूलक लोकगीत
गाँव में प्रचलित विभिन्न प्रकार के पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठानों में भी विभिन्न प्रकार के लोकगीत गाये जाते हैं। असम में भी ऐसे अनेक अनुष्ठान हैं। उनमें से कुछ इस प्रकार हैं:-
आईनाम:- चिकन पोक्स बीमारी को यहाँ वसंत कहा जाता है। यह एक संक्रामक रोग है और इससे लोगों की मृत्यु तक होती है। इसके अधिष्ठात्री देवी के रूप में शीतला माता की कल्पना की गयी है। उन्हें संतुष्ट करने के लिए विविध प्रकार के गीत, पद आदि गाते हुए शीतला पूजा की जाती है। उदाहरण:-
मानाहरे पानी आनाले भवानी, तामारे कलसी लोइ
छयकुर ब्राह्मणे चंडीपाठ पढि़छे, शीतलाक आगते लोइ।
अर्थात् तांबे की गगरी में मानाह नदी से पानी लाया गया है। छ: कुरी (एक कुरी = बीस) ब्राह्मण शीतला माता को सामने लेकर चंडीपाठ कर रहे हैं।

अपेसरी सबाहर गीत
माना जाता है कि जब कोई बच्चा सूख जाता है अथवा बिना पलक झपकाये बच्चा एक ओर देखता रहता है अथवा लड़की रजस्वला नहीं होती तो अपेसरी की नजर लगती है। अपेसरी को दुर्गा का रूप माना जाता है। इसलिए अपेसरी के गीतों में दुर्गा की ही एक तरह से स्तुति की जाती है।
जोने बेलिये लगे भटियाले लगत जाय तामुली तरा,
क्षणेक रोइ जोवा आई अपेसरी लोइ जोवा कुमारी पूजा।
नामे सेवा कोइ गोपिनी पाठे तुष्ट होवा भगवती ए
ए हरो संतोषे हरिउ संतोषे दुर्गा आई संतोष हबा ए।
नामत नधरिबा दोष पदत नधरिा दोष
आमि मूढ़मति नेजानो भकति, एइ नामे संतोष हउक।
अर्थात् चाँद, सूरज डूब गए हैं। साथ अब तारे जा रहे हैं। हे आई अपेसरी कुछ क्षण रुक जाइये। कुमारी पूजा ले जाइये। महिलायें नाम, पाठ, सेवा कर रही हैं, संतुष्ट हो जाइये। दुर्गा आई संतुष्ट हो जाइये। नाम, पद में कोई चूक हो गया हो तो क्षमा कीजिये। हम तो मूढ़मति हैं, भक्ति भी नहीं आती। इसी नाम से संतुष्ट होइये।

बिहू गीत अथवा बिहू नाम
बिहू असम का जातीय उत्सव है। इसमें अन्य रीति-रिवाजों के साथ-साथ बिहू नृत्य और गीत भी होता है। कृषि से सम्बंधित इस उत्सव में युवक-युवतियाँ पठार में बिहू गीत गाते हैं जिसका मूल विषय प्रेम है।
प्रथमे ईश्वरे सृष्टि सरजिले, तार पासत सरजिले जीव
तेनेजन ईश्वरे पीरिति करिले, आमि बा नकरिम किय।
अर्थात् ईश्वर ने सबसे पहले इस सृष्टि की रचना की। उसके बाद जीवों का सृजन किया। उसी ईश्वर ने प्रेम किया है तो हमलोग भला क्यों न करें।

विवाह के गीत
विवाह के समय पालन किये जानेवाले हर रस्म के साथ जुड़े हुए गीत हैं। ऐसे गीत दो तरह के हैं। पहला हास्यप्रधान गीत और दूसरा लड़की के जीवन, सुख-दु:ख, दांपत्य जीवन से सम्बंधित गंभीर भावयुक्त गीत। दूसरे प्रकार के गीत का एक उदाहरण प्रस्तुत है।
कामदेउ पुत्र ओ मन तगर, गोबिंदरे नाति ओ मन तगर,
आनि दिया चित्रलेखी ओ मन तगर, आजि शुदा होब वाणरे नगर।
यहाँ दूल्हे को कामदेव का पुत्र और गोविंद का नाति कहा गया है और दुल्हन को असम के प्राचीन काल के राजा वाण की पुत्री ऊषा के साथ तुलना किया गा है। कहा गया है कि वाण की नगरी आज सूनी पड़ जाएगी।

मेंढक की शादी के गीत
सूखा पडऩे पर असम में बारिश के लिए मेंढकों की शादी करवायी जाती है। सभी नियम आदि असली शादी की तरह ही होती है। बस मेंढक-मेंढकी दूल्हा-दुल्हन के रूप में होते हैं। उसमें भी गीत गाये जाते हैं।
राम राम, भेकुली बियालोइ, राम राम, आहे इंद्रदेव
राम राम, बताह-बरषुणत तितिहे, राम राम, स्वर्गर अपेश्वरी
राम राम, नामि आहिछे, राम राम, भेकुली बिया शुनिहे।
हर पंक्ति में राम का नाम लेते हुए कहा गया है कि मेंढक की शादी में इंद्रदेव आये हैं (इंद्र को बुलाकर बारिश को बुलाया जा रहा है)। मेंढक की शादी की खबर सुनकर हवा, बारिश में भीगकर स्वर्ग से परियाँ भी उतर आयीं हैं।

निचुकोनी गीत अथवा लोरियां
बच्चों को सुलाने के लिए निचुकोनी गीत गाये जाते हैं, जिन्हें हम लोरियों के नाम से जानते हैं। असम में इन्हें धायगीत भी कहा जाता है। ये गीत बच्चों को कल्पना से भरे एक अलौकिक जगत में ले जाते हैं।
जोनबाई ए एटि तरा दिया, एटि तरा नालागे दुटि तरा दिया।
अर्थात् ओ चँदा मामा, एक तारा दे दो। एक नहीं दो तारे दे दो।
इन लोक गीतों के अलावा भी वर्णनमूलक गीत, किंवदंती अथवा जनश्रुतिमूलक गीत, मणिकोंवर के गीत, फूलकोंवर के गीत, जनागाभरुर गीत, बारमाही और बिलाप गीत, गोवालपरीया लोकगीत, प्रेममूलक गीत, दु:ख-दैन्य के गीत, गोरखनाथ पूजा के गीत, आजांगर पूजा के गीत, सड़क पूजा के गीत आदि लोकगीत भी असम में प्रचलित है। ये सारे गीत केवल मात्र गीत नहीं बल्कि पूरे समाज की अभिव्यक्ति है। इससे एक समाज की कथा, किंवदंती आदि परंपराओं को जाना जा सकता है। इससे ही एक समाज का स्वकीय परिचय का निर्माण होता है। ये समाज का इतिहास है, धरोहर है।