कब होगा सरस्वती का उद्धार?

कब होगा सरस्वती का उद्धार?

विश्व-नागरिकता का विचार बीजरूप में सरस्वती-संस्कृति में विद्यमान था। सरस्वती-सभ्यता की विश्वबंधुत्व, ’सर्वे भवन्तु सुखिनः’ प्राणीनां आर्त्तिनाशनम्’ आ नो भद्राः कृतवो यन्तु विश्वतः’, कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’ आदि घोषणाएँ वैश्विक चिन्तन के सशक्त हस्ताक्षर हैं, प्रमाण हैं। बाद में ऐसी वैश्विक सभ्यता और संस्कृति की धुरीरूपा सरस्वती नदी भूपटल से लुप्त हो गयी। शास्त्रों सहित लोकजीवन में विभिन्न कथाओं के रूप में विद्यमान सरस्वती नदी प्रत्यक्ष में कहीं बहती हुई दिखाई नहीं देती थी। अतः सन् 1985 ई. में भारतमाता के श्रेष्ठ पुत्रों ने अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के तहत वैदिक सरस्वती नदी शोध-अभियान को मूर्त्त रूप प्रदान किया। बाबा साहेब आपटे स्मारक समिति के इस महत्वाकांक्षी प्रकल्प की इस सरस्वती शोध-यात्रा का विश्व इतिहास में अभूतपूर्व महत्व है। यात्रा-संयोजक श्री शशीन्द्र विश्वबंधु के शब्दों में, ’’इस सरस्वती नदी शोध-अभियान में सरस्वती के शुष्क प्रवाह-स्थलों और तटवर्ती प्रदेशों का व्यापक सर्वेक्षण साहित्यिक (वैदिक, पौराणिक, ऐतिहासिक और लोक), पुरातात्विक, भूशास्त्रा एवं भूगर्भशास्त्रा, नृशास्त्रा, प्रतिमाशास्त्रा आदि के आधार पर किया गया।
भारतीय जन और विश्व के विद्वत् मानस में लुप्त वैदिक सरस्वती के बारे में अगणित प्रश्न मचल रहे थे। वैदिक काल में जिस नदी को ’सर्वाधिक गतिशील’ उर्वराशक्ति की प्रेरिका’, ’नदीतमा’ के रूप में हिमालय से निकलकर ’आसमुद्रात’ बहने का उल्लेख है, जिसके तट पर मनु, पांचाल, इक्ष्वाकु, चायमान और संवरण आदि राजाओं ने अपने राज्य, नगर एवं यज्ञ-परम्पराओं की वृद्धि की तथा सारस्वत सभ्यता का उन्नयन किया, जिसके तट पर युगंधरा, बनावली, अग्रोदक, कालीबंगा और रंगमहल जैसे विशाल नगर प्रतिष्ठित हुए, वह सरस्वती नदी कब, क्यों, कैसे लुप्त हो गई? क्या सरस्वती हिमालय से निकलकर सिंधु-सागर में मिलती थी? क्या प्रयाग में सचमुच गंगा, यमुना, सरस्वती का संगम हुआ? इसका प्राचीन मार्ग कौन-सा है? इसके नष्ट होने का स्थल विनशन कहाँ है? क्या सिंधु नदी ही प्राचीन सरस्वती है? क्या वर्तमान घग्घर ही प्राचीन सरस्वती है? क्या यह आज अंतः सलिला के रूप में विद्यमान है? सरस्वती घाटी की सभ्यता-संस्कृति का स्वरूप क्या था? नदी के लुप्त हो जाने पर तटवासीजनों का स्थानान्तरण कहाँ-कहाँ हुआ? कृषि एवं आर्थिक समृद्धि में सरस्वती का क्या योगदान रहा? क्या इसके जल और तल की मिट्टी का कोई वैज्ञानिक स्वरूप रहा है? लुप्त सरस्वती का वर्तमान भारतीय जीवन पर कोई प्रभाव विद्यमान है? आदि-आदि।
इन यक्ष-प्रश्नों के आलोक में देश के प्रमुख पुरातत्ववेत्ताओं, इतिहासकारों, भूगर्भशास्त्रिायों, साहित्यवेत्ताओं और वैज्ञानिकों के एक दल ने दिनांक 17 नवम्बर से 18 दिसम्बर, 1985 तक तटवर्ती स्थलों की सर्वेक्षण-यात्रा की। सिरमौर की पहाडियों के ’आदिबद्री’ नामक स्थान से प्रारम्भ इस यात्रा ने हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, और गुजरात के प्रवाह-मार्गों से होकर प्रभासपाटण पर यात्रा सम्पन्न की।
