भारतीय रसायनशास्त्र का इतिहास

भारतीय रसायनशास्त्र का इतिहास

आनंद कुमार
लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।
प्रफुल्ल चन्द्र रे रसायन शास्त्रा के प्रोफेसर थे। सन 1897 में रसायनशास्त्रा के ही एक विद्वान उनसे प्रेसीडेंसी कॉलेज कलकत्ता में जब मिलने आये तो वो उनसे भारतीय रसायनशास्त्रा पर किताब लिखवाना चाहते थे। अपने ही क्षेत्रा के एक विद्वान् की अपील पर प्रोफेसर पी.सी.रे ने “रसेन्द्र सार संग्रह” को आधार मानकर एक छोटी सी पुस्तिका 1898 में ही तैयार कर दी। अपनी इस किताब को पढ़कर प्रोफेसर पी.सी. रे की रूचि खुद ही हिन्दुओं के प्राचीन रसायनशास्त्रा के ज्ञान को दुनिया के सामने लाने में जाग गई। अब उन्होंने हिन्दुओं के रसायनशास्त्रा के ज्ञान को वृहद् रूप में दुनिया के सामने लाने की ठानी।
अपने शोध के लिए उन्होंने कविभूषण श्री राम पंडित नवकांत की मदद ली और चरक, सुश्रुत जैसे आयुर्वेद और रसायन के ग्रंथों से जानकारी इकठ्ठा की। जैसे जैसे काम आगे बढ़ने लगा, वैसे वैसे प्रोफेसर रे को समझ में आने लगा कि ये कोई छोटा मोटा काम नहीं है। करीब चार साल की मेहनत के बाद किताब का पहला भाग तैयार हुआ। इससे पहले कि किताब का दूसरा भाग तैयार हो पाता, पहले भाग की सारी प्रतियाँ बिक चुकी थी। पहले भाग का दूसरा संस्करण 1904 में निकालना पड़ा। जब तक 1909 में दूसरा भाग तैयार होता किताब लिखने की प्रेरणा देने वाले एम. बेर्थेलॉट गुजर चुके थे। उनकी प्रेरणा को याद करते हुए किताब का दूसरा भाग भी उन्हीं को समर्पित है।
दूसरे भाग को तैयार करने में जब प्रोफेसर पी.सी.रे को अपनी जानकारी कम लगी तो उन्होंने विक्टोरिया कॉलेज के प्रिंसिपल श्री ब्रजेन्द्र नाथ सील से भी मदद ली। दूसरे भाग में यांत्रिक और भौतिक रसायन से जुड़े हिन्दुओं के कई सिद्धांत उन्होंने लिखे हैं। इस किताब में उस दौर की ही भाषा का इस्तेमाल हुआ है जो पढने में थोड़ी कठिन लग सकती है। पुराने संस्करण होने के कारन फ्रांसीसी और ग्रीक भाषा के उद्धृत अंशों का अनुवाद भी नहीं है। उस दौर में रसायन के छात्रों को आम तौर पर बेर्थेलॉट, ब्लूमफील्ड, कोलब्रुक, गॉब्लेट जैसे कई लेखकों का लिखा और साथ ही विदेशी भाषाओं के हिस्से भी पढ़ने की आदत होती थी।
ब्रिटिश शासन में, उनकी ही नौकरी करते हुए भी लेखक ने किताब में कई कड़ी टिप्पणियाँ की हैं। उनकी रसायनशास्त्रा की जानकारी पर सवाल नहीं उठाये जा सकते इसलिए टिप्पणियों को भी मान्य करना पड़ता है। वो कोवेल आर गौघ जैसे तथाकथित विद्वानों के गलत अनुवादों को चुनकर बता देते हैं। साथ ही उन्होंने यूल की किताब मार्काे पोलो से निकाल कर योगियों का वर्णन भी अपनी बात के समर्थन में प्रस्तुत कर दिया है। पाश्चात्य विद्वानों के तर्कों के खंडन का तरीका उन्होंने काफी पहले ही सिखा दिया था। पिछले सौ सालों में हम कह सकते हैं कि हमारे विद्वान उसे बस भूलते-भुलाते रहे। उन्होंने हीरों के ज्वलन पर, सस्यका, गैरिका, कम्कुष्ट, वैक्रंता कई किस्म के अम्लों और क्षार, जेवर बनाने की प्रक्रिया में बंगाल में हो रही सोने की बर्बादी और हिन्दुओं और जापानियों के रस कपूर, मदिरा, और कज्जली बनाने की प्रक्रिया में होने वाले अंतर भी बताया है।
