कितनी उपयोगी है एनसीईआरटी पुस्तकेंं ?

डॉ. शैलेन्द्र कुमार
लेखक प्रसार भारती में अपर महानिदेशक हैं।


हमारे देश की विद्यालयी शिक्षा को पांच से अधिक बोर्ड संचालित करते हैं। इसलिए हमारी शिक्षा प्रणाली में एकरूपता का अभाव है। जिस बोर्ड के तहत सबसे अधिक छात्र आते हैं, वह है राज्य माध्यमिक शिक्षा बोर्ड। इसके बाद सी.बी.एस.सी, आइ.सी.एस.र्ई और एन.आई.एस.ओ तो हैं ही, साथ ही दो अंतरराष्ट्रीय बोर्ड भी हैं। अनेक बोर्ड होने के कारण हमारे देश में विषय-सूची, पाठ्यक्रम आदि को लेकर प्रचुर विविधता है। आज देश में कुल विद्यालयी छात्रों की संख्या 26 करोड़ है, जो सारे विश्व में सर्वाधिक है। इतनी बड़ी संख्या में छात्रों को शिक्षा प्रदान करना अत्यन्त चुनौतीपूर्ण कार्य है। और गुणवत्तापरक शिक्षा उपलब्ध कराना तो और भी कठिन तथा जटिल कार्य है। शिक्षा की गुणवत्ता के लिए अनेक कारक उत्तरदायी होते हैं, जैसे विद्यालय में आधारभूत सुविधाओं का होना, योग्य व प्रशिक्षित शिक्षकों की उपस्थिति, विद्यालय का प्रबन्धन, छात्रों के शिक्षित व जागरूक माता-पिता, पर्याप्त मात्रा में पुस्तकों तथा अन्य पाठ्य सामग्री की उपलब्धता, शिक्षा-नीति, शिक्षा का उद्देश्य आदि-आदि। परन्तु इस लेख में केवल एक विषय पाठ्यपुस्तकों पर ही विचार किया जाएगा। पाठ्यपुस्तक के सम्बन्ध में भी इस लेख का उद्देश्य केवल इस लघु प्रश्न पर विचार करना है कि क्या सरकार को पाठ्यपुस्तकों का निर्माण करना चाहिये?

हमारे देश में विद्यालयी छात्रों को उपलब्ध की जा रही पाठ्यपुस्तकों के मुख्यत: तीन स्रोत हैं — 1. एस.सी.ई.आर.टी (राज्य सरकार), 2. एन.सी.ई.आर.टी (केंद्र सरकार) और 3. निजी या प्राइवेट प्रकाशक। परन्तु प्रभाव की दृष्टि से एन.सी.ई.आर.टी सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। एन.सी.ई.आर.टी पूरे बारह वर्ष की विद्यालयी अवधि के लिए पाठ्यपुस्तकें उपलब्ध कराने का काम करती है। सामान्यतया एन.सी.ई.आर.टी नये सिरे से पुस्तक-निर्माण के स्थान पर विभिन्न पुस्तकों के अंशों का संकलन और सम्पादन का काम करती है। फिर भी इतिहास-जैसे विषयों के लिए पुस्तकलेखन का काम भी करती है। जहाँ एन.सी.ई.आर.टी द्वारा निर्मित पाठ्यपुस्तकों का प्रयोग केंद्र सरकार के अधीन आनेवाले विद्यालयों द्वारा किया जाता है, वहीं एससीईआरटी द्वारा निर्मित पाठ्यपुस्तकों का प्रयोग राज्यों के अधीन आनेवाले विद्यालयों द्वारा किया जाता है। राज्यों में प्राथमिक शिक्षा के लिए लगभग अनिवार्य रूप से एससीईआरटी द्वारा निर्मित पुस्तकें ही प्रयुक्त होती हैं। लेकिन ऊँची कक्षाओं के लिए एससीईआरटी की पुस्तकों का प्रयोग अपेक्षाकृत अधिक होता है। उदाहरण के लिए बिहार सरकार अपने ग्यारहवीं तथा बारहवीं के छात्रों के लिए सीधे-सीधे एससीईआरटी की पुस्तकें ही उपलब्ध कराती है।

