- ब्रह्ममुहूर्त में उठें। ब्रह्ममुहूर्त अर्थात् सूर्याेदय से लगभग डेढ़ घंटा पहले की अवधि।
- बैड टी से बचें। प्रातः उठने के बाद लगभग दो गिलास पानी पीना चाहिए, इससे पेट साफ रहता है, पित्त जनित रोग नहीं होते हैं। बवासीर, कब्ज, मूत्रा तथा आंख के रोग ठीक होते हैं।
- भोजन के बाद लगभग एक घंटे तक पानी नहीं पीना चाहिए। भोजन के पहले भी यदि पानी पीना हो तो लगभग एक घंटा पहले पानी पीना चाहिए। भोजन के बीच में आवश्यकतानुसार थोड़ा पानी पी सकते हैं।
- यदि मिष्ठान खाते हों तो भोजन के आरम्भ में खाएं बाद में आईस्क्रीम आदि का सेवन पाचन क्रिया को मंद करता है।
- दोपहर के भोजन में छाछ का प्रयोग अमृत समान हैं।
- ऑफिस से आने के बाद चाय आदि से बचें, सीधे भोजन करें। भोजन सोने के तीन घंटा पहले कर लेना चाहिए, बाद में धीमी गति से टहलना चाहिए। रात में छाछ, दही का सेवन न करें।
- सोने के लगभग एक घंटा पहले दूध पीना अच्छा रहता है।
- रोगी/वृद्ध के अलावा गरमीयों को छोड़ कर दिन में न सोएं।
- केवल मौसमी फल और सब्जियों का ही सेवन करें। फलों का सेवन खाली पेट करें। यदि बाद में भोजन करना हो तो कम से कम आधे घंटे बाद करें। भोजन के बाद यदि फलों को सेवन करना हो तो कम से कम तीन घंटे का अन्तराल रखें।
- अत्यधिक ठंडे पदार्थों के सेवन से जठराग्नि मंद होती है अतः फ्रिज में रखे पदार्थाे का सेवन कम से कम करें। जहां तक संभव हो ताजा बने भोजन को सेवन करें। आटा गंूद कर फ्रिज में रखना ठीक नहीं हैं। ताजे गूंदे हुए आटे का ही प्रयोग करें।
- आयुर्वेद में बिना थके व्यायाम करने के लिए कहा गया है।
- अपनी प्रकृति अवश्य जानें। और उसके अनुसार बताए गए आहार-विहार का पालन करें।
- केवल देसी गाय के घी, सरसों या तिल के तेल का प्रयोग करें। आजकल बाजार में मिलने वाले रिफाइंड ऑयल के प्रयोग से बचें।मौसम परिवर्तन या सूर्य और चन्द्रमा की गति के कारण ऋतुएं बदलती रहती हैं। ऋतुओं के अनुसार तापमान बदलता है। फलतः शरीर की पाचन शक्ति भी बदलती है। अतः ऋतुओं का परिवर्तन होने पर भोजन, निद्रा और व्यायाम में भी परिवर्तन होना चाहिए। इसी का नाम ऋतुचर्या है। वर्षभर में छह ऋतुएं होती है। पहली ऋतु का अन्तिम सप्ताह और आने वाली ऋतु का प्रथम सप्ताह, इन दो सप्ताहों की अवधि को ऋतु-संधि कहते है। इस काल में पूर्व ऋतु में अपनाए गए आहार-विहार को क्रमशः अपनाना चाहिए।
ऋतुचर्या- ग्रीष्म (जेठ,आषाढ़) प्रायः मई एवं जून
पर्व : गंगा दशहरा, निर्जला एकादशी देवशयनी एकादशी, गुरु पूर्णिमा।
रोग : इस ऋतु में प्रायः लू लगना, हैजा, खसरा, चेचक वमन, अतिसार, ज्वर, नक्सीर, दाह, प्यास, ऐनिमियां, पीलिया, रूखापन तथा कमजोरी की समस्या होती है। - सुबह उठकर पानी पिएं। आवश्यकतानुसार दिन में भी बार बार पानी पिएं।
- चिकनाई, मीठा, एवं हल्का आहार जैसे-साठी चावल, जौ, मंूग, मसूर आदि का सेवन करें।
- दूध, पना, दही की लस्सी, जूस, सत्तु, छाछ आदि का प्रयोग हितकर है।
- नारंगी, अनार, नीबू व गन्ने कर रस, खरबूजा, तरबूज, शहतूत आद रसदार फलों को सेवन करें। नारियल का पानी, जलजीरे का प्रयोग हितकर है।हल्के एवं सूती कपड़े पहनना चाहिए।
- आयुर्वेद में केवल ग्रीष्म ऋतु में दिन में सोना हितकर है।
- गरम, तीखे, रूखे गुण वाले, नमक प्रधान द्रव्यों का सेवन नहीं करना चाहिए।
- मांस, तले हुए पदार्थ तेज मसालों से बने पदार्थ तथा मैदा या बेसन से बने हुए आहार का सेवन नहीं करना चाहिए।
- मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए।
- अधिक धूप, परिश्रम, व्यायाम व सहवास से बचना चाहिए।
- कृत्रिम धागों से निर्मित अर्थात् सिंथैटिक वस्त्रों को नहीं पहनना चाहिए।
- प्रदूषित जल व स्थान स अपने आपको बचावें।
ऋतुचर्या वर्षा ( श्रावण, भाद्रपद) प्रायः जुलाई एवं अगस्तपर्व :तीज, रक्षाबन्धन, जन्माष्टमी, गणेश चतुर्थी।
रोग :अपच होना, शारीरिक कमजोरी, रक्तविकार, वायुदोष, जोड़ों का दर्द, सूजन, त्वचा विकार, दाद, कृमिरोग, ज्वर मलेरिया, पेचिस तथा अन्य वायरल बीमारियां। - आलू, नमक, एवं घी डालकर चिकनाई वाला भोजन करना हितकर है।
- पुराने चावल, जौ, गेहूं आदि का सेवन करना चाहिए।
- छाछ में बनी, बाजरा अथवा मक्का की रबड़ी का सेवन करें।
- कद्दू, बैंगन, परवल, करेला, लौकी, तुरई, अदरख, जीरा, मैथी, लहसुन का सेवन हितकर है।
- शुद्ध जल का प्रयोग करें। यदि संभव हो तो पानी को उबाल कर व छांन लें। कुआं तालाब व नदी से लिया गया पानी फिटकरी घुमाकर शुद्ध करें।
- चावल आलू, अरबी (कन्दशाक), भिण्डी तथा पचने में भारी आहार द्रव्यों का सेवन नहीं करना चाहिए।
- बासी भोजन, दही, मांस, मछली का सेवन नहीं करें।
- अधिक तरल पदार्थ व मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए।
- ओस में, खुले में, दिन में सोना व रात्रि जागरण नहीं करना चाहिए।
- अधिक धूप, व्यायाम व शारीरिक श्रम से बचें।
ऋतुचर्या शरद (अश्विन, कार्तिक) प्रायः सितंबर एवं अक्टूबरपर्व :विजयादशमी, शरद पूर्णिमा, करवा चौथ, दीपावली, गोवर्धन पूजा भैया दूज।
रोग :वर्षा के उपरान्त बादलों के छंट जाने व आकाश के साफ हो जाने से सूर्य की गर्मी से पित्त का प्रकोप होता है। अतः पित्तप्रधान रोग जैसे-ज्वर, नकसीर, शरीर में जलन, वमन, शिरःशूल, चक्कर आना, ऐसीडिटी व त्वचा के विकार, अधिक प्यास, कब्ज, अजीर्ण सर्दी, अरुचि आदि विकार होने की सम्भावना होती है। - मीठा, हल्का, शीतल एवं तीखे रस वाले द्रव्यों को सेवन हितकर हे।
- लाल चावल, साठी चावल, जौ एवं गेहूं का उपयोग करना हितकर है।
- निर्मल जल या फिटकरी शोधित जल का प्रयोग करें।
- करेला, परवल, तुरई मेथी, लोकी, पालक, मूली, सिंघाड़ा गाजर, गोभी, अंगूर, आदि का प्रयोग श्रेष्ठ है।
- टमाटर व फलों का रस, सूखे मेवे, नारियल का प्रयोग हितकर है।
- घी (यदि गाय को हो ताूे और अच्छा) को प्रयोग विशेष रुप से करें।
- च्यवनप्राश, ऑवला-रसायन, ब्रह्मरसायन, आदि रसायनिक औषिधियों को चिकित्सक के परामर्श से सेवन करें।
- त्रिफला चूर्ण, निशोथ चूर्ण, व अमलताश के गूदे का प्रयोग हितकर है।
- छिलकेवाली दाल (मूंग उड़द) एवं गर्म मसालों से रहित शाक-सब्जी को सेवन करना चाहिए।
- नीबू का रस गुनगुने जल में मिला कर प्रातः पीना लाभदायक है।
- मुनक्का व हरड़ को प्रयोग विशेष रूप से करें।
- तेल की मालिश एवं व्यायाम नियमित रुप से करें। जिन्हें व्यायाम-आसन आदि करने से कठिनाई हो या दुर्बल हों तो प्रातः भ्रमण करें।
- मैदा से बने हुए आहार द्रव्य को सेवन नहीं करना चाहिए।
- गरम, तीखा, भारी तेज मासलेदार व तले हुए खाद्यान्नों को प्रयोग न करें
- चर्बी, तेल, क्षार, दही व मछली के मांस का सेवचन अहितकर है।
- अमरूद को खाली पेट व अधिक मात्रा में न खाएं।
- कंद शाकों का प्रयोग हानिकारक होता है।
- वनस्पति घी का उपयोग लाभदायक नहीं है।
- मूंगफली या मक्का के भुट्टे खाकर तुरंत जल न पिएं।
- कच्ची ककड़ी व खीरा का अधिक प्रयोग हानिकारक है।
