रोगचर्या

आयुर्वेद में व्यक्ति को शीघ्रता से निरोग करने के लिए ही नहीं बल्कि आगे भी कभी उसे ऐसा कष्ट न हो इसके लिए हितकर और अहितकर आहार-विहार बहुत विस्तार से बताया गया है। सामान्यतः इसे पथ्य-अपथ्य भी कहा जाता है। उपचार के लिए जितना महत्व औषधी का है, उतना ही आहार-विहार का भी क्योंकि इसकी अनदेखी से रोग और भी बढ़ जाता है। पहले यह अमूल्य ज्ञान हमारी परम्परा का ही एक अभिन्न अंग था किन्तु आज संयुक्त परिवार के बिखर जाने व अन्य अनेक कारणों से यह लुप्त हो रहा है। जनहित के लिए हम कुछ खास रोगों के लिए आवश्यक सावधानियों की जानकारी दे रहे हैं।

मधुमेह

रोग:  सामान्यतः मधुमेह का कारण कफ और मेद (वसा) की विकष्ति है।

  • धागे वाली मिश्री या गुड़, शक्कर आदि का सीमित मात्रा में प्रयागे करें। सफेद चीनी बहुत अधिक हानिकारक है। सिंथैटिक मीठा जैसे सैक्रीन की गोली या शुगर फ्री आदि चीनी का ही कैमिकल विकल्प हैं। इन का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
  • गेहूं में चने का आटा या बेसन मिला कर रोटी बनाएं। काले चने, बेसन तथा बाजरे का उपयोग हितकर है।
  • सलाद, ताजे या कम मीठे फल, सब्जियां प्रतिदिन नींबू छिडक कर खाएं।
  • योग, प्राणायाम, नियमित भ्रमण करें। आरामतलबी छोडे़ और सक्रिय रहें।
  • भोजन तिल के शुद्ध तेल में बनाएं। यह तेल मधुमेह के लिए रामबाण है।
  • मीठा व नमक का सेवन कम करें। कटु तथा खट्टे का सेवन अधिक करें।
  • चिन्ता छोड़कर जीवन का आनन्द लेने का प्रयत्न करें तथा खुश रहें।
  • कोल्ड डिंªक्स, आइस्क्रीम, गुड़ और दही का सेवन न करें।
  • भोजन के बाद कम से कम सौ कदम अवश्य चलें।
  • मोटापा दूर करें यह मधुमेह के लिए घातक है।
  • चौलाई, मैथी की सब्जी, दाना मैथी, मखाना तथा तिल का उपयोग करें।
  • ऑवले का सेवन जूस, चूर्ण अथवा अचार के रूप में करें।
  • हल्दी को अचार के रूप में अथवा घी में भून कर तैयार किए हुए लगभग चौथाई चम्मच चूर्ण को गर्म पानी अथवा दूध के साथ प्रयोग करें।

खांसी, जुकाम और दमा

  • उबलते पानीमें थोडा़ बाम डाल कर, बन्द कमरे में सिर ढक कर गहरी सांस अन्दर बाहर करें। इससे अन्दर जमा हुई श्लेष्मा आसानी से बाहर निकल जाती है और सायनस के रोगी को आराम मिलता है।
  • सर्दीयों मंे ठंड से बचें। घर को गरम रखें तथा गरम कपड़े पहनने में कोई संकोच न करें। यहां तक कि वर्षा ऋतु में भी ठंड से बचें। इस ऋतु में जहां तक हो सके, बारिश के पानी से बचना चाहिए।
  • तापमान के शीघ्र परिवर्तन अर्थात ठंडा गरम से शरीर को बचाना चाहिए। जैसे बाहर कड़ी धूप में घूम कर आना और तुरन्त ए.सी. या कूलर में बैठ जाना या फ्रिज से निकाल कर ठंडा पानी पी लेना आदि।
  • ठंड़े पेय (कोल्ड डिंªक्स आदि) और विशेष रूप से फ्रिज से तत्काल निकाली हुई खाद्य साम्रगी न लें।
  • चलती हवा या पंखे की हवा से बचना चाहिए। सिर और छाती को ढ़कना हितकर है।
  • दमे के रोगी को नियमित रूप से भुजंग आसन करना चाहिए।
  • पानी उबाल कर और सौंठ डालकर पीना चाहिए।
  • गर्म पतला सूजी या बेसन का हलवा हितकर है।
  • बादाम, मूंगफली, दही, लस्सी आदि का सेवन न करें।
  • रात में देर तक न जगें और जल्दी सो जाएं ताकि पूरी नींद ली जा सके।

