वास्तव में कोरोना न कोई नयी बीमारी है, न कोई नया वायरस है। यह सर्दी-जुकाम उत्पन्न करने वाले वायरस समूह का नाम है, जिसकी खोज 1964 में ब्रिटिश वायरोलाजिस्ट डॉ. अल्मेडा ने की थी। इस समूह में कई प्रकार के वायरस होते हैं, जिनका संक्रमण नाक की श्लेष्मकला यानी झिल्ली से शुरु होकर गला-कंठ होते हुए फेफड़ों तक पहुँच कर गंभीर रूप धारण कर लेता है। इस रोग के शुरूआती लक्षण नाक बहना, छींकें आना, हल्के ज्वर के साथ शरीर में पीड़ा आदि होते हैं। इसे सामान्यत: फ्लू, एन्फ्लूएन्जा या सर्दी-जुकाम कहा जाता है। यह विशेष रूप से ऋतु संधिकाल अर्थात मौसम में बदलाव के समय होता है। एक सामान्य व्यक्ति को वर्ष में सामान्यत: 2-3 बार हो ही जाता है।
फ्लू या इन्फ्लूएन्जा के वायरस ए, बी और सी नामक तीन प्रकार के होते हैं। 100 से अधिक विभिन्न वायरस सर्दी-जुकाम पैदा कर सकते हैं। जिस कोरोना को हम वैश्विक महामारी के रूप में जानते हैं, वह कोरोना कुल का एक नया वायरस सक्रिय हुआ है, जो फ्लू के ए वर्ग का वायरस है। इसे विश्व स्वास्थ्य संगठन ने नोवेल कोरोना कोविड-19 नाम दिया है। यह सर्वप्रथम दिसम्बर 2019 ई. में चीन के वुहान शहर में सक्रिय हुआ था।
विषाणु व उसका संक्रमण
वायरस एक अकोशिकीय सूक्ष्म जीव होता है, जिसकी संरचना में नाभिकीय अम्ल व प्रोटीन होता है। यह किसी जीवित कोशिका के संपर्क में आने पर सक्रिय हो जाता है। वायरस एक जीवित कोशिका के आर.एन.ए.- डी.एन.ए को प्रभावित करता है। प्रभावित कोशिकायें तेजी से अपने जैसी विकृत कोशिकाओं का प्रजनन करने लगती है, जिससे वह जीव, पशु या मनुष्य बीमार हो जाता है। संक्रमण काल में मानव शरीर की रोग प्रतिरोधक कोशिकायें सक्रिय होकर वायरस के विरुद्ध कार्य करने लगती है। उनके सबल होने की स्थिति में रोगी स्वत: बिना किसी दवा के ही स्वस्थ होने लगता है। रोगप्रतिरोधक शक्ति के कमजोर होने पर रोगी गंभीर स्थिति में पहुँच जाता है, जिससे कभी-कभी रोगी की मृत्यु भी हो जाती है। यहाँ एक विशेष उल्लेखनीय तथ्य है कि विषाणु एक निश्चित समय में स्वयं प्रोटीन के कवच में बन्द होकर सुषुप्तावस्था में चला जाता है। इस निश्चित अवधि में सबल रोग प्रतिरोधक शक्ति का रोगी स्वत: बिना किसी दवा के ही स्वस्थ हो जाता है।
विषाणु को नष्ट नहीं किया जा सकता है। परन्तु पहली बार संक्रमित व्यक्ति में इसके विरुद्ध रोगप्रतिरोधक शक्ति यानी एण्टीबॉडीज उत्पन्न हो जाती है। सामान्यत: उसे दुबारा संक्रमण नहीं होता है, अथवा होने पर वह बीमार नहीं पड़ता। इसकी चिकित्सा लक्षणों के अनुसार की जाती है, जिसमें कोशिश की जाती है कि रोगी को वायरस के स्वसुषुप्ताकाल में पहुँचने तक जीवित रखा जाय।
