कैसे बचें बेटियां

रवि शंकर


आम तौर पर ऐसा कह दिया जाता है कि अपने देश में अत्यंत प्राचीन काल से ही स्त्रियों के प्रति काफी उपेक्षा भरा और शोषणकारी व्यवहार किया जाता रहा है और इसलिए आज भी वह व्यवहार समाज में गहरे जड़ जमाए बैठा है। उस शोषणकारी समाज व्यवस्था को समाप्त करने के लिए अंग्रेजों ने कई कानून बनाए और अब स्वाधीन भारत की सरकारें भी कानून बनाने में जुटी हुई हैं। परंतु देखा यह जा रहा है कि समस्त कानून मिल कर भी इस स्थिति को बदलने में सफल नहीं हो पा रहे हैं। इसका सीधा तात्पर्य है कि कहीं कोई चूक हो रही है।
वास्तव में देखा जाए तो अपने देश में केवल बेटी बचाने का ही नहीं, बल्कि स्त्री सशक्तिकरण के जितने भी प्रयास हो रहे हैं, वे कहीं न कहीं स्त्री सशक्तिकरण की यूरोपीय अवधारणा से प्रेरित हैं और इस कारण भारत के जनमानस को नहीं छूते। यहां समझने की बात यह है कि यूरोप और भारत की परिस्थितियों में काफी अंतर रहा है। यूरोप में लगभग एक हजार वर्ष तक का काल अंधकार का काल माना जाता है। यह वह काल है जब भारत में बाह्य आक्रमणों की शुरूआत हो रही थी। भारत जहां विदेशी आक्रमणों से जूझ रहा था, यूरोप में अपने ही लोगों के आक्रमण हो रहे थे।
यह तो आज सभी जानते हैं कि यूरोप का अंधकार युग और कुछ नहीं ईसाइयत के शासन का काल था। ईसाइयत के सिद्धांत और उनका शासन दोनों ही ज्ञान-विज्ञान के विरोधी थे और इस कारण ज्ञान की परंपरा का अवलंबन करने वाले हर वर्ग को उन्होंने बहुत ही बुरी तरह प्रताडि़त किया। इसके अलावा ईसाइयत में स्त्रियों के बारे में काफी हीन भाव भरी है। ईसाई मान्यताओं के अनुसार परमेश्वर ने आदम की भांति स्त्री की रचना नहीं की। उसने स्त्री की रचना आदम के मनोरंजनार्थ उसकी पसली से किया। ईसाइयत की दूसरी समस्या यह थी कि उनकी मान्यता के अनुसार स्त्री (ईव) ही आदम के पतन का कारण बनी। इसलिए पोप से लेकर फादर और पास्टरों ने स्त्री को घृणा की दृष्टि से देखा और उस पर नियंत्रण करने के अमानवीय प्रयास किए। नियंत्रण करने के इन प्रयासों के तहत ही सबसे पहले स्त्री की लैंगिकता को नकारा गया, फिर उनके प्रति पुरूषों के स्वाभाविक आकर्षण को घृणित माना गया और अंतत: स्त्री के समस्त अस्तित्व को ही पापमय और पापमूलक घोषित कर दिया गया।
पुरूषों में काम भावना की कुंठा से होने वाली विकृति से बचने के लिए चर्च ने विवाह की अनुमति तो दी, परंतु उसे कानूनी व्यभिचार कहा। स्त्री के लिए चर्च का सर्वोत्तम आदर्श माना गया कि पत्नी और मां बन कर गृहस्थ बनने की बजाय वह नन के रूप में चर्च को अपना जीवन समर्पित कर दे। हालांकि परिवार का उच्छेद करने की चर्च की मंशा अप्राकृतिक होने के कारण कभी भी पूरी नहीं हो पाई, परंतु पारिवारिक स्त्रियों को काफी हीन माना गया और उन पर अनेकानेक प्रतिबंध लगाए गए। इन प्रतिबंधों के कारण ही वहां लंबे समय तक स्त्रियों को प्रताडि़त किया जाता रहा।
