पंचतंत्र और फास्टफूड शिक्षा

राजीव रंजन प्रसाद
लेखक एनएचपीसी में इंजीनियर तथा प्रसिद्ध लेखक हैं।


देहरादून स्थित शैमरॉक प्री-स्कूल में मैने अपने बेटे का प्रवेश कराया था। प्री-स्कूल का अर्थ क्या है? विद्यालय में प्रवेश से पूर्व बच्चा खेले-कूदे, हमउम्र बच्चों के बीच मिले-जुले और इस तरह जो सिखाया जा सकता है उसी माध्यम से उसकी बुनियाद इस तरह गढी जाये कि अध्ययन में अभिरुचि हो। इसके ठीक उलट मुझे डायरी में बार बार नोट मिलते कि पालक ध्यान दें, बच्चा याद नहीं कर रहा है या कि स्कूल में आ कर मिलें। मैंने हाजिरी लगाई तो वही रोना फाईव फ्लावर याद नहीं हैं, फाईव एनिमल नहीं बोल पाता, फाईव प्लांन्ट्स के नाम याद कराईये। मैं देख रहा हूँ कि भारी बस्ते वाली पीढ़ी बढती ही जा रही है। ये कैसे प्ले स्कूल हैं और कैसे खेल खिला रहे हैं? बच्चा प्लांट की जगह पौधा समझे तो क्या दिक्कत? नयी पीढी से मुझे सहानुभूति है जिसे इस तरह पीसा जा रहा है मानो काले अक्षर नहीं भैंस हो। बच्चे की हिन्दी और अंग्रेजी विषयक किताबें पलटकर देखता हूँ तो कुछ जाना-पहचाना प्रतीत होता है। अंग्रेजी या कि हिन्दी की पाठ्य पुस्तक मे जो भी कहानियाँ हैं, सभी पंचतंत्र का ही विकृत अनुवाद भर तो है? नया क्या है? दो-ढाई हजार साल पुरानी सामग्री है यह जिसे मॉडर्न एज्यूकेशन के नाम पर रिमॉडल किया गया है। हमें क्या? बच्चा ऐसे नामी-गिरामी स्कूल में पढ रहा है न जिससे कि स्टेटस सिम्बल बनता हो? हम शिक्षा जगत के उन रंगे सियारों को अब भी नहीं पहचानते जिन्होने हमारे बच्चों को ट्विंकल-ट्विंकल लिटिल स्टार पोयम बाईहार्ट करा दिया है। सत्तर साल पहले ही अंग्रेज भारत से गये, अब तो मैकाले को कंधे से उतारा जाये?
आज पंचतंत्र से कौन परिचित नहीं? आज भी रचा जा रहा अधिकांश देसी-विदेशी बाल साहित्य पंचतंत्र की ही नकल है अथवा उससे प्रभावित। क्या वैदिक ज्ञान-परम्परा का विस्तार यह ग्रंथ बालक-शिक्षा किस तरह दी जा सकती है उसका श्रेष्ठतम उदाहरण नहीं है? बात भी लगभग 300 ईसा पूर्व की है। कहते हैं कि दक्षिण भारत में कहीं महिलारोप्य नाम का राज्य था जिसके राजा थे अमरशक्ति। दक्षिण भारत शब्द को दोहरा कर पढियेगा जिससे आपका यह पूर्वाग्रह कुछ हद तक मिटे कि ज्ञान के कतिपय उत्तर भारतीय केंद्र भर नहीं थे अपितु समस्त जम्बूदीप का अपने अपने तौर से योगदान रहा है। राजा के तीन बेटे थे – बहुशक्ति, उग्रशक्ति और अनंतशक्ति जो न केवल अहंकारी अपितु विद्या ग्रहण करने की ओर से उदासीन थे। राजा ने बहुत चेष्टा की लेकिन कोई पढना ही न चाहे तो कैसे पढाया जाये? यह सवाल ठीक इसी तरह आज भी सामने है, इसका उत्तर आधुनिक शिक्षकों के पास है कि पालकों को बुला कर जलील कर लो, बच्चे को कक्षा में हतोत्साहित कर दो, वगैरह वगैरह। क्या पढाया जाना चाहिये क्या इससे अधिक महत्वपूर्ण यह नहीं कि कैसे पढाया जाना चाहिये? राजा अमरशक्ति को सुझाया गया कि राज्य में विद्वान विष्णु शर्मा हैं जिनसे सहायता ली जा सकती है। राजा तो राजा है उसने विष्णु शर्मा को बुलवाया और सीधे ही सौदेबाजी कर डाली। सौ गाँव आपको दे दूंगा अगर राजकुमारों को आपने योग्य बन दिया। राजा ने प्रस्ताव दिया लेकिन शिक्षक तो फक्कड था। विद्यार्थी ले लिये, धन छोड दिया। क्यों पोथे-किताबें दिखा कर डराना? विष्णु शर्मा ने किस्सागोई का सहारा लिया। जो कुछ सिखाना था वह रोचक कहानियों में ढल गया। अब शास्त्र नहीं थे, सूत्र नहीं थे, प्रमेय नहीं थे अपितु शैतान बंदर था, चालाक लोमडी थी, दुष्ट भेडिया था मासूम मेमना था। जीवजगत के ये किरदार, नीति की वे शिक्षायें बन गये जो इस सृष्टि के रहने तक प्रासंगिक रहेंगी।
