स्वस्थ जीवनशैली अपनाएं कैंसर से बचें

डॉ. भगवान सहाय
लेखक आयुर्वेद एवं तिब्बीया कॉलेज में विभागाध्यक्ष हैं।
कैंसर एक तेजी से फैलती बीमारी है। कैंसर का नाम सुनते ही लोग भयभीत हो जाते हैं। समस्या यह है कि इसकी चिकित्सा काफी मँहगी है और उसके बाद भी बचने की सुनिश्चितता कम होती है। ऐसे में यह आवश्यक है कि हम यह जानें कि कैंसर न होने के लिए क्या उपाय किए जाने चाहिए। आज यह स्पष्ट हो चुका है कि कैंसर मूलत: हमारी जीवनशैली में परिवर्तन के कारण होता है। हमारी खानपान की आदतों, सोने-उठने के समयों और अन्यान्य स्वभावों के कारण हमारे शरीर में कोशिकीय स्तर पर परिवर्तन होते हैं और वह धीरे-धीरे कैंसर बन जाता है।
कैंसर होने से बचने के लिए और कैंसर हो जाने पर स्वस्थ होने के लिए आवश्यक जीवनशैली और आहार-विहार का आयुर्वेद में विस्तार से वर्णन प्राप्त होता है। उसका विवरण निम्नप्रकार है