इस प्रकार राष्ट्रीय संस्था होने के कारण एन.सी.ई.आर.टी की पुस्तकों का उपयोग राष्ट्रव्यापी होता है। साथ ही, एन.सी.ई.आर.टी की पुस्तकें एक मानक के रूप में भी प्रयुक्त होती हैं। इसलिए केंद्रीय बोर्ड, जैसे— सी.बी.एस.सी द्वारा प्राधिकृत विद्यालयों के अतिरिक्त निजी क्षेत्र के विद्यालयों में भी एन.सी.ई.आर.टी की पुस्तकों का प्रयोग होता है। इससे भी बड़ी बात यह है कि केंद्रीय प्रतियोगिताओं के लिए छात्र सामान्यत: एन.सी.ई.आर.टी की पुस्तकों पर निर्भर होते हैं। इस प्रकार एन.सी.ई.आर.टी की पुस्तकों में क्या लिखा हुआ है, इसका पूरे देश के छात्रों के मानस पर सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है। बालमन पर एक बार जिस प्रकार की लकीरें खींच दी जाती हैं, वे जीवनपर्यंत विद्यमान रहती हैं। इस दृष्टि से एन.सी.ई.आर.टी की पुस्तकों के स्वरूप पर विमर्श की महती आवश्यकता प्रतीत होती है।

यहाँ प्रश्न उठता है कि क्या सरकार को पुस्तक-लेखन का कार्य अपने हाथ में लेना चाहिए? इस मामले में दूसरे देशों की क्या स्थिति है? विशेषकर ऐसे देश, जो आधुनिक शिक्षा में हमसे कहीं आगे हैं, उनके यहाँ पाठ्यपुस्तकों को लेकर कैसी नीति आपनाई जाती है? हमें यह जानकर आश्चर्य होगा कि अमेरिका, जिसकी शिक्षा-प्रणाली श्रेष्ठ मानी जाती है, वहाँ पाठ्यपुस्तकों को लेकर सरकार की कोई नीति ही नहीं है। इसलिए एन.सी.ई.आर.टी-जैसी कोई संस्था वहाँ होगी, इसकी कोई सम्भावना ही नहीं है। ऐसी ही स्थिति कमोबेश अन्य विकसित देशों की भी है। विकसित देशों के शिक्षा विभाग केवल शिक्षा के उद्देश्यों की बात करते हैं। उनका ध्यान इस बात पर अधिक होता है कि विद्यालयों में छात्र सुरक्षित कैसे रहें, विषय-सूची क्या हो, शिक्षा की गुणवत्ता में किस प्रकार उत्तरोत्तर सुधार हो, आदि-आदि। पुस्तकें कौन लिखेगा, किस प्रकार लिखेगा, कौन प्रकाशित करेगा, कौन उपलब्ध कराएगा-जैसे प्रश्न शिक्षा-विभागों की चिन्ता से परे होते हैं। अमेरिका के राज्य अपने हिसाब से अपनी शिक्षा-नीति बनाते हैं और उसका अनुपालन करते हैं।

यूनेस्को, जिसे विश्व में शान्ति की स्थापना, निर्धनता-उन्मूलन तथा सतत विकास के लिए शिक्षा, विज्ञान, संस्कृति, संचार तथा सूचना को बढ़ावा देने का दायित्व सौंपा गया है, का मानना है कि जिन देशों में व्यापक स्तर पर पाठ्य पुस्तकों के निर्माण की सुदृढ़ परम्परा और दीर्घ अनुभव है, उनके यहाँ लेखकों तथा प्रकाशकों के मध्य प्रतिस्पर्धा होती है। इसके फलस्वरूप शिक्षकों को अपने विद्यालयों के लिए सर्वोत्तम पुस्तकों के चयन की सम्भावना बनी रहती है। परन्तु बहुत ऐसे देश भी हैं जहाँ एक विषय के लिए एक ही पाठ्यपुस्तक उपलब्ध होती है। ऐसे में स्पष्ट है कि सारी शक्ति इस बात में लग जाती है कि वह अकेली पुस्तक सर्वोत्तम हो। पर हम अनुभव से जानते हैं कि एक पुस्तक चाहे कितनी भी अच्छी क्यों न हो, वह अनेक पुस्तकों का विकल्प नहीं बन सकती।

