तलाक

वैद्य गुरुदत्त


”तो जाती क्यों नही न्यायालय में?”
”वहां क्या करने के लिए जाऊं?”
”मुझे तलाक देने।”
”क्यों दूं तलाक?”
”मैं दुराचारी हूं, मैं तुम्हें खर्चा नहीं देता, तुम्हारे बच्चे को मिठाई लाकर नहीं देता और भी जो-जो कुछ तुम चाहती हो, उस सबके लिए।”
ऐसी चुनौती सुनकर तो सदारानी टुकर-टुकर मुख देखती रह गई। उसका पति सुरेंद्र मोहन मुसकराते हुए अपनी आरामकुरसी पर बैठ गया था। सिगार का कश लगा धुआं छोडते हुए और छत की ओर देखते ओर वह बोला, ”क्या मजे में कह दिया, मत लाया करो इन लड़कियों को घर में। घर में ना लाऊं तो कहा ले जाऊँ?”

”मैं तो यह कह रही थी कि आप मेरे खाने पीने और वस्त्रादि के लिए तो कुछ देते नहीं और जब ये लड़कियां आती हैं, तो घर में लहर-बहर लग जाती है।”
”यह तो तुम ठीक कह रही हो, पर मैं विचार करता हूं कि तुमको मैं क्यों दूं? दो लकडिय़ां जलाकर उसके चार चक्कर काट लेने से क्या मैं तुम्हारा देनदार हो गया हूं?”
”आप इस बेटे के बाप हैं। इस पर ही दया कर इसकी मां को कुछ दे दिया करें? मैं अपनी सौंगध खाकर कहती हूं कि कल से एक भी दाना मेरे पेट में नहीं गया।”
”दाने तो मेरे पास बहुत हैं, पर तुम्हें क्यों खाने दूं? तुम अपना ठिकाना कहीं अन्यत्र क्यों नहीं बना लेती? घर छोड़ोगी, तो फिर तुमको दूसरी लड़कियों के यहां आते और खाते पीते देख देख दु:ख नहीं होगा।”
”पर जाऊं कहां?”
”अपने बाप के घर जा सकती हो।”
”और यह बच्चा?”
”इसकी मुझे आवश्यकता नहीं।”
”तो विवाह क्यों किया था?”
”पत्नी पाने के लिए किया था, किंतु यह तो अपने आप बिना इच्छा किए ही आ पहुंचा है।”
अपने पति की इस जीवन-मीमांसा का उत्तर पत्नी नहीं दे सकी। सुरेंद्र उसकी कई बार कह चुका था कि उसे वह पसंद नहीं है और जहां उसके सींग समाएं, वह जा सकती है। आज उसने यह भी कह दिया था कि भारत सरकार की कृपा से उसके लिए अपने इस नालायक पति को छोड़ देने का मार्ग प्रशस्त हो चुका है।
सुरेंद्र अपने काम पर जाने के लिए तैयार था और उसकी पत्नी अपने खाने-पीने के लिए उससे पैसे मांगने आई थी। उस समय उनमें उक्त वार्तालाप हुआ था। सुरेंद्र मोहन ज़ाने लगा, तो उसे एक बात स्मरण हो आई। उसने कहा,”अच्छा, एक काम करो। मैं तुमको पचास रूपये देता हूं। इन रूपयों में तुम चार व्यक्तियों के खाने के लिए सामान तैयार करना। एक बोतल व्हिस्की, दो मुर्ग, नान, प्याज, टमाटर, खीरा, चुकंदर की सलाद, मेज पर सफेद चादर और पलंग पर धुला बिस्तर, कुछ फूल इत्यादि भी। बताओ कर सकोगी?”
”चार में कौन-कौन होगा?”
”मैं, सरोज, मनोज और चौथी तुम।”
”दोनों, एक साथ?”
”हां।”
”परंतु पचास रूपये पूरे हो जाएंगे क्या?”
”देखो, पैंतीस की बोतल, दस रूपये के दो मुर्ग, एक रूपया सलाद के लिए, घी-मिर्च, नमक-मसाला आदि के लिए चार रूपये।”
”और इस समय पेट भरने के लिए? यदि कुछ खाऊंगी नहीं, तो यह सब तैयार कैसे करूंगी?”
”अच्छा, पांच रूपए और ले लो, परंतु हिसाब देना होगा,”