आयुर्वेद की दृष्टि में महामारी व बचाव
आयुर्वेद के साथ ही सभी प्राचीन चिकित्सा पद्धतियों में महामारियों के नियंत्रण व चिकित्सा का उल्लेख है। आयुर्वेद में इसे जनपदोध्वंस कहा गया है, जिसके संक्रमण से जनपदों यानी एक निश्चित परिक्षेत्र का विनाश हो जाता है। वर्तमान में आवागमन के संसाधनों के विकास व सहज उपलब्धता के कारण पूरा विश्व एक जनपद बन चुका है। इसलिए कोरोना शीघ्रता से प्रसारित होकर विश्वध्वंस का कारण बन गया है। आयुर्वेद की दृष्टि में कोरोना भी जनपदोध्वंसक व्याधि है। जनपदोध्वंस के नियंत्रण के लिए आचार्यों ने गृह-ग्राम धूपन व उपासना चिकित्सा का उल्लेख किया है। इसके अनुसार गुग्गुल, जटामांसी, भोजपत्र, कदंब फल, कमल पुष्प, नीमपत्ते आदि सूखी औषधियों को गोघृत, मधु, गुड़ और कपूर मिलाकर नित्य धूपन यानी धुआं करना चाहिए। घर तथा शरीर में स्वच्छता रखने के साथ-साथ आवागमन और भीड़ से बचना चाहिए। महामारी के प्रसार काल में अपनी आस्था के अनुसार उपासना करनी चाहिए। इससे मनोबल बना रहता है।
आयुर्वेद की दृष्टि में कोरोना कोविद-19
आधुनिक वैज्ञानिक अध्ययन व सूचनाओं को आयुर्वेद की दृष्टि से देखने पर यह रोग नासागत वात, पित्त और कफ का विषम या कमजोर होने से होता है। इनके साम्यावस्था या सबल होने पर बाह्य विषाणु का कोई प्रभाव नहीं होता है। परन्तु वात, पित्त और कफ के असंतुलित या दुर्बल होने की स्थिति में विषाणुओं का प्रकोप हो सकता है।
वात, पित्त और कफ के असंतुलन से आमदोष यानी अपच तथा एसिडिटी बढ़ जाता है, जिससे इम्यूनिटी यानी व्याधिक्षमत्व कमजोर हो जाता है। परिणामस्वरूप विषाणु का सहज संक्रमण हो जाता है। सबसे पहले कफ का प्रकोप होता है। इसके शान्त न होने पर वात भी प्रकुपित हो जाता है। यदि इस स्थिति में भी रोग नियंत्रित नहीं हो सका तो पित्त भी प्रकुपित होकर पाक उत्पन्न कर देता है। रोग की यह क्रमश: गंभीर स्थिति होती है। दोषों के आधार पर मूलत: चार प्रकार के प्रतिश्याय होते हैं। कफज प्रतिश्याय, पित्तजप्रतिश्याय, वातज प्रतिश्याय और त्रिदोषजप्रतिश्याय। इसके अतिरिक्त किन्ही दो दोषों के एक साथ प्रकुपित होने पर इसके कई अन्य प्रकार भी बनते हैं। जैसे, कफज-वातज तथा कफज-पित्तज आदि।
ज्ञात लक्षणों के अनुसार कोरोनाजनित रोग, आयुर्वेद की शब्दावली में कफज-वातज प्रतिश्याय है, जो व्याधिक्षमत्व की कमजोर स्थिति या उचित चिकित्सा के अभाव में त्रिदोषज होकर गंभीर स्थिति उत्पन्न करता है। इसकी चिकित्सा प्रतिश्याय को ठीक करने वाली औषधियों से की जा सकती है। आयुर्वेद के अनुसार शीत-ग्रीष्म ऋतु के संधिकाल में मौसम के कारण और दिनचर्या की गड़बड़ी से पाचन क्रिया असंतुलित हो जाती है, जिससे शरीर की व्याधिक्षमत्व शक्ति कमजोर हो जाती है। सामान्यत: कफज प्रकृति के व्यक्ति इससे अधिक प्रभावित होते हैं। वातज प्रकृति के व्यक्ति बहुत कम प्रभावित होते हैं।
