आयुर्वेद से होगा कोरोना का समाधान

डॉ. सुरेश अग्रवाल
लेखक प्रसिद्घ सर्जन और आयुर्वेद के अभ्यासी हैं।


कोरोना महामारी को आज लाइलाज बताया जा रहा है। यह एक वायरस संक्रमण है और रोगप्रतिरोधक क्षमता ही इसे ठीक करती है। रोगप्रतिरोधक क्षमता का वायरल संक्रमण मेंा बहुत महत्त्व है। या तो बचाव के लिए वैक्सीन बनाई जाए, या इलाज के लिए रोगप्रतिरोधक क्षमता को सुधारने के उपाय किए जाएं। इसके लिए जीवनशैली में परिवर्तन करना हो या खानपान में परिवर्तन करना हो, वह करना चाहिए। आयुर्वेद में ऐसी जड़ी बूटियाँ हैं, जिनसे रोगप्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है और साथ ही वायरस का संक्रमण को कम करने में भी सहायता मिलती है। जैसे कालमेघ में ये दोनों ही गुण मिलते हैं। इसी प्रकार कालमेघ, नीम, अमृता या गिलोय, वासक, तुलसी, पिप्पली, हल्दी और यशद भस्म हैं। ये आठ चीजें हैं जिनमें ये दोनों ही गुण हैं यानी ये रोगप्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाती हैं और वायरस की संख्या को भी कम करती हैं। यह तथ्य शोध पर आधारित है और इन पर काफी शोधपत्र प्रकाशित हो चुके हैं कि ये रोगप्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ाते हैं और वायरस को भी नष्ट करते हैं। कोरोना से बचाव और रोग की प्रारंभिक अवस्था में इलाज के लिए भी इनका उपयोग किया जाए तो काफी लाभ होगा। जिन रोगियों की स्थिति गंभीर हो गई हो, उन्हें आयुर्वेदिक के साथ एलोपैथिक दवाएं भी दी जानी चाहिए।

मेरा मानना है कि सरकार को आयुर्वेद पर जितना विश्वास होना चाहिए, उतना नहीं है। दूसरी बात यह है कि आयुर्वेद के राष्ट्रीय स्तर के संगठनों के लोग सामने नहीं आए। वर्तमान स्थिति यह है कि कोरोना का कोई भी इलाज नहीं है, परंतु दूसरी ओर एकदम तार्किक तथा शोधआधारित, केवल भावना पर आधारित नहीं, आयुर्वेदिक चिकित्सा उपलब्ध है। इसका उपयोग प्रारंभ से ही किया जाना चाहिए था। उदाहरण के लिए जिन लोगों को क्वैरन्टाइन में रखा गया है, उन्हें गिलोय या कालमेघ देने में कोई कठिनाई नहीं थी। कोरोना संक्रमित लोगों में से सौ लोगों को उपरोक्त आठ चीजों के मिश्रण के योग दिया जाए और सौ को नहीं दिया जाए। इस प्रयोग का परिणाम देख लीजिए। इसमें कोई अधिक खर्च नहीं है तथा इसके कोई दुष्परिणाम नहीं है और इसके सुखद परिणाम आने की शतप्रतिशत संभावना है। अन्य वायरल रोगों में मैं स्वयं इन चीजों का प्रयोग पिछले 20 वर्षों से करता आ रहा हूँ।
आज की दुरूह स्थिति में जहाँ एलोपैथ में आपके सामने मार्ग एकदम बंद है, वहाँ सरकार ने तुरंत क्यों नहीं निर्णय लिया और आयुष विभाग सामने क्यों नहीं आया, यह बहुत आश्चर्य और निराशा का विषय है। इसमें कोई नुकसान नहीं था ही नहीं। हर स्थिति में आप कुछ लाभ में ही रहते। एड्स के प्रारंभिक दौर में मैंने एक शोधपत्र पढ़ा था। एड्स हमारे रोगप्रतिरोधक तंत्र पर आक्रमण करता है और इसका हमारे पास कोई उपाय नहीं है, तो आयुर्वेद के संदर्भों को उद्धृत करते हुए मैंने गुडुची का प्रयोग करने की बात कही थी। मेरा यह शोधपत्र बाद में प्रकाशित भी हुआ। इस पर बाद के दिनों में बहुत सारा शोध हुआ और उसके सुखद परिणाम भी मिले। यह साबित हुआ है कि एड्स में गुडुची बहुत लाभ करती है। इसलिए यह दुख की बात है कि अभी कोरोना के मामले में सरकार ने इस दिशा में कोई पहल नहीं की है। कोरोना के मामले में आयुर्वेद के उपयोग को हम तीन स्तरों में बाँट सकते हैं। पहला स्तर सामान्य लोगों में कोरोना के रोकथाम का है, दूसरा स्तर बिना लक्षण वाले प्रारंभिक कोरोना संक्रमित रोगी और तीसरा कोरोना के गंभीर रोगी। आयुर्वेद में तीनों स्तरों के लिए औषधियों का भंडार है। मैं तो आयुर्वेदाचार्य नहीं हूँ, आधुनिक चिकित्साशास्त्री हूँ, परंतु मैं आयुर्वेद पर शोध करता हूँ, मेरा मानना है कि यदि हम इसे लेकर आगे बढ़ते तो पूरी दुनिया को रास्ता दिखा सकते थे।

वर्ष 2004 में जब चीन में कोरोना परिवार का ही पहला वायरस सार्स आया तो इस पर डब्ल्यूएचओ की एक 120 पृष्ठों की रिपोर्ट है जिसमें यह लिखित है कि सार्स के इलाज के लिए पारंपरिक चीनी औषधियों का प्रयोग किया गया। मरीजों पर न्यूनतम 10 क्लीनीकल ट्रायल हुए और इसके काफी अच्छे परिणाम थे। चीन तो एक बंद देश है, वह अपनी कोई भी जानकारी बाहर नहीं जाने देता। अभी कोरोना को रोकने के लिए भी उन्होंने पारंपरिक चीनी औषधियों का प्रयोग किया है, यह बाद में अवश्य सामने आएगा। इसलिए भारत को तो आयुर्वेद को लेकर खुल कर सामने आना चाहिए था। बिना बाजार की परवाह किए हुए सामने आना चाहिए। पूरी दुनिया प्रशंसा करेगा। मुझे इस बारे में भरपूर आत्मविश्वास है। यदि सरकार ने कोरोना रोगी मुझे दिया होता तो मुझे इसपर काम करने में प्रसन्नता होती, अभी भी दे तो मैं प्रसन्नतापूर्वक अपना योगदान दूंगा।