रावण की पुस्तकों का दौर…

श्रीकृष्णु ‘जुगनू’


हर किसी ने सिद्ध किया है कि लंकेश्वर रावण महापंडित था। ऐसा क्यों कहा! रावण के नाम से ‘शिव तांडव स्तोत्र’ तो मशहूर रहा ही है, हालांकि वह ज्यादा पुराना नहीं है क्योंकि उसकी संस्कृत पुरानी नहीं। रावण हत्था नामक साज भी पूर्व मध्यकाल की सारंगी है। विष्णुपुराणकार उसकी कोई स्मृति नहीं बचने की बात पृथ्वी गीता में कहता है।

मगर, पिछले कुछ समय से रावण के नाम पर किताबें भी आती जा रही है। मेरे एक परिचित बनारस के डॉ. सुरकांत झा की एक किताब मेरे हाथ में है – रावण संहिता। इसमें रावण की प्रतिभा को लिखा गया है, उसके जन्म से लेकर शिक्षित-दीक्षित होने और तपस्या तक करने का जिक्र इस विशालकाय ग्रंथ में संजोया गया है। कुल 1190 पेजों के इस ग्रंथ में छह तरंगे या अध्याय है। चौखंबा संस्कृत सीरिज से इसका प्रकाशन हुआ है। इसी नाम की एक किताब किसनलाल शर्मा ने भी लिखी है। एक अनोखे लाल नामक सज्जन दिव्य रावण संहिता पर काम कर रहे हैं।

चातुज्र्ञानम् नामक एक पुस्तक संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से प्रकाशित हुई है, जिसका प्रणेता रावण को माना जाता है। यह वैदिकी टीका के साथ प्रकाशित है और बैठ संप्रदाय का प्रारंभिक ग्रंथ है। रावण का चिकित्सा शास्त्र भी विश्रुत है। उस ग्रंथ के अनुशीलन से विदित होता है कि रावण ने चेचक जैसी परेशानी से तंग होकर लंका में बच्चों को इससे मुक्ति दिलाने का प्रारंभिक प्रयास किया था। इस व्याधि को पूतना के नाम से जाना जाता है। पूतना की परेशानी कृष्ण को भी हुई, मगर हमने पूतना वध की कहानी मानकर एक व्याधि की ओर निगाह ही नहीं डाली। आज चेचक का उन्मूलन ही हो गया, मगर इस दिशा में पहली सोच रावण की ही रही होगी। रावण ने बालमातृका दोषों के निवारण के लिए ग्रंथ भी लिखवाए थे। लगता है कि लंका में इस संबंध में पहले सोच विकसित हुआ। यह ग्रंथ आयुर्वेद में पढ़ाया भी जाता है। यह अधिक पुराना नहीं लगता।

उसने पहली बार विमान विद्या पर अनुसंधान करवाया और मय जैसे विज्ञानी को अपने ससुर के साथ-साथ अपने राज्य में वास्तु और विमान विद्या की खोज के लिए नियुक्त किया। पुष्पक जैसा विमान उसने कुबेर से छीन लिया और अन्य विमान बनाए जो इच्छाशक्ति से संचालित होते थे। सीताहरण के दौरान वह विमानारूढ़ होकर ही लंका को लौटा था। मय का अपना विमानशास्त्र था। बृहदविमानशास्त्र में मय के विमान संबंधी विचारों को लिखा गया है। उसने वैरिमारण कवच, इंद्रजाल जैसी विद्या, यक्षिणी साधना, मृत संजीवनी विद्या आदि दर्जनों विद्याओं पर कार्य करवाया। इतना कार्य न कंस ने किया, न ही अन्य किसी असुर ने। रावण सच में रावण ही था।

राजस्थान में चकवा चौहान की एक कथा प्रचलित है। उसकी आन फिरती थी। उसने रावण से भी खरनी मांगने को दूत भेजा था। रावण ने नहीं दी तो दूत ने समुद्र तट पर नकली लंका बनाई और चकवा का नाम लेकर उसका एक बुर्ज गिराया तो लंका का एक बुर्ज सच में ढह गया। रावण चौंक गया और खरनी अर्थात् कर अदा किया। यह क्या कथा है, मालूम नहीं। कहां तो रावण और कहां चकवा? क्यों झाडोल के पास कमलनाथ महादेव के लिए कहा जाता है कि वहां रावण ने तपस्या की और अपनी पद्म पूजा में एक कमल कम होने पर अपना सिर निवेदित कर दिया। आहोर के किले में विश्रवा का आश्रम था और तीनों भाई वहीं पैदा हुए थे। यह जनश्रुति कैसे और क्यों चलाई गई?

वाह रावण और उसकी कथाएं। सच में रावण का जवाब नहीं, तभी तो आज भी रावण दहन के बाद कई समुदायों में बच्चों का मुंडन तक करवाने की परंपरा चली आ रही है। युग हो गए मगर लंका की पंरपराएं हमारे दौरो दरम्यान शेष है।