सदारानी चुप रही। सुरेंद्र ने पचपन रूपए उसके सम्मुख फेंके और सीढिय़ों से नीचे उतर गया।
सदारानी ने पिछले मास एक चूड़ी बेचकर मास भर निर्वाह किया था। इस बार वह दूसरी चूड़ी बेचनेवाली थी, जबकि उसके मन में विचार आया कि जीवन बहुत लंबा है। इस प्रकार कब तक चलेगा और जब सब चूडिय़ां बिक जाएंगी और पतिदेव को पता चलेगा, तो वह चोरी के आरोप लगा सकता है। तब वह किस-किस को बताती फिरेगी कि उसने अपना पेट भरने तथा बच्चे कि दूध के लिए यह सब किया था। आज वह अपने पति को बतानेवाली थी कि वह चूडिय़ां बेचकर खाने का सामान खरीद रही है। उसके ऐसा कहने के पूर्व ही तलाक की बात चल पड़ी थी और फिर सरोज, मनोज के आने का प्रस्ताव हो गया।
जब उसके पति ने उसके सामने पचपन रूपये फेंके तो उसने उठाए नहीं। सुरेंद्र मोहन नीचे उतर गया तो उसने रूपये उठाए और गिन डाले। अब वह विचार करने लगी कि क्या वह इन रूपयों से अपने पति के भोग विलास का प्रबंध करे? एक बार, पहले भी उसने ऐसा किया था। तब उसके मन में यह भावना थी कि वह अपने खाना बनाने तथा दावत का प्रबंध करने में योग्यता दिखाकर अपने पति को प्रसन्न कर लेगी, परंतु ऐसा हुआ नहीं। उसने पुन: ऐसा करने से इनकार कर दिया था। प्राय: सप्ताह में एक बार उसका पति इस प्रकार की दावतें किया करता था और पीछे कई बार, जब सदारानी ने इस प्रकार की दावत के प्रबंध करने से इनकार कर दिया, तो उसने घर का सब खर्च बंद कर दिया और जब भी वे लड़कियां आतीं, तो वह किसी होटलवाले से प्रबंध करवा लेता और पचास के स्थान पर सत्तर-पचहत्तर व्यय कर देता। इस प्रकार अधिक व्यय होने पर वह और भी चिढ़ जाता और घरखर्च न देने के लिए उसका संकल्प दृढ़ होता जाता।
सदारानी ने अपने मन में निश्चय किया किं वह अपने पति के इस प्रकार के भोग-विलास की प्रबंधिका नहीं बनेगी। आज जब सुरेद्र मोहन ने उसको स्वीकृति मान लिया और निश्चित हो अपने कार्यालय चला गया।
सदारानी ने रूपये उठाये तो इस निश्चय के साथ कि वह अब इस घर को छोड़ देगी। उसके पिता लखनऊ में रहते थे। बहुत साधारण वृत्ति के व्यक्ति थे और एक बहुत बड़े परिवार के बोझ के कारण वह लड़की की सहायता करने में असमर्थ थे। यदि सदारानी अभी तक वहां नहीं गई थी, तो इसी कारण कि वह उनके दु:ख के कारण बनना नहीं चाहती थी। परंतु जब पानी नाक से भी ऊपर आ गया, तो डूबने से बचने के लिए अंतिम उपाय वही प्रतीत हुआ और वह लखनऊ जाने के लिए तैयार हो गई।
जब जाने का विचार पक्का हुआ, तो यह समझकर कि वह जीवन भर के लिए जा रही है, उसने अपने सब आभूषण एकत्रित किए, उन्हें अपने तथा बच्चे के कपड़ों के साथ संदूक में रखा और तांगे में बैठ स्टेशन जा पहुंची। दिन के ग्यारह बजे शाहजहांपुर से गाड़ी में बैठकर साढ़े सात बजे सायं वह अपने पिता के घर पहुंची।
सदारानी का पिता अपने कार्यालय से आकर पड़ोस के दो बच्चों को पढ़ाने के लिए जाया करता था। वह वहां गया हुआ था। उसका भाई बी. ए. में पढ़ रहा था। वह भी आठवीं कक्षा के एक छात्र को पढ़ाया करता था। उसके चार और बहन-भाई तथा उसकी मां उस समय घर पर थे। लड़की को बिना किसी प्रकार की सूचना दिए आती देख मां मुख देखती रह गई। उसके भाई-बहन भी उसको विस्मय से देख रहे थे।
पार्वती ने पूछा, ”सदा, क्या बात है, इस प्रकार किस कारण आई हो?”
”मां, मैं पति का घर छोड़ आई हूं। पिताजी कहां है?”
”वे पढ़ाने गए हैं, आते ही होंगे?”
”और विनोद?”
”वह भी पढ़ाने गया है। आजकल महंगाई इतनी बढ़ गई है कि एक आदमी की कमाई एक के लिए ही पर्याप्त नहीं होती।”
सदारानी ने अपना संदूक मां के कमरे में रख दिया और अपने सबसे छोटे भाई जगदीश को बाजार भेजकर बच्चे के लिए दूध मंगवाया।
पार्वती विचार कर रही थी कि यह एक और बोझ सिर पर आ पड़ा है। भगवान जाने क्या कर आई है, जो एकाएक इस प्रकार जा धमकी है। छह मास पूर्व आई थी, उस समय भी अपने पति के व्यवहार से संतुष्ट नहीं थी, परंतु वहां से सदा के लिए चले आने का तो उस समय कोई विचार था ही नहीं।
पार्वती रात का खाना बना रही थी। अत: अनुमान से उसने एक व्यक्ति के लिए और आटा छान लिया। एक चतुर गृहणी की भांती इस महंगाई के युग में वह एक दाना भी व्यर्थ गंवाना नही चाहती थी।

बाजार से दूध आया, तो गरम कर बच्चे को दिया गया। वह दूध पीकर से गया। सदारानी ने अड़तालीस घंटों से भोजन नहीं किया था। अब वह उत्सुकता से रोटी बनने की प्रतीक्षा कर रही थी। इस कारण वह उठी और मां से बोली, ”मां हटो तो, आज मैं पका देती हूं।”

सदारानी का पिता जब पढ़ाकर आया, उसने अपनी बेटी को रसोई में रोटी सेंकते देखा, तो अपनी पत्नी को पृथक ले जाकर पूछने लगा, ”कैसे आई है सदा?”
”मालूम होता है, पति से लड़कर आई है।”
”लड़कर आना तो विचित्र नहीं हो सकता। भय तो इस बात का है कि कहीं घर से निकाल न दी गई हो?”
”यह आप ही उससे पूछ लीजिए। मुझे तो बहुत ही बुरी बात सुननी न पड़ जाए, इससे भय लगता है।”
”क्या बुरी बात हो सकती है।”
”लड़की पर कोई झूठा-सच्चा आरोप न लग गया हो और घरवाले ने धक्के दे देकर निकाल दिया हो।”
”अच्छा, बच्चे सो जाएं, तो बात करेंगे। उनके सामने इस प्रकार की बातें ठीक नहीं होंगी।”
रात के भोजनोपरांत सदारानी ने अपनी पूर्ण बात अपने माता पिता को सुना दी। सब छोटे बच्चे अपनी अपनी पढ़ाई कर रहे थे। केवल विनोद उनके पास बैठा सुन रहा था। वह अब घर की समस्याओं को सुन, समझकर उनमें सहायता किया करता था। पिता ने उसको सदा की बात सुनने के लिए बुला लिया था।
”तो अब क्या करोगी?”