इसी कालखंड में भारत पर विदेशी आक्रमण होने लगे थे। प्रारंभ के विदेशी आक्रमणों से तो भारत की सामाजिक स्थिति में कोई खास परिवर्तन देखने को नहीं मिलता है परंतु नौवीं सदी के बाद भारत पर जो इस्लामिक आक्रमण होने शुरू हुए तो उसने गहरा नकारात्मक सामाजिक प्रभाव डाला। नकारात्मक इसलिए क्योंकि इस्लाम भी ईसाइयत की ही भांति स्त्रियों की उत्पत्ति आदम की पसली से उसके मनोरंजनार्थ ही मानता था। उसके लिए भी स्त्री पापमय और पाप का कारण थी। परंतु इस्लाम ने स्त्रियों पर नियंत्रण करने के दूसरे उपाय किए। उसने स्त्रियों का बाहर निकलना और बाह्य दुनिया से संपर्क ही काट डालने की कोशिश की। स्त्रियों को पुरूषों की खेती माना गया।
ईसाइयत और इस्लाम, दोनों ही मजहबों में स्त्रियों को पुरूषों से हीन और निम्नतर माना गया है। दोनों ही मजहब स्त्री को आदम के पतन का कारण मानते हैं। दोनों ही मजहबों ने इसलिए स्त्री को नियंत्रण में रखने के विविध अमानवीय उपाय किए। यूरोप में पंद्रहवीं शताब्दी के आसपास जब ईसाइयत के प्रति विद्रोह होने लगा, तब वहां की स्त्रियों ने चर्च के आधिपत्य के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। उसने चर्च द्वारा आरोपित सभी वर्जनाओं को तोडऩे के लिए ऐसे कदम भी उठाए जो कम से कम उसके अपने हित में ही नहीं थे। उदाहरण के लिए देह प्रदर्शन करना एक प्रकार से चर्च के उस प्रतिबंध का विरोध था जिसमें स्त्री के यौनांगों को हीनता की वस्तु माना जाता था। यूरोपीय स्त्रियां चर्च के आधिपत्य से तो निकल गईं, परंतु इस लड़ाई में उन्होंने जिस उच्छ्रंखलता को अपना लिया था, उसका नुकसान उन्हें आज भी उठाना पड़ रहा है।
भारत में इस्लामिक आक्रमणों के कारण जो सामाजिक बदलाव हुए, उनसे सबसे अधिक प्रभावित स्त्रियां ही हुईं। इसका कारण यह था कि इस्लाम के आक्रमण से पहले होने वाले युद्धों में स्त्रियों युद्ध के प्रभाव से मुक्त रखा जाता था। परंतु इस्लाम के लिए तो स्त्रियां लूट का सबसे आकर्षक वस्तु थीं। इसलिए भारतीय समाज में स्त्रियों को उनसे बचाना एक बड़ी चुनौती बन गया। स्त्रियों को मुस्लिम लूट से बचाने के लिए ही स्त्रियों को घूंघट में रखना शुरू हुआ। उनकी शिक्षा बंद करनी पड़ी। पढऩे के लिए बाहर जाने पर मुसलमानों द्वारा अपहरण होने की संभावना काफी प्रबल रहती थी। बाल विवाह भी इसी कारण होने लगे। हालांकि बाल विवाह के कुप्रभाव से बचाने के लिए द्विरागमन यानी कि गौना की प्रथा भी डाली गई, जिसके अनुसार लड़की के युवा होने के बाद ही उसे पति के पास भेजा जाता था।
इस प्रकार हम पाते हैं कि भारतीय समाज में आज जो विकृति पाई जाती है, उसके मूल में विदेशी आक्रमणों का दबाव था। इन विकृतियों को चूंकि भारतीय शास्त्रों में कोई आधार नहीं मिलता था, इसलिए पूराने शास्त्रों में श्लोक प्रक्षेपित किए गए और नए शास्त्रों की रचना कर दी गई। पंरतु वास्तव में भारतीय पंरपरा के मूल ग्रंथ वेद स्त्रियों के प्रति काफी सम्मान रखते थे और उनके बिना समाज ही नहीं सृष्टि की ही कल्पना को असंभव मानते थे। वेदों के अनुसार स्त्री की रचना परमात्मा ने सृष्टि की रक्षा करने के लिए की।
