भारतीय संग्रहालय और उपनिवेशवाद

भारतीय संग्रहालय और उपनिवेशवाद

समीक्षक
किसी भी देश की कला, संस्कृति और इतिहास की प्रदर्शनी वहाँ के संग्रहालय होते हैं। संग्रहालय यानी एक ऐसा स्थान जहाँ उस देश अथवा स्थान के सांस्कृतिक तथा ऐतिहासिक महत्व के पुरातात्विक अवशेषों का संग्रह एकत्र हो। आम तौर पर ऐसे अवशेषों में सिक्के, पुरानी मूर्तियां, पुराने औजार तथा हथियार आदि होते हैं। परंतु क्या हमें यह पता है कि संग्रहालयों का प्रारंभ कब से और क्यों हुआ? क्या हमें यह पता है कि भारत में वर्तमान में जो भी संग्रहालय हैं, उनका विकास प्रमुखत: यूरोपीय लोगों ने किया था और उसके पीछे उनके कुछ निहित स्वार्थ भी था? क्या हमने कभी सोचा है कि हमारी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर की प्रदर्शनी होने के बाद भी देश का आम आदमी इनसे जुड़ाव या लगाव अनुभव क्यों नहीं करता? कुछ ऐसे ही प्रश्नों का उत्तर तलाशती है देश के एक अत्यंत मेधावी युवा इतिहासकार डॉ. आनंद बर्धन की पुस्तक – कोलोनियल म्युजिय़म्स, एन इनर हिस्ट्री।
यह पुस्तक ब्रिटिश शासन के दौरान संग्रहालयों का इतिहास प्रस्तुत करती है। इस क्रम में डॉ. आनंद बर्धन ने भारतीय संस्कृति, इतिहास और कलाओं के प्रति यूरोपीय दृष्टिकोण को भी प्रस्तुत किया है। उल्लेखनीय है कि पंद्रहवीं शताब्दी के अंत में वास्को डी गामा के भारत आने के बाद से पूरे यूरोप में भारत आने और यहाँ के धन-वैभव को पाने की होड़ लग गई थी। यूरोप के सभी देशों में ईस्ट इंडिया कंपनियां स्थापित होने लगी थीं। हम जिस ईस्ट इंडिया कंपनी से अधिक परिचित हैं, वह इंग्लैंड की ईस्ट इंडिया कंपनी थी, परंतु उससे पहले भारत में फ्रासीसी, डच, पुर्तगाली, डेनिश, जर्मन आदि कई ईस्ट इंडिया कंपनियां भी काम कर रही थीं। इन सभी में काफी लड़ाइयां हुआ करती थीं जिसमें अंतत: इंग्लैंड की ईस्ट इंडिया कंपनी विजेता रही।
इन सभी यूरोपीय देशों की कंपनियों में भले ही व्यापारिक झगड़े होते रहे हों, परंतु इन सभी देशों का भारत में एक ही काम था और वह काम था यहाँ के धन-वैभव के साथ-साथ यहाँ के ज्ञान-विज्ञान को यूरोप पहुँचाना और भारत को एक पिछड़ा, अविकसित और आदिम देश साबित करके उसके ईसाइकरण का मार्ग प्रशस्त करना। इसके लिए उन्होंने ढेर सारे प्रयास किए। इस क्रम में जो भी किले और खंडहर आदि उनके कब्जे में आए, वहाँ उन्होंने सोने के सिक्के और मूल्यवान मूर्तियों की खोज में खुदाई करनी शुरू की। प्रारंभ में तो वे इस प्रकार की खुदाई से प्राप्त सारी सामग्री अपने देश ले जाया करते थे, परंतु कालांतर में विद्रोह होने की आशंका प्रबल होने पर उन्होंने यहाँ संग्रहालय बनाने प्रारंभ किए। अ_ारहवीं शताब्दी तक यूरोपवासियों का पेट काफी कुछ भर चुका था और इसलिए उनका ध्यान अपने उपनिवेशों के लंबे समय तक मानसिक रूप से गुलाम बनाए रखने के उपायों पर गया। इसके लिए जहाँ शिक्षा एक महत्वपूर्ण हथियार था, वहीं उन्होंने कला और संस्कृति के स्तर पर संग्रहालयों को विकसित किया।
यह देखना महत्वपूर्ण है कि यूरोपीयों ने अपना पक्ष और विपक्ष दोनों ही खड़ा किया। पक्ष तो वे थे ही, विपक्ष के तौर पर प्राच्यविदों की एक लंबी परंपरा खड़ी की गई। डॉ. आनंद बर्धन ने इस संघर्ष और प्राच्यविदों पर भी प्रश्न खड़े करने वाले पॉलिनस जैसे अप्रसिद्ध यूरोपीय यात्रियों का प्रासंगिक उल्लेख किया है। डॉ. बर्धन ने म्युजियम शिक्षा पर औपनिवेशिक प्रभावों और विभिन्न अंग्रेज अधिकारियों द्वारा खड़े किए गए विभिन्न संग्रहालयों का विस्तृत विवेचन किया है। इसी क्रम में उन्होंने लगभग भुला दिए गए राजा सरफोजी और भाई दाजी लाड जैसे भारतीय नामों और उनके योगदान को भी प्रमुखता से प्रस्तुत किया है।
यह पुस्तक न केवल औपनिवेशिक काल में भारत में विकसित किए गए संग्रहालयों का इतिहास प्रस्तुत करती है, बल्कि यह उनके पीछे की औपनिवेशिक मानसिकता को भी उजागर करती है और साथ ही उनकी कमियों को भी सामने लाती है। यह भारत के सांस्कृतिक संघर्ष को भी पर्याप्त प्रमाणों और साक्ष्यों के साथ प्रस्तुत करती है। इस पुस्तक को पढऩे से हमें यह स्पष्ट हो सकता है कि आज के संग्रहालय भारतीय जन-मन को आखिर क्यों नहीं छूते हैं और यदि उन्हें भारतीय मानस से जोडऩा है तो हमें क्या करना होगा। कुल मिला कर कहा जा सकता है कि यह पुस्तक केवल संग्रहालयशास्त्र के छात्रों के लिए ही नहीं, बल्कि साथ ही इतिहास के छात्रों तथा देश की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत के संरक्षण की नीतियां बनाने वाले शासकीय नीतिकारों के लिए भी अवश्य पठनीय है, यो बिल्कुल भी अतिशयोक्ति नहीं होगी।
पुस्तक हालांकि अंग्रेजी में है, लेकिन इसकी भाषा काफी प्रांजल और सरल है, इसलिए अंग्रेजी की सामान्य जानकारी रखने वाले लोग भी इसे थोड़े प्रयास से पढ़ सकते हैं। पुस्तक हार्डबाउंड में है और इसलिए काफी मंहगी है। यदि इसका साधारण पेपरबैक संस्करण भी उपलब्ध हो सके तो अच्छा होगा। फिर भी जो इसे स्वयं नहीं खरीद सकते, वे इसे अपने पास के किसी पुस्तकालय में खरीदवा कर फिर पढ़ सकते हैं। भारतीय इतिहास के एक अनूठे पहलू से साक्षात्कार करने के लिए इतनी मेहनत तो करनी बनती ही है।