भारतीय ज्ञान को उभारती पुस्तकें

आशुतोष कुमार सिंह
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।


पुस्तकों को इंसान का सबसे अच्छा दोस्त माना गया है। कहा जाता है कि एक अच्छी एवं सार्थक पुस्तक आपकी जिंदगी की दिशा को बदल सकती है। वर्तमान समय में पुस्तकों के साथ हमारी दोस्ती कुछ कम-सी होती जा रही है। पुस्तक पढऩे की आदत छूटती जा रही है। एक दौर था, जब बस-ट्रेन में बैठे हुए यात्रियों के हाथ में पुस्तकें दिखती थीं। अच्छा साहित्य पढऩे की लोगों में ललक थी। बच्चों की बात की जाए तो विज्ञान प्रगति, नंदन, चाचा चौधरी, बालहंस, हंसती दुनिया, चकमक, बाल प्रहरी, बालवाणी, बाल भास्कर, अनुराग एवं बच्चों का देश जैसी तमाम पत्रिकाएं थीं, जो बच्चों के बालमन को एक नई दिशा देती थीं। इसमें से आज भी बहुत से पत्रिकाएं छप रही हैं लेकिन आज के बालकों की प्राथमिकता में ये पत्रिकाएं नहीं है। न ही अभिभावकों को इसकी चिंता है कि उनका बालक किस तरह का साहित्य पढ़ रहा है या नहीं पढ़ रहा है।

बचपन में मैंने देखा है कि मेरे बड़े भैया शहर से कोई एक अच्छी किताब लाते थे तो वह किताब पूरे टोले-मुहल्ले में बंटती रहती थी। उपन्यास के नायकों पर वे आपस में बातचीत किया करते थे। हिन्दी साहित्य के प्रति एक विशेष अनुराग देखने को मिलता था। पुस्तकों के प्रति वह स्नेह कहीं खो-सा गया है। गांव जाता हूं तो देखता हूं कि आज के बच्चे ‘क्रिकेट-मोबाइल-यूट्यूब’ के कुचक्र में फंसे हुए हैं। साल-दो साल के बच्चों को भी अभिभावक मोबाइल खेलने के लिए दे रहे हैं। उनको खेलने के लिए यूट्यूब खोलकर थमाया जा रहा है। इन तमाम प्रचलनों को देखकर यह अनुमान लगाना सरल है कि पुस्तकों के प्रति जो लगाव इंटरनेटी दुनिया के पूर्व हुआ करता था, वह अब नहीं रह गया है।

नब्बे के दशक में एक अमेरिकी विचारक सैमुएल हंट्टिंगटन ने सभ्यताओं के संघर्ष का विचार दिया था। अमेरिका और यूरोपीय देश जैसे आज के विकसित समझे जाने वाले देश इस विचार को सत्य मानते हैं। इस विचार का सच केवल इतना है कि ईसाइयत और इस्लाम दोनों राजनीतिक मजहबों ने विश्व भर की सभ्यताओं को नष्ट करने का प्रयास किया। सभ्यताओं का असली संघर्ष यही है जो कि पिछले दो हजार वर्षों से विश्व में चल रहा है। भारत में यह संघर्ष अधिक तेज दिखता है क्योंकि यहाँ के लोगों ने इन दोनों ही राजनीतिक मजहबों के सामने घुटने नहीं टेके। यदि इस्लाम की तलवार से उन्होंने संघर्ष किया और उन्हें मुँहतोड़ उत्तर दिया तो ईसाइयत की मिशनरियों द्वारा रचे गए बौद्धिक मायाजाल को नष्ट करने के लिए प्रखरतम बौद्धिक कर्म भी किए। वह बौद्धिक कर्म आज तक जारी है। दुर्भाग्य यह है कि देश का संविधान ईसाइयत से प्रभावित है और उसके पालनकर्ता संसद और उसमें बैठे नेता इसे सेकुलरवाद के नाम पर अपनाए बैठे हैं। ऐसे में भारत और भारत की आत्मा से जुड़े बौद्धिक कार्यों को देश के अकादमिया जो कि इस सेकुलर दिखने वाले ईसाई संविधान के कब्जे में है, में कोई स्थान नहीं दिया जाता। ऐसे बौद्धिक कार्य जो कि भारत के सभ्यतागत संघर्ष को मजबूत करते हैं और भारत के सही पक्ष को सामने रखते हैं, सामान्यत: उपेक्षित किये जाते हैं। इसलिए आवश्यक है कि ऐसी पुस्तकों को पढ़ा जाए, उन पर चर्चा की जाए, उनके विचारों को प्रसारित किया जाए।