उच्च रक्तचाप

  • साधारण नमक के स्थान पर केवल सेंधा नमक का सेवन करें वह भी जरूरत के हिसाब से। बाजार के बने नमकीन और चिप्स आदि बिल्कुल न लें।
  • तीखे और तले हुए व्यंजन, इडली, डोसा एवं अचार आदि का सेवन न करें।
  • भोजन में केला, दूध तथा ठंड़ी तासीर के फल एवं सब्जियां लाभकारी हैं।
  • चिकित्सक के परामर्श और निर्देशन में विरेचन और रक्तमोक्षण करवाएं।
  • पानी तथा अन्य तरल पदार्थ, जैसे-नींबू पानी आदि अधिक मात्रा मंे लें।
  • क्रोध, ईष्या, चिन्ता आदि उद्वेगों से अपने आप को दूर रखें।
  • नियमित रूप से व्यायाम, योग तथा सैर करना हितकर है।
  • कॉफी और चॉकलेट का उपयोग न करें, चाय भी कम लें।
  • प्राणायाम एवं योग द्वारा अपने मन को सन्तुलित रखें।
  • धीरे बोले और ज्य़ादा न बोलें।

निम्न रक्तचाप

  • बड़ी इलायची का सेवन निम्र रक्त चाप के रोगियों के लिए अत्यधिक उपयोगी है किन्तु इसका अधिक उपयोग गरमी करता है अतः इसके दानों को बारीक पीस कर तिगुनी मात्रा में पिसी हुई मिश्री मिलाकर तथा थोड़ा शहद डाल कर चने के दाने जितनी गोलियां बना कर रख लें। ऐसी दो-दो गोलियों को दिन में दो बार गरम पानी से लेना चाहिए।
  • सामान्यतः कमजोरी के कारण निम्र रक्तचाप का रोग होता है। नियमित रूप से कुछ शक्तिवर्धक रसायनों का सेवन करें। एक या दो कच्चे लहसुन की कलियां शहद मंे पीस कर खाएं।
  • ठंडी तसीर की वस्तुएं न खाए। बड़ी इलायची, लौंग, दालचीनी व तुलसी को उबाल कर ऐसे ही पियें या इसकी चाय बनायें। इसमंे मिश्री अवश्य डाल लें।
  • कम रक्तचाप होने पर विश्राम करें तथा ऊपर लिखे हुए तरीके से बनाई चाय पीएं। सामान्य होने के उपरान्त ही काम करना शुरु करें।
  • भोजन समय पर करें और व्यस्तता आदि कारणों से भूखे रहने से बचें।
  • कॉफी, चॉकलेट तथा मसाला चाय के सेवन से लाभ होता है।
  • दूध में हल्दी उबाल कर पीना अत्यधिक लाभकारी है।
  • घर में बने मसालों का ही प्रयोग करें। नींबू पानी का सेवन अधिक करें।

