वेदों का दिव्य ज्ञान एवं अमर सन्देश

डॉ. प्रणव पंड्या
प्रमुख, अखिल विश्व गायत्री परिवार


परम पूज्य वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने वेदों का भाष्य आज के परिप्रेक्ष्य में किया है। वेदों के दिव्य एवं अमर सन्देश को न केवल प्रगतिशील प्रेरणा, प्रकाश एवं अलौकिक दिव्य ज्ञान को व्यावहारिक दैन्दिन जीवन—क्रम में समुचित समावेश हेतु सामयिक भाष्य किया है, वरन् उन्होंने मानव जीवन के उद्भव-उत्कर्ष से लेकर सम्पूर्ण जीवनकाल खण्डों में किस प्रकार दिव्य ज्ञान एवं अमर सन्देश की महती आवश्यकता होती है, का प्रतिपादन करते हुए बहुत ही सरल भाष्य किया है। उन्होंने मूल वेद मंत्रों के साथ सरल हिन्दी अनुवाद बड़े सुयोग्य ढंग से प्रस्तुत किया गया है जिसे साधारण पढ़े लिखे लोग भी समझ सकते हैं।

मानव जाति के ज्ञान का आदि स्रोत वेद ही है। हमारे ऋषियों का तो कहना है कि वेद ईश्वरीय ज्ञान है और उसे परमात्मा से ही ऋषियों ने प्राप्त किया है। वेद का अर्थ ही है ज्ञान। आरम्भ में मानव-मन विकृत नहीं था। मन का मूल रूप सात्विक है। आदि युग में वह सम्पूर्ण सात्विक था। सभी आध्यात्मशास्त्र एक स्वर से स्वीकार करते हैं कि सम्पूर्ण निर्मल एवं शुद्ध मन में परमात्मा की ज्योति प्रकट होती है। आदि मानव ने अपने निर्मल तथा शुद्ध हृदय में परमात्मा का साक्षात किया। उस समय उसके हृदय में दिव्य वाणी प्रकट हुई। जिस ऋषि ने समाधि में जिस मन्त्र को उपलब्ध किया, वह उसका दृष्टा कहा गया है, अर्थात् वह उसे देखने वाला हुआ। उसी दिव्य वाणी पर अपने शुद्ध हृदय में उस ऋषि ने मन को एकाग्र किया और इस एकाग्रता के द्वारा उसके अर्थ को जाना। इस प्रकार वेद वह ईश्वरीय वाणी है जिसे ऋषियों ने समाधि की स्थिति में सुना है।
इस चलायमान संसार में जो कुछ चलता हुआ है, सब ईश्वर से आच्छादित है। इसलिये त्याग भाव से भोग करो और किसी के भी धन का लालच मत करो।

इस संसार में कर्म करते हुए सौ वर्ष जीने की इच्छा करो। तभी तुमसे कर्म का लगाव छूट सकेगा। कर्म बन्धन से छूटने का इसके अतिरिक्त अन्य उपाय नहीं है। जो आत्मघात करने वाले पुरुष हैं, वे यहाँ से शरीर छोड़ कर उन लोकों में जाते हैं, जो प्रगट अन्धकार से भरे हुए हैं, और असुरों के योग्य हैं। जो आत्मा में समस्त प्राणियों को और समस्त प्राणियों में आत्मा को अनुभव करता है, वह किसी से घृणा नहीं करता।

जिस अवस्था में एकता का दर्शन करने का ज्ञानी पुरुष को सब प्राणियों में आत्म-तत्व ही प्रतीत होने लगता है, उस अवस्था में उसे मोह और शोक नहीं रहता। इस तरह वेदों के दिव्य ज्ञान एवं सन्देश से वेद और विज्ञान-ब्रह्मांड विकास का सतत तुलनात्मक अनुसंधान अनवरत जारी है और इसके आदि एवं अन्त अनन्त है। ‘संसार में जो कुछ भी है वह सापेक्ष है। 1.समय या काल (टाइम) 2. ब्रह्मांड (स्पेश) 3. गति (मोशन) और 4. कारण (काजेशन)- नाम की कोई मूल वस्तुयें नहीं हैं वरन् यह परस्पर तुलनायें हैं, जो ज्ञान, भावना, विचार या अनुभूति में सन्निहित हैं।’

