भारतीय रसायन की ज्ञान परंपरा

भारतीय रसायन की ज्ञान परंपरा

आशीष कुमार ‘अंशु’
लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।

रसायन और गणित दो ऐसे विषय हैं जो अधिक विद्यार्थियों को रूचिकर नहीं जान पड़ते और वे इन विषयों से बचकर निकल जाना चाहते है। यदि यह अनिवार्य पत्रा ना हो तो बहुत सारे छात्रा इसे पढ़ने से ही इंकार कर दें। संभवतः ऐसा इसलिए होता होगा क्योंकि हमारे पाठ्यपुस्तकों को तैयार करते हुए इस बात का ख्याल तैयार करने वालों नहीं रखा कि इसे छात्रों के लिए रूचिकर कैसे बनाया जाए।
उत्तर प्रदेश की प्रकाशन शाखा से छपकर आई 840 पृष्ठों की किताब ‘प्रचीन भारत में रसायन का विकास’ का 1960 में प्रकाशित पहला संस्करण जिस पर मूल्य 14 रुपए अंकित है, मेरे हाथ में है। हिन्दी समिति ग्रंथमाला की इस किताब के लेखक डॉ सत्यप्रकाश हैं। डॉ सत्यप्रकाश प्रयाग विश्वविद्यालय में रसायन शास्त्रा के प्राध्यापक रहे हैं। वे विज्ञान विषय के ख्यातिप्राप्त लेखक है। इनकी लिखी पुस्तकें केन्द्र सरकार और हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा पुरस्कृत हो चुकी हैं। इन्होंने लंबे समय तक ‘विज्ञान पत्रिका’ का संपादन किया है। विज्ञान परिषद की अनुसंधान पत्रिका के भी प्रधान संपादक रहे हैं। इस किताब को पढ़ते हुए एक बार भी नहीं लगा कि इसके लिए किसी पाठक की शैक्षणिक पृष्ठभूमि में रसायन शास़्त्रा के शामिल होने की आवश्यकता है।
प्राचीन भारत में रसायन के विकास को दर्शाने के लिए लेखक ने अलग अलग काल खंडों में अध्याय का विभाजन किया है। मसलन वैदिक काल और ब्राम्हण काल में रसायन की स्थिति, आयुर्वेद काल के बाद नागार्जुन काल और रसतंत्रा का आरंभ जैसे अध्याय भी इस पुस्तक में हैं। रसतंत्रा का उत्तरकाल और रसायन के मूलभूत दार्शनिक विचार पर भी इस पुस्तक में लंबी चर्चा है।
पुस्तक के लेखक का यह स्पष्टीकरण महत्वपूर्ण है कि ‘‘यह संभव नहीं है कि हम अपने साहित्य के रचयिताओं के कार्यकाल के निभ्रांत तिथि संवत दे सकें। हमारे लगभग समस्त ग्रंथों में प्रत्येक युग में कुछ ना कुछ हेर फेर होता रहा है और अपने प्राचीन ग्रंथकारों के जीवन वृत्त हमारे पास है ही नहीं।’’ वैसे रसायन के क्षेत्रा में भारतीय परम्पराओं पर केन्द्रित एक महत्वपूर्ण किताब आचार्य प्रफूूल्ल चन्द्र राय की ‘हिन्दू केमिस्ट्री’ है। श्री राय ने अपनी किताब मंे तांत्रिक रसायन को प्राथमिकता दी थी।
‘प्राचीन भारत में रसायन का विकास’ प्रस्तुत पुस्तक में वैदिक काल से लेकर 16वी-17वीं सदी तक की महत्वपूर्ण रसायन केन्द्रित गतिविधियों को समेटने का प्रयास किया गया है। इतने लंबे कालखंड के साथ एक किताब में न्याय कर पाना लेखक के लिए आसान नहीं रहा होगा। पुस्तक के अनुसार वैदिक काल का व्यक्ति ग्राम्य और वन्य दोनों प्रकार के जीवनों से परिचित था। पालतू पशु उसके पास थे और कृषि से प्राप्त सस्य और धान्य उसकी समृद्धि के साधन थे। एक जगह पर पुस्तक में अथर्ववेद से एक श्लोक को उद्धृत किया गया है- ‘‘यदन्नमद्यि बहुधा विरूपं हिरण्यमश्वमुत गामजामविम्’’ (6/71/1) लेखक के अनुसार यहां हिरण्य का अर्थ ऊंट है।