- दही व खीरा एक साथ न खाएं।
- दिन में सोना नहीं चाहिए।
ऋतुचर्या हेमन्त (मार्गशीर्ष, पौष) प्रायः नवंबर एवं दिसंबर - इस ऋतु में चिकनाई युक्त, मीठा, भारी व मीठा भोजन लेना चाहिए।
- गरम गरम भोजन के साथ घी का सेवन करें।
- विविध प्रकार के पौष्टिक पाक, मोदक ( लडडू) मोगर के लडडू, गोंद के लडडू अश्वगंधा-पाक, कौंच-पाक, मेथी के लडडू, बहा्र-रसायन, च्यवनप्राश आदि का सेवन करना हितकर है।
- नये शाली चावल का सेवन करना चाहिए।
- सूखे मेवे व इनसे बनें पदार्थाे का प्रयोग करना चाहिये।
- बलवर्धक आयुर्वेदिक रसायनों का आयु के अनुसार प्रयोग श्रेष्ठ है।
- ताकत चाहने वाले व्यक्ति इच्छित इच्छित मात्रा में आहार का सेवन कर सकते हैं।
- स्नान के समय शरीर पर तेल की मालिश, उबटन करके गुनगुनें जल से स्नान करना चाहिए।
- गर्म व गहरे रंग के वस्त्रा धारण करना चाहिए। ऊनी वस्त्रों को ओढ़कर सोएं।
- सिर, कान, नाक व पैर के तलुओं में विशेष रूप से तेल मालिश करें।
- हाथ-पांव धोने के लिए गुनगुने जल का उपयोग करना चाहिए।
- ठंडी तासीर वाले, ठंडे विशेष रुप से फ्रिज में रखे अर्थात् वात बढ़ाने वाले पदार्थाे का सेवन न करें।
- कम भोजन और बहुत पतला आहार जैसे-जल में घुले सत्तु आदि का निषेध है।
- इस ऋतु में दिन में नहीं सोना चाहिए। नंगे पांव नहीं रहना चाहिए।
- हल्के एवं सफेद रंग के सूती वस्त्रा न पहनें।
ऋतुचर्या शिशिर (माघ, फाल्गुन) प्रायः जनवरी एवं फरवरी
पर्व : लोहड़ी, मकर संक्रान्ति, वंसत पंचमी, महाशिवरात्रि।
- हरड़ व पिप्पली का समान मात्रा में प्रयोग करें।
- भारी पदार्थों का सेवन तथा प्रातः काल विविध पाक यथा-अश्वगंधा मूसली,बादाम उड़द व मेथी के लडडू का सेवन पाचन क्षमता के अनुसार करें।
- हेमंत ऋतु में बताये गऐ आहार भी उचित हैं।
- लोहासव, अश्वगंधारिष्ट, द्राक्षासव का प्रयोग हितकर है।
- दूध का सेवन विशेष रूप से करें।
- तेल मालिश करें, धूप का सेवन सूर्य की ओर पीठ कर के करें।
- गर्म पानी से स्नान करें, गर्म ऊनी व गहरे रंग के कपड़े पहनें।
- शीत, वर्षा व शीत लहर से बचें।
- अधिक जल मिले पदार्थ, ठंडा भोजन तथा शर्बत व अन्य पेय वर्जित रखें।
ऋतुचर्या वसन्त (चौत्रा, बैशाख) प्रायः मार्च एवं अप्रैलपर्व : होली, नवरात्रा रामनवमी, वैशाखी, अक्षय तृतीया
रोग : श्वास, खांसी, बदन दर्द, ज्वर, वमन, अरुचि, भारीपन, भूख कम लगना, कब्ज, पेट दर्द कृमिजन्य विकार आदि होते हैं। - शरीर संशोधन हेतु वमन, विरेचन, नस्य, कुंजल आदि।
- रूखा, कड़वा, तीखा, कसैले रस वाले पदार्थों का सेवन।
- इस ऋतु में परिश्रम, व्यायाम, उबटन करना चाहिए कफ निकालने वाली औषधियों का चिकित्सक के परामर्श से सेवन करना चाहिए।
- रसायन औषध व शहद के साथ हरड़ के चूर्ण का प्रयोग करना चाहिए।
- एक वर्ष पुराना जौ, गेहूं व चावल का उपयोग करना उचित है।
- इस ऋतु में ज्वार, बाजरा, मक्का आदि रूखे धानों का आहार श्रेष्ठ है।
- मंूग, मसूर, अरहर, चना की दाल उपयोगी है।
- मूली, घीया गाजर, बथुला चौलाई, परवल, सरसौं, मैथी, पत्ता पालक, धनिया अदरक आदि का सेवन करना हितकर है।
- कफ के शमन के लिए नस्य, कुंजल, जल-नेति हितकर है। तेल की मालिश करना उत्तम है।
- नए अन्न, शीतल, चिकनाई युक्त, भारी खट्टे एवं मीठे द्रव्य, दही, उड़द, आलू, प्याज, गन्ना, नए गुड़, भैंस का दूध व सिंघाड़े का सेवन मना है।
- दिन में सोना, एक स्थान पर लम्बे समय तक बैठे रहना उचित नहीं है।