माननीय श्री मोरेश्वर नीलकण्ठ (मोरोपन्त) पिंगले के नेतृत्व में और उज्जैन के शैलचित्रा शोध-संस्थान के पद्मश्री डॉ. विष्णु श्रीधर (हरिभाऊ) वाकणकर तथा कुरुक्षेत्रा विश्वविद्यालय के डॉ. सतीशचन्द्र मित्तल के संयुक्त संचालन में लगभग 4,000 किलोमीटर यात्रा-प्रदक्षिणा पूर्ण की गयी। शास्त्राज्ञ, विज्ञानवेत्ता, लोककला अभ्यासक, पुरातत्वविद्, स्वयंसेवी संस्थाओं के सहयोग से यह शोध-यात्रा सफल हुई। प्राचीन सरस्वती नदी का पुराप्रवाह मार्ग ढूँढ निकाला गया। इतना ही नहीं, विश्व के विद्वानों द्वारा भारतीय सभ्यता का नाम ’सरस्वती-सिंधु सभ्यता’ कहना उचित स्वीकार गया।
इस अभियान के सारथियों में से डॉ. सतीश चन्द्र मित्तल देश का मार्गदर्शन कर रहे हैं, किन्तु मा. मोरोपन्त जी और श्री वाकणकर जी हमारे बीच नहीं है। सरस्वती-शोध हेतु ये दोनों महापुरुष भारतीय जनमानस में अमर रहेंगे। मा. मोरोपन्त जी में महान संगठन-कौशल था और डॉ. वाकणकर जी में महान सौन्दर्य-दृष्टि थी। यह शोधकार्य शोध-प्रक्रिया क्षेत्रा में पथ-प्रदर्शन कार्य के रूप में सदा स्मरण किया जायेगा। डॉ. वाकणकर जी कहा करते थे कि भगवान आपको आँख देता है, किन्तु सौन्दर्य-दृष्टि प्राप्त करने के लिए प्रयत्न और संस्कार आवश्यक है। डॉ. वाकणकर जी को यह सौन्दर्य-दृष्टि थी। उन्होंने हजारों लोगों को यह सौन्दर्य-दृष्टि दी भी। उनका कहना था कि सर्वसामान्य जन को यह दृष्टि प्राप्त हुई तो प्राचीन मन्दिरों को वास्तुशिल्प के विराट सौन्दर्य की स्वतः अनुभूति होगी।
इन्दिरा गाँधी नहर के माध्यम से मरुस्थल में हिमालय के, शुतुद्री ’सतजल’ के जल से मरुवासियों को एक बार फिर प्राचीन दृश्य प्रत्यक्ष हुआ है। बेरियाँवाली ’खाजूवाला’ में भी इन्दिरा गाँधी नहर आ चुकी है। लाखों वर्ग किलोमीटर में पसरे रेगिस्तान के बीच में इस नहर का हिलोरे लेता जल देखकर हम मरुस्थल के लोग कैसे रामांचित होते हैं, यह बताना असम्भव है।
भारत की सात नदियों में विशालतम और पूजनीय सरस्वती नदी का प्राचीन भारतीय साहित्य में भरपूर वर्णन है, किन्तु थार के मरुस्थल में इसका कोई नदी-तंत्रा नहीं मिलता। थार मरुस्थल की पूर्वी सीमा निर्धारित करनेवाली लूणी नदी की एकमात्रा नदी है, जो अरावली के साथ-साथ बहती है। सरस्वती नदी के तट पर महर्षि याज्ञवल्क्य, दधीचि, परशुराम और पाराशर के आश्रम थे और इसी नदी की गोद में कभी एक लाख वर्ग किलोमीटर में फैली हुई हड़प्पा-सभ्यता छुपी थी। भूगर्भीय और जलवायु-परिवर्तनों से कभी हिमालय से बहनेवाली यह नदी शिवालिक पादक्षेत्रा में आते-आते सूख गयी । इसके सूखने का काल 2500-1500 ई.पू. माना जाता है। अध्ययन में सरस्वती के लुप्त होने के कारणों का विश्लेषण करते हुए इसके प्रवाह-मार्ग के निश्चयात्मक निर्धारण का प्रयास प्रस्तुत है।
इस नदी के चिह्नित अध्ययन-क्षेत्रा हैं- पश्चिमोत्तर भारत के थार मरुस्थल के राजस्थान, गुजरात (कच्छ का रण), हरियाणा, पंजाब और पाकिस्तान में सिंधु नदी के पूर्वी क्षेत्रों में स्थित सिंध और बहावलपुर प्रान्त, राजस्थान और उससे सटे पाकिस्तान क्षेत्रा में चिह्नित प्रवाह-मार्ग।