फिर प्रश्न यह उठता है कि हमारे देश में पाठ्यपुस्तक-निर्माण का काम एन.सी.ई.आर.टी को क्यों सौंपा गया? क्या हमारे यहाँ हर एक विषय के लिए अनेक पुस्तकें नहीं लिखी जा सकती थीं? और क्या हमें इससे अपेक्षित लाभ प्राप्त हुआ? इसका उत्तर यह है कि स्वाधीनताप्राप्ति के बाद हमने समाजवाद को अपनाया, जिसके तहत अन्य अनेक बातों के अतिरिक्त हमें ही यह निर्धारित करना था कि कौन क्या पढ़ेगा। इस प्रकार हमारे देश में स्वाधीनताप्राप्ति के बाद से शिक्षा के क्षेत्र में अधिकतम शासकीय हस्तक्षेप आरम्भ हुआ। हम देखेंगे कि हमें इससे बहुत हानि हुई है। चूँकि सरकार ने पाठ्यपुस्तकों के निर्माण का दायित्व अपने ऊपर लिया और इन पुस्तकों को अनिवार्य कर दिया, इसलिए हमारे यहाँ लेखकों और प्रकाशकों के बीच प्रतिस्पर्धा का वातावरण नहीं बन पाया। इसका परिणाम यह हुआ कि हम ‘एक विषय-एक पाठ्यपुस्तक’ वाला देश बन गये। सामान्यतया पाठ्यपुस्तकों को हम तीन वर्गों में विभक्त कर सकते हैं— 1. विज्ञान, 2. कला या सामाजिक विज्ञान तथा 3. वाणिज्य की पुस्तकें। वैसे तो इस प्रकार का स्पष्ट वर्गीकरण ग्यारहवीं तथा बारहवीं कक्षाओं के लिए है, परन्तु छोटी कक्षाओं में भी इन्हीं वर्गों के अलग-अलग विषय पढ़ाए जाते हैं। भाषा और साहित्य एक ऐसा विषय है जो लगभग सभी कक्षाओं में पढ़ाया जाता है। इस प्रकार यदि हम ध्यान से विचार करें, तो पाते हैं कि विज्ञान और वाणिज्य के लिए एन.सी.ई.आर.टी को बहुत कुछ नया नहीं करना पड़ता है। विज्ञान के लिए तो ध्यातव्य है कि निजी प्रकाशकों की पुस्तकों की भी पर्याप्त मांग सदैव बनी रहती है। इसलिए एन.सी.ई.आर.टी विज्ञान की पुस्तकें प्रकाशित करे या न करे, इससे बहुत अधिक अन्तर नहीं पड़ेगा। इसी तरह की स्थिति वाणिज्य की पुस्तकों को लेकर भी है। लेकिन सामाजिक विज्ञान के साथ-साथ भाषा और साहित्य-जैसे विषयों के लिए एन.सी.ई.आर.टी की भूमिका बहुत बढ़ जाती है। सामाजिक विज्ञान में भी इतिहास एकमात्र ऐसा विषय है, जिसके लिए नूतन पुस्तकें लिखी जाती हैं। भाषा और साहित्य के लिए कहानी, कविता आदि का केवल चयन किया जाता है। इस दृष्टि से भाषा और साहित्य के लिए सम्पादन ही मुख्य काम होता है।

उपर्युक्त वस्तुस्थिति की विवेचना करने पर हम पाते हैं कि पाठ्यपुस्तकों को लेकर एन.सी.ई.आर.टी की भूमिका अपरिहार्य नहीं है। अर्थात् यदि एन.सी.ई.आर.टी पुस्तक-निर्माण का काम न भी करे, तो निजी स्रोतों से पुस्तकें प्राप्त की जा सकती हैं। हम तर्क करने के लिए तर्क कर सकते हैं कि स्वाधीनताप्राप्ति के तुरन्त बाद सम्भवत: हमारे लेखक और प्रकाशक इस योग्य नहीं थे कि पाठ्यपुस्तकों की मांग को पूरा करते। परन्तु अब तो ऐसा तर्क नहीं दिया जा सकता। अब तो देश इससे भी बड़ी चुनौतियों का सामना करने के योग्य है।