”वहां अकेली रहती तो व्यर्थ में बदनाम हो जाती, इस कारण यहां चली आई हूं।”
”ये पांच आभूषण पूर्ण जीवन भर साथ दे सकेंगे क्या? तुम जानती ही हो कि मैं तुम्हारी अधिक सहायता नहीं कर सकता। यहां तो सब सज्ञान प्राणी मेहनत करते हैं और जीवन चलाते हैं। सबके यत्न करने पर भी पेट पूरा नहीं भरता।”
”पिताजी, मैं यह सब जानती हूं। यह जानती हुई भी मैं यहाँ आई हूं। आप पर बोझ बनने के लिए नहीं। मैं भी जीवनयापन के लिए कुछ-न-कुछ करूंगी।”
विनोद कहने लगा,”पर बहिन, जीजाजी ने ठीक ही तो कहा था कि उनको तलाक दे सकती हो?”
”दे तो सकती हूं, परंतु मैं देना नहीं चाहती।”
”क्यों?”

”विनोद, तुम समझ नहीं सकोगे। मैं अब दूसरा विवाह नही करूंगी। जब विवाह ही नहीं करना, तो तलाक देने से क्या लाभ होगा? एक बार तलाक हो जाने के बाद पुन: सुलह के लिए कोई स्थान ही नहीं रह जाता।”
”परंतु तुम इस प्रकार कितने दिन तक जीवन चला सकोगी?”
सदारानी इस प्रश्न पर मुख देखती रह गई। इसका उत्तर जानती तो थी, परंतु भविष्य के विषय में कुछ भी कहने और उसमें किसी प्रकार का दावा करने का उसमें साहस नहीं था। तो भी वर्तमान पर ही अपना ध्यान केंद्रित करते हुए उसने कहा, ”विनोद, धन वैभव और अकिंचनता का संबंध विवाह करने अथवा न करने के साथ नहीं है। तुम लोग भी तो जीवन संघर्ष कर रहे हो। यहां तो माता-पिता में झगड़ा नहीं। दोनों परस्पर प्रेम से रहते हैं।”
”पर बहिन, हम तो आशा करते हैं कि कुछ ही वर्षों में हमारी स्थिति बदल जाएगी। दो वर्ष में मैं बी.ए. कर लूंगा और फिर मोहन और जगदीश भी तैयार हो जाएंगे। सब मिलकर रहेंगे, तो घर में संपन्नता हो जाएगी।”

”यह आशा ही तो मनुष्य के जीवन का आश्रय है। इसी के भरोसे तो मनुष्य दुर्गम-से-दुर्गम कठिनाइयां पार करने की क्षमता प्राप्त करता है। विनोद, यह मुझमें भी विद्यमान है। पिताजी ने कुछ पढ़ा दिया था, उसके भरोसे मैं जीवनयापन तथा आगे उन्नति करने की आशा रखती हूं। मैं भी तुम्हारी भांति आशा कर रही हूं कि यह बच्चा बड़ा होगा, पढ़ लिख कर विद्वांन बनेगा और फिर घर में संपन्नता का आगमन होगा।”
”और तब तक तुम बूढ़ी हो जाओगी।”
”तो फिर क्या हुआ? यह तो सुखी हो जाएगा। उसकी सुख सुविधा से मेरे मन को तुष्टि होगी।”
”क्या तुष्टि होगी?”
”यही कि मैंने अपने परिश्रम से अपने पुत्र को संसार में सिर ऊंचा करने के लिए अवसर उपलब्ध कराया है। विनोद। गरीबी और अमीरी को बातें विवाह से संबंधित नहीं हैं। इसका संबंध भाग्य और पुरूषार्थ से हैं।”
”क्यों पिताजी, ”विनोद ने निरूत्तर होते हुए और उपने पिता की बात को आगे ले चलने के लिए पूछा,”आप क्या समझते हैं?”
”बेटा, सदारानी ठीक कहती है। विवाह के साथ दरिद्रता चली ही जाएगी, यह निश्चित नहीं। यह भाग्य की बात है, परंतु विवाह तो किसी अन्य बात के लिए किया जाता है। बड़े बड़े ऋषि महर्षि भी अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण नहीं रख सकते, इस कारण समाज ने इस नियंत्रण में सुविधा के लिए ही विवाह प्रथा बनाई गई है। मैं तो सदारानी को इस दिशा में विचार करने की बात कह रहा हूं। क्या वह जीवन को अकेली चला सकेगी?”

यह फिर भविष्य में होनेवाली संभावना की ओर संकेत था। सदारानी ने व्यर्थ का अभिमान और शौर्य दिखाने की अपेक्षा कहा,”पिताजी! आप बड़ों का आशीर्वाद और संरक्षण प्राप्त होता रहा, तो वह दुस्तर सागर भी पार हो ही जाएगा। कौन व्यक्ति है, जो भविष्य के संभावित भय से त्रसित वर्तमान को विकृत करने का यत्न करेगा। इस प्रकार विचार करना भी मैं ठीक नहीं समझती। मुझको यत्न करने दीजिए और कहीं मार्ग से विचलित होने लगंू तो आप सचेत कर दीजिए।”

विनोद ने पुन: वार्तालाप में हस्तक्षेप करते हुए कहा,”परंतु इस दुर्घटना का पूर्ण बोझ और कष्ट तो तुम केवल अपने ही कंधों पर उठाने की योजना बना रही हो। उस दुष्ट को क्या दंड मिलेगा? उसे तो तुमने स्वतंत्रता से गुलछरे उड़ाने के लिए मैदान खाली छोड़ दिया है?”

