समय सिर्फ इतिहास नहीं लिखता

किसी व्यक्ति, संस्था, राजनीतिक दल या किसी व्यावसायिक कार्य पर टिप्पणी करना हमारा प्रयोजन नहीं है, लेकिन यह भी संभव नहीं है कि इस देश की सनातन संस्कृति पर और उसके संरक्षकों पर किए जा रहे अकारण प्रहारों पर चुप रहा जाए। यहां वाणिज्यिक और राजनीतिक स्वार्थों के लिए देश की संस्कृति पर हमले करने की कोशिश हो रही है। गीता प्रेस गोरखपुर को गांधी शांति पुरस्कार मिलने की घोषणा होने के बाद गीता प्रेस के विरुद्ध जिस प्रकार की टिप्पणियां सामने आई हैं, वह अत्यंत विचलित करने वाली हैं। ध्यान देने की बात बात यह है भी कि झूठ और विद्रूप की कई परतें बनाकर एक कपोलकल्पित सत्य गढऩे की कोशिश का एक चलन चल पड़ा है। पहले कोई व्यक्ति एक पुस्तक लिखता है, जो पूरी तरह मनगढ़ंत बातों पर आधारित होती है। कुछ वर्ष बीतने के बाद उस पुस्तक में कही गई कपोलकल्पित बातों को तथ्य बताते हुए गीता प्रेस पर मनगढ़ंत आरोप लगाए जा रहे हैं। अगर किसी को कोई वास्तविक आपत्ति है, तो उसे तथ्यों के साथ सामने आना चाहिए। साधु-संत इस तरह के विवादों में नहीं पड़ते, और गीता प्रेस तो एक जीवित साधु संस्था है। कुतर्क का उत्तर देने के लिए इस स्तर पर न उतरना गीता प्रेस की विवशता हो सकती है।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि गीता प्रेस को श्रृद्धा भाव से देखने वाले भी उसी प्रकार शांत बने रहेंगे। अगर वे उत्तर देने पर उतर आए, तो क्या होगा? गीता प्रेस ने यह कहकर पुरस्कार राशि न लेने से इनकार किया है कि वह दान न लेने के लिए प्रतिबद्ध है। क्या गांधीजी के नाम पर गीता प्रेस पर आक्रमण करने वाले जानते हैं कि गीता प्रेस को दान न लेने की सलाह सबसे पहले स्वयं गांधीजी ने दी थी? राजनीति अपने स्थान पर है, लेकिन क्या सत्य से मुंह फेर कर भी राजनीति की जा सकती है। जो देश ‘सत्यमेव जयतेÓ को ब्रह्मसूत्र मानता है, वह निश्चित रूप से असत्य की पराजय को सुनिश्चित करना भी जानता है। इसी प्रकार एक फिल्म द्वारा हिंदू आराध्यों का उपहास उड़ाने और उसका विद्रूप प्रस्तुत करने का प्रकरण है। वाणिज्यिक सफलता के लिए फिल्मों को विवादित बना देना एक चलन जरूर है। लेकिन इसके लिए हिन्दुओं के आराध्यों की छवि के साथ खिलवाड़ करना वास्तव में सनातन सहिष्णुता का दुरुपयोग करना है। नेपाल में जब इस फिल्म को रोकने की बात आई, तो उससे यह भी स्पष्ट होता है कि भारत में उपलब्ध अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और भारत की व्यापक सनातन सहिष्णुता का कितना भारी दुरुपयोग किया जा रहा है। अगर इस सहिष्णुता और स्वतंत्रता का दुरुपयोग किया जाएगा, इससे पैसे कमाने की या राजनीति साधने की चेष्टा की जाएगी, तो उसके दुष्परिणाम भी निश्चित रूप से भुगतने होंगे।

वास्तव में गीता प्रेस पर किए जा रहे आक्रमण और फिल्म के माध्यम से भारतीय आराध्यों पर किए गए आक्रमण में कोई अंतर नहीं है। दोनों एक ही लक्ष्य के लिए काम करते प्रतीत हो रहे हैं। भले ही उसका अनुमान उन्हें हो या न हो। भारतीय सनातन संस्कृति पर, भारतीय कला पर, भारतीय साहित्य और भारत की सनातन चेतना पर किए जा रहे आक्रमणों का लक्ष्य अंतत: हिन्दू संस्कृति को समाप्त करना और उसके स्थान पर सेमेटिक-अब्राहमिक पंथों को स्थापित करना है। सत्य यह भी है कि भारत की हिन्दू चेतना अब इन हरकतों को बखूबी समझ रही है। इस कारण इन आक्रमणकारियों को भारत की सहिष्णुता का दुरुपयोग करने से बचना चाहिए। वास्तव में वे उसी धर्मनिरपेक्षता, उसी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और उसी राजनीति का विनाश करने जा रहे हैं, जिसकी गोद में अभी वह पनपते नजर आ रहे हैं।

भारत के लिए यह एक क्रांतिक समय है। उसे इन आक्रमणों को न केवल रोकना होगा, बल्कि उन्हें उनके स्रोत की ओर ही वापस धकेलना भी शुरु करना होगा। भारतीय संस्कृति केवल और लगातार आत्मरक्षा के भाव में बने रहने के लिए अभिशप्त नहीं है। अगर भारतीय संस्कृति आत्मरक्षा के लिए ही बाध्य किया जाता रहेगा, तो निश्चित रूप से इसका प्रभाव भारतीय सहनशीलता पर भी पड़ेगा। यह चीज नजर आने लगी है और देश-विदेश के विभिन्न भागों से इसके स्वर भी उठने लगे हैं। यह उन तमाम लोगों के लिए एक चेतावनी के रूप में होना चाहिए, जो अभी अपनी विक्षिप्तता की गहरी अवस्था में हैं। समय सिर्फ इतिहास नहीं लिखता है, समय इतिहास बना भी देता है।