पाँच तंत्रों अथवा भाग में पंचतंत्र की कहानियाँ संकलित हैं – मित्रभेद, मित्रलाभ, संधि-विग्रह/काकोलूकियम (कौवे एवं उल्लुओं की कहानियाँ), लब्ध प्रणाश एवं अपरीक्षित कारक। मित्र कैसे होने चाहिये, मित्रता का लाभ क्या है, यदि आप किसी संकट में हैं तो उससे बाहर आने का रास्ता क्या है, किसी कार्य को करने से पूर्व क्या करें, कैसे परख करें आदि जैसे विषयों के माध्यम से प्राचीन पंचतंत्र ग्रंथ प्राथमिक शिक्षा का जांचा-परखा सर्वयुगीन सिलेबस है। विष्णु शर्मा के पास बीएड नहीं था। पढाने का कोई सरकारी प्रशिक्षण भी प्राप्त नहीं था। वे न तो ऑक्सफोर्ड रिटर्न थे न ही जेएनयू से पीएचडी। वे अलग थे, बिलकुल मौलिक। उन्होंने संस्थानों को रास्ता दिखाया है कि प्राथमिक शिक्षा कैसे दी जानी चाहिये। यह अलग बात है कि आज के स्कूली पाठ्यक्रमों ने उनकी नकल तो की लेकिन थोथा-थोथा भर, सार-सार को तो उडा दिया। कितने प्रतिशत भारतीय जानते हैं कि सचिन तेंदूलकर क्रिकेट के महानतम खिलाडी हैं? इस प्रश्न का उत्तर सौ बटा सौ मिल जायेगा लेकिन क्या हम भारत के लोग यह जानते हैं कि बाईबल के बाद दुनिया का सबसे अधिक प्रसार प्राप्त ग्रंथ है – पंचतंत्र। वह दुनिया की अभागी भाषा ही होगी यदि उसके पास पंचतंत्र का अनुवाद उपलब्ध नहीं है। विदेशी भाषा में पंचतंत्र का पहला ज्ञात अनुवाद 570 ई. में सिरियाई भाषा में हुआ था। लगभग 750 ई. में सीरियाई भाषा से अरबी में अब्दुल्ला इब्नल मोकफ्फा के प्रयासों से अनूदित हुआ। इसके पश्चात लगभग दसवी-ग्यारहवी सदी के अगमन तक यूरोप में पंचतंत्र अपनी पैठ जमाने लगा। यूनानी (ग्यारहवी सदी), हिबू्र (ग्यारहवी सदी), लैटिन (1263 से 1278 के मध्य), फारसी (1470 से 1505 के मध्य), जर्मन (1483), स्पेनिश (1493), इटालियन (1546), फ्रेंच (1556 तथा 1644), अंग्रेजी (1570) तथा इतालवी (1583) आदि पंचतंत्र के आरम्भिक विदेशी भाषा में किये गये अनुवाद थे। अनेक समकालीन अथवा बाद के भारतीय ग्रंथ भी पंचतंत्र की आभा में लिखे गये इनमें प्रमुखता से गिने जाते हैं – तन्त्राख्यायिका, दक्षिण भारतीय पंचतंत्र, नेपाली पंचतंत्र, हितोपदेश, सोमदेव कृत कथासरित्सागर, क्षेमेन्द्र कृत बृहत्कथा-मंजरी, पश्चिमी भारतीय पंचतंत्र, पूर्णभद्र कृत पंचाख्यान आदि।
पंचतंत्र को आज बाल-साहित्य की तरह देखा परखा जाता है जबकि आवश्यकता इसकी रचना प्रक्रिया और उसके उद्देश्य को समझने की है। विष्णु शर्मा ने राजा से उसके पुत्रों को शिक्षा देना स्वीकार किया तब कहा – ‘किंतु त्वत्प्रार्थना सिद्धयर्थे सरस्वती विनोद करिष्यामि’। सरस्वती विनोद शब्द पर ध्यान दीजिये। क्या विनोद-आनंद के साथ सरस्वती प्रदान करने का तरीका नहीं है पंचतंत्र? विषय कितना भी जटिल हो क्या उसे सरल तरीके से समझाने का तरीका पंचतंत्र में अंतर्निहित नहीं है? साथ ही फाईव एनिमल रटाने वाले अध्यापक ध्यान दें कि केवल पंचतंत्र को ही पढ़ाने पर आपका विद्यार्थी जाने कितने एनिमल, कितने ही बर्ड, कितने ही प्लांट वगैरह वगैरह के नाम ही नहीं जान सकेगा अपितु उसके माध्यम से उसे वे नैतिक शिक्षायें भी प्राप्त होंगी जो आज के फास्ट-फूड सिलेबस में कहीं पीछे छूट गयी हैं।