लेखक : डॉ. शैलेंद्र कुमार
जिस दिन मेरा दुमका दौरे का कार्यक्रम बना उसी दिन से मैं इंटरनेट पर वहां के महत्वपूर्ण स्थल ढूंढने लगा। प्रत्येक साइट पर मुझे दो पर्यटक स्थल मिले — बासुकिनाथ धाम और मलूटी गांव। यहाँ मलूटी गांव का वर्णन किया जा रहा है। इस संदर्भ में सर्वप्रथम यह बताना आवश्यक है कि जिन मित्रों ने मुझे दुमका के बारे में बताया था, उनमें से किसी ने भी मलूटी गांव के बारे में नहीं बताया। यहां तक कि मेरे एक विद्वान मित्र जो धनबाद के रहने वाले हैं, उन्हें भी इस गांव के विषय में कोई ज्ञान नहीं था। तात्पर्य यह कि हमारी पूरी शैक्षणिक और सांस्कृतिक व्यवस्था ऐसी बना दी गई है कि हम जिन स्थानों पर गर्व कर सकते हैं उनके विषय में हमें बताया ही नहीं जाता। इससे पता चलता है कि हमारी संपूर्ण व्यवस्था कितनी उदासीन और समाज से किस सीमा तक असंपृक्त है!
जब हम वहां पहुंचे तो हमें सबसे पहले एक चमकता-दमकता सिंहद्वार दिखा, जिसे हाल में ही बनाया गया था। इस द्वार में प्रवेश करते ही दाहिनी ओर एक पुराना मंदिर है और सामने है मौलीक्षा मां का मंदिर, जिसमें लगा कि हर समय अच्छी-खासी भीड़ रहती होगी। दोपहर के समय भी पंक्तिबद्ध श्रद्धालु देवी पूजा के लिए अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे थे। चमकते हुए लाल रंग की मौलीक्षा मां की मूर्ति है। स्थानीय लोगों में मौलीक्षा मां का बड़ा महात्म्य है। इन्हें माता महाजननी और ‘बड़ी मां’ भी कहा जाता है।
मुझे वहां के एक स्थानीय — समीर कुमार साहा मिले, जिन्होंने एक लघु पुस्तिका बंगाल की सीमा पर पुरातत्व के आलोक में मलूटी लिखी है। यह पुस्तक मूलत: बांग्ला में लिखी गई और बाद में इसका हिंदी एवं अंग्रेजी में अनुवाद किया गया। पुस्तक की हिंदी अत्यंत दोषपूर्ण है। फिर भी इससे कुछ जानकारी मिलती है। साहा के अनुसार, मौलीक्षा माता के प्रकट होने की कथा कुछ इस प्रकार है : मलूटी के राजपरिवार के निवास स्थान के चयन के लिए काशी स्थित सुमेरु मठ के दंडी स्वामी द्वितीय सर्वानंदतीर्थ महाराज सन 1676 में मलूटी बुलाए गए। गुरु महाराज को यह स्थान भा गया और इसके बाद घने वन की सफाई आरंभ हुई। सफाई करते समय लोगों ने एक मंदिर का भग्नावशेष देखा। उस मंदिर के मध्यस्थल में ऊंची वेदी पर विराजमान एक अद्भुत एवं सुंदर देवीमस्तक पाया गया, जो त्रिनयनी, हास्यमयी, अपरूपा और लाल मुखमंडल वाला था। इस देवी को देखकर गुरु महाराज ने राजपरिवार को निर्देश दिया कि ‘चूंकि इस देवी का मुखमंडल लाल है तथा इसकी दृष्टि पश्चिम दिशा की ओर है और मूर्ति के पीछे कमल के पुष्प अंकित हैं, इसलिए यह देवीमूर्ति प्राचीन बौद्ध संन्यासियों की आराध्य ‘देवी पांडोरा’ हैं और इसे ध्यान में रखते हुए मौलिकता के आधार पर देवीमूर्ति की प्रतिष्ठा ‘मौलिक्षा’ के रूप में की जाए। गुरु महाराज के निर्देश का पालन करते हुए मौलिक्षा मां ही देवी दुर्गा एवं सिंहवाहिनी मां के रूप में मलूटी राजवंश की प्रतिष्ठित राजकुल देवी हुईं। कालांतर में कहते हैं कि मौलिक्षा नाम का सहज अर्थ भी लोगों में प्रचलित हो गया। ‘मौली’ शब्द का अर्थ मस्तक होता है और ‘ईक्षा’ का अर्थ होता है दर्शन करने की अभिलाषा। इस प्रकार जिस मस्तक को देखने की अभिलाषा हो, वही ‘मौलीक्षा’ है।