1. जागना

वेदों एवं आयुर्वेद में सर्वत्र जागने का उचित समय ब्रह्म मुहुर्त बताया गया है, जो प्रात: 4—5 बजे के बीच का होता है। आयुर्वेद की दृष्टि से इस समय शरीर में वात दोष की प्रबलता रहती है जिससे हमारी आंते सक्रिय रहती है तथा मल-मूत्र का विसर्जन ठीक से होता है। इस समय यदि मलो को बाहर नहीं निकलने देगे तो मल में विद्यमान विषाक्त तत्व को आंते अवशोषित करके रक्तसंचरण के माध्यम से शरीर में वापस भेज देंगी। रासायनिक अंसतुलन जीवनशैलीजन्य रोगों का कारण बनता है। कैंसर भी उनमें से एक है। इसलिए ब्रह्म मुहुर्त में जागना स्वस्थ जीवन के लिए आवश्यक है। अर्थववेद में भी कहा कि उगते सूर्य की किरणें अनेकानेक रोगों को नष्ट करने में सक्षम है। अत: सभी प्रमादों को छोड़कर रोगी शीघ्र सोये ताकि प्रात: ब्रह्म मुर्हूत में जागना सम्भव हो सके ।
2. तेलगंडूष या कवल धारण 
प्रात:काल दांतों साफ करने के बाद मुंह में तेल या घी को 5 मिनट तक भरकर रखना चाहिए। इससे दंतरोगों एवं मुखरोगों से छुटकारा मिलता है। इससे मुख की श्लैष्मिक झिल्ली एवं जबड़ों का स्नेहन यानी लुब्रिकेशन हो जाता है। जो कैंसर रोगी कीमोथैरेपी या रेडियोथैरपी पर हों, उन्हें घी से यह प्रयोग नियमित रूप से करना चाहिए। यह श्लैष्मल त्वचा पर होने वाले दुष्प्रभावों को नहीं होने देगा। साथ ही साथ मुंह एवं गले के कैंसर रोगियों के लिए तो यह क्रिया रामबाण है।
3. नस्य प्रयोग
प्रात:काल तिल के तेल, सरसों तेल या बाजार में उपलब्ध अणु तेल की 6—6 बूदें ड्रोपर से नाक में डालनी चाहिए। इससे सुनने, सूंघने, देखने तथा स्मरण करने की शक्ति बढ़ती है। मस्तिष्क की नाडिय़ां सबल बनती हैं जिससे हार्मोनों का संतुलन बना रहता है जो कैंसर जैसे रोगों से बचाव करती है।
4. तेल मालिश
प्रात: भ्रमण पर जाने से पूर्व 10 मिनट अवस्थानुसार किसी भी तेल से मालिश करें। इससे रक्त संरचण बढ़ती है तथा त्वचा की सुन्दरता में वृद्धि होती है। कीमोथेरेपी तथा रेडियाथैरेपी के कारण जो त्वचा पर दुष्प्रभाव होता है, उसे तेल मालिश से ठीक किया जा सकता है।
5. सिर में तेल मालिश
स्नान के बाद बाल सूखने के बाद सिर में तेल मालिश अवश्य करनी चाहिए। इससे बाल दृढ़ होने के साथ साथ गहरी नींद आना भी सुनिश्चित होता है। जीवनशैलीजन्य विशेषकर उच्चरक्तचाप एवं कैंसर का कारण पर्याप्त एवं गहरी निद्रा का अभाव होता है।
6. पैर के तलुओं में तेल मालिश
रात में सोते समय पैरों को सामान्य पानी से धोकर तलुवों में तेल मालिश करनी चाहिए। इससे नेत्र ज्योति, स्मरणशक्ति एवं एकाग्रता बढ़ती है। साथ ही साथ प्रगाढ़ निद्रा आती है।
7. व्यायाम
इसके लिए प्रात:काल का समय सर्वाधिक उपयुक्त है। अपनी क्षमता के अनुसार भ्रमण, दौड़, आसन— प्राणायाम आदि का चयन किया जा सकता है। अपनी शारीरिक क्षमता से अधिक यानी थकाने वाला व्यायाम कदापि नही करें।
8. निद्रा
निद्रा शरीर के विश्राम की अवस्था होती है। यह समय क्षतिग्रस्त कोशिकाओं के पुन:निर्माण का होता है। अत: कम से कम सात घण्टे की निद्रा अवश्य लें। निद्रा का उपयुक्त समय रात्रि ही होता है क्योंकि मेलोटोनिन नामक हाइमोन का स्राव रात्रि के अंधेरे में ही होता है। दिन में शयन स्वास्थ्य की दृष्टि से हानिकारक है।
10. नियमित संशोधन
त्रिफला चूर्ण या हरड़ का चूर्ण की 2-3 ग्राम की मात्रा में रात को गरम पानी से सेवन करने से प्रात: मल शुद्धि सम्यक प्रकार से होती है जो स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है।
11. रात्रिशयन से पूर्व ध्यान
सोने से पूर्व ध्यान अथवा ईश्वर को दिनभर की गतिविधियों के लिए धन्यवादपूर्वक स्मरण करते हुए निश्चिंत होकर सोना चाहिए।
स्वास्थ्य संरक्षण एवं संवर्धन में भोजन की भूमिका
भोजन स्वास्थ्य का मुख्य आभार है। इसी भोजन से बल, वर्ण, रोग प्रतिरोधक क्षमता एवं शरीर का मुख्य आधार पाचन शक्ति का पोषण होता है। भोजन पूर्णत: संतुलित एवं पोषक तत्वों से युक्त होना चाहिए। अनुपयुक्त एवं अनुचित विधि से किया गया भोजन कैंसर आदि रोगों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

1.
भोजन कैसा होना चाहिए: भोजन हमेशा गरम, उचित मात्रा में, घी तेल युक्त ( रूक्ष नही) होना चाहिए। रूखा भोजन शरीर में वात दोष बढ़ाता है जो कैंसर उत्पन्न कर सकता है।
2. भोजन पचने में भारी न होकर सुपाच्य होना चाहिए।
3. फ्रिज में रखा बासी भोजन नहीं करना चाहिए।
4. जंकफूड एवं फास्ट फूड सेवनयोग्य नहीं है क्योंकि इनमें नमक-क्षार-वसा एवं शर्करा की मात्रा अधिक होती है।