पेट तथा अन्य पाचन सम्बन्धी रोग

सामान्यतः बार बार खाने से या एक ही बार में अधिक खाने से इस प्रकार के रोग होते हैं। आरम्भिक अवस्था में तो यह रोग महर्षि चरक द्वारा बताए गये आहार-विहार सम्बन्धी आठ सामान्य नियमों के पालन से भी ठीक किए जा सकते हैं।
1. दिन में ज्यादा से ज्यादा चार बार कुछ खाएं। किन्तु तीन बार खाना स्वास्थ्य तथा पेट के लिए और अधिक लाभदायक है। एक बार कुछ खाने के बाद कम से कम चार घंटे का अन्तर रखें। बीच में कुछ भी खाना पेट तथा सामान्य स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है।
2. भोजन बहुत जल्दी जल्दी या बहुत धीरे-धीरे न करें। भोजन को क्या हितकारी है और क्या अहितकारी है ये समझकर, अच्छी तरह परोस कर, चबा-चबा कर तथा शान्तिपूर्वक बिना टी.वी. इत्यादि देखते हुए करना चाहिए।
3. रात्रि का भोजन सोने से कम से कम दो घंटा पहले करें। यदि यह अन्तर तीन घंटे का हो तो और बढिय़ा है। रात्रि के भोजन और सुबह के नाश्ते में बारह घंटे का अन्तर रखें।
4. भरपेट भोजन न करें। भूख से थोड़ा कम ही खाएं। पेट को हमेशा दो तिहाई ही भरना चाहिए। एक तिहाई स्थान पाचन के लिए खाली रखना चाहिए।
5. भोजन के पूर्व स्नान करंे इस से जठराग्रि तीव्र होती है। बाद में स्नान न करें यदि करना ही पड़े तो भोजन के कम से कम तीन घंटे बाद स्नान करें।
6. भोजन आरम्भ करने से पहले अपना चित्त एकाग्र करने के लिए कोई मंत्रा अथवा प्रार्थना करनी चाहिए या पांच बार गहरी सांस लेनी चाहिए।
7. भोजन शान्त अवस्था में तथा शुद्ध एवं सुन्दर वातावरण मंे करें। क्रोध, दुःख आदि की अवस्था में भोजन न करें।
8. भोजन हमेशा गरम और तरल होना चाहिए।

इस के अतिरिक्त सप्ताह में एक बार उपवास या फिर फलाहार करना चाहिए। यह सम्भव न हो तो सप्ताह में एक बार हलका आहार लेने का नियम बनाए। विरुद्ध आहार का सेवन हानिकारक है जैसे दूध के साथ खट्टे पदार्थ या तरबूज अथवा गरम किया हुआ शहद लेना। एसिडिटी से परेशान लोग भोजन करने के लगभग पंद्रह मिनट बाद एक कप मिश्री मिलाकर ठंडा दूध लें या भोजन के बाद दो लौंग और सात आठ किशमिश मिलाकर पीस कर खाएं। दिन में कभी नहीं सोना चाहिए विशेषकर भोजन के बाद। रात्रि जागरण से भी बचें।

जोडा़ें का दर्द ( वात विकृति )

आयुवर्दे में जोड़ों के दर्द का कारण वात विकृति है। सुबह शरीर का अकड़ा होना, उबासियां या हिचकियां आना, बार बार गला सूखना, गहरी नींद न सो पाना कब्ज का रहना वात विकृति के प्रारम्भिक लक्षण हैं। इन लक्षणों की उपेक्षा से अनेक बीमारियां जैसे जोड़ों का दर्द या गठिया आदि होते हैं।