”भैया, मैं उनके विषय मेंं नहीं सोच रही। मेरी अनुपस्थिति में वे आनंद में होंगे अथवा दु:ख में, मैं विचार कर चिंता करने की स्थिति में नहीं हूं। मैं उनकी सुख सुविधा में सहायक होने की स्थिति में भी नहीं हूं। मैं तो अपने विषय में ही विचार और उपाय कर सकती हूं।”

”मैं तो चाहता हूं कि कोर्ट में तलाक की प्रार्थना कर दी जाए, और यत्न किया जाए कि बच्चे के लालन-पोषण के लिए उनसे खर्चा मिल जाए।”
उसके पिता ने कहा, ”इस प्रक्रिया में कम-से-कम एक वर्ष लग जाएगा। उसमें सदारानी को अपने पति के दुश्चरित्र होने की कहानी सुनानी पड़ेगी। साथ ही केवल सुनाने से तो काम बनेगा नही। अपने कथन के लिए प्रमाण और साक्षी भी प्रस्तुत करने होंगे। मैं समझता हूं कि मुकदमेबाजी में व्यर्थ का धन और शक्ति का व्यय नहीं करना चाहिए। यदि सदारानी को तलाक के बाद भी विवाह नहीं करना है, तो फिर इस सब झंझट की आवश्यकता ही क्या है?”
”परंतु पिताजी, जीजाजी को शिक्षा किस प्रकार मिलेगी?”

”शिक्षा तो उसका शिक्षक ही उसको देगा। सदारानी को मैंने उसका शिक्षक बनाकर नहीं भेजा था। विनोद, एक बात और समझ लो। तलाक देने से जो दंड मिलता है, वह पति नहीं, वरन् पत्नी को मिलता है। इस अवस्था में तो सुरेंद्र मोहन को अपनी पत्नी को तंग करने अथवा मारने-पीटने का पुरस्कार मिलेगा। नहीं, मेरी सम्मति में तलाक के लिए आज के कार्यक्रम में झगड़ा करना लाभ की बात नहीं।”

”परंतु तलाक का कानून बनानेवालों का तो यह कहना है कि स्त्रियों के सुखवद्र्धन के लिए इसका निर्माण किया गया है।”
सुरेंद्र मोहन की मित्रता अपने ही कार्यालय में काम करनेवाली दो लड़कियों से हो गई थी। पहले तो वह एक एक से पृथक पृथक संबंध रखता था। बाद में जब उन लड़कियों को पता चल गया, तो फिर दोनों से इकट्ठा व्यवहार रखने लगा। उनको बारी बारी से निमंत्रण देता था। जब सदारानी को उसके उनसे अनुचित संबंधों का ज्ञान हुआ, तो वह उनको घर पर लाने लगा। समय व्यतीत होता गया और सुरेंद्र मोहन अपने विकृत मार्ग पर आगे बढ़ता चला गया।

पत्नी से उसकी तनातनी रहने लगी और उसने उसको खर्चा देना बंद कर दिया। जब स्थिति असह्य हो गई, तो घर में ताला लगा सदारानी अपने पिता के घर चली गई।
उस दिन सुरेंद्र मोहन ने सरोज और मनोज दोनों को एक साथ ही रात के भोजन पर आमंत्रित किया था। वह पैसेवाला आदमी था। तीनों ही अपने अपने उद्देश्य में लीन थे। सुरेंद्र सुख भोग में और लड़कियां उसका धन शोषण में।

सायंकाल अपने कार्यालय से उठ सुरेंद्र मोहन किसी निश्चित रेस्तरां में उनमें से एक से मिलता था। वहां चाय पीकर प्राय: सिनेमा देखने के लिए चला जाता था। तदनंतर किसी अन्य रेस्तरां में भोजन के लिए जाया करता था, फिर घर पर ले आता और रात भर रख प्रात: वापस उसके घर भेज दिया करता था।
आज के कार्यक्रम में कुछ अंतर था। दोनों को एक साथ आमंत्रित किया गया था। सिनेमा से वह उनको घर लाने वाला था। भोजन का प्रबंध घर पर ही था, परंतु रात के साढ़े नौ बजे वह घर पर आया, तो मकान को ताला लगा देख वह भौंचक्का हो गया।

ताला बहुत मजबूत था, उसे तोडऩे में कठिनाई हुई। आधे घंटे से अधिक तो ताला तोडऩे में लग गया। अंदर जाकर उसने देखा कि भोजन के तो कहीं चिह्न तक नहीं थे और साथ ही उसकी पत्नी के वस्त्रों तथा आभूषणों का संदूक भी खाली पड़ा था।

जब सुरेंद्र मोहन देख रहा था कि घर में से क्या क्या गया है तो बड़ी लड़की सरोज ने पूछ लिया,”क्या हुआ है,”
”देवीजी सबकुछ लेकर भाग गई हैं।”
”सबकुछ से क्या मतलब?”
”अपने वस्त्राभूषण और…… और न जाने क्या क्या।”
”आपके पतलून कोट तो नहीं ले गई?”
सुरेंद्र मोहन ने मुसकराते हुए कहा,”नहीं।”
”और आपका पर्स?,”मनोज ने पूछा।
”नहीं वह भी है।”
”आपकी चैक बुक?”
मेज का दराज खोल सुरेंद्र ने कहा,”वह भी है।”
”तो फिर चिंता की कोई बात नहीं। ”सरोज ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा।
मनोज कहने लगी, ”मुझे तो भूख लगी है।”
सरोज कहने लगी, ”हां, अब बताइए, खाना कहां होगा। दस बजे तो होटल बंद हो जाते हैं।”
”हां बाजार जाता हूं, यदि कुछ मिल गया तो ले आऊंगा।”
”यदि कुछ न मिला तो क्या होगा?”
”कुछ नहीं, ठंडा पानी पीकर सो जाएंगे।”

यह कह वह मकान के नीचे उतर गया। प्राय: सभी दुकानें बंद हो चुकी थी। एक भटियारिन की दुकान खुली थी। वह बहुत प्रात: काल रेल की वर्कशाप को जानेवालों के लिए चबेना भून रही थी। सुरेंद्र मोहन उसकी दुकान पर खड़ा हो गया। वह विस्मय में बाबू की ओर देखकर पूछने लगी, ”क्या चाहिए बाबू?”
”चार आने का चबेना दे दो।”

भटियारिन ने आधा सेर चने मंूग इत्यादि तौलकर दे दिए। सुरेंद्र मोहन ने उन्हें रूमाल में बांधा और घर आ गया।
जब उसने रूमाल खोलकर लड़कियों को दिखाया, तो सरोज के मुख से निकला,”सब मजा किरकिरा हो गया। मै तो घर जाती हूं। मां को कहूंगी, तो खाना मिल जाएगा।”
मनोज ने भी उठते हुए कहा,”हमको दीजिए, जो देना चाहते हैं। मैं भी जाऊंगी।”
”मैं तो मिठाई लेने के लिए गया था। किसी हलवाई की दुकान खुली ही नहीं थी। मै क्या करता?”
”करना क्या है, आप चबेना खाइए और सो जाइए। हमसे तो इसे चबाकर रात भर गुजर नहीं हो सकती।”
मनोज ने पुन: सुरेंद्र से कह,”मुझे तो विदा करिए, नींद आने लगी है।”
”क्या विदाई दे दंू?”