पित्तज प्रकृति में नगण्य प्रभाव होता है। कोरोना संक्रमण को भी इस सूत्र के अनुसार देखा जाना चाहिए।
व्याधिक्षमत्व
आयुर्वेद के अनुसार व्याधिक्षमत्व के दो महत्वपूर्ण घटक होते हैं, जिन्हे सत्वबल व ओज कहा गया है।
सत्वबल का तात्पर्य मनोबल से है। ओज का तात्पर्य देह, मन और आत्मा के संयुक्त शक्ति है। व्याधिक्षमत्व को बल कहा गया है। यह तीन प्रकार का होता है।
1. सहज बल – यह जन्मजात होता है।
2. काल बल – यह मौसम व ऋतुओं पर आधारित होता है।
3. युक्तिबल – यह औषधि सेवन, उचित आहार, पोषण, व्यायाम, योगादि से अर्जित किया जाता है।
संक्रामक रोगों या महामारी के प्रसार काल में युक्तिबल को बढ़ाना आवश्यक होता है।
व्याधिक्षमत्ववर्धक औषधियाँ
सामान्यत: महामारीकाल में भय-तनाव व विषाद का प्रभाव भी संक्रामक हो जाता है। इससे व्याधिक्षमत्व कमजोर होता है। इसलिए इस स्थिति में ऐसी औषधियों का प्रयोग किया जाना चाहिए जो मानसिक व शारीरिक दोनों स्तरों पर सबलता प्रदान करें। इसके लिए आयुर्वेद में रसायन चिकित्सा का प्रावधान है।
रसायन सेवन का उद्देश्य आयु, मेधा, स्मृतिवृद्धि व आरोग्यलाभ तथा असमय वृद्धावस्था व व्याधि से रक्षा करना है। इसके निम्नलिखित तीन प्रकार हैं।
1. काम्य रसायन – इसका प्रयोग किसी विशेष उद्देश्य जैसे मेधा, स्मृति, बल आदि के लिए किया जाता है।
2. आजस्रिक रसायन – यह नियमित पोषक द्रव्यों जैसे दूध, घी, आदि के सेवन को कहा गया है।
3. नैमित्तिक रसायन – यह रोग विशेष से बचाव के लिए सेवन किया जाता है। यह तत्काल प्रभावी होता है। महामारी काल में इसी वर्ग के रसायनों का सेवन किया जाता है।
प्रयोग विधि के अनुसार रसायन औषधियाँ निम्न दो वर्गो में विभाजित हैं।
1. कुटीप्रवेशिक विधि रसायन – यह विधि पूर्णत: चिकित्सक के देख-रेख में ही प्रयोग की जाती है। आधुनिक शैली में कहा जाय तो वातानुकूलित चिकित्सा कक्ष में वमन, विरेचन आदि कर्म से शरीर का संशोधन करके किया जाता है। इस वर्ग की औषधियों में ब्रह्म रसायन, च्यवनप्राश रसायन, अभयामवकावलेह, आमलक रसायन, पंचार्विन्दघृत आदि हैं।
2. वातातपिक रसायन विधि – इसका प्रयोग सामान्य दैनिक जीवन में किया जाता है। महामारी काल में इन्हीं रसायनों का प्रयोग उपयुक्त होता है।
वर्तमान के कोरोना संक्रमण के बचाव के लिए इस वर्ग की कुछ सहज उपलब्ध रसायन औषधियों का उल्लेख यहाँ किया जा रहा है।
1. अश्वगंधा चूर्ण – 3 से 5 ग्राम नित्य दूध या गुनगुने जल से दिन में एक बार।
