भारत को पुन: विश्वगुरु बनाने की दिशा में धर्मशास्त्रों की युगानुकूल विवेचना आवश्यक”

विश्वगुरु—यह कोई सपना नहीं, यह भारत की ऐतिहासिक वास्तविकता रही है। वह भारत जिसने संसार को ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का संदेश दिया, जिसने आध्यात्मिकता, तत्त्वज्ञान, शांति और धर्म की दीपशिखा को युगों तक प्रज्वलित रखा। किंतु आज, जब भारत पुन: अपने वैश्विक नेतृत्व की ओर बढ़ रहा है, तब यह आवश्यक है कि हम अपने उसी सनातन ज्ञान-स्रोत की ओर लौटें—हमारे प्राचीन धर्मशास्त्रों की ओर।

भारतीय संस्कृति की आत्मा हमारे धर्मशास्त्रों में बसी है। वेद, उपनिषद, महाभारत, रामायण, स्मृतियाँ, पुराण और धर्मसूत्र न केवल आध्यात्मिक और नैतिक जीवन की शिक्षा देते हैं, बल्कि वे समाज, राजनीति, अर्थनीति, पर्यावरण, न्याय, शिक्षा और विज्ञान के विषयों पर भी गहन दृष्टि प्रदान करते हैं। किंतु इन शास्त्रों को केवल ग्रंथालयों और मंदिरों तक सीमित रखकर, हम उनकी ऊर्जा को वर्तमान युग में उपयोगी नहीं बना सकते।

आज आवश्यकता है युगानुकूल विवेचना की—अर्थात शास्त्रों को आज की चुनौतियों, संदर्भों और आवश्यकताओं के अनुरूप समझने और प्रस्तुत करने की। धर्मशास्त्र स्थूल परंपराओं का संकलन नहीं, अपितु एक जीवंत ज्ञान-परंपरा हैं जो समय के साथ परिवर्तित होती रही है। वे केवल धार्मिक अनुष्ठानों के नियम नहीं, अपितु मानव धर्म, कर्तव्य, न्याय और समाज-व्यवस्था के गूढ़ सिद्धांतों का भंडार हैं।

आज जब हम नैतिक पतन, पारिवारिक विघटन, पर्यावरणीय संकट और सामाजिक असंतुलन के युग में जी रहे हैं, तब धर्मशास्त्रों की यथार्थवादी व्याख्या हमारे लिए मार्गदर्शक बन सकती है। उदाहरणार्थ, मनुस्मृति का यह वाक्य—”धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षित:”—इस तथ्य को उजागर करता है कि धर्म की रक्षा करने वाला व्यक्ति स्वयं सुरक्षित रहता है। यही विचार आज की नीति-निर्माण प्रक्रियाओं और न्याय व्यवस्था के केंद्र में आना चाहिए।

भारत को यदि पुन: विश्वगुरु बनना है, तो केवल आर्थिक प्रगति, सैन्य शक्ति और तकनीकी विकास पर्याप्त नहीं होंगे। हमें अपने चार पुरुषार्थों—धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—की संतुलित व्याख्या और शिक्षा देनी होगी। वर्तमान शिक्षा प्रणाली में नैतिकता और आध्यात्मिकता का जो अभाव है, वह धर्मशास्त्रों के विवेचन से पूरा हो सकता है।

धर्मशास्त्रों को युगानुकूल बनाने का अर्थ यह नहीं कि हम मूल मूल्यों को त्याग दें, बल्कि यह है कि हम उनकी भावनात्मक और तात्त्विक दृष्टि को आज के परिप्रेक्ष्य में पुन: समझें। जैसे गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं—”यद्यदाचरति श्रेष्ठ: तत्तदेवेतरो जन:” —आज हमें ऐसे आदर्शों की आवश्यकता है जिनका अनुसरण समाज कर सके। यह तभी संभव है जब हम धर्म के उन गूढ़ सूत्रों को सरल भाषा और व्यवहारिक उदाहरणों के साथ समाज तक पहुँचाएँ।

धर्मशास्त्रों की विवेचना का कार्य केवल विद्वानों और संन्यासियों का नहीं है, यह समाज के हर जागरूक नागरिक का कर्तव्य है। मीडिया, शिक्षा संस्थान, धार्मिक संगठन और नीति-निर्माता, सबको इसमें सहभागी होना होगा। एक संतुलित, विवेकपूर्ण और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ धर्मशास्त्रों का अध्ययन और प्रसार भारत को फिर से एक सांस्कृतिक और नैतिक प्रकाश-स्तंभ बना सकता है।

आज भारत तकनीकी रूप से सक्षम है, आर्थिक रूप से सशक्त हो रहा है और वैश्विक मंचों पर नेतृत्वकारी भूमिका निभा रहा है। परंतु यदि हमें ”वसुधैव कुटुम्बकम्” और ”सर्वे भवन्तु सुखिन:” के विचारों को वैश्विक विमर्श का केंद्र बनाना है, तो हमें अपने धर्मशास्त्रों से प्रेरणा लेकर उन्हें आधुनिक संदर्भ में प्रस्तुत करना ही होगा।

भारतीय धरोहर केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा है—और उसका प्रकाश स्तंभ हमारे धर्मशास्त्र हैं। युग की पुकार है कि हम उन्हें फिर से पढ़ें, समझें और समयानुकूल जीवन में उतारें। तभी भारत को पुन: विश्वगुरु बनने से कोई नहीं रोक सकता।