चूंकि मौलीक्षा मां का केवल मुखमंडल ही देखा जा सकता है, इसलिए यह नाम अधिक अर्थपूर्ण प्रतीत होता है। मौलीक्षा मां के मंदिर के महत्व के विषय में रश्मि शर्मा बताती हैं कि यह सिद्धपीठ है और यह मंदिर बंगाल शैली की स्थाहपत्येकला का श्रेष्ठ नमूना है। मलूटी राजवंश के अन्यतम संन्यासी राजा राखड़चंद्र ने मौलीक्षा मंदिर का निर्माण किया और आगे चलकर विष्णुपुर ( बंगाल ) के शिल्पकारों को लाकर मौलीक्षा मां के मंदिर के सामने दो शिवमंदिर बनवाए।
बाद में राजपरिवार चार हिस्सों में विभक्त हो गया। परंतु अब चारों परिवारों में मंदिर निर्माण की होड़ लग गई। इसका परिणाम यह हुआ कि मलूटी एक सुंद
र मंदिर ग्राम में रूपांतरित हो गया और देखते-ही-देखते 108 मंदिरों की स्थापना हो गई। इनमें अधिकतर शिवमंदिर हैं। किंतु दुर्गा मंदिर, काली मंदिर, नारायण मंदिर आदि भी हैं। चूंकि दंडी स्वामी शिव की काशी नगरी से आए थे, इसलिए मलूटी ग्राम भी उनसे प्रभावित हुआ और इस प्रकार एक नई काशी की रचना हुई। परंतु उन दिनों मलूटी ग्राम के मंदिरों के विषय में बाहर के लोगों को पता नहीं था, इसलिए इसे ‘गुप्त काशी मलूटी’ भी कहा जाता था।
मंदिर की स्थापत्यकला को लेकर साहा लिखते हैं कि प्राचीन युग की विस्मयकारी सृष्टि टेराकोटा ( पकाई गयी मिट्टी से बनाई गयी कलाकृति) शिल्प अपने-आप में एक अनूठी शिल्प शैली है और इसी टेराकोटा शिल्प शैली से निर्मित हैं मलूटी के विख्यात मंदिर। कई मंदिर तो काल का ग्रास बन चुके हैं और इस प्रकार 108 में से केवल 72 मंदिर ही अंशत: अपने मूल रूप में विराजमान हैं। मंदिरों के मुख्य भाग की दीवार पर टेराकोटा शैली में राम-रावण युद्ध, महिषासुरमर्दिनी, रामायण-महाभारत की विभिन्न घटनाएं और आंचलिक व सामाजिक जीवन इत्यादि की झांकियां उकेरी गई हैं। दीवारों पर अंकित ये दृश्य रोमांचकारी और विस्मयकारी तो हैं ही साथ ही इन्हें देखकर लगता है कि इनका निर्माण हाल में ही हुआ होगा।
वास्तव में दीवारों पर की गई नक्काशी की लालिमा किसी को भी सोचने पर विवश कर देती है कि इन अद्वितीय कीर्तियों का निर्माण हाल की ही बात होगी।
मलूटी गांव स्थित मंदिरों के विषय में रश्मि शर्मा का कहना है कि ये मंदिर स्थापत्यकला का बेजोड़ नमूना हैं। रश्मि शर्मा आगे लिखती हैं : ‘मंदिरों में टेराकोटा इसकी खूबसूरती में चार चांद लगाता है। मलूटी के मंदिरों में किसी एक स्थाापत्यं शैली का अनुकरण नहीं किया गया है। पूर्वोतर भारत में प्रचलित लगभग सभी प्रकार की शैलियों के नमूने हमें यहां दिखे। मलूटी के अधिकांश मंदिरों के सामने के भाग के ऊपरी हिस्से में संस्कृत या प्राकृत भाषा में प्रतिष्ठाता का नाम व स्थापना तिथि अंकित है। इससे पता चलता है कि इन मंदिरों की निर्माण अवधि वर्ष 1720 से 1845 के भीतर रही है। हर जगह करीब 20-20 मंदिरों का समूह है। हर समूह के मंदिरों की अपनी ही शैली और सजावट है। शिखर मंदिर, समतल छतदार मंदिर, रेखा मंदिर यानी उड़ीसा शैली और रास मंच या मंच शैली के मंदिर। ज्यादातर मंदिरों में शिवलिंग स्थांपित थे। मंदिर में प्रवेश करने के लिए छोटे-छोटे द्वार बने हुए हैं। सभी मंदिरों के सामने के भाग में नक्काशी की गई है। विभिन्न देवी-देवता के चित्र और रामायण के दृश्य बने हुए हैं।
