विकास के लिए आवश्यक है धरोहर का संरक्षण

भारत विविधताओं से भरा देश है खान-पान रहन-सहन, भाषायें वेशभूशा सभी प्रकार की विभिन्नता यहाँ के सौन्दर्य को परिपुष्ट करती है। ज्ञान-विज्ञान की आदि धरा विश्व की अनन्य संस्कृति की धात्राी भारतभूमि ने अनेक संघर्षों में अपने को अक्षुण्ण बनाये रखा। इस्लामिक आक्रमणों से संघर्ष का इतिहास दीर्घ काल रहा। परन्तु भारत ने अपने अस्तित्व को बनाये रखा। उसके पश्चात, भारत ने अंग्रेजों के साथ दीर्घकाल तक संघर्ष किया। परन्तु वह इतना दीर्घ नही था जितना कि इस्लामिक परन्तु देश को सर्वाधिक प्रभावित यदि किसी ने किया तो वह था अंग्रेजी संघर्ष। भारत ने जो हजार वर्ष के संघर्ष में नहीं खोया उसे मात्रा 200 वर्ष के काल खण्ड में खो दिया।
क्या कारण रहा कि हम अपने पूर्वजों की गौरव गाथा का भूल गये? जिन दानवों से निरन्तर संघर्ष करते रहे जिनसे मुक्ति का मार्ग खोजते रहे, आज उन्हें ही महिमा मण्डित करने लगे है। अपनी चिति को अंग्रेजियत का गुलाम बना दिया है हमने। भारत की विश्व व्यापिनी संस्कृति को आज क्यों हमने सांप्रदायिक वृक्ष की शाखा बना दिया है। ’वसुधैव कुटुमबकम्’ का राग जिसने गाया, सर्वे भवन्तु सुखिनः की ध्वनि आज भी जिसके कण्ठ से निकलती है, क्यों उसे आज का निम्नतम स्वरूप प्रदान किया गया? कौन से कारण थे इसके?
सभी प्रश्नों का उत्तर है हमारी विस्मृति। हमने अपने पूर्वजों को भुला दिया, अपनी धरोहर, अपनी गौरव गाथा को भुला दिया। जिसे कभी विश्व धरोहर माना जाता था आज उसे हमने सांप्रदायिक बना दिया। वेद, उपनिषद, रामायण महाभारत आदि वैश्विक ज्ञान के आगार है जिन्हें हमने सांप्रदायिक ग्रन्थ बना दिया। विश्व कल्याण के लिए लिखे गये ग्रन्थ जब संप्रदाय विशेष के गन्थ बन जायें तो उनके मानसिक संकुचन की कल्पना की जा सकती है। विश्व गुरू कहलाने वाला भारत सोने की चिड़िया कहलाने वाला भारत, जहां दुनिया भर के लोग लूटने या व्यापार करने आते थे, वह देश अचानक भिखमंगों वाला देश कैसे हो जाता है? विश्व में ज्ञान की ज्योति जलाने वाला देश अचानक ’अनपढ़ गंवारों’ का देश कैसे हो जाता है? जिन लोगों ने भारत के विषय में इस प्रकार हीन भावना को विकसित करने का प्रयास किया, उनसे अधिक दोषी वे लोग है जिन्होंने अपने विषय में कही गयी अनर्गल बातों को स्वीकृति दी।
हमने एक बार भी यह प्रश्न नहीं किया कि जब हम भिखारी थे तो तुम यहां व्यापार करने क्यों आये? जब हम ज्ञान शून्य थे तो तुम यहां ज्ञानार्जन करने क्यों आये? वेद में मूर्खता पूर्ण बातंे भरी है तो तुमने इनके अध्ययन में समय क्यों बर्बाद किया? क्यों इनका अनुवाद अपनी भाषाओं में करने की मूर्खता की? हमारे बुद्धिजीवियों ने न तो तब कोई प्रश्न किया और न आज करते हैं? उनके द्वारा की गयी तथ्यहीन बातों को अपनी स्वीकृति दी। उसका ही परिणाम है कि हम आज स्वाभिमानशून्य पीढ़ी का निर्माण कर रहे है। क्या यह सोच देश को गुरूता प्रदान कर सकती है? कदापि नहीं। हम जब तक अपने गौरवमय इतिहास को नहीं पहचानेगें उसके प्रति स्वाभिमान निर्माण नहीं होगा। हमे अपने स्वाभिमान को जगाने की आवश्यकता है। अपनी धरोहर को पुनः समाज में स्थापित करने की आवश्यकता है।