सरस्वती नदी का मूल उद्गम एवं मार्ग

सरस्वती नदी का मूल उद्गम एवं मार्ग

डॉ. हेमेन्द्र कुमार राजपूत
लेखक इतिहासकार हैं।

भारतवर्ष की प्राचीन नदियों में से प्रमुख नदी सरस्वती ही थी, यद्यपि वर्तमान समय मे सरस्वती नदी लुप्तावस्था में है। ब्रह्मा जी ने मानव सृष्टि का आरम्भ सरस्वती नदी तट पर किया था। ब्रह्मा जी की पत्नी सरस्वती के नाम पर ही इस नदी का नामकरण हुआ था। ऋग्वेद भी इसी नदी के तट पर रचा गया है। वैदिक संदर्भो के अनुसार सरस्वती हिमालय से निकलकर राजस्थान के समुद्र में मिलती थी।
महाभारत से प्रतीत होता है कि उस काल में सरस्वती लुप्त होने लगी थी। इसलिए तो उसे दृश्यादृश्य नदी भी कहा गया था। इसके सूखने का कारण भूगर्भीय परिवर्तन था। लगभग 1990 वर्ष ई. पूर्व में सरस्वती नदी पूर्णतः सूख गई थी। वर्तमान सुरसुती नदी ही सरस्वती थी जो थानेश्वर नगर के पश्चिम में बहती हुई पटियाला जिलान्तर्गत, पश्चिम-वहिनी घग्घर नदी से मिलती है तथा हिसार से होकर गुजरती है। यह भटनैर के निकट बालू में विलुप्त हो जाती है।
महाभारत युद्ध के समय सरस्वती का प्रवाह कालीबंगा और अनूपगढ़ तक था। बलराम जी ने उसकी तीर्थयात्रा की थी। सरस्वती के तटवर्ती प्रदेशों में महाभारत पूर्व की सघन बस्तियों और महाभारत में वर्णित समुन्नत नगर व्यवस्था के दर्शन होते है।
सरस्वती नदी का तटीय प्रदेश उपजाऊ एवं हरा-भरा था। महाभारत में इसके तटवर्ती विशाल क्षेत्रा में काम्यक वन, द्वैतवन एवं कारप वन थे। कारप वन सिरमौर की पहाड़ियों से अम्बाला तक विस्तृत था। काम्यक वन सरस्वती के पश्चिमी भाग के कुरुक्षेत्रा से मध्य राजस्थान तक व्याप्त था और द्वैतवन सरस्वती के पूर्वी तटीय क्षेत्रा में मध्य राजस्थान से उत्तरी गुजरात तक के प्रदेश में फैला था इसके उत्तर में पुष्करारण्य और दक्षिण-पश्चिम में अर्बुदारण्य था। हरियाणा में इस नदी के दक्षिण प्रदेश में रोहितकारण्य था। कुरुक्षेत्रा के उत्तर में पुण्यशीत वन था। महाभारत काल में इसका प्रवाह बीकानेर से दक्षिण-पूर्व होकर दक्षिण की ओर था। महाभारत इसके प्रवाह की स्थिति को स्वयं सिद्ध करता है। वनवास के समय पाण्डव गंगा नदी तट के प्रमाण कोटि वृक्ष (शुुक्र ताल, मुज्जफरनगर, उ.प्र) से पश्चिम की ओर चले, यमुना नदी को पार करके काम्यक वन में पहुँचे। अतः सिद्ध होता है कि कुरुक्षेत्रा जनपद में सरस्वती प्रवाहित थी। महाभारत के उल्लेख के अनुसार चितांग या चित्रारंग नदी को दृषद्वती और माकैण्डा नदी को ही सरस्वती प्रमाणित किया जा सकता है। मार्कण्डेय ऋषि ने सरस्वती नदी तट पर पाण्डवों को प्रवचन दिया था, तब से यह माकैण्डा कहलाती है।
काम्यक वन से मरुभूमि (बीकानेर) के पास से होते हुए दक्षिण मे पाण्डवों ने द्वैतवन में प्रवेश किया। वहाँ, सरस्वती नदी के तटवर्ती वन में पाण्डव विहार करने लगे। सरस्वती नदी तीन स्थानों पर पुनः प्रकट हुई, वे हैं-चमसोद्भेद, शिरोद्भेद एवं नागोद्भेद। सरस्वती नदी के विलुप्त होने के स्थान उद्पान तीर्थ, नैमिषीय कुंज और विनशन तीर्थं थे। सतलज और यमुना के मध्य ब्रह्मावर्त का वर्णन मिलता है। मनुस्मृति और महाभारत में इसका बालू में विलुप्त होना