आज देश में अनेक बौद्धिक विमर्श हैं जो केवल भारतविरोध में चलाए जा रहे हैं। उदाहरण के लिए दलित विमर्श है। दलित विमर्श की चिंता दलितों के उत्थान की कम और समाज को तोडऩे की अधिक दिखती है। उदाहरण के लिए दलितों के राजनीतिक मसीहा माने जाने वाले कांशीराम ने एक टेलीविजन में दिए गए साक्षात्कार में कहा था कि उनका काम राजनीतिक अस्थिरता बनाए रखना है, न कि स्थिर सरकार बनाना। यदि हम दलित विमर्श के पीछे की फंडिंग को देखें तो हमें ध्यान में आएगा कि अधिकांश दलित लेखन के पीछे विपुल मात्रा में विदेशी धन लगा हुआ है। दलित लेखन और बौद्धिकता प्रकारांतर से देश में हिंसक नक्सली गतिविधियों को न्यायोचित ठहराती है। इसे ही आज शहरी नक्सववाद के नाम से जाना जा रहा है।

कुछ ऐसी ही स्थिति स्त्री विमर्श की भी है। यूरोप में जो स्त्री विमर्श ईसाइयत का विरोधी था, भारत में वह स्त्री विमर्श ईसाइयत का समर्थक और हिंदुत्व का विरोधी है। इसका कारण एक तो यूरोपीय संदर्भों को भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखने की जड़ता है और दूसरा कारण है यूरोप और अमेरिका का सभ्यतागत संघर्ष में आक्रामक भूमिका। भारतीय परंपराएं दोनों के ही निशाने पर हैं। इसलिए शबरीमलै की परंपरा को तोडऩा यदि स्त्रियों का अधिकार का प्रश्न है तो बुर्का पहनना मुस्लिम स्त्रियों के निजत्व का मामला हो जाता है। यह दोहरापन तमाम बौद्धिक कर्मों में झलकता है।

आज की स्थिति यह है कि भारत की प्राचीन परंपरा और इतिहास को हीन, लज्जास्पद और पिछड़ा बताने वाली पुस्तकें तो बाजार में भरी पड़ी हैं। जो लोग भारतीय संस्कृति के व्या याकार बताए जाते हैं, वे भी वास्तव में अपनी अज्ञानता तथा पूर्वाग्रह के कारण उसे कमतर ही दिखा रहे होते हैं। उदाहरण के लिए हम देवदत्त पटनायक, अमीश त्रिपाठी जैसे अंग्रेजी लेखकों की पुस्तकें देख सकते हैं। भारतीय पौराणिक कहानियों पर आधारित इनके उपन्यास और पुस्तकें भारतीय संस्कृति को प्रकारांतर से हल्का ही दिखलाती हैं।

इस विषम परिस्थिति में भी बहुत से लेखक भारतीय परंपरा के पक्ष में निरंतर बौद्धिक कर्म में जुटे हैं। इनमें से बहुत ऐसे हैं जो शुद्ध रूप से लेखक हैं, परंतु बहुत से ऐसे भी हैं जो पेशे से कुछ और होते हुए भी कलम के सिपाही बने हुए हैं। अनेक चिकित्सक, व्यवसायी, इंजीनियर आदि ने इन बौद्धिक चुनौतियों का सामना करने के लिए कलम उठा रखा है। वे पुस्तकें लिख रहे हैं, उनका प्रकाशन कर रहे हैं और साथ ही दृढ़ता तथा आक्रामकता के साथ अपनी बात को रख रहे हैं। स्वाभाविक ही है कि भारत के अकादमिया में इन्हें बहुत महत्त्व नहीं दिया जाता, परंतु इनकी पुस्तकें न केवल पर्याप्त से अधिक संदर्भों से युक्त हैं, बल्कि वे आज प्रचलित बौद्धिक धाराओं पर गंभीर प्रश्न भी खड़े करती हैं। आज आवश्यक है कि ऐसी पुस्तकों को खोज कर पढ़ा जाए। उनका प्रचार-प्रसार किया जाए। इससे समाज में एक न केवल बौद्धिक संतुलन लाना संभव होगा, बल्कि भारत के पक्ष को उभारना भी सरल हो पाएगा।