आगे के चित्रों में देखा जा सकता है कि किस प्रकार मंदिर के द्वार के ऊपर और स्तंभों पर अनेक धार्मिक घटनाएं एवं सामाजिक जीवन की झलकियां तथा फूल-पत्तियां उकेरी गई हैं। शिल्पकारों ने इतनी बारीकी और खूबसूरती से इन चित्रों को दीवारों पर अंकित किया है कि ये कृतियां अद्वितीय बन गई हैं।
राम-रावण का युद्ध व पुष्पचित्रण
रवि प्रकाश हमें बताते हैं कि इन मंदिरों में 58 शिव मंदिर हैं, जबकि शेष 15 मंदिर दूसरे देवी-देवताओं के हैं। इनमें से सबसे ऊंचा मंदिर 60 फीट और सबसे छोटा 15 फीट का है। इनमें 30 मंदिर टेराकेटा शैली के हैं। बाद के दिनों में ग्रामीणों ने भी आठ नए मंदिर बनवाए। गांव की महिलाएं सुबह-शाम इनमें पूजा करती हैं। इन मंदिरों में कई जगह टूटे लेकिन विशालकाय शिवलिंग हैं। इन खंडित शिवलिंगों की अब पूजा नहीं होती। 108 मंदिरों के अतिरिक्त इस गांव की एक और विशेषता यह है कि यहां 108 तालाब भी बनाए गए। मुझे तो बहुत सारे तालाब नहीं दिखे, किंतु चमकते-दमकते 108 मंदिर और 108 ही पानी से लबालब भरे तालाब वाले गांव के उस अद्भुत व मनोहारी दृश्य की कल्पना मात्र से ही मन रोमांचित हो जाता है। कितना सुंदर लगता होगा तब यह गांव!
मलूटी के विषय में गरिमा सिंह लिखती हैं कि झारखंड राज्य का यह गांव ऐसा है जहां माला के मोतियों के बराबर 108 मंदिर हैं। भक्तों को रिझाते और पर्यटकों को आकर्षित करते ये मंदिर सदियों से ऐसे ही खड़े हैं। हालांकि समय की मार और देखभाल के अभाव में अब इनकी रंगत कम हो गई है और संख्या भी। इन मंदिरों के कारण ही यह क्षेत्र विश्वभर में प्रसिद्ध है। गरिमा सिंह आगे बताती हैं कि इस गांव का राजा कोई शाही परिवार का मुखिया नहीं बल्कि बसंत नाम का एक किसान था, जिसे बंगाल के तत्कालीन सुल्तान हसन शाह ने यह गांव खुश होकर ईनाम में दिया था।
सामाजिक जीवन व पुष्प चित्रण
गांव का मालिक बनने पर बसंत को राजा बसंत कहा जाने लगा और बाज पकडऩे के कारण इसके नाम में बाज जुड़कर, इसका नाम राजा बाज बसंत पड़ा। दरअसल, एक बार सुल्तान की बेगम का पालतू बाज उड़कर दूर चला गया। इस पर किसान बसंत ने पिंजरे से उड़े बाज को पकड़कर वापस बेगम को लौटा दिया। बसंत की इस बहादुरी से खुश होकर सुल्तान ने उसे मलूटी गांव ईनाम में दिया। बसंत ने इस गांव में कोई महल या हवेली न बनवाकर मंदिरों का निर्माण किया। एक माला में 108 मोती होते हैं। इन्हीं मोतियों की संख्या के आधार पर बसंत ने गांव में मंदिर बनाए। पर देखरेख और संरक्षण के अभाव में अनेक मंदिर खंडहर हो गए हैं या ढह गए हैं।