स्त्रियों की उत्पत्ति और उनके समाज में महत्व को दर्शाने के लिए ऋग्वेद और अथर्ववेद में एक ब्रह्मजाया सूक्त पाया जाता है। इस सूक्त के पहले मंत्र में कहा गया है कि, ‘आरम्भ में परमेश्वर द्वारा सृष्टि उत्पत्ति के पुण्य कार्य की समाज/संसार की अवनति को रोकने के लिए परमेश्वर ने सबसे पहले कन्या को उत्पन्न करने की आवश्यकता प्रतीत की। ऋत द्वारा सम्पन्न इस कार्य के लिए सृष्टि उत्पन्न करने वाले परमेश्वर के प्रतिनिधियों, आदित्य, सलिल और वायु ने नवजात कन्या को विशेष सामथ्र्य प्रदान करने के बारे में मन्त्रणा की। वेद के अनुसार तप द्वारा अर्जित बलवानों की उग्रता जैसे रामायण काल मे उग्र बलशाली रावण जैसे राक्षसों का अहंकार भरा मतान्ध आचरण या महाभारत काल मे दुर्योधन का आचरण या आधुनिक काल मे बलशाली तानाशाहों के अत्याचार ही समाज की अवनति का कारण होते हैं। इस उग्र पापाचारी शक्ति को हरने के लिए जिस प्रकार गर्मी को ठन्डा करने के लिए शीतल जल डाला जाता है, उसी प्रकार के गुणों से संसार मे सुख प्रदान करने के लिए परमेश्वर ने सबसे पहले कन्या रूपी देवी को बनाया।Ó
वेदों में स्त्री की उत्पत्ति के इस सिद्धांत की तुलना हम बाइबिल और कुरान में दिए गए स्त्री की उत्पत्ति के वर्णन से कर सकते हैं। मौलिक सिद्धांत ही स्त्रियों की स्थिति को स्पष्ट कर देता है। वैदिक वर्णन स्त्रियों को समाज में एक विशेष स्थिति प्रदान करता है। वेद के अनुसार स्त्रियां पाप का कारण नहीं हैं, बल्कि पापाचरण को नियंत्रित करने वाली हैं। उनका अवतरण ही इस अस्वाभाविक उग्रता का शमन करने के लिए हुआ है। इसलिए वैदिक ऋषियों ने घोषणा की कि जहां महिलाओं को सम्मान मिलता है वहां समृद्धि का राज्य होता है। जहां महिलाऑ का अपमान होता है, वहां की सब योजनाएं/ कार्य विफल हो जाते हैं। यह वैदिक काल की विशिष्ट रूप से एक भारतीय परंपरा है, जो विश्व की किसी अन्य सभ्यता में नहीं मिलती। वेदों की स्पष्ट घोषणा है कि स्त्रियों के सम्मान की रक्षा में ही संपूर्ण समाज की रक्षा निहित है।
आधुनिक भारतीय समाज की स्थिति का अवलोकन करने पर आज हम देखते हैं कि
1. महिलाओं पर अत्याचार, कन्या भ्रूण हत्या, आर्थिक लाभ के लिए महिलाओं के अभद्र प्रदर्शन का दुरुपयोग एक साधारण बात है।
2. हमारे निर्वाचित नेता, मंत्री, अभिनेता सब हमारे अपने ही समाज के लोगों द्वारा हिंसक हमलों के डर से उच्च सुरक्षा से घिरे रहते हैं।
3. जलवायु परिवर्तन हमारे नियंत्रण से बाहर होनेे लगे हैं।
4. पारिवारिक सम्बंध समाप्त होते जा रहे हैं।
5. सरकारी कर्मचारियों के वेतन और सुविधाओं में लगातार वृद्धि के बावजूद ईमानदारी से अपना अपना कार्य कर के समाज में अपना दायित्व निभाता कोई नही दिखता।
6. योग्य व शिक्षित वर्ग की उपेक्षा एक नियम बन गई है।
7. प्रतिदिन निर्दोष लोग हिंसा और दूसरे अपराधों के शिकार होते हैं।