पर प्रश्न उठता है कि एन.सी.ई.आर.टी द्वारा किए जा रहे इस काम से क्या हानि हो रही है जिससे हम इसके विकल्प पर विचार करें। एन.सी.ई.आर.टी द्वारा किए जा रहे पुस्तक-निर्माण की सबसे पहली कमी तो यह है कि इसकी पुस्तकें अद्यतन नहीं होतीं। चाहे किसी भी कक्षा की पुस्तक क्यों न हो, यदि उसे अद्यतन बनाना है तो एन.सी.ई.आर.टी कम-से-कम एक दशक तो लेती ही है। सरकारी संस्था होने के कारण सरकार की तमाम कमियाँ इस संस्था में भी हैं और लाख चाहने पर भी यह काम कभी भी समय पर पूरा नहीं हो पाता है। इसका सीधा अर्थ यह है कि करोड़ों छात्र पुरानी पुस्तकें पढऩे को बाध्य होते हैं।

दूसरी सबसे बड़ी कमी है समय पर पुस्तकों का उपलब्ध न होना। यूनेस्को का, जो कि सारे विश्व की शिक्षा पर नजÞर रखता है, कहना है कि पुस्तकों का समय पर प्रकाशन और उसकी उपलब्धता सुनिश्चित कराना अपने आप में बहुत बड़ी चुनौती होती है। इसलिए कई बार हम ऐसी ख़बर पढ़ते हैं कि शैक्षणिक सत्र आरम्भ होने के समय छात्रों को एन.सी.ई.आर.टी की पुस्तकों के अभाव का सामना करना पड़ता है। वैसे तो अब ये पुस्तकें ऑनलाइन उपलब्ध हैं। परन्तु एक तो सबके पास यह सुविधा नहीं होती। दूसरे, बिना प्रिंट कराए बच्चों का काम नहीं चल सकता। स्पष्ट है कि जिस दक्षता के साथ निजी क्षेत्र इस काम को कर सकता है, सरकार नहीं कर सकती।

एन.सी.ई.आर.टी की पुस्तकों के अनूदित संस्करणों में भाषायी अशुद्धियाँ आम होती हैं। यह हमारे देश का दुर्भाग्य है कि आज तक भाषा-साहित्य को छोड़कर किसी और विषय की पुस्तकें किसी भी भारतीय भाषा में नहीं लिखी जातीं। यहाँ भी शुद्ध सरकारी मनोभाव से काम होता है। यानी सबसे पहले सारे विद्वान् बैठकर अंग्रेज़ी में लिखते हैं उसके बाद उसका भारतीय भाषाओं में अनुवाद होता है। इस प्रकार सारी भारतीय भाषाएँ सिफर्Þ और सिर्फ अनुवाद की भाषाएँ बनकर रह जाती हैं। वर्तमान सोच के हिसाब से भारतीय भाषाओं में एन.सी.ई.आर.टी द्वारा पुस्तक लेखन का काम नहीं हो सकता। अनुवाद की भाषा कृत्रिम होती है। अंग्रेज़ी और भारतीय भाषाओं के स्वभावगत अन्तर की अनदेखी की जाती है। ऐसे अनुवाद को पढऩे में आनन्द नहीं आता है। अनुवादक को अपनी भाषा के ज्ञान के साथ-साथ उस विषय में भी प्रवीण होना अनिवार्य है जिसका उसे अनुवाद करना होता है। परन्तु ऐसा संयोग दुर्लभ होता है। अंग्रेज़ी में लिखनेवाले अनूदित पाठ्य को सम्भवत: देखते भी नहीं हैं। और यदि देखते भी होंगे तो उनका भारतीय भाषा का ज्ञान कम होने के कारण वे अनुवाद के साथ न्याय नहीं कर पाते होंगे। इस प्रकार यह शाश्वत समस्या बन गई है। और इसका हल ढूँढऩा एन.सी.ई.आर.टी की क्षमता से बाहर है। सरकारी नियमों की जकड़बन्दी के कारण उसके लिए यह सम्भव नहीं कि वह मौलिक रूप से भारतीय भाषाओं में पुस्तक-निर्माण का काम सुरुचिपूर्ण तरीके से करे। रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने ‘संस्कृति के चार अध्याय’ नामक एक अत्यन्त लोकप्रिय ग्रंथ की रचना की। इस पुस्तक को इतिहास की श्रेणी में भी रखा जा सकता है। चूँकि यह मौलिक पुस्तक है, अतएव इसकी भाषा, कथ्य, लेखनशैली आदि-आदि इतने रोचक हैं कि पाठक इसको पढ़कर आनन्द उठाता है। इसी तरह की अनेक पुस्तकें हैं जिनको पढ़कर छात्र लाभान्वित हो सकते हैं, परन्तु ऐसी पुस्तकों को पढऩे के स्थान पर हम अंग्रेज़ी की जूठन पढऩे को बाध्य किए जाते हैं।