रवि प्रकाश हमें बताते हैं कि 2015 के गणतंत्र दिवस समारोह में झारखंड सरकार ने 108 मंदिरों वाले गांव मलूटी की झांकी प्रस्तुत की थी, जिसे द्वितीय पुरस्कार मिला था और इस बहाने देशभर के लोग मलूटी से भी परिचित हुए थे। उसी साल 2 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दुमका आए तो उन्होंने मलूटी के जीर्णोद्धार की शुरुआत की। तब लगा कि इस सरकारी पहल से मलूटी का कायाकल्प होगा। लेकिन मलूटी के लोग नाराज हैं। उन्हें जीर्णोद्धार के तौर-तरीके पर आपत्ति है। उनका कहना है कि उनके गांव के इतिहास और मंदिरों के वर्तमान स्वरूप से खिलवाड़ किया जा रहा है। एक ग्रामीण ने रवि प्रकाश को बताया कि, ‘देखिए, ये लोग जिस तरीके से मंदिरों का जीर्णोद्धार कर रहे हैं, उससे इनका मौलिक स्वरूप ही बदल जाएगा। कई सौ साल पहले बने इन मंदिरों के निर्माण में सुरखी (पक्की ईंटों का बारीक बुरादा ) और चूने का उपयोग किया गया था। अब जीर्णोद्धार के नाम पर इन मंदिरों को सीमेंट और ईंटों के टुकड़ों से जोड़ा जा रहा है। इनका रंग भी बदल दिया गया है। अब जब मंदिरों का स्वरूप ही बदल जाएगा तो लोग यहां क्या देखने आएंगे। इसलिए इन मंदिरों का जीर्णोद्धार तत्काल रोका जाना चाहिए।
जिस प्रकार से मंदिरों का जीर्णोद्धार हो रहा है उससे रश्मि शर्मा भी असहमत हैं। वह लिखती हैं कि, ‘इससे मंदिरों का रूप-रंग बिल्कुल बदला हुआ लगा। जो पुरानी पहचान है, जो मौलिकता है वह खो गई है। टेराकोटा कला का अस्तित्व मिटा हुआ था। बिल्कुल नया-सा लगा और आर्कषणहीन। इस तरह मौलिकता समाप्त् कर संरक्षण करने का क्या फायदा ? बिल्कुल नये मंदिरों-सा दिख रहा।’ नीचे के चित्र में देखा जा सकता है कि किस प्रकार मंदिर का जीर्णोद्धार हो रहा है।
मलूटी के मंदिरों पर लंबे समय से शोध कर रहे 82 वर्षीय गोपालदास मुखर्जी ने रवि प्रकाश को बताया कि वह इन मंदिरों के जीर्णोद्धार के काम में भारतीय पुरातत्व विभाग की भागीदारी चाहते हैं। उनका मानना है कि अगर पुरातत्व विभाग इनका जीर्णोद्धार करे, तो मंदिरों का मूल स्वरूप कायम रह सकेगा। उन्होंने यह भी बताया कि 1979 में उन्होंने भागलपुर के तत्कालीन कमिश्नर से मंदिरों को पुरातत्व विभाग से संरक्षित कराने की मांग की थी। बाद में पुरातत्व विभाग ने यहां काम भी किया। लेकिन अब पुरातत्व विभाग यह काम नहीं कर रहा है।
मैंने स्वयं जीर्णोद्धार हो रहे एक मंदिर को देखकर यही अनुभव किया कि जिस तरह से यह काम किया जा रहा है उससे अच्छा तो यही होगा कि मंदिरों को यूं ही छोड़ दिया जाए। बाद में एक स्थानीय अधिकारी ने मुझे बताया कि असल में झारखंड सरकार ने इस काम को किसी गैर-सरकारी संस्था को सौंप दिया है, जो बिल्कुल नौसिखिया है। इसने पतली-पतली ईंटों को मंदिर से निकालकर उनके स्थान पर आज की मोटी-मोटी ईंटें लगाई हैं, जिससे मंदिर का स्वरूप और सौंदर्य दोनों समाप्त हो गए हैं। पर इससे भी बड़ी बात यह है कि दर्जन भर मंदिरों की छतों और दीवारों पर बड़े-बड़े पेड़-पौधे उग आए हैं, जिनकी जड़ें इन मंदिरों को अंदर से खोखला कर रही हैं। यदि किसी तरह केवल इन पेड़-पौधों को हटा दिया जाए तो भी मंदिरों की आयु बढ़ जाएगी। आगे के चित्र में मंदिर की छत पर उगे हुए पेड़-पौधे देखे जा सकते हैं।साथ ही इन मंदिरों की सुरक्षा के लिए चारदीवारी भी खड़ी करनी होगी। हमें बताया गया कि रात में यहां अंधेरा रहता है। इसलिए पर्याप्त रौशनी की व्यवस्था करना भी आवश्यक है। इसी के साथ सीसीटीवी कैमरों का लगाया जाना भी आवश्यक है।