यह जानना रोचक और आश्चर्यजनक है कि वेदों का मानना है कि जिस समाज में कन्याओं/ महिलाओं का शोषण होता है, उस समाज में ही ऐसी स्थिति पाई जाती है। उपरोक्त ब्रह्मजाया सूक्त में स्त्री की उत्पत्ति का वर्णन करने के बाद स्त्रियों की समाज में भूमिका के बारे में बताते हुए कहा है कि वेदों के अनुसार समाजिक मूल्यों के विघटन का मूल कारण, समाज निर्माण के कार्य में महिलाओं की भूमिका को न समझना और महिलाओं की उपेक्षा होता है।
वेदों का मानना है कि संतान के मानसिक और शारीरिक निर्माण में स्त्री की भूमिका गर्भकाल से ही प्रारम्भ हो जाती है। संतान में बाल्यकाल से सामाजिक मूल्यों की अवधारणा, प्राकृतिक सौन्दर्य के प्रति चेतना, अच्छे में रुचि होना आदि माँ की ही समाज को देन होती है। प्रकृति ने जन्म से ही स्त्री जाति को अपने इस सामाजिक दायित्व को निभाने के लिए सक्षम बनाया है और कोई भी शिक्षण संस्था मातृशक्ति की राष्ट्र निर्माण में इस भूमिका की कमी का पूरक कभी नही हो सकती।
ब्रह्मजाया सूक्त के अगले तीन मन्त्रों में कन्याओं के मनोवैज्ञानिक एवम शारीरिक विकास की क्रमश: तीन अवस्थाओं के बारे मे बताया है। ह विकास क्रम अत्यंत ही वैज्ञानिक और तार्किक है। आधुनिक विज्ञान से भी इस विकासक्रम की पुष्टि होती है।
वेद का अगला मंत्र कौमार्यावस्था के आरम्भ से ही कन्याओं को (पापाचारियों से) सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने को राष्ट्र की सुरक्षा जितना महत्व देता है। इस बात को पुष्ट करने के लिए अगले मंत्र में कहा गया है कि पथभ्रष्ट, अनुशासनहीन, अनैतिक, अज्ञानी, समाज में उपेक्षित और वंचित महिलाओं के मैले व खुले बाल एक प्रतीक हैं कि वे माताएं बन कर अपनी संतान को ज्ञानवान और अच्छे संस्कार नहीं दे पाएंगी। इसका दुष्प्रभाव एक महान संकट के रूप में समाज पर विनाशकारी बादल या आकाश से गिरने वाली प्रलयंकारी उल्काओं जैसा होता है। इसलिए स्त्रियों को इतनी सामाजिक सुरक्षा मिलनी चाहिए कि वे सभ्य तरीके से सम्मानपूर्वक अपना जीवन व्यतीत कर सकें। तभी वे अच्छी माताएं बन कर समाज की भी रक्षा करेंगी।
वेद का अगला मंत्र बताता है कि यदि कोई स्त्री पथभ्रष्ट हो ही जाए तो भी युवा ब्रह्मचारियों को उसका उद्धार करना चाहिए। वेदों का मानना है कि इस प्रकार युवतियों को, उनकी छिपी मातृशक्ति पुन: मिल सकती है, जैसा परमेश्वर ने आरम्भ मे उनसे अपेक्षा की थी। उस रूप में वे मानव जाति के विकास के लिए समाज को अच्छी संतान प्रदान कर सकती हैं।
अगले वेदमंत्र में स्त्रियों की रक्षा के दायित्व की चर्चा को और आगे बढ़ाते हुए कहा गया है कि जिस प्रकार पहले सप्तऋषि यह काम किया करते थे, उसी प्रकार उनकी रक्षा का दायित्व हमारा भी है। सप्तऋषि का आधिभौतिक अर्थ मानव शरीर के सात अंग (दो आंख, दो कान, दो नसिका छिद्र, एक मुख) है। इस प्रकार वेद कहते हैं कि हमें स्त्रियों की रक्षा हेतु चौकन्ना रहना चाहिए।
ब्रह्मजाया सूक्त का अगला मंत्र कहता है कि कन्या भ्रूणहत्या से स्त्रियों का नाश होता है जिसके कारण समाज में हिंसा और अपराध का वातावरण बनता है। कन्या भ्रूणहत्या को रोके जाने और स्त्रियों की रक्षा किए जाने पर ही समाज में शांति स्थापित की जा सकती है। इसलिए वेद आगे कहते हैं कि यदि कई पुरूषों द्वारा शोषण से पतित हो चुकी स्त्री का भी विवाह करा देना चाहिए। इससे वह पुन: समाज में प्रतिष्ठित हो जाती है। इसके बाद वेद कहते हैं कि समाज में स्त्रियों की रक्षा और उनका पुनर्वास राज्य का दायित्व है। इस पर होने वाले खर्च को भी राज्य को ही वहन करना चाहिए।
