वसंत ऋतु स्वस्थ रहने के लिए पंचकर्म कराईए

डॉ. दीप नारायण पाण्डेय
लेखक इंडियन फारेस्ट सर्विस में वरिष्ठ अधिकारी हैं।


कम से कम पांच हज़ार वर्ष पूर्व का एक गहन विचार-विमर्श है, जो भारत के दो धुरंधर आयुर्वेदाचार्यों के मध्य हो रहा था। देखिये ”हे भगवन! निश्चित ही आपने सभी रोगों की चिकित्सा के रूप में पूरे पंचकर्म या इसके अलग-अलग घटकों को कहा है। लेकिन, हे चिकित्सक श्रेष्ठ! क्या ऐसा कोई रोग है जो चिकित्सा से तो साध्य है, पर पंचकर्म से ठीक नहीं होता हो?”—अग्निवेश ने अपने महान गुरु आत्रेय से पूछा। ”हाँ, है। ऊरुस्तम्भ।”—आत्रेय का उत्तर था।
यहां दो स्पष्ट संदेश हैं। ऊरुस्तम्भ के बारे में तो उत्तर स्पष्ट ही है और उस पर हम कभी और चर्चा करेंगे। पर अग्निवेश और आत्रेय की इस चर्चा में एक गहरा सन्देश तमाम रोगों के विरुद्ध पंचकर्म और इसकी घटक क्रियाओं की विशाल प्रयोज्यता और उपयोगिता के बारे में है। जब रोगों के उपचार या स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की बात आती है, तो आयुर्वेदिक पंचकर्म के टक्कर की और कोई विधि नहीं है। सभ्यताओं के विनाश काल में भी, अगर आदमी मौत के मुंह में जाने का काम ही न कर रहा हो, तो पंचकर्म सबसे दुरुस्त चिकित्सा है। (च.वि.3.13)
वसंत ऋतु आने वाली है और यह समय होगा जब आप पंचकर्म या ऋतुचर्या के अनुसार कम से कम पंचकर्म के एक घटक, वमन का प्रयोग कर सकते हैं। इस पर आगे चर्चा करते हैं। आइये वसंत के कुछ लक्षण देखते हैं। हेमन्त तथा शिशिर ऋतु में शरीर में संचित कफ, वसन्त ऋतु में सूर्य की गर्मी से कुपित होकर, जठराग्नि को बाधित करता है जिसके कारण उनके कफज व्याधियां उत्पन्न हो सकती हैं। अत: कफ को निकालने के लिए वसन्त ऋतु में शिरो विरेचन, वमन, कवल-धारण आदि का प्रयोग करना स्वास्थ्य के लिये लाभकारी रहता है। इसके साथ ही उबटन, गुनगुने पानी का प्रयोग, उद्यानों एवं वनों में घूमना, पैदल चलना तथा शारीरिक व्यायाम भी बसंती-ऋतुचर्या के उपयोगी आयाम हैं। पुष्पित पल्लवित वनों में इनका अनुभव लेना चाहिये।
वसन्त ऋतु में बहुत मीठा, स्निग्ध, अम्ल, देर से पचने वाले गुरू आहार तथा दिन में सोना ठीक नहीं रहता। इसका मूल कारण यह है कि हेमन्त और शिशिर ऋतु में संचित कफ अपने आप में एक समस्या है, और यदि कफ वृद्धि करने वाले ये सभी कार्य किये जायें तो आगे चलकर बीमार होने की आशंका रहती है।
वसन्त ऋतु में खाद्य पदार्थ के रूप में सबसे उत्तम जौ, गेहूं, शहद, ईख, अंगूर आदि उत्तम हैं। अंगूर या महुवा से बने हुये स्वच्छ औषधीय-आसव व अरिष्ट वसन्त ऋतु में लिये जा सकते हैं। साठी के चावल, शीत द्रव्य, मूंग, निवारी के चावल, कोदो तथा मूंग की दाल के सूप, बैंगन, पटोल आदि तिक्त रस वाले द्रव्यों का उपयोग उत्तम रहताहै। वसन्त ऋतु में तीक्ष्ण, रुक्ष, कटु, क्षार, कषाय रस वाले पदार्थो में जौ, मूंग और मधु मिलाकर भोजन के रूप में लेना उपयोगी है।