अरावली पर्वत-श्रृंखला के समानान्तर और संलग्न पाकिस्तान क्षेत्रा में सरस्वती नदी के पुरातन शुष्क प्रवाह-मार्गों का एक गहन जाल-सा बिछा हुआ दिखाई देता है। जहाँ घग्घर नदी से गुजरनेवाले प्रवाह-मार्ग और विस्तृत हैं, वहीं अरावली के समीपवाले प्रवाह-मार्ग बहुत सँकरे (मात्रा कुछ सौ मीटर चौड़े) हैं। विभिन्न दिशाओं में फैले पुरातन शुष्क पुरातन शुष्क प्रवाह। ये प्रवाह-मार्ग दो मुख्य वर्ग के हैं और निम्न प्रकार प्रवाहित हैं-
भारतीय पश्चिमोत्तर के निकट के प्रवाह-(इस प्रवाह-मार्गों का सूचीकरण उनकी पश्चिम से पूर्व की स्थिति के आधार पर किया गया है)।
1. घग्घर नदी के माध्यम से जो प्रवाह-मार्ग चिह्नित किया गया है, वह सरस्वती का मुख्य प्रवाह-मार्ग है जो 4-10 किलोमीटर चौड़ा है। यह प्रवाह-मार्ग बाणावली-अनूपगढ का है जो कि बेरियाँवाली और गनेरीवाला के उत्तर-पश्चिम में और नवाकोट, इस्लामगढ, तनोट, लोंगेवाला के पश्चिम में है। यह मुख्य प्रवाह नारा नदी के समानान्तर घोटारु के पश्चिम और पैरेवार के पूर्व में स्थित है। नारा नदी खींपरो तथा मुनाबाब के उत्तर-पश्चिम में और इस्लामकोट के पूर्व में बहती हुई कच्छ के रण में मिल जाती है।
2. द्वितीय महत्त्वपूर्ण प्रवाह- मार्ग 4 से 6 किलोमीटर चौड़ा है और भारतीय सीमा के समानान्तर बहता हुआ दिखाई देता है। यह प्रवाह-मार्ग घग्घर नदी के बाणावली-अनूपगढ़ क्षेत्रा में स्थित है, जो कि बेरियाँवाली, रुकनपुर, नवाकोट के उत्तर-पश्चिम में, इस्लामगढ, तनोट, लोंगेवाला, घोटारु और धनाना के पश्चिम में तथा मियांजलार और मुनाबाव के पश्चिम में होकर, इस्लामकोट के पूर्व से बहते हुए कच्छ के रण में जाकर मिल जाता है।
3. तृतीय प्रवाह- मार्ग भी मुख्य प्रवाह से ही बीजनोट के निकट प्रकट हुआ है और कानोड-गडरारोड से बहता हुआ इस्लामकोट के पूर्व में होकर मुनाबाब के पूर्व में पुनः मुख्य प्रवाह से मिल जाता है तथा अंत के कच्छ के रण में जाकर विलीन हो जाता है। यह प्रवाह मात्रा कुछ सौ मीटर चौडा है तथा कानोड, मीठा व खारा रण को जाडता है।
4. अरावली पर्वत शृंखलाओं के समीपस्थ प्रवाह- यह प्रवाह हिसार-सिवारी राजगढ से होते हुए चूरु-फतेहपुर-डीडवाना के पूर्व में तथा तरनेऊ-मेडता और पीपाड के पूर्व में होते हुए लूणी, कल्याणपुर और पचपदरा के उत्तर में बहते हुए कच्छ के रण में मिल जाता है। यह प्रवाह सिरवा (शिव) ग्राम होते हुए अथवा सीधे भी लूणी नदी के वर्तमान प्रवाह के द्वारा कच्छ के रण में मिल जाता है।
5. पाँचवाँ प्रवाह- लोहारू, नवलगढ, सीकर, मौलासर, डेगाना, मेडता और पीपाड होते लूणी-कल्याणपूर और पचपदरा के उत्तर में बहते हुए कच्छ के रण पहुँचता है।
सरस्वती मुख्य प्रवाह- ऋग्वेद की महाशक्तिशलिनी नदी सरस्वती के तटों पर हडप्पा और पूर्व-हड़प्पा सभ्यता के बहुत सारे स्थल प्राप्त हुए हैं जो कि इस नदी के सामर्थ्य और प्रभुता को प्रदर्शित करते हैं।