इतना बताने के बाद वेद चेतावनी देते हैं कि यदि किसी राज्य में स्त्रियों का शोषण किया जाए या फिर उन्हें उनकी इच्छा के विरूद्ध जीने के लिए मजबूर किया जाए तो समाज में क्या-क्या संकट पैदा होते हैं।
1. वहां के शासक चारों ओर से सुरक्षा बलों से घिरे होने पर भी अपने आवास में भी स्वयं को सुरक्षित नहीं होते।
2. उस देश के समाज में बुद्धिजीवियों की आवाज नही सुनी जाती। अज्ञानियों का विस्तार और बौद्धिक विद्वानों का विकास रुक जाता है।
3. आभूषणों से सुसज्जित अर्थात् समृद्ध कर्मचारी, शूरवीर क्षत्रिय सैनिक भी अपना दायित्व नहीं निभाते।
4. अश्वमेध यज्ञ के लिए राजा अपने अश्व पर भी नहीं चढ़ पाता अर्थात् उस देश के शासक की दुनिया में कहीं प्रतिष्ठा नहीं होती और उसका अपने पडोसी देशों में भी सम्मान नहीं होता।
5. वहां जलाशयों में कमल के फूल नहीं खिलते, वनस्पतियों के बीज स्वयं नही अंकुरित होते। कुल मिला कर पर्यावरण का नाश होता है।
6. उस देश में गाएं दुधारु नही होती।
7. समाज न ही गाय बैलों से कल्याण ले पाता है (जैविक कृषि नही प्राप्त होती) और महिलाओं की समाज में सक्रिय भागीदारी के अभाव में पुरुष रात्रि में अपराध करने के लिए मुक्त फिरते हैं।
उपरोक्त विवरण को पढऩे से साफ हो जाता है कि हमारे शास्त्र वेद स्त्रियों की रक्षा और उनके सम्मान को कितना महत्व देते हैं। वेदों में इससे विपरीत चलने पर होने वाले परिणामों का कितना सटीक वर्णन किया गया है। आज देश की स्थिति लगभग ऐसी ही है। हमारी गायें दूध कम देती हैं, खेती खराब हो रही है। सर्वत्र अपराध बढ़ रहे हैं। नदियां प्रदूषित हो रही हैं और तालाब नष्ट हो रहे हैं। शासक यानी नेतागण तो इतने असुरक्षित हैं कि जेड प्लस की सुरक्षा में भी हत्याएं हो रही हैं। देश के तीन-तीन प्रधानमंत्रियों तक की हत्या की जा चुकी है। हमारे पड़ोसी देश तो हमारा बिल्कुल भी सम्मान नहीं करते। विद्वानों की बजाय लोकप्रिय व्यक्ति की बात सुनी जाती है।
इसलिए यदि वास्तव में हमें अपने देश में बेटियों को बचाना है तो उन्हें पढ़ाना ही होगा। परंतु क्या आज जो कुछ पढ़ाया लिखाया जा रहा है, उससे इसमें कुछ लाभ होने वाला है? नहीं, उससे कोई लाभ नहीं हो रहा, यह तो कन्या भ्रूणहत्या के राज्यवार आंकड़े बता रहे हैं। इसलिए जरूरी है कि वेदों का यह संदेश जन-जन तक पहुंचाया जाए, लोगों को अपने शास्त्रों की वाणी से परिचित कराया जाए, स्त्रियों का सम्मान करने की भारत की परंपरा का ज्ञान सभी को दिया जाए, तभी यह अभियान सफल हो सकता है। स्त्री सशक्तिकरण के प्रयासों की धारा को भारतोन्मुखी बनाना होगा। पश्चिम के आदर्श स्त्रियों की सुरक्षा करने में सक्षम नहीं हैं। इसके लिए हमें अपने देश के प्राचीन आदर्शों की ओर ही जाना होगा।