बौद्धिक संघर्ष के इस दौर में इंटरनेट भी एक बड़े माध्यम के रूप में उभरा है। इंटरनेट ने जहाँ एक ओर बौद्धिक अधिनायकत्व को नष्ट कर दिया है, वहीं दूसरी ओर इसने एक बौद्धिक कूड़ेदान भी बना दिया है। आज के समय पर इंटरनेट सूचनाओं का एक बहुत बड़ा ‘कबाडख़ाना’ बन चुका है। इस कबाडख़ाने से अपने काम की सूचना निकाल पाना आसान काम नहीं है। इंटरनेट पर ज्ञान के नाम पर इतना कूड़ा-कचरा डाला गया है कि ज्ञान की खोज करने वाला व्यक्ति पूरा इंटरनेट खंगालने के बाद ‘भ्रम-ज्ञानÓ लेकर लौटता है। इंटरनेट का जो मास्टरमाइंड है वह चाहता है कि आप संवेदनशून्य हो जाएं और उसके ‘आर्थिक साम्राज्यवाद’ का एक सशक्त सिपाही बनें। आपको याद होगा 2003-4 का वह दौर जब आपके हाथ में 500 रूपये के बदले मोबाइल थमा दिया गया था और कहा गया था कि ‘कर लो दुनिया मु_ी में। इस स्लोगन को आपने अपने तरीके से समझा। आपको लगा कि मोबाइल कंपनी आपको संबोधित करते हुए आपसे कह रही है कि कर लो दुनिया मु_ी में। लेकिन असलियत यह नहीं है। सच्चाई यह है कि वह कंपनी आपको यानी आप जैसे करोड़ो लोगों को अपनी मु_ी में करना चाहती थी। और उसने कर लिया। फिर उस मोबाइल में आपका बटुआ अटैच्ड हो गया। आपको इंटरनेट का डाटा बहुत सस्ता मिलने लगा। अब आप बाजार द्वारा परोसे जा रहे कचरा सामान, कचरा ज्ञान के चंगुल में फंसते चले गए। और आज स्थिति यह है कि आपके एक क्लिक पर आपके घर, वह हर समान पहुंच जाता है, जिसे आप अपने स्थानीय बाजार में जाकर खरीदते थे। आपको आलसी बना दिया गया। आपको समाज से काट दिया गया। आपको आर्थिक रूप से गुलाम बना दिया गया। और आप यह सोचते रहे कि आप विकास की राह पर लंबी छलांग लगा रहे हैं।

खैर, मैं बात कर रहा था, पुस्तक संस्कृति की। इस संस्कृति की लोप होने के कारणों की। ऊपर के बातों से यह तो साफ हो गया कि किस तरह ‘आर्थिक साम्राज्यवादÓ के चंगुल में हम फंस चुके हैं। आप पाठको से एक सवाल पूछना चाहता हूं। आप ठीक से याद कीजिए कि किताब की दुकान पर गए हुए आपको कितने दिन हुए। विगत पांच वर्षों में आपने किताब की दुकान से कितनी किताबे खरीदी है? आपके जवाब का मुझे इंतजार रहेगा। इस बावत दिल्ली के कई मित्रो से मैंने यही सवाल पूछा। उनका जवाब था कि इंटरनेट के जमाने में किताब की दुकान पर कौन जाता है। दूसरे का जवाब था कि मुझे पागल कुत्ते ने काटा है कि मैं किताब की दुकान पर जाऊं। सभी से हुई बातचीत का परिणाम यह है कि वे लोग अपने मोबाइल पर इंस्टॉल ई-वेबसाइटों, मसलन फ्लिपकार्ट, अमेजन जैसी कंपनियों से किताब मंगवा लेते हैं। वह भी भारी छूट पर।

आर्थिक रूप से देखा जाए तो प्रथम दृष्टया यही लगेगा कि इंटरनेट से किताब मंगा लेना एक सस्ती प्रक्रिया है। लेकिन इन सबके बीच में जो हमसे छूट गया वह है- ‘अच्छा एवं सार्थक साहित्य’। हम बाजार के भुलावे में इस कदर अंधे हो गए कि हम कबाड़ उठाकर लाते हैं और यह समझ बैठते है कि इससे अच्छा साहित्य तो कुछ हो ही नहीं सकता। जब एक पाठक एक किताब की दुकान पर जाता है तो वह तमाम तरह की किताबो को स्वयं उलट-पलट के देख सकता है। उसके कंटेंट के समझ सकता है। साथ ही वह एक किताब खरीदने जाता है तो एक दो और किताब खरीद कर लाता है। इस प्रक्रिया से पुस्तक-संस्कृति को विस्तार मिलता था। लेकिन अब ऐसा नहीं है। पाठको की इसी नासमझी के कारण कितनी दुकाने बंद हो चुकी हैं। जो बची हैं वो भी बंद होने की कगार पर हैं।

