वाम मार्ग आधुनिक समाज का असली चेहरा

आनंद कुमार

जैसे और क्षेत्रों में समूह-दल होते हैं, वैसे ही लेखन में भी होते हैं। संगठित क्षेत्रों में तो राजनैतिक और गैर राजनैतिक हितों की रक्षा के लिए ऐसे संगठनों-दलों का होना आम बात है। जो लेखन का क्षेत्रा है उसे संगठित मजदूरी का क्षेत्रा नहीं कह सकते। फिर भी ऐसे लेखकों के संघ होते हैं। जिनका ऐसे संघों से जुड़ाव नहीं रहा, वो एकाकी लेखक आम तौर पर हाशिये पर डाल दिए गए हैं। ऐसे ही लेखकों में से एक हैं गुरुदत्त। अपने जीवन काल में उन्होंने करीब दो सौ किताबें लिखीं। इनमें समाजशास्त्रा, धर्म जैसे विषयों की किताबों के अलावा कई उपन्यास भी थे। लेकिन लेखकों के दलों की आयातित विचारधारा के बदले वे भारतीयता और हिंदुत्व के ज्यादा करीब थे।
जाहिर है वामपंथी विचारों के आलोचक होने के कारण उनकी किताबों को दबाये रखने का हर संभव प्रयत्न किया गया। उनकी आलोचनाएँ नहीं लिखी गई, तथाकथित प्रगतिशील लेखकों की जमात में उन किताबों पर चर्चा नहीं हुई। आम जन को उनकी किताबें याद रही, इसलिए पाठकों की वजह से ही उनकी किताबें आज भी पढ़ी-खरीदी जाती हैं।
कई लोग लेफ्टिस्ट(वामपंथी) विचारधारा को एक नया सिद्धांत मानते हैं जिसका उदय फ़्रांसिसी क्रांति के काल में हुआ। लेकिन सच ये है कि उस दौर में सिर्फ उनका नामकरण लेफ्ट के तौर पर हुआ था। उस दौर की फ्रांससी संसद में सामंती व्यवस्था के लोग दाहिनी तरफ बैठते थे और किसान-मजदूर वर्ग के लोग बायीं तरफ। दोनों में वैमनस्य ऐसा था कि वो एक दुसरे का नाम भी नहीं लेते थे। ऐसे में किसी बात का जवाब देने के लिए कहा जाता था, ‘पर्सन ऑन माय राईट’ या ‘पर्सन ऑन माय लेफ्ट’। अख़बारों में जगह बचाने के लिए इसी को छोटा कर के लेफ्ट-विंग और राईट-विंग कहा जाने लगा।
विचारों के तौर पर देखें तो मार्क्स के विचार उनके काफी पहले के हेगल के दिए हुए सिद्धांत हैं। वास्तव में देखें तो ये आज के किसी ‘पार्लियामेन्टरी सिस्टम’ की उपज नहीं, वामपक्षीय विचार-धारा के लोग तो मानव-इतिहास के आदि काल से चले आ रहे हैं। जब से मनुष्य ने अपनी निज की, समाज की तथा संसार की समस्याओं पर विचार करना आरम्भ किया है, तब से ही दो प्रमुख विचार मनुष्य के मन को आन्दोलित करते रहे हैं। वर्तमान और भविष्य ये उन दो विचारधाराओं की धुरी रहे है।
जो सिर्फ आज की सोचें ऐसे ‘ऋण कृत्वा घृतं पिवेत’ की नीति पर चलने वाले, केवल वर्तमान की ओर ध्यान रखने वाले, लोग हमेशा रहे हैं। उनकी नजर का दायरा कभी पैदा होने से मरने तक के आगे बढ़ ही नहीं पाया। संसदीय राजनीति में भी वामपंथी केवल आज की जीत को देखते हैं। कल क्या होगा ये नहीं सोचने का नतीजा आज के बंगाल में तीन दशकों के वामपंथी शोषण के बाद भी स्पष्ट दिखता है। वामपंथियों को देरी भी बर्दाश्त नहीं होती, सोशल मीडिया के इस दौर में अक्सर इन्हें टू मिनट नूडल कहकर भी बुलाया जाता है। उन्हें सफलता में देरी जब बर्दाश्त नहीं होती तो वो क्रांति की मांग करते भी दिखते है। उचित और अनुचित उपायों का विचार, या कहिये की नैतिकता की बातों को वो दकियानूसी मानते हैं। इस वजह से इनके शासित इलाके सबसे भीषण नरसंहारों के भी क्षेत्रा रहे हैं।