जीर्णोद्धार कार्य जारी
मलूटी गांव के विषय में रवि प्रकाश बताते हैं कि मलहूटी के नाम से जाना जाने वाला गांव अब मलूटी कहा जाता है। शिकारीपाड़ा प्रखंड के इस गांव में 350 घर हैं। यहां करीब 2500 लोग रहते हैं। इनकी भाषा बांग्ला है। रश्मि शर्मा बताती हैं कि यह गांव झारखंड और बंगाल की सीमा पर है और यहां की भाषा बांग्ला मिश्रित हिंदी है। हम जब इस गांव में प्रविष्ट हुए तो सर्वत्र बांग्ला भाषा देखकर आश्चर्यचकित रह गए। पल भर के लिए तो मुझे लगा कि कहीं हम बंगाल में तो नहीं आ गए हैं। यहां के लोगों की बातचीत की भाषा भी बांग्ला ही है। वास्तव में, जैसा कि रवि प्रकाश बताते हैं, पहले यह गांव बंगाल के बीरभूम जिले का हिस्सा हुआ करता था। इसलिए अब यहां के अधिकतर लोग कोलकाता या रामपुरहाट जाकर बस गए हैं। गांव में वही लोग हैं जो या तो यहां खेती-मजदूरी करते हैं या फिर नौकरी। अत: काली पूजा जैसे आयोजनों पर ही गांव पूरी तरह से गुलजार होता है। मैंने स्वयं यहां कई बड़े-बड़े दो मंजिला घर देखे जो खंडहर प्रतीत हुए। पूछने पर पता चला कि घर वाले बाहर रहते हैं और केवल काली पूजा के समय ही अपने गांव आते हैं।
कितने महत्वपूर्ण हैं ये मंदिर? इसका उत्तर देते हुए रवि प्रकाश बताते हैं कि हेरिटेज (धरोहर) पर काम कर रही संस्था ‘ग्लोबल हेरिटेज फंडÓ ने वर्ष 2010 में मलूटी के मंदिरों को विश्व के 12 सर्वाधिक लुप्तप्राय धरोहरों की सूची में शामिल किया था। इस सूची में भारत से शामिल होने वाली यह इकलौती धरोहर है। अब झारखंड सरकार ने भी मलूटी को यूनेस्को की विश्व धरोहरों की सूची में शामिल कराने का प्रयास शुरू किया है। कोई आश्चर्य नहीं कि रश्मि शर्मा इस मंदिरों वाले गांव को अद्भुत स्थान मानती हैं और सुझाव देती हैं कि यदि इसे पर्यटक क्षेत्र के रूप में विकसित किया जाए तो यह झारखंड को अलग पहचान देगा। पर अभी यह गांव ही है। इसलिए यहां रहने की कोई व्यवस्था नहीं है। यदि किसी को रुकना हो तो आगे तारापीठ में कई होटल हैं या दुमका या रामपुर में ही रुकने की व्यवस्था है।
यह हमारे देश की कैसी विडंबना है कि ग्लोबल हेरिटेज फंड द्वारा वर्ष 2010 में मलूटी के मंदिरों को विश्व की 12 सर्वाधिक लुप्तप्राय धरोहरों की सूची में शामिल करने के बावजूद भी किसी ने इस गांव की सुध नहीं ली और न इस गांव की प्रसिद्धि में ही कोई बढ़ोतरी हुई। इसके लिए और पांच वर्ष प्रतीक्षा करनी पड़ी जब 2015 के गणतंत्र दिवस समारोह में राज्य सरकार द्वारा दिल्ली में इसकी झांकी प्रस्तुत की गई। रश्मि शर्मा मानती हैं कि झांकी को पुरस्कृत किए जाने के बाद यह गांव पर्यटन मानचित्र पर आया। पर इससे भी बात उतनी नहीं बनी। बात तब बनी जब प्रधानमंत्री ने इस गांव का दौरा किया। मुझे भी इस गांव पर जितना साहित्य मिला है, सब-का-सब 2015 के बाद का ही है। फिर भी लगता है कि इतना सब कुछ भी पर्याप्त नहीं है। वास्तव में इसके लिए राज्य और केंद्र सरकारों द्वारा निरंतर प्रचार करने की आवश्यकता है।