एक बात और है जिसे ठीक से समझने की जरूरत है। इंटरनेट पर जितनी भी ई-कॉमर्स की साइटे चल रही हैं। उसमें से ज्यादातर विदेशी हैं। उनको इस बात से कुछ भी लेना देना नहीं है कि भारतीय संस्कृति, संस्कार एवं संवाद का विस्तार हो रहा है कि नहीं। इन वेबसाइटों पर आ जाएंगे तो ऐसे हजारो साहित्य आपको मुफ्त में मिल जाएंगे जिनका मकसद भारतीयता को नीचा दिखाना है अथवा एक खास धर्म, संप्रदाय का प्रचार करना है। पिछले दिनों मैंने एक प्रकाशक से बातचीत की थी। उन्होंने कहा कि ये जितनी ऑनलाइन कंपनियां है, उनका एकमात्र मकसद लाभ कमाना हैं। उन्होंने अपनी पीड़ा साझा करते हुए कहा भी ये कंपनियां उनके यहां से छपी ऐसी किताबें जो भारतीयता को मजबूत करती हैं, जो भारत को एक सकारात्मक नजरिए से प्रस्तुत करती हैं, उनका डिस्प्ले अपनी वेबसाइट पर ठीक से नहीं करती हैं। बीच-बीच में अगर किताब का डिमांड बढता है तो उस किताब के डिस्प्ले को हटा भी देती हैं।

ऐसे में भारत को वैश्विक मंच पर स्थापित करने वाले साहित्य के लिए इन कंपनियों के पास स्पेस नहीं है। और रहे भी क्यों? उनका मकसद भारतीयता का प्रचार-प्रसार तो है भी नहीं। इन तमाम ट्रेंड्स को देखने के बाद मुझे लगता है कि भारत एक तरह से ‘सांस्कृतिक आक्रमणÓ का शिकार हो रहा है। यहां पर ध्यान देने वाली बात यह है कि भारत एक मिश्रित अर्थव्यवस्था वाला देश है। ऐसे में यहां का बाजार बहुत ही विकेन्द्रित है। इन कंपनियों के आने से सारा बाजार इनके इर्द-गिर्द केन्द्रित होता जा रहा है। छोटे-मझोले दुकानदारों को रोजी-रोटी के लाले पडऩे लगे हैं। जिस दिन ये कंपनियां हमारे पूरे घरेलु बाजार को निगल जाएंगी, उस दिन ये कितना बड़ा आर्थिक दैत्य बनकर उभरेंगी इसका अंदाजा सहज लगाया जा सकता है।

इससे बचने का उपाय तो यही हैं कि हम इन कंपनियों के चंगुल से बाहर निकलें। अपनी पुस्तक-संस्कृति को आगे बढ़ाएं। इंटरनेट का प्रयोग केवल उन पुस्तकों को खोजने के लिए करें, जो सामान्यत: उपलब्ध नहीं हैं और जिनको पीडीएफ के रूप में इंटरनेट पर नि:शुल्क डाला गया है। ऐसी कई वेबसाइटें हैं, जहाँ लाखों पुस्तकें नि:शुल्क उपलब्ध हैं। परंतु यदि आपको पुस्तक खरीदनी हो तो जबतक आवश्यक न हो, इंटरनेट पर खरीदने से बचें। पुस्तकें खरीदें या नि:शुल्क डाउनलोड करें, उन्हें स्वयं पढ़ें और अपने मित्रो को भी पढऩे के लिए आमंत्रित करें। पुस्तकों को ऑनलाइन ऑर्डर न कर के किताबों की दुकानों पर जाएं ताकि हम अपनी ज्ञान-परंपरा से दूर न हो सकें। नहीं तो एक दिन ऐसा आएगा हमारी नई पीढ़ी भारत रहकर यूरोप का गुणगान गाएगी और भारतीयता की बात करने वालों को बेवकूफ, भक्त या पागल समझेगी।