वर्णित है जो कि सिरसा के पास विनशन तीर्थ कहा जाता है। विनशन में लुप्त होकर पुष्कर में प्रातः प्रकट होने और आगे बहकर पुनः लुप्त होकर सौराष्ट्र में फिर से प्रकट होने और आगे बहते हुए सोमनाथ के पास समुद्र में गिरने का वर्णन है। अलबेरूनी के अनुसार भी सर्सती नदी सोमनाथ के पूर्व में एक तीर की मार के अन्तर पर समुद्र में गिरती है। प्रभास क्षेत्रा में अपने डेल्टाई प्रदेश मे वह पाँच धाराओं-हरिणी, वज्रिणी, न्यंकु, कपिला और सरस्वती में विभक्त होकर लवणोद्धि-रत्नाकर (अरब सागर) में प्रविष्ट हुई है।
वर्तमान घग्घर एवं मार्केण्डा नदियाँ ही संयुक्त रूप से सरस्वती थी। पैहोवा के पास आगे चलकर घग्घर मार्केण्डा में मिल जाती है। सरस्वती नदी एवं इसकी सहायक हाकरा नदी के सूखने का कारण कम वर्षा नही था अपितु सतलज नदी के प्रवाह में परिवर्तन था। सतलज नदी की एक शाखा का जल निरन्तर हाकरा नदी को प्राप्त होता रहता था। इसके मध्य भू-उत्थान होने से हाकरा को जल मिलना बन्द हो गया अतः मरुभूमि पार करने के लिए सरस्वती नदी ने दृश्यादृश्य रूप प्रकट करना प्रारम्भ किया सम्भव है कि कुरुक्षेत्रा का सन्निहत ताल एवं राजस्थान का पुष्कर ताल इस नदी के छोड़े हुए सरोवर है। सरस्वती नदी अपनी सहायक (शिरा) नदियों के अभाव में लुप्त हो गई। वैदिक साहित्य में शुतुद्रि का रूपान्तर शतदु है। शतद्रु नदी मानसरोवर के पश्चिम में रावणह्रद (रकस) नामक झील से निकलती है। पूर्वकाल में शुतुद्रि एवं विपाशा अलग-अलग प्रवाहित होकर सिन्धु नदी में मिलती थी किन्तु भूगर्भीय म्रशोत्थ होने से शुतुद्रि (सतलज) व्यास नदी में मिल गई है। कालान्तर में सरस्वती नदी का प्रवाह पूर्व की ओर हटता गया और बीकानेर से दक्षिण की और प्रवाहित हो गया। वर्तमान में राजस्थान की लूनी नदी भी सरस्वती के प्रवाह का शेष भाग है। कच्छसागर के उथला होने से इसका प्रवाह सोमनाथ की ओर अग्रसर हुआ। इसी प्रकार भौगोलिक परिवर्तन इस नदी के उत्तरापथ में भी हुआ था। कुरुक्षेत्रा से 26 किलोमीटर पश्चिम में प्राचीन सरस्वती नदी तट पर पृथूदक नगर था। अतः वर्तमान का पेहोवा नगर ही पृथूदक है । यह नगर कितना प्राचीन है इसकी जानकारी इसके टीलों से मिलती है। इस प्रकार वर्तमान की मार्केण्डा नदी ही मुख्य सरस्वती थी।
विमल चरण लाहा इसके विषय में उल्लेख करते है-’’पूर्व वैदिक काल की सरस्वती नदी को मिलिन्दपन्हों ग्रन्थ में हिमालय से निकलने वाली नदी कहा गया है। इसका उद्गम स्थल हिमालय पर्वत श्रेणी में शिमला पहाड़ी के ऊपर बताया गया है। दक्षिण की ओर उन्नत धरातल बनाती हुई यह शिमला और सिरमौर से होकर बहती है । यह पटियाला में (घग्घर के रूप में) बहते हुए सिरसा से कुछ दूर राजपूताना के मरुस्थल के उत्तरी भाग में विनष्ट हो जाती है। दृषद्वती नदी यमुना के अधिक निकट बहती है। इसका स्रोत सिरमौर की पहाड़ियों में खोजा जा सकता है। मध्य तक इसका प्रवाह पश्चिम की ओर है और यहाँ से दक्षिण की ओर बहती है। चितांग नदी ही दृषद्वती थी।
