सैन्य विज्ञान था धनुर्वेद

विवेक भटनागर
लेखक इतिहास के विद्वान हैं।

धनुर्वेद एक उपवेद है। इसके अन्तर्गत धनुर्विद्या या सैन्य विज्ञान आता है। दूसरे शब्दों में, धनुर्वेद, भारतीय सैन्य विज्ञान का दूसरा नाम है। शास्त्रों के अनुसार चार वेद हैं और इसी तरह चार उपवेद हैं। इन उपवेदों में पहला आयुर्वेद है। दूसरा शिल्प वेद है। तीसरा गंधर्व वेद और चौथा धनुर्वेद है। इस धनुर्वेद में धनुर्विद्या का सारा रहस्य मौजूद है। ये अलग बात है कि अब ये धनुर्वेद अपने मूल स्वरुप में कहीं नहीं है। धनुर्वेद यजुर्वेद का उपवेद है जिसमें धनुष चलाने की विद्या का निरूपण है।
वैशम्पायन द्वारा रचित नीतिप्रकाश या नीतिप्रकाशिका नामक ग्रन्थ में धनुर्वेद के बारे में जानकारी है। यह ग्रंथ मद्रास में डॉ॰ आपर्ट द्वारा 1882 में सम्पादित किया गया। धनुर्वेद के अलावा इस ग्रन्थ में राजधर्मोपदेश, खड्गोत्पत्ति, मुक्तायुधनिरूपण, सेनानयन, सैन्यप्रयोग एवं राज व्यापार पर आठ अध्यायों में तक्षशिला में वैशम्पायन द्वारा जन्मेजय को दिया गया शिक्षण है। इस ग्रंथ में राजशास्त्र के प्रवर्तकों का उल्लेख है।
भारतीय सैन्य विज्ञान का नाम धनुर्वेद होना सिद्ध करता है कि वैदिक काल में भी प्राचीन भारत में धनुर्विद्या प्रतिष्ठित थी। संहिताओं और ब्राह्मणों में वज्र के साथ ही धनुष बाण का भी उल्लेख मिलता है। कौशीतकी ब्राह्मण में लिखा है कि धनुर्धर की यात्रा धनुष के कारण सकुशल और निरापद होती है। जो धनुर्धर शास्त्रोक्त विधि से बाण का प्रयोग करता है, वह बड़ा यशस्वी होता है। भीष्म ने छह हाथ लंबे धनुष का प्रयोग किया था। रघुवंश में राम व लक्ष्मण के धनुषों के टंकार का वर्णन व अभिज्ञान शाकुंतलम् में दुष्यंत के युद्धकौशल का वर्णन सिद्ध करता है कि कालिदास को धनुर्विद्या की अच्छी जानकारी थी।
धनुर्विद्या के बारे में जो भी वर्णन हमें विभिन्न ग्रन्थों और धनुर्वेद से मिलता है, वह प्रमाणित करता है कि यह एक पूर्ण विज्ञान था। इसमें विभिन्न प्रकार के धनुष से छोड़े जाने वाले अलग-अलग बाणों के प्रभाव का भी वर्णन है। उसके अनुसार बाण साधारण से लेकर महाविनाशकारी हो सकते थे। संभव है कि इन में से कुछ बाण वर्तमान युग की मिसाइलों के समान विनाशकारी हों। यह कल्पना भी हो सकती है और सत्य भी। क्योंकि इस विज्ञान का प्रभाव बाद में अर्थात हर्यकोंं, शिशुनागों, नन्दों, मौर्यों के काल में नजर नहीं आता। बौद्ध और सिद्ध साहित्यों में भी इनका वर्णन वैसा नहीं जैसा धनुर्वेद और रामायण व महाभारत में है।
भारत के पुराणकालीन इतिहास में धनुर्विद्या के प्रताप से अर्जित विजयों के लिए राम व अर्जुन का नाम सदा आदर से लिया जाएगा। पश्चिमी विद्वान विलसन का कथन सच है कि भारतीयों ने बहुत ही परिश्रम और अध्यवसाय पूर्वक धनुर्विद्या का विकास किया था। वे घोड़े पर सवार होकर बाण चलाने से सिद्धहस्त थे। धनुष बाण की एक विशेषता यह थी कि इसका उपयोग चतुरंगिणी सेना के चारों अंग कर सकते थे। भारत में धनुष की डोरी जहां कान तक खींची जाती थी, वहीं यूनान में सीने तक ही खींची जाती थी।
अग्नि पुराण में धनुर्विद्या की तकनीकी बारीकियों का विस्तारपूर्वक वर्णन है। बाएं हाथ में धनुष और दाएं हाथ में बाण लेकर, बाण के पंखदार सिरे को डोरी पर रखकर ऐसा लपेटना चाहिए कि धनुष की डोरी और दंड के बीच बहुत थोड़ा अवकाश रह जाए। फिर डोरी को कान तक सीधी रेखा से अधिक खींचना चाहिए। बाण छोड़ते समय बहुत सावधानी बरतनी चाहिए। किसी वस्तु विशेष पर बाण का लक्ष्य करते समय त्रिकोणात्मक स्थिति में खड़े रहना चाहिए। धनुर्विज्ञान में इसके अतिरिक्त अन्य स्थितियों का भी उल्लेख है, जो निम्नलिखित हैं:-
समपद या खड़ी स्थिति, में पैर, हथेली, पिंडली और हाथ के अंगूठे एक दूसरे से घने सटे रहते हैं।
वैशाख स्थिति में पंजों के बल खड़ा रहा जाता है, जांघे स्थिर रहती हैं और दोनों पैरों के बीच थोड़ी दूरी रहती है।
मंडल में वृत्ताकार या अर्धवृत्ताकार स्थिति में खड़ा रहा जाता है। इस स्थिति में वैशाख स्थिति की अपेक्षा पैरों में अधिक अंतर रहता है।
आलीढ़ स्थिति में दाईं जांघ और घुटने को स्थिर रखकर बाएं पैर को पीछे खींच लिया जाता है।
प्रत्यालीढ़ उपर्युक्त स्थिति से विपरीत स्थिति है।
स्थानम् में अंगुलियों के बराबर स्थान घेरा जाता है, अधिक नहीं।
निश्चल स्थिति में बाएं घुटने को सीधा रखा जाता है और दाएं घुटने को मुड़ा हुआ।
विकट स्थिति में दायां पैर सीधा रहता है।
संपुट में दोनो टांगें उठी हुई और घुटने मुड़े होते हैं।
स्वस्तिक स्थिति में दोनों टांगें सीधी फैली होती हैं और पैर के पंजे बाहर की ओर निकले होते हैं।

