पिछले कुछ वर्षों में देखने में आया है कि भारतीयों में अपने नववर्ष के प्रति जागरूकता बढ़ रही है। अब लोग अपना जन्मदिन, विवाह की वर्षगांठ आदि पंचांग की तिथियों के अनुसार मनाने लगे हैं। इसके कई कारण हैं। इनमें एक यह है कि आज सोशल मीडिया का युग है। हर व्यक्ति के हाथ में मोबाइल है। इस कारण कोई भी जानकारी मिनटों में अनगिनत लोगों तक पहुंच रही है। इससे लोगों में हर तरह की जागरूकता बढ़ रही है। हालांकि सोशल मीडिया दो-धारी तलवार है। यह बुराई और अच्छाई दोनों को प्रसारित करता है। लेकिन यह अच्छी बात है कि लोग अच्छाई को स्वीकार कर रहे हैं।
भारतीय नववर्ष (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा) को वैदिक और पौराणिक ग्रंथों में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। यह दिन सृष्टि की रचना, नवचक्र के आरंभ और कई ऐतिहासिक घटनाओं से जुड़ा हुआ है। वेदों, पुराणों और अन्य शास्त्रों में इसे शुभ और मांगलिक दिन माना गया है।
ब्रह्मपुराण के अनुसार, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की थी। इस दिन को सृजन और नव प्रारंभ का दिन माना जाता है। विष्णु पुराण में उल्लेख है कि भगवान विष्णु ने इसी दिन मत्स्य अवतार लिया था और वैवस्वत मनु को ज्ञान प्रदान किया था। इसलिए यह दिन धर्म और संस्कृति की रक्षा का प्रतीक माना जाता है। भारतीय नववर्ष की महत्ता के बारे में गीता, रामायण आदि ग्रंथों में उल्लेख मिलता है। जब भारतीय नव वर्ष प्रारंभ होता है तब प्रकृति में भी बदलाव साफ दिखाई पड़ता है। वसंत ऋतु होती है। चारों ओर बहुत ही सुखद अनुभव कराने वाली हवा मन्द मन्द बहती है। पेड़ों के पुराने पत्ते झड़ जाते हैं और नए पत्ते आते हैं। स्वास्थ्य की दृष्टि से भी यह समय बहुत अच्छा माना जाता है।
भारतीय नववर्ष के प्रारंभ में शक्ति की अधिष्ठात्री देवी मां दुर्गा के विभिन्न रूपों की नौ दिन तक पूजा होती है। यानी एक सच्चा भारतीय अपने नव वर्ष का प्रारंभ अनुष्ठान अथवा संयमित जीवन के संकल्प से करता है। दूसरी ओर ई-सन् के प्रारंभ में तामसिक वातावरण होता है। लोग दारू और मांस की ‘पार्टीÓ करते हैं, अश्लीलता की सारी हदें पार कर जाते हैं। नए साल के नाम पर हर वह काम होता है जिसे निषेध माना गया है। प्रकृति में भी कोई नयापन बदलाव नहीं दिखता है। यानी ई-सन् प्राकृतिक भी नहीं है, जबकि भारतीय नववर्ष पूरी तरह प्राकृतिक है। किन्तु लगभग हजार वर्ष की गुलामी ने हमें अपनी संस्कृति, अपनी प्रकृति, अपने वर्ष, अपने खानपान, अपनी वेशभूषा सबसे दूर कर दिया था। किसी भी देश की, समाज की पहचान उसकी अपनी प्राचीन संस्कृति से ही होती है। इसलिए अपनी संस्कृति को बचाना, उसका पालन करना हर मानव का कर्तव्य है।
किन्तु बीच के वर्षों हम ऐसा नहीं कर पा रहे थे जिसका प्रभाव ये हो रहा था कि आंग्ल नववर्ष के नाम पर 31 दिसम्बर की रात को ‘पार्टी’ मनाते हैं और अपना नव वर्ष कब आया और गया, यह भी पता नहीं रखते थे, लेकिन समय का चक्र अब बदल गया है। अब भारतीयों में अपनी संस्कृति के प्रति गौरव की अनुभूति बढ़ रही है। आप ने देखा होगा कि आज से एक दो वर्ष पहले अंग्रेजी नव वर्ष पर बहुत सारी शुभकामनाएं आती थीं। ऐसी शुभकामनाएं अब कम आती हैं। इसी के साथ चैत्र प्रतिपदा पर शुभकामनाएं प्रेषित करने वाले लोगों की संख्या बढ़ रही है और ये परिवर्तन भारतीय संस्कृति सभ्यता के लिए सुखद है। भारतीय नववर्ष को मनाना या भारतीय कालगणना को मानना भारत वासियों में बढ़ रही साँस्कृतिक और वैज्ञानिक चेतना का परिचायक है।