  • जोडों का दर्द कई बार इन स्थानों पर यूरिक एसिड जमने से भी होता है। ऐसा हमारे कृषि उत्पादन में बढ़ते हुए रासायनिक खादों के प्रयोग के कारण होता है। खाद्य पदार्थों में बढ़ती हुई यूरिया की मात्रा से बचने के लिए जहां तक हो सके जैविक उत्पादों का ही सेवन करें।
  • पूरे शरीर में मालिश करके स्वेदन के बाद सुबह की धूप में बैठना लाभदायक है। चिकित्सक की सलाह के अनुसार बस्ति का सेवन भी उपयोगी है।
  • देसी गेंहू का आटा प्रयोग करें। जो गेहूं छोटी-छोटी दिखती है उनमें प्रायः रासायनिक खादों का प्रयोग कम हुआ होता है। अतः उसका प्रयोग करें।
  • आकार में सामान्य से छोटी दिखने वाली सब्जियों का सेवन करे। यह सस्ती भी होती है और इनमें रासायनिक खादों का प्रयोग कम हुआ होता है।
  • रेत का तथा लोहे का सेक जोड़ों का दर्द कम करने के लिये रामबाण हैं। रेत गर्म करके उसे सूती कपडे़ की थैली में रख कर सेक करें।
  • कठोर भूमि पर न चलें, जूते चप्पल भी ऐसे होने चाहिए कि उनसे पैरों को नुकसान न हो तथा अधिक चलने पर भी थकावट महसूस न हो।
  • ठंड़ा, बासी और सूखा भोजन न करें। सूप, पतली दाल, हलवा इत्यादि का प्रयोग करें। साबुत दालें 24 घंटे भिगो कर तथा कई बार इनका पानी बदल कर पकाएं। धुली हुई दालें भी 2-3 घंटे भिगो कर बनाएं।
  • वात विकृति होने पर गरम पानी, तेल मालिश तथा भाप का सेक लें।
  • चना, उड़द, राजमा, मटर, चौलाई आदि का सेवन यथासम्भव न करें।
  • एक चम्मच हल्दी को दूध में उबाल कर रोज सेवन करें।
  • अगर मोटापा भी हो तो उसे दूर करने का उपाय करें।
  • रात्रि जागरण न करें।

मोटापा

मोटापे को कम करने के लिए तथा और न बढऩे देने के लिए महर्षि चरक द्वारा बताए गए आठ सुनहरी सिद्धान्त तो रामबाण का काम करते ही हैं इसके अतिरिक्त निम्र उपाय भी लाभकारी है।

  • सुबह उठकर खाली पेट दो गिलास गरम जल पिएं आरै उसके बाद आधा घंटा बिना चाय आदि पिए व्यायाम, योग और सैर करें।
  • रात को सोने के पहले भी एक गिलास गरम पानी पिए।
  • रात्रि भोजन के तत्काल बाद न सोएं। कम से कम एक हजार कदम अवश्य चलें।
  • केवल सेंधा नमक का उपयोग करें। सब्जियां पक जाने के बाद ही नमक डालें।
  • मिश्री का प्रयोग करें और चीनी के प्रयोग से बचें।
  • भोजन तिल या जैतून के तेल या देसी घी से ही बनाएं। तेल की मात्रा बहुत कम होनी चाहिए। रिफाइडं तेलों का प्रयोग कभी न करें।
  • गरिष्ठ आहार जैसे कि मैदे से बनी चीजें, मिठाई, गुड़, ठंडे पेय और आइस्क्रीम का सेवन न करें। तले हुए व्यंजन, फास्ट फूड, मांस, चीज़, बटर आदि के सेवन से बचें।

हृदय रोग

  • मन को शान्त रखें, चिन्ता, शोक, भय, क्रोध आदि उद्वेगों से बचें।
  • फलाहार अधिक मात्रा में करें।
  • छोटी इलायची कोलेस्ट्रॉल को कम करती है तथा हृदय को शक्ति प्रदान करती है।
  • मुलहठी का उपयोग हृदय के लिये हितकर है।
  • मुलहठी, छोटी इलायची, काली मिर्च और तुलसी की चाय लाभकारी है।
  • हृदय रोगी को सरल योगासन तथा नाड़ी शोधन प्राणायाम नियमित रूप से करना चाहिए।
  • आयुर्वेद में घी का निषेध नहीं होता किन्तु मात्रा कम और नियमित रखें। सन्तुलित आहार लेना चाहिए। तीखे, तले हुए तथा गरिष्ठ खाद्य पदार्थ बिलकुल नहीं खाने चाहिए।
  • कभी भी आवश्यकता से अधिक या अनियमित भोजन नहीं करना चाहिए।
  • गुलकन्द का सेवन करें यह हृदय की शक्ति को बढ़ाता है।