धर्म तथा समाजवाद

आनंद कुमार

अभी हाल में जब क्यूबा के तानाशाह फ़िदेल कास्त्रो की मृत्यु हुई तो कई लोगों का ध्यान क्यूबा की तरफ गया। एक अनोखी चीज़ जो वहां की अर्थव्यवस्था में दिखी होगी वो थी वहां कई डॉक्टरों का होना। इतने ज्यादा कि पड़ोसी देश वेनेजुएला से तेल के आयात पर विशेष छूट लेने के लिए क्यूबा अपने डॉक्टर निर्यात करता था। तेल के बदले मनुष्य? आश्चर्य हुआ सुनकर? इसे वहां के स्थानीय लोग अजीब नहीं मानते। इंसान भी आयात निर्यात की वस्तु हो सकता है ये पुराने दौर के गुलामी जैसी व्यवस्था लग सकती है। असल में देखा जाए तो पुराने गुलाम सिर्फ शारीरिक रूप से गुलाम थे। ये आज्ञा पालन तो करते थे, मगर चूँकि उनसे जबरन ऐसे काम करवाए जा रहे होते थे इसलिए उनके मन में कहीं ना कहीं विरोध की भावना होती थी।
अपनी किताब ‘धर्म तथा समाजवाद’ में लेखक गुरुदत्त कहते हैं कि कोई भी व्यक्ति जब भी दुसरे व्यक्ति से सम्बन्ध स्थापित करता है तो उसे धर्म, अर्थ और काम के नियमों से नियंत्रित होना चाहिए। कानून और नैतिकता सिर्फ इस दुनियां की बातें हैं ना कि ईश्वरीय निर्णय। इसलिए इन्साफ, या कहिये कि नैतिकता के कानून, किसी भी पंथ-सम्प्रदाय की स्थापना से पहले ही अस्तित्व में आ गए होंगे। जब ये पंथ किसी भी मुख्य धर्म का हिस्सा हो गए तो धीरे धीरे वो मजहबों का हिस्सा बने तो इनका भी धर्म में समावेश हुआ, लेकिन ये धर्म तो हरगिज़ नहीं थे। ऐसे ही अन्य समाज और धर्म के संबंधों पर आधारित किताब है ‘धर्म तथा समाजवाद’।
अब जब हम इन दोनों को मिला कर देखते हैं तो हमारा ध्यान जाता है कि जिस किस्म की मानसिक दासता की चर्चा क्यूबा के डॉक्टरों के लिए की जाती है वो तो शारीरिक दासता से भी कहीं घृणित है। यहाँ तो इंसान मन से भी परतंत्रा किया जा रहा है ! क्या ऐसा पहले भी हुआ है? कहीं और हुआ है? गुरुदत्त का कहना है कि हाँ, हुआ है। मुस्लिम आक्रमणों के दौर का भारत करीब हज़ार साल दास रहा। अलग अलग क्षेत्रों में बार बार इनके खिलाफ विद्रोह होते रहे। ये शारीरिक दासता थी। हिन्दू मुसलमान नवाबों और बादशाहों की नौकरी तो करते थे लेकिन उन्हें खुद से श्रेष्ठ नहीं मानते थे। इसकी वजह से लगातार सशस्त्रा विद्रोह होते रहे। शारीरिक दासता से मुक्ति के लिए स्थानीय शासक और आम जन लगातार विरोध करते रहे।
भारत में मानसिक दासता अंग्रेजों के डेढ़ सौ वर्ष के राज में ही आई। जहाँ इस्लामिक दासता में हिन्दू शारीरिक दासता में भी मानसिक दृष्टि से स्वतंत्रा थे, वहीं अंग्रेजी राजनैतिक शासन से 1947 में स्वतंत्रा होने के बाद भी देश का स्वाभिमान मृत था। अपने धर्म और ज्ञान-विज्ञान में हमारी निष्ठा नहीं रही, हम वेश-भूषा से लेकर भाषा तक में यूरोप के गुलाम ही रहे। शिक्षा पद्धति और भाषा के प्रचार के अन्दर ही वो मानसिक गुलाम बनाने का चमत्कार छुपा है जो मुसलमान सात सौ वर्षों में नहीं कर पाए लेकिन अंग्रेजों ने डेढ़-दो सौ वर्षों में ही कर डाला। ऐसे ही विषयों को गुरुदत्त की ‘धर्म तथा समाजवाद’ छूती है। आम तौर पर ये वो विषय हैं जो मुख्य धारा के लेखक छूने से भी कतराते हैं। इनपर लिखने वालों को कई बार रुढ़िवादी जैसे विशेषणों से भी नवाज़ा जाता है।
यहाँ आकर गुरुदत्त की ये किताब अन्य लेखकों से अलग हो जाती है। मानसिक गुलामों की भीड़ में गुरुदत्त गुलामों की किस्म भी पहचान लेते हैं। जो हर विदेशी चीज़ को बेहतर मानते हैं और भारतीय लोगों को असभ्य, उन्हें तो गुरुदत्त मानसिक गुलाम ही मानते हैं। गुरुदत्त एक और किस्म की मानसिक दासता का रूप दिखाते हैं। इसमें व्यक्ति यूरोप से आई नयी चीज़ों को भी किन्ही कारणों से अपने ही देश की पुरानी परम्पराओं में पहले से ही उपलब्ध बताते हैं। उनका कहना है कि मानसिक दासता से स्वतंत्रा लोग ना तो किसी पुरानी बात को आँखें मूँदकर स्वीकार करने के लिए तैयार हैं, न ही किसी वर्तमान युगीन बात को बिना विचार किये स्वीकार करने की इच्छा रखते है। ये लोग स्वतंत्रा मन और निष्पक्ष बुद्धि से प्राचीन का अध्ययन करते हैं और नवीन से उसकी तुलना करते हैं। ये मन से स्वतंत्रा हैं।