अरावली के समानान्तर पाए जानेवाले प्रवाह अत्यन्त सँकरे हैं और सरस्वती वैभव के वहाँ कोई संकेत प्राप्त नहीं होते। अतः ये किसी अन्य नदी के शुष्क प्रवाह-मार्ग हैं। (दृषद्वती आदि के)
प्रथम दो पुरातन शुष्क प्रवाह (क्र.1 व 2), जो घग्घर नदी से प्रकट हुए दिखाई देते हैं और जो जैसलमेर जिले से होते हुए अंतर्राष्ट्रीय सीमा के साथ-साथ पाकिस्तान में प्रवेश करते हैं और जिसकी चौड़ाई 4 से 10 किलोमीटर है, सरस्वती की अवधारणा से साम्य रखता है। हमारा विश्वास है कि यही प्रवाह-मार्ग सं. 1 लुप्त वैदिक नदी सरस्वती है।
तथ्यों की कसौटी पर पुरामार्ग सं. 1
इस विश्वास की पृष्टि हेतु वैज्ञानिक प्रणालियों की कसौटी पर निर्णय को परखा गया। जिन वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग हुआ, वे संक्षेप में निम्न हैं- भू-उपग्रह चित्रों से ज्ञात किए गए सरस्वती प्रवाह-मार्ग के जैसलमेर जिले के तनोट-किशनगढ, लोंगेवाला और घोटारु क्षेत्रा में खोदे गए 14 ट्यूबवैल, जिनसे प्राप्त जल की उच्च गुणवत्ता में शोध भूजल विभाग, राजस्थान द्वारा की गई, जिससे प्रकट हुआ कि ये शुष्क प्रवाह-मार्ग अपने गर्भ में उत्तम कोटि के पेयजल के भण्डार सुरक्षित रखे हैं। इन 14 नलकूपों की खुदाई में प्राप्त मिट्टी के वैज्ञानिक परीक्षणों से 9 नलकूपों में भूविज्ञान द्वारा सरस्वती जल की उपस्थिति की पुष्टि हुई है।
भाभा एटॉमिट रिसर्च सेंटर (बी.ए.आर.सी. मुम्बई) ने इन कुओं से प्राप्त जल नमूनों के परीक्षण से सिद्ध किया कि यह जल पुरातन रक्षित है। हड़प्पा और पूर्व-हड़प्पा के पश्चिमी राजस्थान में स्थित सभी स्थित सभी 54 स्थल सरस्वती नदी तटों की शोभा हैं।
इटालवी, डच और ब्रिटिश विद्वानों द्वारा सन् 1746 में तैयार किए गए भारत-पाक मानचित्रा से सिद्ध होता है कि मानसून और बाढ़ से 13वीं शती तक और लघु प्रवाह 16वीं शती तक सरस्वती की उपस्थिति सिद्ध करते हैं। (बिल्हेल्मी 1969)
भुज भूकम्प- गुजरात के भुज में 26 जनवरी, 2000 में भूकम्प आया, था जिससे भूगर्भ का जल धरती पर प्रकट हो गया था। इसरो ने भूकम्प से एक वर्ष पूर्व ही भूकम्प की चेतावनी दे दी थी। उपग्रह-चित्रों से यह प्रमाणित हुआ था कि दबे हुए सरस्वती-प्रवाह पुनः सक्रिय हुए हैं। यह प्रकट जल लुप्त सरस्वती का था। यह सुप्रसिद्ध पुरास्थल धौलावीरा और कच्छ के रण तथा सरस्वती के साथ संबंधों की पुष्टि थी।
परिणाम- समस्त वैज्ञानिक प्रयासों और तथ्यों के विश्लेषण से ज्ञात होता है कि वैदिक सरस्वती नदी स्वतन्त्रा रीति से सिंधु के समानान्तर बहती थी। भू-उपग्रह चित्रों से सरस्वती नदी का प्रवाह-मार्ग नारा नदी के पूर्व में 40 किलोमीटर दूर स्थिर था। यह भी ज्ञात हुआ कि सरस्वती नदी ने कभी भी धूणी नदी के प्रवाह-क्षेत्रा को नहीं अपनाया, यह कभी भी अरावली के समानान्तर नहीं बही और कभी भी अपने मार्ग को पूर्व से पश्चिम की ओर नहीं बदला, जो दूरी 500 किलोमीटर है।