समय क्या है?- कोई घटना प्रारंभ होती है, फिर वह कहीं-न-कहीं जाकर समाप्त होती है। इन दोनों की अनुभूति के अन्तर का नाम समय है। 2. चन्द्रमा कोई स्वतंत्र ब्रह्मांड नहीं। जिस तरह अनेक प्रकार के तत्वों से पृथ्वी बनी है, वैसे ही तारामण्डल के समस्त तारागण पदार्थ से बने हैं। इन सब के बीच समान वस्तुओं में आकर्षण का सिद्धांत काम करता है। इसलिये प्रत्येक ब्रह्मांड में दूसरे की तुलना में कुछ तत्व अधिक, कुछ कम होते हैं। पृथ्वी में धूल के कण अधिक हैं, सूर्य में हीलियम अथवा अग्नि के। परमाणुओं की तुलना में ब्रह्मांडों की स्थिति का पता चलता है। यदि परमाणुओं में समान-जातीय गठबंधन न होता तो ब्रह्मांड ही नहीं पदार्थों की भी अनुभूति नहीं होती। 3. इसी प्रकार गति भी सापेक्ष है। कलकत्ते से हवाई जहाज उड़ता है और लन्दन तक पहुँचने में 36 घण्टे लेता है। यह हमारी पार्थिव माप है। यदि हम सूर्य में बैठे हुए हों, तो चूँकि सूर्य भी अपने सौर मण्डल को लेकर चल रहा है, इसलिये वहाँ की गति भी हमें प्रभावित करेगी। तब यह 36 घण्टे का समय हमें आँच मिचकने जितना कम लगेगा। ऐसे 4 कारण सिद्धांत भी हैं। अब वैज्ञानिक भी मानने लगे हैं कि संसार में जो भी पदार्थ हैं वह सब शक्ति हैं और संगठित होकर पदार्थ बनाने वाले प्रोटानों एवं इलेक्ट्रानों की संख्या यदि कम या अधिक की जा सके, जो कि प्रकृति में अपने आप होता रहता है, तो एक पदार्थ को दूसरे पदार्थ में भौतिक रूप से भी बदलकर दिखाया जा सकता है।

उदाहरण के लिये आवर्ती सारणी (पीरियाडिक टेबल) में इरीडियम, प्लैटिनम, गोल्ड (सोना) और मरकरी (पारा) का परमाणु क्रमांक या प्रोटानों की संख्या क्रमश: 77, 78, 79 और 80 होती है। यदि 80 प्रोटानों वाले मरकरी (पारा) परमाणु से एक प्रोटोन कम कर दें तो वही परमाणु सोने का परमाणु हो जायेगा। अब यदि उसमें से भी एक प्रोटॉन निकाल बाहर करें तो वही सोना प्लैटिनम में, प्लेटिनम इरीडियम में, इरीडियम क्रमश: ओस्मियम, रीनियम, टंगस्टन आदि में बदलते-बदलते हाइड्रोजन तक अर्थात् कुल एक प्रोटोन वाले सबसे हल्के तत्व में बदल जायेगा। हाइड्रोजन से भी हल्का कोई तत्व संसार में है, यह वैज्ञानिकों को ज्ञात नहीं।

1922 में सोवियत वैज्ञानिक अलेक्सान्देर फ्रीडमैन ने आइन्स्टीन के उपरोक्त सिद्धांत का गहन अध्ययन कर यह बताया कि इस सिद्धांत का अर्थ यह हुआ कि ब्रह्माण्ड फैल रहा है अर्थात् पहले कभी सारा संसार किसी छोटे-से-छोटे व्यास वाले बिन्दु में समाया था- इतने दिनों बाद वह फैलता-फैलता 10 करोड़ ओस की बूंदें और 50 करोड़ प्रकाश वर्ष के घेरे में आ पहुँचा तब से अब तक लगातार असंख्य खोजें हुई हैं और वे फीडमेन की उक्त कल्पना की ही पुष्टि नहीं करतीं वरन् अब उससे भी आगे निकलकर भारतीय अध्यात्म के प्रतिपादनों को छूने लगी हैं।