इसके विपरीत राईटिस्ट (दक्षिण-पंथीय विचार के लोग) समय को चक्रीय, और अपने जीवन काल को केवल एक हिस्सा मानते हैं। इनके विचार थोड़े गंभीर और समय काल फैला हुआ होता है। कामयाबी के लिए उनमें घबराहट, या जल्दबाजी नहीं दिखेगी। आधुनिक वैज्ञानिक तरीकों को देखें तो सिक्स सिग्मा के नाम से जाना जाने वाला तरीका भी यही कहता है। हड़बड़ी में कोई काम पांच मिनट में पूरा कर के उसे गलत करने से बेहतर है कि सात मिनट लगा कर उसे ढंग से किया जाए। इस से दोबारा गलत को सही करने में लगा पांच मिनट बचेगा। दो बार में एक ही काम करने की निराशा नहीं होती। इसके अलावा सात मिनट में आराम से ढंग से काम करने पर दो बार में करने के दस मिनट नहीं लगते तो तीन मिनट का समय भी बचता है।
दक्षिणपंथी ना तो सफलता के लिए अनुचित उपायों के हिमायती होते हैं, ना ही वो क्रान्ति को जरूरी या फायदेमंद मानते हैं। नतीजे किसी भी तरह से तरीकों को उचित या अनुचित नहीं ठहराते। निजी उन्नति, अंततः समाज की भी उन्नति होगी। नेहरु युग की ऊपर से छन-छन कर नीचे आती उन्नति के बदले वो सबसे निचले स्तर पर एक एक व्यक्ति की उन्नति से पूरे समाज की उन्नति में विश्वास रखते हैं। ऐसे ही विचारों को लेकर ये उपन्यास ‘वाममार्ग’ बरसों पहले गुरुदत्त ने जब लिखा था तो कई लोगों को इस से काफी असहमति रही। समय के साथ जैसे जैसे वामपंथी शासन के नतीजे समाज पर नजर आने लगे वैसे वैसे ये किताब भी सच्ची प्रतीत होने लगी। अपराध और पाप के अंतर को दर्शाता ये उपन्यास भले ही काल्पनिक पात्रों को लेकर गढ़ा गया हो, मगर इस से किताब की प्रासंगिकता पर कोई असर नहीं पड़ता।
धर्म व्यक्ति के आचरण का समाज के निर्माण पर असर दिखाता है। अगर आप धर्म का अध्ययन करते हैं तो ये चीज़ दिखेगी। रिलिजन शब्द की उत्पत्ति रेलीगेयर से हुई है जिसका अर्थ है बांधना। जब इसकी तुलना नवीन वामपंथियों ने अपनी विचारधारा से की तो उन्होंने अपनी विचारधारा को तो मुक्त करने वाला बता दिया। इसके साथ मगर वो ये बताना भूल गए कि धर्म उन्मुक्त करता है और वो रिलिजन शब्द का सही अनुवाद नहीं है। ऐसे एक नहीं कई सैद्धांतिक भेद हैं जो वामपंथ और दक्षिण पंथ में होते तो हैं मगर चालाकी से वामपंथ ने कभी उनके बारे में बताया ही नहीं।
‘वाममार्ग’ नाम का ये उपन्यास कई ऐसे सवालों की तरफ ध्यान दिलाता है जिनपर चर्चा नहीं हुई है। उपन्यास की शक्ल में, ये संवादों में, घटनाओं में संसार को एक क्षणभंगुर बुलबुले से अलग एक सतत प्रवाह की तरह दिखा जाता है। शरीर से आगे आत्मा, और जीवन-मरण के आगे के अनश्वर तत्व की और ‘वाममार्ग’ एक इशारा है। मुश्किल से मुश्किल घड़ी में भी उतावली की जरूरत नहीं होती। गलत तरीकों के नतीजे कभी भी अच्छे नहीं होते। अभी तुरंत फल ना भी मिले तो ठीक पेड़ों जैसा, कर्म कभी सालों में अंकुरित होगा, बढ़ेगा और आज नहीं तो कल उसका फल होगा,, ये कर्मफल का सिद्धांत इस उपन्यास की रीढ़ जैसा है। इसे और ऐसे ही धर्म के कई गूढ़ विषयों को ‘वाममार्ग’ रोचक ढंग से समझाती है।
सालों पहले लिखी गई ये किताब अब भी प्रकाशन में है, ये इसके पाठक वर्ग का होना ही सिद्ध करता है। किताब ऑनलाइन भी मंगवाई जा सकती है, इस से धीरे धीरे इसकी पहुँच बढ़ रही होगी। गुरुदत्त की सभी पुस्तकें निम्न पते से मंगाई जा सकती हैं –
हिन्दी साहित्य सदन, शॉप न. दो, बी डी चैम्बर्स, 18/54, देशबंधु गुप्ता मार्ग, करोगबाग, नई दिल्ली-110005
फोनः 011-23553624, 9213527666