हनुमानगढ-श्रीगंगानगर जिलों में सरस्वती के विशाल प्रवाह-पथ और पुरास्थलों से प्रमाणित होता है कि वर्तमान घग्घर का मार्ग ही प्राचीन सरस्वती का मार्ग है। कृष्णन (1982) और यशपाल के मतानुसार भी भूगर्भीय और जलवायु प्रभावों से शिवालिक पर्वतक्षेत्रों के आए परिवर्तनों से सरस्वती जलविहीन हो गयी। सरस्वती का मुख्य प्रवाह ( 4-10 किलोमीटर चौडा) अभी शुष्क पुराप्रवाह के रूप में स्थित और नंगी आँखों से भी स्पष्ट दिखाई देता है।
उपग्रहीय चित्रों के अध्ययन से धरती में छुपे और वनस्पति-जगत् में प्रकट सरस्वती के पुराप्रवाहों को भली-भाँति पहचाना और चिह्नित किया गया है। इस कार्य के लिए आई.आर.एस.पी. 3 डब्ल्यू.आई.एस.पी. 6 ए.डब्ल्यू.आई.एफ.एस. संवेदकों से प्राप्त (55 मी के आँकडे) अत्यधिक उपयोगी सिद्ध हुए।
गुजरात में सरस्वती के शुष्क पुराप्रवाह- प्रारम्भिक तौर पर आई.आर.एस.डब्ल्यू.आई.एफ.एस. से प्राप्त आँकडे बताते हैं कि सरस्वती यद्यपि पाकिस्तान-स्थित कच्छ के रण में समाहित होती थी, तथापि सरस्वती के कुछ प्रवाह दक्षिण-पूर्व में मुडकर धौलावीरा तथा खदिर द्वीपों को दक्षिण दिशा में स्पर्श करते थे जबकि एक प्रवाह धौलावीरा तथा बोदराणी के उत्तर में बहता था। ये प्रवाह कच्छ की खाड़ी के मुहाने पर सुरकोटदा के दक्षिण-पूर्व में मिलते थे। सरस्वती के मुख्य प्रवाह से जन्मे कुछ अन्य प्रवाह भी सुरकोटदा की ओर बहते हुए कच्छ की खाड़ी में मिलते दिखाई देते हैं। वर्तमान में प्राप्त प्रमाणों से यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता है वैदिक नदी सरस्वती स्वयं ही कच्छ की खाड़ी में गिरती थी, किन्तु इस सम्भावना को नकारा भी नहीं जा सकता। इस दिशा में अभी और शोध अपेक्षित है, जो कि प्रक्रियाधीन है।
हरियाणा में शोध-कार्य- हरियाणा में सरस्वती के पुराप्रवाह मार्गों के अध्ययन हेतु आई.आर.एस.ए.डब्ल्यू.आई.एफ.एस. से प्राप्त आँकडों और राडार-चित्रों का प्रयोग किया गया, किन्तु यहाँ के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है – सरकार द्वारा निर्मित नहरों का जाल। इसके परिणामस्वरूप सरस्वती के पुराप्रवाह मार्गों और वर्तमान नहरों के जाल परस्पर गुंथे हुए हैं।हरियाणा में दृषद्वती नदी-प्रवाहों का भी अस्तित्व है। अतः सरस्वती प्रवाह-मार्ग का निर्धारण करना कठिन हो गया है तथापि यमुनागर, कुरुक्षेत्रा, जींद, हिसार, सिरसा, कैथल, करनाल, फतेहाबाद, भिवानी, सोनीपत और पानीपत जिलों का अध्ययन किया गया।
उपग्रह-चित्रों और राडार-चित्रों के साथ ही साथ इनसे हरियाणा सरकार के भूजल-विभाग से मृदा-संबंधी आँकड़े (लिथोलॉजी) प्राप्त किए, जिनसे ज्ञात होता है कि यहाँ मृदा की रचना तीन स्तरों पर हुई है। मार्ग में भिन्न-भिन्न स्थानों पर ये मृदाएँ भिन्न-भिन्न मात्रा में पाई जाती हैं। हड़प्पा-सभ्यता के स्थल भी यहाँ प्रचुर मात्रा में हैं।(सरस्वती नाला) सरसुती नदी आदिबद्री के निकट प्रकट होती है जहाँ प्राच्य मन्दिरों और ऐतिहासिक स्थानों का विशेष महत्व ह। आदिबद्री क्षेत्रा का, वर्षा के आँकड़ों का, जल के नमूनों के विश्लेषण का कार्य किया गया। कलायत तीर्थ में प्राप्त जल के विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि यह जल आसपास के तालाबों का नहीं है, अपितु भूमिगत पुराप्रवाह का है। (साभार)