”साधारण रूप से हमको पचास रूपए मिलनेवाले थे। इस विशेष परिस्थिति में तो हम पचहत्तर से कम नहीं लेंगी।”
”पचहत्तर?”
”हां आज खाने पीने को कुछ नहीं मिला न?”
”जितना तुमको कष्ट हुआ है, उतना तो मैं तुम्हारे मनोरंजन पर व्यय कर चुका हूं।”
”बात यह है कि हमारे कष्ट का नाप तौल आपके पास नहीं है। यह तो हम जानती हैं कि इस प्रकार पूर्ण शाम को आवारागर्दी के बाद सूखे चने सामने देखने पर क्या दशा होती है मन की?”
”परंतु इसमें मेरा तो कोई दोष नहीं है?”
”तो हमारा दोष है?”
”नहीं, यह भाग्य की बात है। जैसे मैं सहन कर रहा हूं, वैसे ही तुम लोगों को भी करना चाहिए।”
मनोज यह सुन क्रोध से जल भुन उठी। उसने कहा, ”भले इनसान की भांति हमारे रूपए हमको दे दो। नहीं तो ठीक नहीं होगा। पिछले एक घंटे में जो कष्ट हमको हुआ है। उसका कोई पारावार है भी?”

अब सुरेंद्र ने का्रेध दरशाते हुए कहा, ”ऐ छोकरी! हल्ला क्यों करती है? चुपचाप नीचे उतर जाओ। तुम मेरी विवाहिता नहीं हो। झगड़ा कर तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा। चुपचाप चली जाओ यहां से।”

सरोज अभी भी मिन्नत खुशामद से जो मिले, ले लेने के लिए तैयार थी, परंतु मनोज तो क्रोध के घोड़े पर सवार थी। उसने सरोज की बांहों में बांह डाली और उसको मकान की सीढिय़ों की ओर खींचते हुए कहा, ”छोड़ो इस कमीने को। हमारी तुलना अपनी पत्नी से कर रहा है। यह गधा तो पत्नी और प्रेमिका में अंतर ही नहीं जानता।”
सदारानी को छोटे बच्चों की ट्यूशन पकडऩे में दस बारह दिन लग गए, परंतु भाग्य की बात थी, जब ट्यूशन मिले तो कई वर्ष के लिए काम मिल गया। राजा अंबिका प्रसाद की चार लड़कियां थी। तीन तो स्कूल जाती थी। एक अभी छोटी ही थी। चारों की चारों ही सदारानी की देख रेख में रख दी गई और उसको छह मास के कार्य को परीक्षा के उपरांत का काम पक्का करने की आशा दिलाई गई।

सदारानी को अपने पिता के घर आए दो वर्ष हो चुके थे। न तो इसकी सूचना अपने पति को भेजी थी और न ही उसके पति ने उसके विषय में जानने का यत्न किया था। सदारानी ने अपना पूर्ण मन अपने संरक्षण में रखे गए बच्चों पर लगा दिया था। प्रात: ही अपने बच्चे को खिला पिलाकर वह राजा साहब की कोठी पर चली जाती। तीन बड़ी लड़िकयां गंगा, यमुना और गोदावरी तो स्कूल की पांचवी, तीसरी और दूसरी श्रेणी में पढ़ती थी। ये प्राय: सदारानी के आने से पूर्व उठ स्नानादि कर स्कूल जाने के लिए तैयार हो जाया करती थी। यह उनको वस्त्र पहना पुस्तकें देख, विधिवत उनके थैलों में रख और उनको स्कूल छोडऩे के लिए चली जाती। यह उसका काम था कि लड़कियों की अध्यापिकाओं से मिलकर उनके विषय में कोई सूचना हो तो घर पर ले आया करें।

घर पहूंचकर सबसे छोटी लड़की को, जो इस समय तीन वर्ष की थी, स्नानादि करा, वस्त्र पहना, उसको अल्पहार कराती। रानी नीलमणि तो प्राय: रूग्ण ही रहा करती थीं। वह बच्चों की देखभाल नहीं कर सकती थी। इसलिए बच्चों का सब काम सदारानी को ही करना पड़ता था।
इस काल में सदारानी के व्यवहार और बच्चों की प्रसन्नता से नीलमणि संतुष्ट हो गई थी। अब तक नीलमणि को सदारानी के इतिहास का भी ज्ञान हो गया और वह उसको अपना बच्चा भी वहीं ले जाने के लिए कहा करती थी।

इस समय तक यह उसका स्वभाव बन गया था और सदारानी अपने पति के विरूद्ध अपनी भावना को विस्मरण कर चुकी थी। न तो उसको अपने उस काल की बात स्मरण कर उस पर विचार करने का स्मरण कर उस पर विचार करने का अवकाश था और न ही वह उस व्यर्थ के जीवन पर विचार करने की आवश्यता समझती थी।
परंतु जीवन एक सार नहीं चल सका। एक दिन उसने राजा साहब के घर जाते हुए अनुभव किया की कोई व्यक्ति साइकिल रिक्शा पर उसके पीछे आ रहा है। वह स्वयं भी रिक्शा पर ही थी। उसे संदेह हुआ, तो उसने घूमकर पीछे देखा। पीछे वाले रिक्शा में सुरेंद्र मोहन बैठा हुआ था।