इस श्लोक का उल्लेख इसलिए क्योंकि भारतीय ग्रंथ अंग्रेजी में संस्कृत पढ़कर पीएचडी करने वाले अंग्रेज और भारतीय अंग्रेज मानसिकता वाले विद्वानों की गलत व्याख्या का सबसे बड़ा शिकार रहा है। भारतीय संस्कृत ग्रंथों के अनुवाद में ना सिर्फ उन्होंने मन मुताबिक उसका अनुवाद किया बल्कि असंख्य क्षेपक भारतीय ग्रंथों में शामिल कर दिए गए जो आज भी इन ग्रंथों को निथारने में लगे विद्वानों के लिए एक बड़ी चुनौती है और अंग्रेज मानसिकता से पोषित विचारधारा वालों को विवाद खड़ा करने की वजह मुहैया कराता है।
कवि उशना, वृहस्पति, सनत्कुमार, नारद, धन्वन्तरी (प्रथम) या आदिदेव, गर्ग, च्यवन, वरुण, जमदग्नि, वरुण, और काश्यप या वृद्ध काश्यप, इनका जिक्र चिकित्सा संबंधी प्राचीन वाड्मय में प्रचुर मात्रा में मिलता है। कवि उशना भृगुपुत्रा थे इसलिए उन्हें भार्गव भी कहा गया और कवि उशना का एक नाम शुक्र भी है। जो व्यक्ति कवि उशना के सबंध में इन सभी संदर्भाे को नही जानेगा, वह अर्थ का अनर्थ करें तो क्या आश्चर्य। कवि उसना असुरांे के पुरोहित भी थे जैसे वृहस्पति देवों के पुरोहित थे। अष्टांगहृदय या अष्टांगसंग्रह के समय तक औषधियों को तैयार करने में उन्हीं सरलतम प्रक्रियाओं का प्रचलन था, जिसकी नीवं वैदिक काल अथवा ब्राम्हणकाल में पड़ चुकी थी। ऊर्ध्वपातन भभके में उड़ाकर आसव या अरिष्ट का चुआना आदि की विधियां उस समय तक प्रचलित न हो पाई थीं।
पुस्तक में कुछ यंत्रों का भी परिचय मिलता है, जो पाठकों के लिए रूचिकर होगा। जैसे- चक्रयंच, एक ऐसा यंत्रा है जो कोल्हू के समान या पहिए के समान आकृति का है। पद्ययंत्रा कमल के आकार का है, पातालयंत्रा में पैंदी में छेद वाले एक पात्रा को दूसरे पात्रा पर रखते हैं। गड्ढे में धंसाकर ऊपर से कंडे की आंच देते हैं। गंधक, हरिताल आदि का इसमें शोधन होता है। इसी प्रकार पातनायंत्रा, भूधरयंत्रा, बालुकायंत्रा, वेणुयंत्रा, सारणायंत्रा, ज्वाला परीक्षण आदि का जिक्र आया है।
इस पुस्तक को पढ़ते हुए यह आभास होता है कि 17वी शती तक भारत में रसायन का स्वर्ण काल चल रहा था। लेकिन यह पुस्तक इस सवाल का जवाब नहीं देती कि 17वी शती के बाद भारतीय ज्ञान परंपरा में वह कौन सी घटना घटी थी, जिसने नए प्रयोगों से भारत को वंचित किया। आज इस सवाल का तार्किक और तथ्यात्मक उत्तर तलाशना शेष है।
फिलहाल यह पुस्तक केवल पुस्तकालयों में ही उपलब्ध है। परंतु प्रो. सत्यप्रकाश की ही भारतीय विज्ञान पर लिखी अन्य कई पुस्तकें उपलब्ध हैं। ‘प्राचीन भारत के वैज्ञानिक कर्णधार’ पुस्तकायन, 2/4240ए, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली से प्राप्त की जा सकती है। दूसरी पुस्तक ‘वैज्ञानिक विकास की भारतीय परंपरा’ www.archieve.org से डाउनलोड की जा सकती है।