ऐसे स्वतंत्रा लोगों को ध्यान में रखकर ‘धर्म तथा समाजवाद’ को लिखा गया हैं। इसने दोनों पक्षों को आमने सामने रखकर तुलना की गई है और निष्कर्ष निकाले गए हैं।
जिन्हें समकालीन इतिहास की जानकारी होती उन्हें पता होगा कि कांग्रेस ने आपातकाल के दौरान जबरन हमारे संविधान में ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘समाजवाद’ जैसे शब्द ठूंस दिए थे। ऐसा जबरदस्ती का थोपा गया समाजवाद दरअसल एक ऐसा छलावा है जिससे मानसिक गुलामों को नियंत्रित किया जा सके। कई बार उस दौर के जनसंघ और हिन्दू महासभा आदि अपने कम होते प्रभाव को बढ़ाने के लिए समाजवाद की मोटी बातों को स्वीकार करते रहे हैं। जैसे कि संपत्ति पर या जमीन रखने पर उपरी सीमा तय करना सरकार का काम नहीं होता, लेकिन उन्हें स्वीकार गया। व्यक्ति समाज की उपज नहीं होता, व्यक्तियों से समाज का निर्माण होता है, गुरुदत्त इसी बात पर बल देते हैं। जैसा कि अम्बेडकर भी मानते थे कि हड़ताल जैसे काम राष्ट्र के लिए शुभ नहीं, वैसा ही गुरुदत्त भी मानते हैं।
इस किताब के जरिये गुरुदत्त आस्तिकवाद को बढ़ावा देते हैं। वो केवल ईश्वर को मानना ही नहीं है, वरंच इस जगत के पूर्ण रहस्य (त्रौतवाद) को समझने पर जोर देते है। इस किताब को लिखने की जरूरत उन्हें इसलिए पड़ी क्योंकि मनुष्य को जाने बिना, मनुष्यों के समाज की बातें करना बेमानी है। भोग यानि प्रकृति, भोक्ता यानि जीवात्मा, और उनका सम्बन्ध निर्धारित करने वाले नियंता, देव के सम्बन्ध को जाने बिना त्रौतवाद नहीं समझा जा सकता।
धर्म और धर्मवाद के जरिये इस किताब में समाजवाद का विकल्प दिया गया है। अगर मनुष्य को एक मिट्टी का ढेला मान लिया जाए तो फिर तो जैसे तेल जैसी वस्तुओं के बदले में आज क्यूबा डॉक्टर निर्यात कर रहा है वो इंसानी व्यापार भी उचित जान पड़ेगा ! कई साल पहले लिखी गई इस किताब के अंदेशे आज आपको भारत में ही दिख जायेंगे जहाँ केरल और बंगाल जैसे राज्यों से मनुष्य लगातार पलायन कर रहे हैं।
समाजवाद कहता है कि गरीब संख्या में ज्यादा है, इसलिए उनका राज्य बहुसंख्यक के लिए सुखदायी होगा। क्या ये तर्क अपने मूल में ही अल्पसंख्यकों का विरोधी नहीं है? जहाँ खाने-पीने, रहने, व्यवहार, विवाह, विचार व्यक्त करने तक पर सरकारी पाबन्दी हो वहां मनुष्य की निजी स्वतंत्राता कहाँ रह जायेगी? ऐसे ही कठिन प्रश्नों को लेकर गुरुदत्त ने सालों पहले ये किताब लिखी थी। जाहिर है प्रचलित विचारों और शासक वर्ग की विचारधारा के विरोधी विचारों के कारण इस पुस्तक को यथासंभव जनसामान्य से दूर रखने के हर संभव प्रयास किये गए हैं। समाजवादी देशों की वर्तमान स्थिति से इस किताब की बातें और स्पष्ट हो जाती है। बिना किसी को हानि पहुंचाए स्वेच्छा से बढ़ने का नाम स्वतंत्राता है। यह समाजवाद में संभव नहीं क्योंकि वहां सबको साथ लेकर आगे बढ़ना होगा, ये धर्मवाद में ही सम्भव है।
अगर वैचारिक स्वतंत्राता और सोचने की आजादी में रूचि हो तो ये किताब जरूर देखी जानी चाहिए। ये किताब ऑनलाइन भी काफी कम कीमत पर उपलब्ध है। आशा है जल्दी ही ये कंप्यूटर और किन्डल जैसे साधनों पर पढ़ने के लिए इलेक्ट्रॉनिक माध्यम में भी उपलब्ध होगी। पुस्तक को प्राप्त करने का पता पृष्ठ 43 पर दिया गया है।