सदारानी में यह भाव बना कि उसने उसे देखा ही नहीं, वह आगे चलती गई। इस पर भी मन ही मन वह भय अनुभव करने लगी थी। वह उसके इस प्रकार पीछा करने का अर्थ नहीं समझ पा रही थी। नहीं जानती थी कि वह क्या करने आया है और क्या कर सकता है।

इसी उधेड़ बुन में वह राजा साहब की कोठी पर पहुंच गई। उसका रिक्शा कोठी के अंदर गया तो उसने पुन: घूमकर देखा। सुरेद्र मोहन का रिक्शा चौकीदार ने द्वार पर रोक लिया था। इससे उसको कुछ सांत्वना हुई। अपने रिक्शेवाले को पैसे दे सदारानी भीतर चली गई।

भीतर जाकर उसने नीलमणि को द्वार पर रोके गए रिक्शा के बारे में बता दिया। वह कहने लगी कि उसका पति उसका पीछा करता हुआ यहां तक आया है, भगवान, जाने उसके मन में क्या है।

रानी ने कहा, ”तुम अपना काम करो। मैं पता करती हूं।”उसने घंटी बजा चपरासी को बुलाया और उसको द्वार पर भेज वहां पर रूके रिक्शा में बैठे व्यक्ति को बुलाकर बैठक घर में बैठाने के लिए कह दिया।

द्वार पर चौकीदार ने रिक्शा रोक सुरेंद्र मोहन से पूछ लिया था, ”किस काम से आए हों?”
”यह किसकी कोठी है?”उसने चौकीदार से प्रश्न किया।
”राजा साहब की।”
”अरे भाई, कौन राजा साहब?”
”राजा साहब छतरपुर।”
”मैं उस औरत से मिलना चाहता हूं, जो अभी इस रिक्शा में आई है।”
”ओह, मास्टरायनजी से?”
”मास्टरायनजी, हां, उससे ही।”
”आप अपना नाम धाम और काम लिख दें, यदि उनको मिलना स्वीकार होगा, तो भीतर ले जाऊंगा।”
सुरेद्र मोहन मुख देखता रह गया। चौकीदार उसका मार्ग रोके खड़ा था। उसने जेब टटोलकर एक कागज का टुकड़ा निकाला और अपना फाउंटेन पेन खोल रिक्शा की सीट के सहारे लिखने लगा था कि चपरासी ने आकर चौकीदार से कहा,”इनको आने दो, रानी साहिबा बुला रही हैं।”

चौकीदार एक ओर को हट गया और चपरासी ने सुरेंद्र मोहन से कहा, ”चलिए, आपको रानी साहिबा बुला रही है।”

सुरेंद्र मोहन का मुख लाल हो गया। उसने अपने होठों में कहा, ”रानी साहिबा। सदारानी, रानी साहिबा! क्या गड़बड़ है। ”फिर कुछ विचार कर चपरासी के साथ चल दिया। रिक्शा वहीं द्वार पर खड़ी रही।

उसको ले जाकर कोठी के बैठकघर में बैठा दिया गया। एक गद्देदार कुरसी पर बैठते हुए यह विचार कर रहा था कि सदारानी जैसी कुरूप स्त्री को कोई राजा अपनी रानी बना सकता है क्या? तभी उसको स्मरण हो आया कि वह रिक्शा पर सवार होकर आ रही थी, यदि राजा साहब की प्रिया होती, तो मोटर में आती-जाती।
सुरेंद्र मोहन वहां प्रतीक्षा कर रहा था कि बाहर एक मोटर के भर्र भर्र का शब्द हुआ। उसने विचार किया कि कौन आया है। उसने बैठकघर से झांककर देखा। बाहर कोठी की ड्योढ़ी में खाली मोटर खड़ी थी। उसी समय सदारानी तीन पुस्तकों के थैले उठाए हुए आई। लड़कियां भी साथ में थी। सब मोटर में बैठीं और चल दी।
इस दृश्य से तो सुरेंद्र मोहन समझ गया कि उसको भीतर बुलानेवाली सदारानी नहीं अपितु राजा साहब की रानी हो सकती है। इससे उसका क्रोध शंात हुआ और वह उत्सुकता से रानी साहिब के आने का प्रतीक्षा करने लगा।

परंतु उससे मिलने के लिए राजा साहब स्वयं आए। सूरत शक्ल से ही सुरेंद्र मोहन समझ गया कि आनेवाला व्यक्ति इस मकान का स्वामी है। साथ ही बैठक के बाहर बैठे चपरासी ने उठकर और झुककर उसको सलाम किया था।

राजा साहब बैठक में आए तो अनायास ही सुरेंद्र मोहन अपने स्थान से उठा और हाथ जोड़कर नमस्कार करने लगा। नमस्कार करते हुए वह स्वयं ही अपने व्यवहार पर विस्मित हो रहा था। अपने कार्यालय में तो वह अपने अधीनस्थों को सिर हिलाकर अभिवादन करता था और उच्चाधिकारियों का हाथ मिलाकर स्वागत किया करता था।
सुरेंद्र मोहन ने हाथ जोड़े तो राजा साहब ने मुसकुराते हुए कहा,”बैठिए।”
वह बैठ गया।

राजा साहब बैठे और जेब से सिगरेटकेस निकालकर सुरेंद्र मोहन की ओर बढ़ाया। सुरेंद्र मोहन ने केस में से सिगरेट निकाली तो राजा साहब ने लाइटर जलाकर आगे कर दिया। उसने सिगरेट सुलगाई और एक लंबा कश लेकर स्वस्थ चित्त हो बैठ गया।
”तो आप श्रीमान सुरेंद्र मोहन है?”
”जी।”
”सदारानी के पति?”
”जी।”
”वह मेरे बच्चों की गवर्नेंस है। आप किसलिए आए हैं?”
”वह मेरी स्वीकृति के बिना नौकरी के लिए आ गई है।”
”हम उसके जीवन वृतांत को जानते है। आप यह बताइए कि वह बालिग है या नाबालिग।”
”उसकी आयु इस समय बाईस तेईस की होगी।”
”इस पर भी आप समझते हैं कि अपने जीविकोपार्जन के लिए उसको आपसे पूछना चाहिए?”
”वह मेरी पत्नी है।”
”पत्नी का अर्थ क्रीतदासी नहीं होता।”
”मैं उसे घर ले जाने के लिए आया हूं।”