इतिहास की कम जानकारी और तारीखों का वैसा ही निर्धारण जैसा तात्कालिक विदेशियों ने किया था, ये उनकी किताब से स्पष्ट हो जाता है। उस समय तक प्राप्त जानकारी के आधार पर रसहृदय तंत्रा ग्यारहवीं सदी की रचना थी और गोविन्द भगवत बौद्ध थे। ऐसे कई मिथक बाद के शोध ने तोड़ दिए हैं। संस्कृत को पढ़ने में उन्हें होने वाली दिक्कतों की वजह से उन्हें कई दूसरे विद्वानों की मदद लेनी पड़ी थी। वो उद्देश्य (संक्षेप में मुद्दे को रखना), निर्देश (जिस मुद्दे को प्रस्तुत किया गया है, उसकी व्याख्या) और लक्षण (परिभाषा और सार) की प्रक्रिया को समझ नहीं पाते थे। चरक के आयुर्वेद के शास्त्रा से रसायनशास्त्रा की जानकारी को अलग निकालने में उन्हें खासी मुश्किल हुई होगी।
अगर विषों और उपविषों का हिस्सा छोड़ दें तो हिन्दुओं के रसायन के सभी मुद्दों को प्रोफेसर पी.सी. रे ने छुआ है। आज ये किताब प्रिंट में जरा मुश्किल से मिलती है। शोध के छात्रों के लिए ये एक महत्वपूर्ण किताब है। प्रोफेसर पी.सी.रे का काम इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि उनके काम की वजह से ही हिन्दुओं के रसायनशास्त्रा की कई पुस्तकें प्रकाश में आई। आम तौर पर बहुसंख्यक हिन्दुओं की रूचि धार्मिक विषयों पर भाव विभोर होने और आह वाह करने तक ही सीमित रही है। आज जैसे पी.सी.रे की खुद की किताब कम छपती है, वैसे ही शायद ये हिन्दुओं के रसायनशास्त्रा तो गायब ही हो गए होते।
किताब के पहले भाग की शुरुआत वेदों में रसायनशास्त्रा से होती है। शुरुआत में ही वेद से आयुर्वेद, फिर धीरे धीरे तंत्रा का उद्भव, बुद्ध से ठीक पहले के काल में रसायनशास्त्रा की जानकारी का अरब की ओर बढ़ना और फिर बुद्ध के शुरूआती समय में ही आणविक नियमों के बनने और तत्वों की जानकारी का जिक्र है। फिर ये किताब आयुर्वेद में कैसे चरक और सुश्रुत जैसे विद्वानों ने चकित्सा के लिए आयुर्वेद का इस्तेमाल किया इस बार में एक हिस्सा है। यहाँ आयुर्वेदिक काल में रसायन का जिक्र है। फिर आगे चलकर सिद्धयोग में वृन्द द्वारा और चक्रपाणी द्वारा सन 900-1000 के बीच रसायन का इस्तेमाल बताया गया है। सन् 1100 से 1300 के काल को पी.सी. रे तांत्रिक काल कहते हैं। इस दौरान तांत्रिकों ने रसायनशास्त्रा में काफी योगदान दिया। इसके बाद रसरत्न समुच्चय जैसी किताबें आई। धातुओं उनके निष्कासन विधियों पर, अम्ल और किस्म किस्म के क्षार, बारूद, कृत्रिम अम्ल ऐसे विषयों पर कई नोट किताब के अंत में दिए गए हैं।
कुल मिला कर ये कहा जा सकता है कि हिन्दुओं के विज्ञान और उसकी तरक्की का जो विदेशी शासन काल में दबाया गया, उसे दोबारा जीवन देने में इस किताब और लेखक का योगदान अभूतपूर्व है। इसकी ऑनलाइन प्रतियाँ भी उपलब्ध हैं। अगर विज्ञान में रूचि हो तो पुनर्जागरण करने वाली इस किताब को एक बार जरूर देखें। यह पुस्तक www.archieve.org से डाउनलोड की जा सकती है।