दूसरी ओर एन.सी.ई.आर.टी की उपस्थिति ने छात्रों के लिए स्वतन्त्र लेखन को हतोत्साहित किया है। यदि विद्यालयों पर पाठ्यपुस्तकों के चयन का दायित्व सौंप दिया जाए, तो कहीं बेहतर पाठ्य सामग्री उपलब्ध होगी। कुछ सीमा तक आज भी ऐसा हो रहा है। सातवीं-आठवीं कक्षा से ही आईआईटी-जैसे संस्थानों में प्रवेश की तैयारी के लिए छात्र स्वतंत्र लेखकों द्वारा लिखी पुस्तकों या पाठ्य सामग्री का उपयोग करना आरम्भ कर देते हैं। इसलिए यदि एन.सी.ई.आर.टी की अनिवार्यता समाप्त कर दी जाए, तो स्वतंत्र लेखन की बाढ़ आ जायेगी। हाँ, इतना अवश्य होगा कि बहुत सारी पुस्तकें स्तरहीन भी होंगी। लेकिन इससे बहुत फÞर्क नहीं पड़ेगा; क्योंकि हर पुस्तक के अनेक विकल्प उपलब्ध होंगे। अंतत: इससे मौलिक लेखन को बढ़ावा मिलेगा और भारतीय भाषाओं में भी मूल रूप से पुस्तकें लिखी जाएँगी।

जिस विषय से देश की सर्वाधिक हानि हुई है वह है इतिहास। यह एकमात्र विषय है जिसकी पुस्तकें एन.सी.ई.आर.टी द्वारा मनोनीत विद्वानों द्वारा लिखी जाती हैं। इस विषय में लेखकों की विचारधारा अत्यन्त मुखर होकर सामने आती है। आठवीं शती से मुस्लिम हमलावरों ने अपने हिसाब से इतिहास लिखवाया। इतिहास मुख्यत: उनके दरबारियों ने लिखा। स्पष्ट है कि उनकी दृष्टि एकांगी थी। फिर भी आज जो इतिहास हमें पढ़ाया जाता है वह इन दरबारियों द्वारा लिखित इतिहास पर बहुत सीमा तक निर्भर है। इसके अतिरिक्त मध्यकाल में आए विदेशी यात्रियों के यात्रा-वृत्तांत पर भी हमारा इतिहास निर्भर है। विदेशी यात्रियों में या तो मुस्लिम हैं या यूरोपीय। दोनों का ही अपना-अपना उद्देश्य था जिस कारण हमारे लिए उनके वृत्तांत का न्यूनतम उपयोग ही सम्भव है। मुस्लिम यात्रियों में सर्वप्रसिद्ध है इब्नबतूता। इब्न बतूता के बारे में वी.एस. नायपल अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि उसका लक्ष्य था तत्कालीन सभी मुस्लिम देशों का भ्रमण करना और इसके लिए वह उस समय के निरंकुश सुलतानों के दान पर निर्भर रहता था। ऐसे में सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि इब्न बतूता का वृत्तांत किस सीमा तक हमारे काम का हो सकता था!

असल में इतिहासलेखन में आरम्भ से ही ख़ामियाँ रही हैं। सबसे बड़ी ख़ामी तो यह रही कि हमारे इतिहासकार अंग्रेज़ों या पश्चिमी इतिहासकारों की एक निर्मित धारणा का मुखर उत्तर नहीं दे सके कि आर्य बाहर से आए थे। इससे आर्य-द्रविड़ का विवाद आरम्भ हुआ। इतने लम्बे समय तक किसी टूटे रिकार्ड की तरह एक ही धुन बजाई गई जो आज भी लोगों के मन-मस्तिष्क में कायम है। दुर्भाग्य यह है कि सम्भवत: हमारे एन.सी.ई.आर.टी के लेखकों ने प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन नहीं किया और जिस कारण से ‘आर्य’ शब्द का सटीक अर्थ लगा नहीं पाये। कालिदास की रचनाओं में राजा-रानी, विदूषक, विद्वान् आदि को ‘आर्यपुत्र’, ‘आर्या’ जैसे शब्दों से सम्बोधित किया गया है। इसी तरह ‘द्रविड़’ एक ऐसा शब्द है जिससे एक विशेष भौगोलिक क्षेत्र का बोध होता है न कि किसी जाति विशेष का। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने राष्ट्रगीत में ‘द्रविड़’ शब्द का प्रयोग एक भौगोलिक क्षेत्र के रूप में ही किया है। इन सब पारम्परिक प्रमाणों की अनदेखी करके हम भी आर्य-द्रविड़ के भेद में पड़ गए, जिससे हमारे देश की अपूरणीय क्षति हुई।