आयुर्वेद में वसंत ऋतुचर्या का बड़ा रोचक वर्णन है जो आधुनिक आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टि से पूर्ण साम्यता रखता है। वनों और कानन में जहां ठण्डी हवा, जल से भरे हुये तालाब, विविध प्रकार की जैव-विविधता वाले पुष्प-वृक्षों की प्रजातियाँ एवं विविध प्रजातियों के पक्षियों की कलरव ध्वनि हो, वहां समय बिताने के लिये वसन्त ऋतु सर्वोत्तम है। आधुनिक वैज्ञानिक शोध में उपवन, हरियाली, पार्कों या बागीचों के स्वास्थोपयोगी प्रभाव पर पूरी दुनिया में बहुत शोध हुये हैं। परन्तु प्राकृतिक-तन्त्रों, वनों एवं जैव विविधता क्षेत्रों में स्वास्थ्य पर पडऩे वाले प्रभाव पर सबसे महत्वपूर्ण और प्राचीन निष्कर्ष चरक संहिता, सुश्रुत संहिता और अष्टांग हृदय में ही उपलब्ध हैं। इस विषय में आधुनिक शोध का इतिहास बहुत पुराना नहीं है परन्तु जो कुछ भी उपलब्ध हैए उससे आयुर्वेद में दी गयी सलाह की पुष्टि ही होती है। अत: वसंत ऋतु में प्राकृतिक स्थलों का आनद लेना स्वास्थ्यवर्धक है।
जहाँ तक पंचकर्म का प्रश्न है,क्या आपको सचमुच इसकी जरूरत है? इसका दुरुस्त आंकलन आपके आयुर्वेदाचार्य आपके लिये कर सकते हैं। लगभग पांच वर्ष पूर्व एक माह से अधिक समय तक चलने वाली पंचकर्म चिकित्सा का आनंद मैंने लिया था। हाल ही में चक्रपाणि आयुर्वेदा जयपुर में लम्बे समय के कार्यरत आयुर्वेदाचार्य डॉ. लक्ष्मी अनूप, जिन्हें आयुर्वेद की उत्तर-भारतीय और दक्षिण-भारतीय विधाओं की गहरी समझ है, और उनकी टीम के साथ विचार-विमर्श हुआ। इस गहन परामर्श से मुझे पुन: लगा कि मैं भी उस श्रेणी में अपने आपको गिन सकता हूँ जिन्हें पंचकर्म से स्वास्थ्य को यथावत बनाये रखने और उम्र-आधारित रोग-जनन को दूर रखने में मदद मिलेगी। मेरी तरह आप भी उनमें से एक हो सकते हैं।
पंचकर्म वैसे तो शारीरिक-मानसिक शोधन और रोग शमन दोनों में मददगार है, पर पहली बात यह है कि आप सबकी तरह मैं भी निरंतर स्वस्थ रहना चाहता हूँ। अन्य शब्दों में, मैं बार बार बीमार होकर दवाओं में अपना धन नष्ट नहीं करना चाहता। बीमारी में धन की बर्बादी के साथ जो शारीरिक-मानसिक पचड़ा-परेशानी होती है वह तो अतिरिक्त है। अत: सदैव स्वस्थ बने रहने के लिये साल में एक बार पंचकर्म करना सबसे उपयुक्त है।
दूसरी बात यह है कि सघन चिकित्सा इकाई में कोई नहीं मरना चाहता। जीवन के अंतिम दिन तक, स्वस्थ रहना है तो आयुर्वेद के रसायन बड़ी मदद करते हैं। पर बिना शोधन क्रिया कराए रसायनों को लेने का मतलब वैसा ही है जैसा पुराने कम्बल को रंगना। रसायन उम्र-आधारित रोग-जनन रोकने या दर्द-निवारण में तभी सक्षम होते हैं जब पहले पंचकर्म से शोधन कराया जाये। नियमानुसार पंचकर्म, रसायन और वाजीकर का प्रयोग करने से धातुसाम्य बना रहता है, रोग नहीं होते, धातुयें बढ़ती हैं इसलिये बूढ़े होने की गति धीमी हो जाती है। (च.सू.7.48-49)
तीसरी बात यह है कि वैसे तो पंचकर्म की कुछ क्रियाएं दिनचर्या और ऋतुचर्या का अंग हैं, पर हम प्राय: उन्हें भुला देते हैं। जीवन शैली ऐसी हो गई है कि तीनों दोष कुपित रहते हैं। जानबूझ कर लापरवाही करना और इंद्रियों के सामंजस्य के विरुद्ध संयोग हमारी आदत हो गये हैं। हमारा समय त्रिदोष-भड़काऊ काल है। ऐसी स्थिति में अनेक रोगों की रोगों की शुरुआती अवस्था दिखने लगती है, तब होश आता है कि पंचकर्म तो हमारे लिये ही है।