”वह अभी आती है, उससे कहना और यदि वह जाना चाहेगी, तो एक मास का नोटिस देकर जा सकती है। आप यहां बैठिए। वह आधे घंटे में लौट आएगी।”
राजा साहब ने घंटी का बटन दबाया, चपरासी भीतर आया तो राजा साहब ने कहा, ”बाबू साहब के लिए चाय ले आओ।”

चपरासी के जाने पर उन्होंने सुरेंद्र मोहन से एक बार फिर कहा, ”सदारानी के आने पर उससे बात करने के बाद आप मुझको बुला लीजिएगा। उसके जाने की शर्त मैंने बता दी है।”
सुरेंद्र मोहन अभी इस विषय में विचार ही कर रहा था कि क्या कहे, इतने में राजा साहब उठे और जिस दिशा से आए थे, उसी ओर चले गए।
सदारानी आई तो रानी साहिबा से मिल, बैठकघर में चली गई। उससे कहने लगी, ”बोलिए, किस कार्य से आए हैं।”
”तुमको घर वापस ले चलने के लिए।”

”न तो मैं आपकी इच्छा से आई थी और न ही आपकी इच्छा से आऊंगी।”
”तो किस प्रकार चलोगी?”
”जब मेरा मन करेगा।”
”तुम्हारा मन कब करेगा।”
”जब वहां सुख सुविधा मिलने की आशा प्रतीत हेागी।”
”वह कैसे प्रतीत होगी।”
”जब मेरे पास इतनी सामथ्र्य होगी कि मैं आपका भरण पालन कर सकूं।”
”वह तो कभी नहीं होगी।”
”तो मैं कभी भी नहीं आऊंगी।”
”तुम मेरी पत्नी हो।”
”वे सरोज, मनोज कहां गई?”
”सरोज का तो विवाह हो गया हैं, मनेाज मुझसे विवाह करने के लिए कह रही है, किंतु मैं कर नहीं सकता।”
”क्यों नहीं कर सकते?”
”एक पुरूष दो स्त्रियां नहीं रख सकता।”
”एक पत्नी और एक रखैल तो रख सकता है?”
”हां यह कानून से वर्जित नहीं है।”
”तो आप ऐसे मूर्खतापूर्ण कानून को मत मानिए।”
”परंतु कानून ने नई पत्नी रखने के लिए पुरानी को तलाक का नियम भी तो बनाया है।”
”तो आप एक को तलाक दे दीजिए।”
”मैं तलाक देने के लिए जाऊंगा तो तुम्हारी निंदा करनी पड़ेगी।”
”तो फिर क्या करेंगे?”
”या तो तुम मेरे साथ मेरे घर चलकर रहो अथवा मुझे तलाक दे दो।”