एनसीइआरटी की आठवीं कक्षा की पुस्तक में ‘आर्य’ के बारे में ज्योतिबा फुळे के सन्दर्भ में क्या पढ़ाया जा रहा है : ‘फुळे का तर्क था कि आर्य विदेशी थे, जो इस उपमहाद्वीप के बाहर से आए थे और जिन्होंने यहाँ के भूमिपुत्रों को पराजित करके अपने अधीनस्थ किया। चूँकि आर्य यहाँ के भूमिपुत्रों पर हावी हो गए इसलिए उन्होंने भूमिपुत्रों को अपने से निम्न जाति का माना।’ इसी तरह देखिए कि एन.सी.ई.आर.टी की आठवीं कक्षा की पुस्तक में पेरियार के सन्दर्भ में ‘आर्य’ को लेकर क्या पढ़ाया जा रहा है : ‘ब्राह्मणेतर आंदोलन की शुरूआत बीसवीं शताब्दी के आरम्भ में हुई। इसके लिए ब्राह्मणेतर जातियों द्वारा पहल की गई, जिनका मानना था कि ब्राह्मण ‘आर्य’ आक्रमणकारियों के वारिस हैं और इन्हीं ब्राह्मणों ने दक्षिण भारत की मूल द्रविड़ जातियों पर विजय प्राप्त की।’

इसी प्रकार मुस्लिम आक्रमणकारियों के द्वारा किए गए अत्याचारों को कम करते-करते ऐसी स्थिति हो गई कि इतिहास की पुस्तक में सिंध पर आक्रमण के बाद आए अरबों के लिए लिखा जाने लगा कि ‘भारत की पश्चिमी किनारे पर अरबों का आगमन हुआ और उनकी सत्ता स्थापित हुई’। इसका बालमन पर कैसा प्रभाव पड़ेगा? सम्भव है, भविष्य में यही समझा जाएगा कि अरबों को भारत ने आमन्त्रित किया था। जबकि सच्चाई यह है कि मुहम्मद पैगंबर की मृत्यु के दो वर्ष के बाद से ही सिंध के हिंदू राज्य पर अरबों का आक्रमण आरम्भ हो गया। कुल मिलाकर 634 से 710 ई. के बीच नौ आक्रमण किए गये। इन आक्रमणों का संचालन सीरिया में बैठे खलीफा ने किया। भीषण रक्तपात, लूट तथा लोगों को दास बनाए जाने के कारण सिंध के आक्रमण याद किए जाते हैं। हम कहीं भी यह नहीं पढ़ते कि किस प्रकार पूरी इस्लामी सत्ता के विरुद्ध एक राज्य ने लगभग आठ दशकों तक संघर्ष किया। दिल्ली सल्तनत के इतिहास में कहीं भी स्पष्ट रूप से इस बात का उल्लेख नहीं मिलता है कि इस कालखण्ड में प्रजा के बीच मजहब के आधार पर भेद किया गया और ग़ैर-मुस्लिम समुदाय से तरह-तरह के ‘कर’ जैसे तीर्थकर, जजिया, ऊँची दरों पर व्यापार कर आदि लिए गए। हजारों की संख्या में मन्दिरों को तोड़ा गया। नये मन्दिरों के निर्माण पर रोक लगाई गई। इसी तरह बलात् मुसलमान बनाए जाने को लेकर भी कुछ विशेष नहीं लिखा जाता। यह हमारे इतिहास का क्रूर पक्ष है, पर हम इसकी अनदेखी नहीं कर सकते। हमारे बच्चों को सब कुछ जानने का अधिकार है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि इतने प्रयासों के बाद भी सत्य सामने आ ही जाता है। दिल्ली सल्तनत के बारे में पढऩे के बाद जब हम अकबर को पढ़ते हैं, तो अकबर की प्रशंसा में कहा जाता है कि अकबर ने तीर्थ कर तथा जजिया-जैसे विभेदकारी करों को समाप्त कर दिया। यहाँ चिन्तनशील छात्र अचानक पूछ सकते हैं कि ये ‘कर’ लगाए कब गए जिन्हें अकबर को हटाना पड़ा।