ऋतुचर्या में पंचकर्म की क्रियायें तो उपयोगी हैं ही, पर साथ ही आयुर्वेद का सिद्धांत यह है कि बहुदोष के लक्षण दिखें तो समझिये पंचकर्म की जरूरत आ पड़ी। या तो बीमार होइये या पंचकर्म कराइये और स्वस्थ रहिये। तात्पर्य यह समझिये कि अपच, आहार-अरुचि, मोटापा, पांडुता, भारीपन, थकावट, पिडका कोठ और कंडू (तरह तरह की फुंसियाँ), स्तम्भ, अरति, आलस, श्रम, कमजोरी, शारीरिकदुर्गन्ध, अवसाद, कफ व पित्त का भड़कना (उत्क्लेश),नींद उड़ जाना या खूब नींद आना, तन्द्रा (उनींदापन या हमेशा औंघाते रहना), क्लैब्य, अबुद्धि की स्थिति, उल्टे-पुल्टे सपने आना, और पौष्टिक आहार लेते रहने के बावजूद बल और रंग उडऩा बहुदोष के लक्षण हैं। ऐसे लोगों के लिये पंचकर्म या संशोधन हितकारी होता है। अनुभवी और कुशल चिकित्सक रोगी के दोष स्थिति एवं बल को समझकर चिकित्सा की सलाह देगा एवं शोधन करायेगा। (च.सू.16.13-16)
एक और सिद्धांत है। मेरे विचार से जीवन और मृत्यु के मध्य सात रक्षा दीवारें हैं: आहार, विहार, सद्वृत्त, स्वस्थवृत्त, पंचकर्म, रसायन/वाजीकर, औषधि। इनमें से शुरू की छ: दीवारें स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य-रक्षण में मदद करती हैं। और सभी सात दीवारें या सुरक्षा कवच मिलकर रोगी को स्वस्थ करने में मदद करती हैं। जब आहार, विहार, सद्वृत्त वस्वस्थवृत्त की सुरक्षा दीवार को ठीक से प्रतिदिन न सम्हाला गया हो तो पंचकर्म की जरूरत पड़ जाती है। इसके बाद, जीवन और मृत्यु के बीच रसायन और औषधि की दीवारें ही शेष बचती हैं।
जहाँ तक पंचकर्म में अभी तक प्रकाशित शोध का प्रश्न है, शोधकर्ताओं को पंचकर्म की समग्रता में शोध करना होगा। अभी प्राय: जो शोध हो रही है उसमें पंचकर्म की समग्रता और अखंडता की उपेक्षा ही दिखाई पड़ती है। पंचकर्म पर वैज्ञानिक अनुसंधान हेतु ऐसी विधियां अभी तक विकसित नहीं हो पायी हैं, जिनका उपयोग कर पंचकर्म के सभी पहलुओं की विविधता और प्रत्येक पहलू के क्रियान्वयन को समाहित कर वाञ्छित प्रश्नों के निर्विवाद उत्तर प्राप्त किये जा सकें। इसके बावजूद अभी तक जो शोध है वह निर्विवाद रूप से रोगों के उपचार और स्वास्थ्यरक्षण में पंचकर्म की उपयोगिता यथावत सिद्ध करती है। संहिताओं, विज्ञान और अनुभव में कोई विरोधाभासी प्रमाण नहीं मिलते।
अंत में पांच हजार साल पहले हुए गुरु-शिष्य संवाद का एक रोचक दृष्टांत पुन: देखते हैं। अग्निवेश ने पूछा: ”भगवन्! मनुष्य की आयु निश्चित होती है या नहीं?ÓÓ (किन्नु खलु भगवन्! नियतकालप्रमाणमायु: सर्वं न ति)। आत्रेय का उत्तर था: ”अग्निवेश! समस्त प्राणियों की आयु युक्ति की अपेक्षा करती है।ÓÓ हम सबके लिये सन्देश यह है कि जल, वायु, मिट्टी और ऋतुओं के प्रदूषण काल में भी मृत्यु की तिथि तय नहीं है। आयु युक्ति की अपेक्षा करती है। युक्ति से आप स्वस्थ रह सकते हैं। युक्ति से आपकी आयु बढ़ाई जा सकती है।