आहार विधि
1. भेाजन से पूर्व सेंधा या काले नमक के साथ अदरक चबाना लाभकारी होता है। इससे पाचनरस की मात्रा बढ़ती है जो भोजन के पाचन में सहायक होती है।
2. रुचि के अनुसार एवं उचित मात्रा में ही भोजन ग्रहण करना चाहिए। यह न अधिक हो और न ही आवश्कता से कम हो।
3. एक बार खाया हुआ पदार्थ पचने के बाद ही दूसरा आहार ग्रहण करना चाहिए। दो समय के भोजन में कम से कम तीन घंटों का अंतर होना चाहिए।
4. भोजन के समय अर्थात् भूख के समय ही भोजन करना चाहिए। भोजन का समय व्यतीत होने पर भोजन करना पड़े तो अल्पमात्रा में भोजन करें।
5. शांतचित्र होकर प्रिय स्थान पर बैठकर भोजन करें।
6. भोजन न शीघ्रतापूर्वक एवं न ही बहुत धीरे-धीरे करें अपितु एक व्यावहारिक दृष्टिकोण अथवा चाहिए।
7. हँसते हुए, वार्तालाप करते हुए, टीवी देखते हुए भोजन नहीं करना चाहिए।
8. चिकनाईयुक्त मिठाई तथा पचने में भारी खाद्यपदार्थों को भोजन के प्रारंभ में ग्रहण करना चाहिए।
9. खट्टे एवं नमकीन खाद्य पदार्थ भोजन के बीच में ग्रहण करें।
10. रुक्ष, द्रव, कटु, तिक्त, कषाय रस वाले भोज्य पदार्थ भोजन के बाद ग्रहण करें।

अल्पमात्रा में भोजन की हानियां
वजन नियंत्रित करने के चक्कर में आजकल भोजन कम मात्रा में करने का प्रचलन देखा जा रहा है जो कि स्वास्थ्य की दृष्टि से ठीक नहीं है। आवश्यकता से कम भोजन करने से शरीर में पोषक तत्वों का अभाव तथा धातुक्षय यानी कैटाबोलिज्म में कमी होने लगता है, जो बलक्षय, वर्णनाश, वजन में कमी, तेजहीनता, गैस बनना, वीर्यनाश, एसिडीटी, लो ब्लड प्रेशर, बालों का गिरना, रक्ताल्पताजन्य चक्कर आना, अवसाद, बार—बार बीमार होना (ओजक्षय) आदि के रूप में परिलक्षित होता है।

प्रतिदिन सेवन योग्य भोज्यपदार्थ
1. चावल, गेहूँ, जौ नियमित रूप से भोजन में शामिल करें। ग्रीष्म ऋतु में ज्वार एवं मक्का तथा शीत ऋतु में बाजरा का भी सेवन करना चाहिए।
2. गौ घृत, गाय का दूध, शहद, मूंग दाल, अनार, बथुआ, छोटी मूली, हरड़, आंवला, सेंधा नमक एवं छाछ का प्रयोग नियमित रूप से करे।
3. बादाम—अखरोट, मुनक्का, खर्जूर का प्रयोग स्वास्थ्यकर है।

निरन्तर सेवन के अयोग्य भोज्य पदार्थ
निम्न भोज्य पदार्थ यद्यपि पोषण की दृष्टि से उपयोगी है परन्तु इनका नियमित प्रयोग पाचक अग्नि को मन्द कर सकता है। अत: इनका नियमित प्रयोग वर्जित है।
1. पनीर
2. गेहूं, जौ, मक्का, ज्वार आदि को भून कर प्रयोग करना ।
3. अंकुरित अनाज। मूंग, मोठ, चना आदि को अंकुरित करने से ये पचने में भारी हो जाते हैं तथा रुखे एवं शीत गुण वाले होने से वातवर्धक हो जाते हैं। इनका प्रयोग यदा कदा, थोड़ी मात्रा में एवं उबालकर ही करें।
4. दही। शरद, ग्रीष्म, बंसत में दही का प्रयोग नहीं करना चाहिए। दही का प्रयोग रात्रि में नहीं करना चाहिए। साथ ही दही ताजा प्रयोग करें अन्यथा खट्टा दही पित्तवर्धक हो जाता है।
सर्वथा अप्रयोज्य भोज्य पदार्थ
मैदा आदि से निर्मित ब्रेड, मोमोज, मैगी आदि जंक फूड एवं प्रसंस्कृत यानी पैकेटों वाले खाद्य पदार्थ, फ्रिज का ठण्डा पानी, रिफाइन्ड तेल आदि का प्रयोग स्वास्थ्य की दृष्टि से निन्दनीय है। अत: सर्वथा त्याग करें।