ब्रह्मांड के विकास की जानकारी के लिये आजकल अनेक विशालकाय और साधन सम्पन्न वेधशालाएं अध्ययन और प्रयोगरत हैं। प्रकाश तरंगों से यह अनुमान लगाया जा रहा है कि अत्यन्त सूक्ष्म अवस्था में अनेक तत्व गैस की स्थिति में बहती हुई ओस की बंूदें किसी न चुकने वाले ऐसे प्रकाश स्रोत से आ रही हैं जो सम्पूर्ण सृष्टि का केन्द्र बिन्दु है, उसके वर्तमान स्वरूप का अभी पता नहीं है। पर वैज्ञानिक उसकी पूर्व स्थिति का पता लगाने में अवश्य जुटे हैं। अभी इस क्षेत्र में अधिकांश परिकल्पनाएं ही काम कर रही हैं। कोई तो कहता है कि जिन प्रारंभिक कणों से ब्रह्मांड की रचना हुई वह इतने गर्म थे कि ब्रह्मांड का जब विस्तार प्रारंभ हुआ तब उसके कुल दस मिनट बाद तापमान एक अरब डिग्री सेन्टीग्रेड था। उसमें स्थूल कण न होकर केवल न्यूट्रॉन थे। रूस के वैज्ञानिक डॉ. चाकोब जेल्डोविच का विचार इससे भिन्न है। उनका कहना है कि सृष्टि के मूल विकास की प्रक्रिया हाइड्रोजन से प्रारंभ होती है। उसमें भाग लेने वाले अणुओं में अकेले न्यूट्रॉन ही नहीं थे वरन् प्रोटीन, इलेक्ट्रान भी थे। अत्यधिक शीत के कारण हाइड्रोजन एक जमे हुए पदार्थ के रूप में था। वही टूट-टूट कर बूँद और परमाणुओं के रूप में फैलता चला गया और तापमान तथा वायु दाब (प्रेशर) आदि की विभिन्न परिस्थितियों में आवर्ती सारिणी के अनेक पदार्थों में बदलता चला गया। आज जो अनेक तारागण, पृथ्वी आदि दिखाई देते हैं वह सब इस जमे हुए हाइड्रोजन के ही परिवर्तित और परिवद्र्धित रूप हैं। ब्रह्मांड-विकास की इस वैज्ञानिक जानकारी को जब सृष्टि-उत्पत्ति विषयक ऋषि प्रणीत वेद से तुलना करते हैं तो पता चलता है कि हमारी जानकारियाँ कितनी अत्याधुनिक तथा दर्शन कितना विज्ञानसम्मत रहा है। विज्ञान की दिनों दिन बढ़ती प्रगति निरन्तर भारतीय सिद्धांतों की ही पुष्टि करती चली जा रही हैं। जो लोग यह सोचते हैं कि भारतीयों ने केवल भावनाओं की ही महत्ता प्रतिपादित की, उन्हें अब यह भी जानना चाहिए कि हमारा प्रत्येक प्रतिपादन भौतिक विज्ञान की ही आधारशिला पर रहा है।

