कृषि की भारतीय परंपरा की स्थापना के लिए चले आंदोलन

देश पिछले कुछ समय से विभिन्न प्रकार के आंदोलनों से दो-चार हो रहा है। इसी कड़ी में किसान भी आंदोलन कर रहे हैं। किसानों का आंदोलन करना लोगों को स्वाभाविक भी प्रतीत होता है। खेती की हालत बहुत बुरी है, यह तो सभी जानते हैं। किसानों की आत्महत्याओं के समाचार भी हम अक्सर पढ़ते रहे हैं। किसान और गरीबी तथा खेती और नुकसान अपने देश में मानो पर्यायवाची समान हो गए हैं। इसलिए किसानों के आंदोलन के समाचार ने लोगों में स्वाभाविक सहानुभूति उत्पन्न की। लोगों को लगा कि किसान परेशान हैं तो आंदोलन कर रहे हैं। परंतु ऐसा नहीं था। किसान परेशान तो थे, परंतु वास्तव में जो किसान परेशान थे, वे आंदोलन नहीं कर रहे थे। आंदोलन कर रहे थे अमीर किसान। वे अमीर किसान जो स्वयं खेतों में नहीं जाते, जो बड़े-बड़े खेतों और संपत्ति के स्वामी हैं। वे आंदोलन कर रहे हैं और इसलिए इस आंदोलन में जुटे किसान रूखी-सूखी रोटी नहीं, बल्कि मेवे, हलुआ-पुड़ी की दावत करते हुए धरने पर बैठे हैं। स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि यदि ये किसान इतने समृद्ध हैं तो आंदोलन किस बात के लिए कर रहे हैं?

चिंता की बात यही है कि यह किसान आंदोलन खेती की समस्या को सुलझाने के लिए नहीं हो रहा है। यह किसान आंदोलन गरीब किसानों के मुद्दों को उठाने के लिए भी नहीं हो रहा है। यह किसान आंदोलन हो रहा है उन गरीब किसानों की स्थिति को सुधारने के लिए उठाए गए कदमों का विरोध करने के लिए। हैरानी की बात यह भी है कि इस आंदोलन में अधिकांशत: पंजाब के किसान ही शामिल हैं, जहाँ वे कानून लागू नहीं हैं, जिनका वे विरोध कर रहे हैं। जहाँ ये कानून प्रभावी होंगे, वहाँ के किसानों को इस आंदोलन से मतलब भी नहीं है। यह किसान आंदोलन एक उदाहरण है, जो यह बतलाता है कि किसप्रकार हमारे देश में वास्तविक मुद्दों को भी गलीच चुनावी राजनीति में उलझा दिया जाता है। किसानों की स्थिति वास्तव में ठीक नहीं है। खेती की स्थिति तो और भी खराब है। परंतु उसे ठीक करने के लिए ही सरकार ने कुछ सुधारात्मक कानून बनाए हैं। उन पर देश में ठीक से विमर्श नहीं हुआ, सीधा विरोध प्रारंभ हो गया। होना तो यह चाहिए था कि खेती की दशा को सुधारने के लिए किसान कुछ सुझाव लेकर आते, उन सुझावों को स्वीकार करने के लिए सरकार पर दबाव बनाते। उसके लिए आंदोलन करते। परंतु इस आंदोलन की दिशा ही कुछ और है।

भारतीय परंपरा हमेशा से समस्याओं के सामाजिक समाधान की रही है। आज हर विषय का समाधान राजनीति और सरकार में ढूंढा जाने लगा है। खेती जैसे विषय जोकि भारत के लोकमन से जुड़े रहे हैं, सरकार पर आश्रित होते जा रहे हैं। यह देखना निश्चय ही दुखद रहा है कि पिछले सौ वर्षों से खेती को लेकर सरकारों ने जो नीतियां बनाईं, वे खेती से अधिक उद्योग जगत को ध्यान में रख कर बनाई गई थीं। उन नीतियों को बनाने वालों को न तो भारत की समझ थी, न भारत के सामान्य किसानों की स्थितियों की जानकारी थी और न ही वे खेती की तकनीक से परिचित थे। उन्होंने केवल यूरोप की नकल करना प्रारंभ किया। इसने देश में खेती और किसान दोनों की ही स्थिति खराब कर दी। पंजाब और हरियाणा अधिक उपज करने के कारण देश का पेट भरने वाले राज्य नहीं कहलाते हैं, बल्कि सरकार उनसे अनाज खरीदती है, इसलिए ऐसा कहलाते हैं। परंतु अधिक अन्न उत्पादन के चक्कर में इन दोनों ही राज्यों में रासायनिक खेती की यूरोपीय तरीकों को इतना व्यापक बना दिया गया कि वहाँ का अनाज जहरीला हो गया। इसी पंजाब से राजस्थान जाने वाली एक ट्रेन को कैंसर एक्सप्रेस कहा जाने लगा। कहते हैं कि कृषि रसायनों के अत्यधिक प्रयोग के कारण पंजाब की जमीनें इतनी प्रदूषित हो चुकी हैं कि आरओ से भी उनका जल शुद्ध नहीं होता।

कृषि से हुई इस आय ने पंजाब को आर्थिक रूप से समृद्ध तो बनाया परंतु सांस्कृतिक रूप से दरिद्र बना दिया। कभी विश्व को प्रकाश दिखाने वाला पंजाब आज नशे और रोगों का प्रतीक बन गया है। पंजाब के किसानों ने कभी इसके लिए आंदोलन नहीं किया। जो सिख इस समय देश को बचाने के लिए किए गए गुरुओं के बलिदान की दुहाई दे रहे हैं, उन सिखों ने गुरुओं के वचनों का पालन करने के लिए कभी नशाविरोधी आंदोलन नहीं चलाया। अभी सच्चा किसान आंदोलन होना शेष है। एक ऐसा किसान आंदोलन जो मिट्टी से जुड़ा होगा और जो खेती की वास्तविक चिंताओं से प्रेरित होगा।