बाण चलाते समय धनुष को लगभग खड़ी स्थिति में पकड़ते हैं, जैसा आज भी होता है और तदनुसार ही अंग को ऊपरी या निचला तीर यदि लक्ष्य के केंद्र से नीचे बेघता है, तो लक्ष्यविंदु लक्ष्य की ओर और वह यदि केंद्र से ऊपर पड़ता है, तो लक्ष्यविंदु धनुर्धारी की ओर खिसकना चाहिए। धनुष के सिरों पर सींग या लकड़ी से अधिक मजबूत और टिकाऊ किसी अन्य पदार्थ को जड़कर, सिरों को दृढ़ बनाया जात हा है। डोरी को मजबूती से चढ़ाने के लिए सिरों पर खांचा होता है।
बाण को छोडऩे से पहले उस प्रत्यंचा पर रखकर साधने के लिए बाण पर भी खांचा बना रहता है। प्रत्यंचा खींचते समय धनुष की पीठ उत्तल और पेट अवतल होता है। धनुष के मध्यभाग में, जो दृढ़ होता है और मोड़ा नहीं जा सकता, धनुष की मूठ होती है। मूठ के ठीक ऊपर एक ओर अस्थि, सीग या हाथीदांत की बाणपट्टिका जड़ी होती है। बाण को पीछे की ओर तानने पर पट्टिका पर बाण फिसलता है और बाण को छोडऩे से पहले इसी पर उसका सिरा स्थिर होता है। प्रत्यंचा के दोनों सिरों पर फंदे होते हैं, जिनसे वह दोनों सिरों पर दृढ़ता से आबद्ध होती है। निर्मुक्त धनुष को मोड़कर, फंदे को ऊपर सरकाकर, ऊपरी खांचे में गिराने की क्रिया को धनुष कसना कहते हैं।
धनुष को प्राय: इतनी लंबी डोरी से कसते हैं कि कसने की ऊंचाई, यानी डोरी से मूठ के भीतरी भाग तक की दूरी, धनुर्धर के खुले अंगूठे सहित मु_ी के बराबर हो। धनुर्धर के डीलडौल पर निर्भर यह दूरी छह और सात इंच के बीच होती है। जिस समय धनुष का उपयोग नहीं करना होता है उस समय इसकी विपरीत क्रिया करके धनुष को ढीला कर देते हैं और इस प्रकार उपयोग के समय ही धनुष तनाव की स्थिति में रहता है।