2. शतावरी चूर्ण – 3 से 5 ग्राम नित्य दूध या गुनगुने जल से दिन में एक बार।
3. मधुयष्टि (मुलेठी) चूर्ण – 3 से 5 ग्राम नित्य दूध या गुनगुने जल से दिन में एक बार।
5. अश्वगंधा, मधुयष्टि, रससिंदूर (50, 50, 1.5 ग्राम के अनुपात में) मिलाकर 2-3 ग्राम शहद या जल से दिन में एक बार।
6. गिलोयस्वरस 50 मिली या काढ़ा 20 मिली लेना चाहिए। काढ़े में शहद, गुड़, काली मिर्च, दालचीनी, मुलेठी, मुनक्का आदि मात्रानुसार मिलाया जा सकता है।
7. शिलाजित – 500 मिग्रा कैप्सूल बाजार में उपलब्ध हैं, जिसे दिन में एक बार जल या दूध से लिया जा सकता है। इसके साथ गिलो या अश्वगंध या शतावरी या वासा का कैप्सूल भी लिया जा सकता है।
8. नारदीय लक्ष्मीविलास रस- यह बाजार में उपलब्ध है। इसे 250 मिग्रा की मात्रा में दिन में एक बार लिया जा सकता है। परन्तु रसौषधि होने के कारण वैद्य के परामर्श से ही इसका सेवन उचित है। ये रसायन औषधियाँ शीघ्रता से व्याधिक्षमत्व को बढ़ाकर कोरोना कोविद-19 से रक्षा कर सकती हैं।
9. नस्य योग – षडविन्दु तैल, अणुतैल, तुरवक तैल में से किसी एक का नस्य भी लेना चाहिए। इसके लिए प्रात:काल प्रत्येक नासा छिद्र में 4-5 बूँद तैल डाल कर 5 मिनट विश्राम अवस्था रहना चाहिए। इसके बाद नमक मिले गुनगुने पानी से गरारा करना चाहिए।
आयुर्वेदिक औषधियों के मानकीकरण का प्रश्न
हजारों वर्षों से लेकर आज तक मनुष्य आयुर्वेदिक औषधियों के प्रयोग से लाभान्वित होता रहा है। इससे बड़ा क्लीनिकल तो क्या, मानवीय परीक्षण भी विश्व में अन्यत्र दुर्लभ है। इसके बावजूद इन औषधियों के चूहों व खरगोश पर प्रभावों के आंकड़े जुटाने की जिद हास्यापद लगती है। अंतत: यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि रसौधियों के प्रयोग से कोरोना की सफल एवं प्रभावी चिकित्सा प्रबंधन संभव है।
(मूल लेखक डॉ. आर. अचल आयुर्वेद चिकित्सक तथा वल्र्ड आयुर्वेद काँग्रेस के सदस्य हैं)
कोरोना का नया वेरिएंट हमारे पास है जवाब
कोरोना वायरस के नए वेरिएंट – बीएफ.7 को लेकर दुनिया फिर आतंक या कम से कम तनाव का सामना कर रही है। मानवनिर्मित प्रयोगशाला से उत्पन्न भस्मासुर मानव जाति का ही ग्रसण करने की कोशिश कर रहा है। हालांकि ऐसे भस्मासुरों की काफी बड़ी संख्या है, किन्तु, अगर हम सिर्फ कोरोना वायरस के नए वेरिएंट की बात करें, तो सचेत रहने की स्थिति पैदा हो चुकी है। ‘चीन में हुआ है, तो हमें नहीं होगा’, या ‘अभी तो यहां ऐसा कुछ नहीं है’ – इस प्रकार की धारणाएं उचित नहीं हैं।