मलूटी गांव बिल्कुल साधारण गांव है और वहां भी दुमका या झारखंड के अन्य जिलों की तरह कच्ची दीवारों और फूस की छत वाले घर हैं। कहीं-कहीं मिट्टी की दीवारों वाले दो-मंजिला घर भी हैं। गांव के अंदर पतली-पतली गलियां हैं। घर की दीवारों पर गोबर का गोइठा सूखता रहता है। वैसे मिट्टी की दीवारों और फूस की छत वाले घर पर्यावरण और स्वास्थ्य के अनुकूल तो होते हैं, परंतु इनकी मरम्मत और रख-रखाव बहुत कठिन होता है। और आजकल इस काम के लिए कारीगरों और मजदूरों की कमी हो रही है। इसलिए आने वाले समय में ऐसे घरों के निर्माण और मरम्मत का काम कठिनतर होता जाएगा। अत: पक्के घर बनाना ही श्रेयस्कर होगा।
मलूटी के मंदिरों और मलूटी गांव के बाद इन मंदिरों का निर्माण करने वाले राजाओं का उल्लेख न करना उनके प्रति बहुत बड़ा अन्याय होगा। अब मलूटी के मंदिरों की चर्चा तो होने लगी है, किंतु उन राजाओं की चर्चा नहीं होती जिन्होंने ऐसे अविस्मरणीय और अद्भुत मंदिर बनवाए हैं। वास्तव में इन राजाओं पर गहन शोध होना चाहिए कि ऐसा क्या था उनके व्यक्तित्व में कि वे इतने नि:स्वार्थी, परोपकारी और सामाजिक थे। हमारे शास्त्रों में परोपकार: पुण्याय का उल्लेख है। इस प्रकार परोपकार करना ही पुण्य है। उस समय मंदिर संपूर्ण समाज के लिए शिक्षा, संस्कार और धर्म का केंद्र होते थे। अत: उन राजाओं की धार्मिक एवं सामाजिक निष्ठा की जितनी प्रशंसा की जाए कम होगी।
सामान्यतया हम यही सुनते और पढ़ते आए हैं कि राज्य प्राप्त करने के लिए राजा रक्त बहाते हैं और राज्य प्राप्ति के उपरांत अपनी दैहिक सुख-सुविधा का सामान इक_ा करते हैं। परंतु मलूटी के एक के बाद एक राजा ने न तो अपने लिए महल या हवेली ही बनवाई और न ही वे अन्य सुविधाओं के पीछे भागे। पूरी तरह समाज के लिए जीवन जीने का ऐसा उदाहरण शायद ही कहीं मिलेगा! मलूटी के राजा राखड़चंद्र के विषय में साहा बताते हैं कि वह बड़े ही धार्मिक, निष्ठावान और भोग-विलासिता से मुक्त एक लोकप्रिय राजा थे। कोई आश्चर्य नहीं कि इन्हें लोग संन्यासी राजा भी कहा करते थे।
इतने मंदिरों और तालाबों के निर्माण के बारे में जानकर हम बड़ी सहजता से इस परिणाम पर पहुंच सकते हैं कि अतीत में यह गांव समृद्ध रहा होगा। अन्यथा इतने बड़े पैमाने पर निर्माण के लिए धन का संग्रह नहीं हो पाता। साथ ही बड़ी संख्या में उत्कृष्ट कोटि के शिल्पकार और प्रकांड पंडित इस महती कार्य में लगाए गए होंगे, जो उस समय के लिए किसी भी प्रकार से कम चुनौतीपूर्ण कार्य नहीं रहा होगा। इस प्रकार यह कितनी बड़ी विडंबना है कि हम उन महान आत्माओं के विषय में बिल्कुल ही नहीं जानते, जिन्होंने ऐसे अनूठे, ऐतिहासिक और लोकहितकारी कार्य किए हैं ! अत: सरकार तथा स्वतंत्र शोधकर्ताओं का यह पुनीत कर्तव्य है कि वे इन राजाओं के विषय में यथासाध्य सामग्री एकत्रित करके शोध करें और समाज को बताएं।