ऋवेद के (10 190) पुरुष सूक्त और दशवें मण्डल में प्रयुक्त कई सूक्त, मंत्र या ऋचाओं में सृष्टि विकास विषयक जो भी निर्देशन है वह न केवल उपरोक्त वैज्ञानिक अनुसंधानों से मेल खाता है वरन् उससे भी परिमार्जित शुद्ध ज्ञान है। साथ ही उसमें आत्मा के उत्थान और विकास का विज्ञान भी संयुक्त होने के कारण वह मनुष्य मात्र के लिए लाभदायक भी है।
भौतिक शास्त्रियों ने हाइड्रोजन सरीखे किसी पदार्थ को ब्रह्मांड विकास का मूल माना है। इस संबंध में सभी वैज्ञानिकों में मतभेद है, जबकि हमारे सभी प्राचीन ग्रंथकार इस संबंध में एकमत रहे हैं कि यह संपूर्ण जगत एक ही पुरुष या परमात्मा की इच्छा या आदि तत्व में क्षोभ के कारण उत्पन्न हुआ। पुरुष शब्द का अर्थ मनुष्य से जान पड़ता है। पर वस्तुत: पुरुष का अर्थ ‘सम्पूर्ण जीव जगत में व्याप्त चेतना’ से है, जो अव्यक्त, अक्षर, अविनाशी और अनादि है। उसे ही परब्रह्म कहा है।
आइन्स्टीन ने सृष्टि के मुख्य मानक (फैक्ट्स) चार ही माने थे। पर सच बात यह है कि-‘मनुष्य के स्वभाव और विराट चेतना की कार्य-प्रणाली प्रकृति के स्वभाव और क्रिया की जानकारी’ भी उसमें पाँचवीं संयुक्त होनी चाहिए। संसार जितना दृश्य है उतना ही मानसिक और आत्मिक भी। आत्मा और मन के विज्ञान को छोड़ा नहीं जा सकता।
चेतना जो पुरुष रूप में भी थी वह ‘हरिण्यगर्म’ तथा ‘प्रजापति’ रूप में थी। हिरण्यगर्भ का अर्थ ‘प्रकाश व अग्नि स्वरूप’ और प्रजापति का अर्थ ‘उसमें भरी हुई चेतना, इच्छा व विचार शक्ति’ से ही है। फिर जब उस पुरुष में क्षोभ उत्पन्न हुआ, तो उसने अपने तेजस कणों से शीत कणों की उत्पत्ति की (पुरुष भी तत्व है) उन्हें आप:कण कहा गया। इन आप:, जिनका अर्थ सलिल होता है, को हाइड्रोजन ही मानना चाहिए। क्योंकि आप: का अर्थ स्थूल जल से नहीं, सूक्ष्म जल से है और हाइड्रोजन भी जल बनाने वाला ही तत्व है। यहाँ से भारतीय विज्ञान व पाश्चात्य विज्ञान में तुलना प्रारंभ हो जाती है- अपों सघातो विलयनंच तेज: संयोगात’ वैशेषिक दर्शन 51218। इन आप: कणों में संपीडऩ (प्रेशर) उत्पन्न होने से क्रमश: एक परमाणु एक अणु (हाइड्रोजन) द्रवणुक अर्थात् दो प्रोटोन या इलेक्ट्रान वाला [होलियम] त्रसरेणु अर्थात् तीन इलेक्ट्रान वाला (लीथियम) आदि अनेक गैसों, धातुओं, खनिजों आदि प्रकृति की उत्पत्ति होती चली गई। यह क्रम आवर्ती सारिणी के अनुसार ही है। पर हमारे यहाँ आप: (जल), अग्नि और वायु की स्थिति को मुख्य माना है। धातुओं और खनिजों में उनकी उपस्थिति अनिवार्य रूप से रहती है। इसलिये यह सब तत्व नहीं माने गये, जो ठीक भी है। तत्व तो वह हैं जो रासायनिक क्रिया में भाग लेते हैं। रासायनिक क्रिया में मूल रूप से अग्नि, जल, वायु (एअर प्रेशर और टेम्परेचर) ही भाग लेते हैं, इसलिये उन्हीं को तत्व कहा जाना ठीक है। यदि अग्नि, आप: और दबाव आदि न हो तो रासायनिक क्रिया कभी हो ही नहीं सकती। इस तरह सृष्टि-विकास की मूल प्रक्रिया अग्नि और जल-कणों से ही गैस रूप में होती है। नीहारिका एक प्रकार की गैस ही है जो वायु के संसर्ग में आते ही दूसरे-दूसरे भौतिक तत्वों की उत्पत्ति और अनेक ब्रह्मांडों का सृजन करती है।

निष्कर्ष

निष्कर्षत: वेदों के सन्दर्भ में वेदों के दिव्य ज्ञान एवं अमर सन्देशों जो तीनों कालों- भूत, वर्तमान एवं भविष्य में सदैव ही शाश्वत ज्ञान एवं शाश्वत सन्देश के रूप में सदा-सर्वदा सार्वभौम तो कोई अत्युक्ति नहीं, चूँकि ज्ञान और विज्ञान के आदि एवं अनुपम स्वरूप के बारे में सारे ऋषि-मनीषियों, तत्त्ववेत्ताओं, वेद विदुषियों, मनस्वी चिन्तकों से लेकर यहाँ तक कि इस वैज्ञानिक युग में समस्त विज्ञान सम्मत प्रतिपादनों के आधार पर दिव्य एवं अलौकिक ज्ञान-सम्पदा के भण्डारण और सभी कालों में अमर सन्देशों की शाश्वतता वैज्ञानिकता के आधार पर प्रमाणित हैं जो मनुष्यता एवं मानव जाति के लिए सदैव ही गर्व-गौरव की बात है। आज वर्तमान परिप्रेक्ष्य में जब वेदों के दिव्य ज्ञान एवं अमर सन्देशों को मानवी चेतना के अन्तराल में स्थापित करने और व्यवहारिकता की धरातल में अवतरित करने पर स्वयं वैज्ञानिक वैज्ञानिक सम्मत प्रतिपादन करते हुए आदि, अनुपम, अमोघ ज्ञान के रूप में न केवल स्वीकार रहे हैं, वरन् विअध्यात्म तत्वदर्शन अर्थात् ज्ञान के अनादि स्रोत से विज्ञान की उत्पत्ति हुयी है, यह आध्यात्मिक-वैज्ञानिक सम्मत प्रतिपादन वेदों के चिरंतन अमर सन्देश को प्रमाणित कर वेद-ज्ञान मानव जीवन की सफलता, सार्थकता के लिए न केवल आवश्यक है, वरन्, मानव जीवन में इसकी अनिवार्य आवश्यकता भी है। इस प्रकार वेदों का दिव्य ज्ञान-अमर सन्देश सभी कालों में वैज्ञानिक सम्मत एवं शाश्वत है।