अत: प्रश्न है कि यदि एन.सी.ई.आर.टी की पुस्तकों का प्रयोग बन्द कर दिया जाए, तो हमारे पास विकल्प क्या है? विकल्प यह है कि सरकार सिफऱ् शिक्षा का उद्देश्य निर्धारित करे। विषय-सूची निर्धारित करे। यह भी निर्धारित करे कि छात्र क्या सीखकर विद्यालय से बाहर निकलेंगे। इसके बाद सब कुछ विद्यालयों पर छोड़ दे। विद्यालय चाहे सरकारी हो या प्राइवेट नीति एक समान होनी चाहिए। इस प्रकार की स्वायत्तता विद्यालय और उसके शिक्षकों को अधिक जिÞम्मेदार बनाएगी। स्वतंत्र रूप से पाठ्यपुस्तक लिखनेवालों की मांग बढ़ेगी। फिर भारतीय भाषाओं में भी मौलिक पुस्तकें लिखी जाएँगी। इतिहास-जैसे विषयों के लिए भी विकल्पों की झड़ी लग जाएगी। कम-से-कम एक विचारधारा से प्रभावित पुस्तकों की अनिवार्यता समाप्त हो जाएगी। और इसी के साथ सरकारी विचारधारा के चंगुल से भी पाठ्यपुस्तकें सदा के लिए मुक्त हो जाएँगी।

भारत में शिक्षा की वर्तमान स्थिति के लिए बहुत सीमा तक केंद्र सरकार उत्तरदायी है। असल में शिक्षा पूरी तरह राज्य का विषय होना चाहिए; क्योंकि लगभग 95 प्रतिशत छात्र राज्यों के अंतर्गत आनेवाले विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में पढ़ते हैं। पिछले दो दशकों से निजी विश्वविद्यालयों का चलन ज़ोर पकड़ रहा है। फिर भी देश के सर्वाधिक छात्र राज्यों में ही पढ़ते हैं। इस तरह संख्या की दृष्टि से सबसे कम छात्र केंद्रीय संस्थानों में पढ़ते हैं। परन्तु देश के सर्वाधिक संपन्न संस्थान केंद्रीय संस्थान ही हैं। राज्यों के पास धन का अभाव होता है। इसलिए वे शिक्षा पर अपेक्षित धन खर्च नहीं कर पाते हैं। परिणामस्वरूप राज्यों में शिक्षा की गुणवत्ता में लगातार ह्रास हुआ है। आदर्श स्थिति तो यह होती कि केन्द्र सरकार अपने संस्थान खोलने के स्थान पर राज्यों के संस्थानों के लिए अधिक धन उपलब्ध कराती। चंद केन्द्रीय संस्थान हार्वर्ड या ऑक्सफोर्ड क्यों न बन जाएँ, जब तक राज्यों के संस्थानों की स्थिति में पर्याप्त सुधार नहीं होगा, तब तक देश के अधिकतर छात्र अच्छी शिक्षा से वंचित ही रहेंगे। इस तरह राज्यों को इस बात का अधिकार होना चाहिए कि वे अपने हिसाब से पाठ्यक्रम तय करें। परंतु राज्यों को भी पाठ्यपुस्तक लिखवाने जैसे काम में नहीं लगना चाहिए।

उपर्युक्त के अतिरिक्त एन.सी.ई.आर.टी को लेकर सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह एक सरकारी संस्था है और इसलिए सरकार की विचारधारा और एजेंडे से प्रभावित होती रही है। इस दृष्टि से यदि किसी विशेष समय में सब कुछ ठीक-ठाक चल भी रहा हो, तो इस बात की कोई गारंटी नहीं कि कब स्थिति में परिवर्तन हो जाए। अन्तत: एन.सी.ई.आर.टी जैसी संस्था को चलाने में जो धन लग रहा है, उसका सदुपयोग राज्यों की शिक्षा के स्तर को ऊपर उठाने में होना चाहिए। इससे देश कहीं अधिक लाभान्वित होगा।