”अभी तो इनमें से एक भी बात नहीं कर सकती। आपके घर जाकर मुझे सुख जो क्या भोजन मिलने की भी आशा नहीं। तलाक देने में मुझे कोई लाभ नहीं होता। सबसे बड़ी बात यह है कि मैं किस बिना पर तलाक दूं।”
”गुजारे के बिना पर।”
”उसकी मुझे अब आवश्यकता नहीं है।”
”क्या मिल जाता यहां से?”
”दो समय चाय और अल्पाहार। मध्याह्र का भोजन और एक सौ रूपया प्रतिमाह।”
”कुटकू क्या करता है?”
”मां के पास खेलता रहता है।”
”मैं कोर्ट में प्रार्थना करूंगा कि कंजुगल राइट्स मुझको मिलने चाहिए।”
”मैं स्वीकार नहीं करूगी।”
”तब विवाह विच्छेद हो जाएगा।”
”तो कर लीजिए।”
”पर क्या हुआ है, पहले तो तुम इसी बात के लिए सरोज इत्यादि से ईष्र्या करती थीं।”
”हां, पर अब उन बातों से अरूचि हो गई है।”
”क्यों, बूढ़ी हो गई हो।”
”ऐसी कोई बात नही। बस रूचि का केंद्र बदल गया है। कभी किसी की रूचि गाने सुनने से हटकर सुंदर दृश्य देखने की हो जाती है अथवा किसी की स्वादिष्ट भोजन करने से रूचि बदलकर वैराग्य की होने लगती है।’
”यह सब वाग्जाल है, बोलो, मेरे साथ चलोगी कि नहीं?”
”नहीं।”
”तो बल प्रयोग करना पड़ेगा?”
”कर सकते हैं, पर इतना स्मरण रखना कि यह राजनियम के विपरीत भी है और दंडनीय भी।”
इस समय राजा साहब वहां आ गए। उनके साथ एक लट्ठबंद सेवक भी था। उसे और राजा साहब के माथे पर चढ़ी त्योरियों को देखकर सुरेंद्र मोहन डर गया। वह उठा और नमस्कार कर बैठक से बाहर निकल गया। राजा साहब उसके पीछे पीछे बाहर आए और सुरेंद्र मोहन को बुलाकर कोठी के लॉन में ले गए।
”क्या यहीं फौजदारी करने लगे थे न?”
”जी नहीं, मेरा मतलब यह नहीं था, मैं तो केवल धमका रहा था।”
”अच्छा, जाओ इतना ध्यान रखना कि अब इस औरत की रक्षा का प्रबंध मैं करूंगा।”
समय व्यतीत होता गया और दो वर्ष और निकल गए। सुरेंद्र मोहन ने अपना काम लखनऊ में बदल लिया। वहां उसने मनोज को अविवाहित पत्नी के रूप के रखा हुआ था। वह एक दिन उसे छोड़कर भाग गई। अब सुरेंद्र मोहन पुन: पत्नी की खोज करने लगा। यह बात कठिन नहीं थी। बिना विवाह के तो पैसे के बल पर नई पत्नी मिल सकती थी, परन्तु वह अब स्थिर जीवन में विश्वास करने लगा था। उसकी आयु तीस वर्ष की होने जा रही थी, परंतु अत्यधिक भोग विलास और मद्य विलास और मद्य सेवन से उसका यौवन ढल रहा था। विवाह का विचार आया, तो वह फिर सदारानी की खोज में चल पड़ा। इस बार वह उसको उसके पिता के घर पर ही मिला।
रात के समय वह अपने वह अपने श्वसुर के घर जा पहुंचा। उसने अपने साले से कहा,
”क्यों विनोद! बहिन घर पर है?”
”है।”
”भाई, उसको बुला दो।”
”वह नीचे नहीं आएगी, आप ऊपर आ सकते हैं।”
सुरेंद्र मोहन वही चाहता था। वह ऊपर चला गया। सदारानी अपने बच्चे को खाना खिला रही थी। सुरेंद्र मोहन को द्वार पर खड़ा देख वह विस्मय करने लगी।
”पहचाना है?”सुरेंद्र मोहन ने पूछा।
”कुछ कुछ, थोड़ा अंतर आ गया है।”
”हां, लखनऊ की जलवायु अनुकूल नहीं आ रही है।”
”तो वापस शाहजहांपुर चले जाइए। अपना काम करते हैं, किसी की नौकरी तो है नहीं।”
”तुम भी चलोगी?”
”मुझे लखनऊ का जलवायु अनुकूल बैठ रहा है।”
”तो मेरी खातिर ही चली चलो।”
”मनोज भाग गई है, इसलिए?”
”तुम्हें कैसे मालूम?”
”बैठ जाइए। इसे पहचानते हैं?”उसने बच्चे की ओर संकेत किया।
”इसका कुछ नाम भी रखा है कि नहीं।”
”हां, रखा है, कल्याणस्वरूप।”
”नाम तो चुनकर रखा है।”
”हां, वैसे तो इसके बाप को भी चुनकर ही पसंद किया था, परंतु……”
”परंतु क्या?”
”मनोज आई थी और बता गई कि आप….”
”क्या बात है? बात आधी ही क्यों छोड़ देती हो?”
”उसने विवाह कर लिया है।”
”और अपना लड़का कहां रख गई है?”
”वह उसके साथ ही है। उसने अपने पति को समझा दिया है कि उसको त्यक्ता पत्नी मानकर उसके साथ विवाह करे और उसके पुत्र को उसके पति का पुत्र माने।”
”बिना विवाह के ही त्यक्ता बन गई है?”
”हां, कहती थी कि बिना विवाह के विवाहिता थी और बिना तलाक के त्यक्ता बन गई है।”
”देखिए, जिस समाज में यह सबकुछ हो सकता है, उसमें मैंने तलाक की आवश्यकता नही समझी। विवाह देश के कानून का क्षेत्र को गया है। इससे इसका मूल्य एक ठेकेदारी के वचन पत्र के बराबर रह गया है।, कभी वचन पत्र के विपरीत कार्य हुआ, तो उसका प्रतिकार रूपयों में आंका जाता है। जहां संतान के माता पिता का इतना मात्र मूल्य हो, वहां उस संबंध के लिए विवाह जैसे आडंबर के करने की आवश्यकता ही क्या है और फिर उसको तोडऩे के लिए मजिस्ट्रेट के समुख एक वर्ष तक नाक रगडऩे की मुझे आवश्यकता नहीं हई।”
”मुझे अब अनुभव हो रहा है कि तुम ठीक कहती थीं।”
”आपकी प्रकृति देख विश्वास नहीं हो रहा।”
”तो एक बार फिर परीक्षा कर सकती हो।”
”और एक कुटकू और बना लंू?”
”हो सकता है।”
”एक शर्त है।”
”क्या?”
”कुछ रूपया मुझे पृथक दे दीजिए। मैं उसके ब्याज से अपना निर्वाह करूंगी। आप पर आर्थिक रूपेण निर्भर नहीं रहना चाहती। जब आप खाना नहीं देंगे, तो पेट में घुटने देकर सोने की आवश्यकता नहीं रहेगी।”
”कितना धन देना होगा?”
”इतना कि जिसकी आय से दो सौ रूपया मासिक मिलता रहे।”
”तुम मेरे घर में आकर भी तो अपनी नौकरी कर सकती हो?”
”मैं करूंगी नहीं और कदाचित कर भी नहीं सकूंगी।”
”सदारानी, सरोज, मनोज….. मैं इस सूची को लंबी बनाना नहीं चाहता। इसलिए इसे पुन: सदारानी पर ही समाप्त करना चाहता हूं।।”
”विचार कर लीजिए। जब विवाह धर्म का संबंध था, तब धर्म पालन के लिए श्रृद्धा पर विश्वास कर लिया जाता था। अधिकांश हिंदू स्त्रियों में तो इसमें धर्म की सी निष्ठा अब भी है, परंतु पुरूषों में लोप हो रही है। आपमें तो इसको इस प्रकार समझने का कोई चिह्र भी नहीं दिखाई देता। इसीलिए आपसे गारंटी मांग रही हूं।”
सुरेंद्र मोहन विचार करता हुआ चला गया।
इसके एक माह बाद सदारानी को एक पत्र मिला और उसके साथ ही उसको हजरतगंज की एक इमारत के कागजात मिले, जिसकी आय ढाई सौ रूपया मासिक थी।
इसके एक मास बाद सदारानी सुरेंद्र मोहन की कोठी में चली गई। कल्याण उसके साथ था।
एक दिन सुरेंद्र ने उससे पूछा, ”सदा अब प्रसन्न हो?”
”प्रसन्न नहीं, पत्नी के पद से गिरकर ठेकेदार की पदवी पर पहुंच गई है। यह पतन है, इसमें प्रसन्नता कैसी?”
”हां, इस पतन से अंग भंग नहीं हुए, इसका संतोष तो है ही।”