परस्पर विरुद्ध आहार का सेवन त्यागें
रस, गुण, वीर्य, विपाक आदि में परस्पर विरोधी खाद्य पदार्थों का सेवन एक साथ नहीं करें। ये हमारी पाचन शक्ति को दूषित करके आम की उत्पत्ति करते है जो निरन्तर प्रयोग से अनेकानेक विशेषकर कैंसर आदि घातक रोगों का कारण बनते हैं। कुछ उदाहरण निम्नवत् हैं –
1. मूली—लहसुन—तुलसी आदि के साथ दूध का प्रयोग।
2. दूध के साथ किसी भी फल जैसे केला आम, सेब, नाशपति, खरबूजा, तरबूज, आवंला आदि का प्रयोग करना।
3. दूध के साथ खिचड़ी का प्रयोग करना।
4. दूध के साथ नमक का प्रयोग करना।
5. दही के साथ उड़द का प्रयोग, जैसे दही-भल्ले।
6. घी— शहद का समान मात्रा में प्रयोग करना।
7. शहद को गर्म दूध या पानी के साथ प्रयोग करना।
8. मूल के साथ उड़द की दाल खाना।
9. कई अनाजों को मिलाकर एक साथ खाना।
10. दूध के साथ मछली का प्रयोग।

रसायनों का सेवन
स्वास्थ्य संवर्धन एवं कैंसर से बचाव तथा उसकी चिकित्सा के लिए रसायनों का सेवन करें। जो आहार या औषधियां रस रक्तादि धातुओं की वृद्धि करते हैं, उन्हें रसायन द्रव्य कहा जाता है। आधुनिक भाषा में इन्हें एंटी ऑक्सीडेन्ट कहा जाता है। रसायन फ्रीरेडिकलों जो कैंसर रोग में अपरिपक्व कोशिकाओं के उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, को नष्ट करते हैं। अत: स्वस्थ व्यक्ति इनका नियमित सेवन करके कैंसर आदि घातक रोगों से वचाव कर सकता है। दूसरी ओर कैंसर होने पर उसकी चिकित्सा में भी काम आते हैं। कुछ रसायन निम्न हैं
1. मेध्य रसायन, ब्राह्मी—शंखपुष्पी, मूलेठी, गिलोय आदि।
2. अश्वगंधा, शतावरी, आंवला। इनका पृथक पृथक या एक साथ दूध के साथ प्रयोग करना चाहिए।
3. त्रिफला— हरड़ आदि शरीर शोधन की दृष्टि से श्रेष्ठ रसायन माने गये हैं।
4. घृतकुमारी या एलोवेरा। यह चयापचय यानी मेटाबोलिज्म शक्ति को बढ़ाता हुआ कैंसर आदि व्याधियों के समाधान में समर्थ है।
5. गिलोय, मुलेठी, मेध्य प्रभाव के साथ-साथ कीमोथेरेपी के दुष्प्रभावों की श्रेष्ठ चिकित्सा है।
6. हल्दी – इसमें विद्यमान कुर्कुमिन नामक तत्व कैंसर के लिए विशेष रूप से लाभदायक है। अत: इसे विविध रूप में सेवन किया जाना चाहिए। इसके चूर्ण को घी में भून कर गरम पानी से या दूध के साथ सेवन करना चाहिए। कच्ची हल्दी का अचार के रूप में भी प्रयोग कर सकते हैं।