बीएफ.7 वैरिएंट अचानक सामने नहीं आया है। यह लगभग दो वर्षों से अस्तित्व में है, हालांकि चीन को छोड़कर अभी तक इससे बहुत विशेष नुकसान होने की सूचना नहीं है। स्क्रिप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, फरवरी 2021 के बाद से बीएफ.7 के जेनेटिक मेकअप और म्यूटेशन प्रोफाइल से मेल खाने वाला एक वेरिएंट 91 देशों में मौजूद था। अंत में इसे बीएफ.7 नाम दिया गया और मई 2022 में क्च्र.5 ओमिक्रॉन वंश में जोड़ा गया। इस वैरिएंट का प्रसार दुनिया भर में 0.5त्न बना हुआ है। इस वैरिएंट की पहचान 26 फरवरी 2021 को की गई थी। उसके बाद दुनिया भर में केवल 47,881 अनुक्रमित रोगी सैम्पल्स में इसे देखा गया। वास्तव में पिछले 22 महीनों में बीएफ.7 की तुलना में कहीं ज्यादा संक्रमण ओमिक्रॉन और उसकी उपशाखाओं का हुआ है। जबकि बीएफ.7 की उपस्थिति कई देशों में एक साथ रही है। फिर भी, चीन में बीएफ.7 का उत्पात विनाशकारी है। कौन सा वेरिएंट किस समुदाय के लिए सुग्राही और अति सुग्राही हो जाए, कहा नहीं जा सकता है। निश्चित रूप से इसके कई पहलू हो सकते हैं।
कोरोना की दो लहरों का सामना, बाकी सारे विश्व के साथ-साथ भारत ने भी किया है, और यह कहने में कोई अतिश्यक्ति नहीं है कि संभवत: सिर्फ भारत ने इन लहरों का सामना काफी हद तक सफलतापूर्वक किया है।
इसमें काफी बड़ी भूमिका भारत की नीतियों की, भारतीयों की जीवनशैली की और विशेष तौर पर आयुर्वेद की रही है। आपद् काल ने पूरे विश्व ने आयुर्वेद को स्वीकार किया, लेकिन सांस लेने का मौका मिलते ही फिर वह अपने क्षुद्र स्वार्थों पर उतर आया।
यह आयुर्वेद हमारा रक्षक है, हमारी धरोहर है और हमारी जीवनशैली का हिस्सा है। नया वेरिएंट समस्या पैदा कर सके, उसके पहले फिर एक बार अपनी रक्षा प्रणाली को सचेत और दुरुस्त कर लेना आवश्यक है। इसी कारण, भारतीय धरोहर वायरस रोधी आयुर्वेदिक उपायों का एक कोश प्रस्तुत कर रहा है, जो कोरोना से निपटने में प्रभावी है, पढऩे और अपनाने के साथ-साथ दूसरों को पढ़ाने की दृष्टि से भी उपयोगी है।
कोरोना की चिकित्सा
कोरोना के संक्रमण की चिकित्सा के लिए आयुर्वेद के श्लेष्मवातिक प्रतिश्याय की चिकित्सा प्रभावी सिद्ध होगी। रोग के प्रत्येक स्तर की चिकित्सा के लिए आयुर्वेद में योग उपलब्ध हैं।
त्रिभुवनकीर्तिरस, लक्ष्मीविलासरस नारदीय, मल्लसिन्दूर, यवाखार, सूतशेखर रस, गोदंतीभस्म, कफकेतु रस, कफकर्तरीरस, प्रवालपंचामृत, समीरपन्नग रस, वसंतमालती रस आनन्दभैरव रस, कस्तूरी भैरव रस, राजमृगांक रस आदि प्रतिश्याय, श्वास, कास, क्षय आदि श्वसनतंत्र पर प्रभावी औषधियोग हैं। रस तथा भस्म युक्त होने के कारण इनके प्रयोग से रोगी को तत्काल लाभ मिलता है। इसके अतिरिक्त दार्वीक्वाथ, दशमूलक्वाथ, वासावलेह, वासापत्रस्वरस, सितोपलादि, तालिसादि चूर्ण आदि प्रभावी वनौषधियाँ भी हैं, जिनका स्थिति व आवश्यकतानुसार प्रयोग किया जा सकता है।