महाभारत के उल्लेखानुसार सौगन्धिक वन के आगे सरिताओं में श्रेष्ठ और नदियों में उत्तम सरस्वती देवी का उद्गम स्थान है, जहाँ वह प्लक्ष (पकड़ी) नामक वृ़क्ष की जड़ से टपक रही है ? वहाँ एक बाबी (गुफा) से जल निकलता है इसे ही प्लक्ष प्रक्षवण कहा जाता था। यह सौगन्धिक वन शिमला के पूर्व में स्थित था इससे पलाश वन भी कहा गया है। एक सौगन्धिक वन मानसरोवर के पश्चिम में भी वर्णित है। पलाश वन के उत्तरपूर्व में विशाखयूप वन है।
इस प्रकार सरस्वती नदी का उद्गम स्थल शिमला जिलान्तर्गत शिमला के उत्तर-पूर्व में हिमालय की बागी पर्वत श्रेणी में है जहाँ बागीगिरि हिमानी का प्रवाह रहता है। इस नदी को गिरि नदी कहते है। गिरि नदी में दोनों और से कई नदियों आकर मिलती है। सब का जल लेकर यह दक्षिण-पश्चिम की ओर बहते हुए दक्षिण-पश्चिम में यह दक्षिण की ओर में ददाहु के दक्षिण-पश्चिम में यह दक्षिण की ओर मुडकर सिरमौर-नाहन की घाटी में बहते हुए नाहन के पूर्व में पहाड़ियों की घाटी से होकर दक्षिण में मार्केण्डा नदी थी। किन्तु भूगर्भीय उत्थान-पतन से इसका मार्ग बदल गया। नाहन शहर के उत्तर-पूर्व की ओर ददाहु के दक्षिण-पश्चिम में भ्रशोंत्थ हुआ और ददाहु के पूर्व में भूमि का तल निम्न हो जाने से इसका प्रवाह पूर्व की और होकर यमुना में मिल गया। अन्यथा यह गिरि नदी सरस्वती के रूप में नाहन की शिवालिक श्रेणी की घाटी से होकर दक्षिण में अम्बाला जिले के पूर्वी भाग में बहते हुए कुरुक्षेत्रा जिले में शाहवाद के पास से होते हुए, पेहोवा के निकट से निकलकर कैथल जिले के पास से प्रवाहित होते हुए पटियाला जिले के दक्षिण में शतरना के पास घग्घर (सरस्वती की दूसरी शाखा) इसमें मिलकर, संयुक्त धारा के रूप में सिरसा जिले की ओर प्रवाहित होती थी। दृषद्वती (चितांग) नदी का उद्गम स्थल शिवालिंक श्रेणी में नाहन की पहाडियों का पूर्वी भाग है। वासुदेव शरण अग्रवाल और कान्ति किशोर भारतिया भी इन दोनों नदियों का उद्गम नाहन की पहाडियों में मानते है।
इस प्रकार सरस्वती नदी का मूल उद्गम स्थल 31 डिग्री 13 उत्तरी अक्षाशं और 77 डिग्री 13 पूर्वी देशान्तर पर निश्चित किया जा सकता है। महाभारत के अनुसार सरस्वती नाम की सात नदियां और भी है जो इस सारे जगत में फैली हुई है। उन सबके नाम इस प्रकार है- सुप्रभा, कांचनाक्षी विशाल मनोरमा, सरस्वती, औघवती, सुरेणु और मिवलोदका। गान्धार क्षेत्रा में भी कुरुक्षेत्रा की भाँति एक सरस्वती नदी थी, जिसे आज हेलमेद कहते है। महाभारत काल में वह हेमा नाम से विख्यात थी। एक सरस्वती नदी व्यास गुफा से भी सम्बंधित है जो बद्रीनाथ के उत्तर-पश्चिम में है।
जब कौरव-पाण्डव युद्ध समाप्त हो चुका था तब महर्षि कृष्ण द्वैपायन व्यास ने पूर्ण रूपेण समाहित मन से ध्यानावलोकित निर्मल बुद्धि और स्वस्थ सर्जन शीलता से अतुल महिमा से सम्पन्न शुक्ला सरिता सरस्वती के किनारे इस महाभारत नाम वाले एक लाख श्लोकों के अद्भुत ग्रन्थराज की सृष्टि की थी। यह कुरुक्षेत्रा वाली सरस्वती नदी नहीं थी। बल्कि अलकनंदा की सहायक ब्रदीनाथ के उत्तर में माना से आने वाली सरस्वती नदी थी। आज भी इसे सरस्वती कहते है। कुरुक्षेत्रा में सरस्वती को ओधवती और हिरमयी भी कहते थे। इसी प्रकार हिमालय क्षेत्रा में विमलोदक और पुष्कर क्षेत्रा में सुप्रभा नाम से भी सरस्वती नदी विख्यात थी।